मैंने भला क्या ही चाहा था तुमसे? बस इतना कि किसी रोज़, बिना किसी कारण के, तुम अचानक कह दो- "मेरे हो तुम" तुम्हें तो ज्ञात था तुम्हारे इतना कह देने मात्र से मेरा होना सार्थक हो जाता, मेरी वर्षों से ठहरी तमाम उम्र की प्रतीक्षा उसी क्षण अपने अंतिम पड़ाव तक पहुँच जाती..
जब बाहर का शोर बहुत बढ़ जाता है, और उम्मीदों के सारे पक्के मकान एक-एक करके ढहने लगते हैं, तब मैं अपने भीतर की उस शांत, अनजानी गली में लौट जाता हूँ। वहाँ आज भी एक चिराग जल रहा है, जिसे मैंने दुनिया की तेज़ हवाओं से छुपाकर, अपनी हथेलियों की ओट में ज़िंदा रखा है। 🖤
"35 साल की उम्र पार करने के बाद आज मैं अपनी लाइफ को इस मोड़ पर समझ पाया हूँ कि अगर मुझे एक तिनका भी चाहिए, तो उसके लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। मेरी लाइफ में लक, डेस्टिनी या ऑपर्च्युनिटी जैसे शब्दों का कोई वजूद नहीं है।"
सुख महज़ एक छलावा था,जिसमें न जाने कब से मैं सदियों की नींद सो रहा था।जब हक़ीक़त की ठोकर लगी और मैं संभला,तो जाना कि दुःख ही एकमात्र शाश्वत सत्य है।मैं तो बस इसी महा-दुःख का एक अंश हूँ,उसी के बीजों से पनपा एक अदना सा वजूद।आदि से अंत तक,मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ दुःख से ही निर्मित हूं।
ये अकेलापन है या अधूरापन, पता नहीं पर जो भी है उदास करता है... पर मन में कुछ है जो किसी से कहना है पर सबसे नहीं कोई एक विशेष सा जो स्थाई हो मेरे साथ, बीती बार की तरह अधूरा छोड़ देने वाला नहीं अंत तक साथ रह सकने वाला.. बस उससे मन का हर भाव हर ख्याल कह देना चाहता हूं...!!!