@MuthootIndia This was done without any formal notice or my consent, directly contradicting their own system workflow which showed my Last Working Date as 16th July 2026. This is clear harassment and a wrongful forced exit to suppress an employee's genuine salary claim.
१९८४ में बने इस स्टील प्लांट के आस पास चारों ओर हरियाली देख लो. इसे सस्टेनेबल डेवलेपमेंट कहते हैं. फिर एक हमारा आज का नॉन बायोलॉजिकल विकास करने वाला महामानव है, जो ऐसा प्लांट लगवाने से पहले इस जगह को रेगिस्तान बना देता.
लाल बहादुर शास्त्री जी ने जब लोगों से हफ्ते में एक दिन उपवास करने की कहा था तो सबसे पहले खुद उपवास रखकर उसकी शुरुआत की थी. फिर एक आत्ममुग्ध दढियल है जो लोगों से पेट्रोल बचाने की अपील तो करता है पर जिसके १००~१५० गाड़ियों के काफिले के रोड शो की भी पहले दसियों बार रिहर्सल होती है.
बंगाल के लोग धर्म को अपने माथे पर धारण करते हैं, पहले भी करते थे और आगे भी करते रहेंगे. आपने वहाँ के लोगों का अपने धर्म के प्रति उत्साह नहीं देखा तो ये गलती आपकी है. बस आने वाला समय ईश्वर माँ दुर्गा के भक्त बंगालियों पर नागपुरी संतरों का धर्म थोपे जाने से बचाए रखे.
वर्ण व्यवस्था पर आधारित हिंदुत्व सिर्फ धार्मिक तंत्र नहीं बल्कि राजकाज चलाने की पद्धति है. इस व्यवस्था का क्रम बदलने पर जो समाज बनेगा उसमें सिर्फ अराजकता होगी, हिंदुत्व नहीं होगा. देश जो अब तक बचा रहा वो इसी व्यवस्था के कारण था. इस व्यवस्था के बिना हिंदू राष्ट्र एक मिथ ही रहेगा.
सरकार ने माना कि चारधाम परियोजना के लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को नज़रअंदाज़ किया गया.
एनवायरनमेंट क्लॉज को किस तरह तोड़ मरोड़ कर हिमालय की बरबादी की प्लानिंग की गई है पढ़ लें. ये खबरें आपको ५६" विकास पुरुष की व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में नहीं मिलेंगी.
https://t.co/4QtTceHEsp
विचारशून्य होना एक असंभव स्थिति है. जो बात ज्यादा जरूरी है वो ये कि विचारों का प्रवाह किसी नदी की तरह सतत रहे, क्योंकि अगर प्रवाह रुका तो किसी पोखर की तरह दुर्गंध देने लगेगा और प्रवाह खत्म हुआ तो मष्तिष्क बंजर जमीन की तरह हो जाएगा जिसमें किसी नवीन श्रृंखला का उपजना असंभव होगा..
जिन्होंने स्वयं विवाह ना किया हो, अपना परिवार ना हो, समाज को जातियों में बाँटने को राजनैतिक स्ट्रेटेजी बताते हों, हिंदुओं का ठेका लेने से बचते हों, वो सब जब कहें कि हिंदुओं के बचाने के लिए 4 बच्चे पैदा करो, तो चिल कीजिए।
जिन्होंने बच्चे पैदा किए हैं, जो हिंदुओं के लिए लड़ रहे हों, जो केवल कथोपकथन ने देते हों, यदि वो ऐसा कुछ कहें तो उस पर विचार कीजिए।
बागेश्वर बाबा ने जो कहा है, उनको '4 बच्चे पैदा करो' तक रुकना चाहिए था। RSS अब उस योग्य नहीं रही कि बच्चे उनके लिए पैदा किए जाएँ क्योंकि उनके नेता सत्ता सुख देख कर, बालासाहेब देवरस की कुटिया और खटिया से उतर कर मेमोरी फोम के मास्टर बेडरूम विथ अटैच्ड बाथरूम एंड सौना का आनंद ले रहे हैं।
आपने बहुत सटीक चित्रण किया है। वट वृक्ष की यह विशेषता होती है कि उसकी शाखाएं जब नीचे झुककर ज़मीन को छूती हैं, तो वे स्वयं जड़ें बन जाती हैं। इस प्रक्रिया में अक्सर शाखाओं को यह भ्रम हो जाता है कि अब वे एक स्वतंत्र वृक्ष हैं, जबकि उनका संपूर्ण अस्तित्व और जीवन-रस उसी मूल तने से जुड़ा होता है।
