जय जय जय हनुमान
संकटमोचन हनुमान जी को सौंप दो अपनी हर चिंता की डोर, फिर देखी कैसे
जीवन की हर राह आसान हो जाती है
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यह कहानी त्रेतायुग की है, जब स्वयं नारायण ने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के रूप में धरती पर अवतार लिया। आइए, इस पावन कथा की यात्रा पर चलते हैं:
१. अयोध्या का दिव्य जन्म और बाल्यकाल
सरयू नदी के तट पर बसी भव्य नगरी अयोध्या के राजा दशरथ थे। वे सभी कलाओं में निपुण और प्रजाप्रिय थे, लेकिन उनके कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया, जिसक�� फलस्वरूप उनके घर चार दिव्य पुत्रों का जन्म हुआ—राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न।
चारों भाइयों में अपार प्रेम था। श्री राम बचपन से ही शांत, गंभीर और अत्यंत तेजस्वी ��े। जब वे किशोर हुए, तब महर्षि विश्वामित्र उनके पास आए और अपने यज्ञ की रक्षा के लिए राम-लक्ष्मण को साथ मांग लिया। श्री राम ने वन में जाकर ताड़का और सुबाहु जैसे भयंकर राक्षसों का संहार किया और ऋषियों के आश्रमों को सुरक्षित किया।
इसके बाद, विश्वामित्र दोनों भाइयों को मिथिलापुरी ले गए, जहाँ राजा जनक की पुत्री माता सीता का स्वयंवर था। वहाँ भगवान शिव का एक विशाल और भारी धनुष रखा था, जिसे उठाने की सामर्थ्य किसी राजा में नहीं थी। श्री राम ने गुरु की आज्ञा पाकर उस धनुष को सहज ही उठा लिया और जैसे ही उसकी प्रत्यंचा चढ़ाई, वह वज्रध्वनि के साथ टूट गया। इस प्रकार प्रभु राम और माता सीता का अटूट विवाह संपन्न हुआ।
२. वनगमन और पंचवटी का एकांत
विवाह के बाद अयोध्या में उत्सव का माहौल था। राजा दशरथ राम का राज्याभिषेक करना चाहते थे। पूरी नगरी खुशी से झूम रही थी, लेकिन तभी राजा की छोटी रानी कैकेयी की दासी मंथरा ने उनके कान भर दिए। कैकेयी ने राजा दशरथ से अपने दो पुराने वचन मांग लिए:
1. भरत को अयोध्या का राज्य मिले।
2. श्री राम को १४ वर्ष का वनवास भोगना पड़े।
अपने पिता के वचनों की लाज रखने के लिए, श्री राम ने बिना किसी शिकन के, मुस्कुराते हुए राजपाट का त्याग कर दिया। उनके साथ उनकी अर्धांगिनी माता सीता और परम स्नेही भाई लक्ष्मण भी महलों के सुख छोड़कर वन की ओर चल पड़े।
मर्यादा का साक्षात रूप: भगवान राम ने न तो कैकेयी से कोई शिकायत की और न ही भरत के प्रति मन में कोई खोट रखा। उन्होंने कर्तव्य को सर्वोपरि माना।
वे वन-वन भटकते हुए पंचवटी पहुंचे, जहाँ उन्होंने एक सुंदर कुटिया बनाई। वहाँ वे कंद-मूल खाते और प्रकृति के बीच शांति से रहते थे।
३. सीता हरण और हनुमान जी ��े मिलन
शांति के वे दिन तब समाप्त हुए जब लंका के अहंकारी राजा रावण की नजर माता सीता पर पड़ी। रावण ने छल का सहारा लिया। उसने मारीच नाम के राक्षस को सोने का हिरण बनाकर भेजा। सीता जी उस सुंदर हिरण को देखकर मुग्ध हो गईं और राम जी उसे पकड़ने चले गए। पीछे से रावण ने भिक्षुक का रूप धरकर छल से माता सीता का हरण कर लिया और उन्हें आकाश मार्ग से लंका ले गया, जहाँ उसने उन्हें 'अशोक वाटिका' में बंदी बनाकर रख दिया���
जब राम और लक्ष्मण कुटिया लौटे, तो सीता जी को न पाकर प्रभु राम का हृदय भर आया। वे दोनों भाई पागलों की तरह वनों में सीता जी को ढूंढने लगे। इसी खोज के दौरान वे किष्किंधा पहुंचे, जहाँ उनकी मुलाकात वानर राज सुग्रीव और उनके परम भक्त हनुमान जी से हुई।
हनुमान जी ने अपनी अगाध भक्ति और शक्ति के बल पर सौ योजन विशाल समुद्र को एक छलांग में पार किया। वे लंका पहुंचे, माता सीता क��� प्रभु राम की मुद्रिका (अंगूठी) दी और उनके मन में ढाढस बंधाया। जब रावण के सैनिकों ने हनुमान जी की पूंछ में आग लगाई, तो उन्होंने पूरी लंका को ही भस्म कर दिया और वापस आकर प्रभु राम को सीता जी का कुशल-क्षेम सुनाया।