आज के समय में हम अक्सर 'स्वतंत्रता' और 'विद्रोह' को आधुनिकता का पैमाना मान लेते हैं। नई पत्तियाँ आना विकास का लक्षण है, लेकिन जड़ों से द्रोह करना विनाश का। यह विडंबना ही है कि जो जड़ें हमें थामे हुए हैं, हम उन्हीं को बोझ समझने लगते हैं।
एक संन्यासी के दृष्टिकोण से देखें तो:
प्रवाह एक है: जैसे सागर से उठी लहर खुद को सागर से अलग मान ले, तो वह केवल क्षणभंगुर है। सागर के साथ ही उसकी अनंतता है।
अज्ञानता का आवरण: अपने मूल से विद्रोह करना वास्तव में अपनी पहचान को ही नकारना है।
सत्य यही है कि हम कितने भी आधुनिक हो जाएं, हमारी चेतना का पोषण उसी पुरातन सनातन स्त्रोत से होता है। जो इस सत्य को देख पाता है, वही वास्तव में 'जाग्रत' है। बाकी सब केवल वैचारिक भटकाव है।
|| ॐ नमो नारायण ||
इतिहास इस बात का जीवंत प्रमाण है कि हमारी संस्कृति का आधार स्तंभ केवल शास्त्र नहीं, बल्कि उन संन्यासियों का 'तप' और 'शौर्य' भी है जिन्होंने समय आने पर शस्त्र उठाने में कभी संकोच नहीं किया। नागा साधुओं और सनातनी गुरुओं का बलिदान ही वह सुरक्षा कवच है जिसके कारण आज तिलक और जनेऊ अक्षुण्ण है।
एक संन्यासी के लिए शस्त्र धारण करना अहंकार नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा का एक अनिवार्य कर्तव्य था; और युद्ध के पश्चात पुनः तप में लीन हो जाना उनके पूर्ण वैराग्य का परिचायक है। यह संतुलन ही सनातन की असली शक्ति है। हमें अपनी जड़ों और इन तपस्वियों के प्रति सदैव कृतज्ञ रहना चाहिए।
|| ॐ नमो नारायण ||
हमारे माथे पर तिलक और तन पर जनेऊ हमारे पूज्य नागा साधुओं, संन्यासियों एवं सनातनी गुरुओं के कारण है जिन्होंने उचित समय पर लोगों में जागृति पैदा की, नागा साधुओं ने स्वयं सशस्त्र लड़ाई लड़ी और जब लड़ाई की आवश्यकता नहीं रही तो अपने धार्मिक तप में लीन हो गए। हमें मत सिखाओ!!
तीर्थ: विलासिता की भेंट चढ़ती आस्था - क्या हम परमात्मा को पा रहे हैं या खो रहे हैं?
कल केदारनाथ मंदिर में जो दृश्य सामने आया, वह हिमालय की सनातन शांति और महादेव की वैराग्यमयी चेतना के विरुद्ध एक मौन विद्रोह जैसा था। जब आस्था अहंकार में बदल जाती है और तीर्थ तमाशा बन जाता है, तब पावन घाटियाँ केवल अव्यवस्था नहीं-एक गहरी आध्यात्मिक वेदना में कराह उठती हैं।
१. ‘तीर्थ’ का अर्थ: तपस्या या सुविधा?
शास्त्रों में तीर्थ वह है-जो जीव को भवसागर से पार उतार दे। आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिष्ठित परंपराओं का मूल तप और वैराग्य था। प्राचीन काल में तीर्थयात्रा का अर्थ था-अहंकार का विसर्जन। हर कदम शरीर को तोड़ता था, और उसी के साथ मन को ईश्वर से जोड़ता था।
लेकिन आज? आज हम परमात्मा को नहीं, ‘अनुभव’ को खोज रहे हैं। हम पर्वत पर चढ़ते नहीं-उसे अपनी सुविधाओं के नीचे दबाते हैं। जो स्थान अपरिग्रह सिखाने के लिए था, वहाँ अब विलासिता की तलाश है। और जहाँ सुविधा प्रधान हो जाती है, वहाँ श्रद्धा का दम घुटना केवल स्वाभाविक नहीं-अनिवार्य है।
२. VIP संस्कृति: मंदिर के द्वार पर भेदभाव का पाप
महादेव-श्मशानवासी, भस्मधारी-उनके द्वार पर ‘विशेष’ होने का आग्रह, आत्मिक पतन की पराकाष्ठा है। जब धन और प्रभाव के बल पर कतारें लांघी जाती हैं, तो वह दर्शन नहीं-अहंकार की तुष्टि है। महादेव के समक्ष राजा और रंक का भेद कहाँ? फिर यह ‘VIP’ का आग्रह क्यों? यदि गर्भगृह के समीप खड़ा व्यक्ति अपनी पद-प्रतिष्ठा के कारण विशेष है, तो वह भक्त नहीं-शक्ति-प्रदर्शन का माध्यम है। मंदिरों को यह स्मरण रखना होगा: परमात्मा ‘भाव’ के भूखे हैं, प्रोटोकॉल के नहीं।