४. महायुद्ध और राम राज्य की स्थापना
सीता जी को मुक्त कराने के लिए प्रभु राम ने वानर सेना के साथ लंका की ओर कूच किया। समुद्र पार करने के लिए नल और नील की देखरेख में वानरों ने पत्थरों पर 'श्र��� राम' लिखकर पानी पर तैरने वाला एक चमत्कारी पुल बनाया, जिसे आज हम राम सेतु के नाम से जानते हैं।
लंका की धरती पर कदम रखकर भी प्रभु राम ने मर्यादा का पालन किया और रावण के पास शांति दूत भेजा। लेकिन अहंकार में डूबे रावण ने युद्ध को चुना। इसके बाद एक ऐसा भयंकर युद्ध हुआ जिसकी गूंज आज भी इतिहास में सुनाई देती है। लक्ष्मण जी ने रावण के पराक्रमी पुत्र इंद्रजीत (मेघनाद) का वध किया। अंत में, विजयादशमी के पावन दिन, भगवान श्री राम ने अपन�� अचूक बाण से रावण की नाभि के अमृत को सुखाकर उसका अंत किया और अधर्म पर धर्म की विजय पताका फहराई।
५. अयोध्या वापसी और दीपोत्सव
१४ वर्ष की अवधि पूरी होने पर, श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण, विभीषण और हनुमान जी के साथ पुष्पक विमान से वापस अयोध्या लौटे। अपने प्रिय राजा के लौटने की खुशी में पूरी अयोध्या नगरी झूम उठी। लोगों ने घी के दीये जलाकर अमावस्या की उस काली रात को उजली सुबह में बदल दिया।जय श्री र���म
हल्दीघाटी साक्षी है भारत के पराक्रम की
अद्भुत-अदम्य वीरता के हर महान क्षण की
ह�� माथ नवाते हैं हमारी धरती के उस सूर्य को
जन्म लेकर जिसने नव प्रकाश दिया शौर्य को”
भारतीय स्वाभिमान के अमिट हस्ताक्षर वीर शिरोमणि पूज्य महाराणा प्रताप जी की जयंती पर कोटि-कोटि नमन!
स्वतंत्रता, स्वाभिमान के वैश्विक प्रतिमान, मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने वाले महान योद्धा, वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप सिंह जी की जयंती पर कोटि-कोटि नमन।
#महाराणा_प्रताप_जयंती
श्री लक्ष्मीनारायण (गोलोकधाम), प्रभासक्षेत्र - गुजरात (सौराष्ट्र)
दिनांक: 07 जून 2026, अधिक ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी - रविवार
06269478
भगवान कृष्ण एवं बलदाऊ के देहोत्सर्ग तीर्थ पहुंचने के लिए लोकेशन लिंक:🛕📍https://t.co/3maLGcO4rM
हमारा देश और सनातन धर्म सुरक्षित है, तभी हम सब सुरक्षित हैं।
आज देवभूमि उत्तराखण्ड के पौड़ी गढ़वाल स्थित श्री हरि विष्णु पंचदेव मंदिर, पंचूर में आयोजित ��्राण-प्रतिष्ठा समारोह एवं श्री श्री हरि विष्णु महायज्ञ में सम्मिलित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
इस अवसर पर पूज्य साधु-संतों एवं धर्माचार्यों की भी गरिमामयी उपस्थिति रही।
मां भारती के अमर सपूत, स्वाधीनता के कालजयी स्वर, ‘वीर शिरोमणि’ महाराणा प्रताप जी की जयंती पर उन्हें कोटिशः नमन!
‘स्वदेश, स्वधर्म और स्वाभिमान’ की रक्षा हेतु अपना सर्वस्व समर्पित कर देने वाले महाराणा प्रताप जी भारतीय इतिहास के ऐसे महानायक हैं, जिन्होंने कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी मातृभूमि की आन, बान और शान से कभी समझौता नहीं किया।
उनका त्यागमय, पराक्रमी और राष्ट्रनिष्ठ जीवन आज भी प्रत्येक भारतवासी के हृदय में मातृभूमि के प्रति श्रद्धा, समर्पण और राष्ट्रभक्ति का भाव जागृत करता है तथा साहस, शौर्य और आत्मसम्मान के साथ राष्ट्रसेवा के पथ पर ���गे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
देश सदैव उनके अद्वितीय बलिदान और वीरता का ऋणी रहेगा।
��ीरता और पराक्रम के अमर प्रतीक, देश के महान योद्धा महाराणा प्रताप को उनकी जयंती पर आदरपूर्ण श्रद्धांजलि। उन्होंने मातृभूमि की आन-बान और शान की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनके अदम्य साहस और अटूट स्वाभिमान की गाथाएं युगों-युगों तक देशवासियों के हृदय में राष्ट्रभक्ति का दीप प्रज्वलित करती रहेंगी।