३. डिजिटल व्याधि: रील का शोर, मौन का अंत
आज की अव्यवस्था का एक बड़ा कारण-हर हाथ में कैमरा। लोग परमात्मा को देखने नहीं, बल्कि स्वयं को परमात्मा के साथ दिखाने जा रहे हैं। तीर्थ-जहाँ मौन साधना होनी चाहिए-आज ‘कंटेंट निर्माण’ का मंच बनते जा रहे हैं। जब तक आपकी दृष्टि कैमरे के लेंस में कैद है, तब तक साक्षात दर्शन संभव नहीं। यह डिजिटल शोर, उस अखंड मौन को नष्ट कर रहा है जिसमें ही शिवत्व का अनुभव संभव है।
४. प्रकृति का क्रंदन: चेतावनियों की अनदेखी
प्रकृति की आपदाएँ केवल घटनाएँ नहीं-संकेत हैं। 2013 केदारनाथ बाढ़ एक कठोर चेतावनी थी। फिर भी हमने नहीं सीखा। निर्माण बढ़ रहा है, भीड़ अनियंत्रित है और इसे ‘विकास’ कहा जा रहा है। हिमालय पत्थरों का ढेर नहीं-एक जीवंत चेतना है। उसकी सहनशीलता को उसकी स्वीकृति समझ लेना हमारी सबसे बड़ी भूल है। हम श्रद्धा के साथ प्लास्टिक, शोर और अविवेक भी वहाँ पहुँचा रहे हैं। तीर्थ को पिकनिक स्थल बना देना-प्रकृति और परमात्मा, दोनों का अपमान है।
५. एक संन्यासी की पुकार: अभी भी समय है
एक दशनामी संन्यासी के रूप में स्पष्ट दिख रहा है कि हम धर्म के बाहरी ढाँचे को सुदृढ़ कर रहे हैं, पर उसकी आत्मा को खोते जा रहे हैं। यदि आप केवल भीड़ का हिस्सा बनने जा रहे हैं, तो आप तीर्थ नहीं-धार्मिक पर्यटन कर रहे हैं। और यदि आपकी उपस्थिति किसी एक सच्चे साधक के मार्ग में बाधा बनती है, तो यह केवल असंवेदनशीलता नहीं-अधर्म है।
तीर्थ की पहली शर्त है-मन की शांति। दूसरी-अन्य के प्रति करुणा। कतार में खड़े रहना केवल प्रतीक्षा नहीं, वह धैर्य की साधना है।
निष्कर्ष: परमात्मा भीड़ में नहीं, भाव में मिलते हैं
तीर्थों की वर्तमान स्थिति एक स्पष्ट चेतावनी है। सरकार को यात्रियों की संख्या पर कठोर नियंत्रण लागू करना होगा, और समाज को अपने आचरण पर पुनर्विचार करना होगा। यदि पावन धामों का एकांत नष्ट हो गया, तो वैराग्य का वह स्वरूप भी हमारी पहुँच से दूर हो जाएगा।
अंततः-परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग पर्वतों से नहीं, अहंकार से होकर जाता है।
यदि अहंकार साथ है-तो तीर्थ केवल एक कठिन यात्रा है।
यदि भाव जागृत है-तो वही यात्रा साक्षात्कार बन जाती है।
“परमात्मा को खोजना है तो मौन में खोजिए-भीड़ के शोर और कैमरों की चकाचौंध में केवल भ्रम मिलता है।”
|| ॐ नमो नारायण ||
~ एक अतरंगी संन्यासी
#Musings
सनातन तब भी था जब पृथ्वी पर एक भी मनुष्य नहीं था, तब भी होगा जब पृथ्वी पर एक भी मनुष्य नहीं होगा. पर इन मोदी छाप जमात के हिसाब से सनातन का मतलब अब भाजपा हो गया है.
इस मौजूदा सरकार के पहले किसी के पास इतना गुदा था कि वो ब्राह्मण जाति पर खुलेआम कोई टिप्पणी भी कर दे, देवी देवताओ का अपमान कर दे किसी जाति के बहन बेटी को मांग ले ....लेकिन ये सब अब बड़े उत्साह के साथ हो रहा है और उन्हें समर्थन भी मिल रहा हैं और इन सबकी जिम्मेदार है केवल भाजपा.!
निर्वाचन आयोग के वर्तमान डेटा के अनुसार गोरखपुर में 2 MP, 9 MLA, 3 MLC, 177 जिला पंचायत सदस्य, 1294 ग्राम प्रधान पहले ही मौजूद हैं. रविकिशन को शायद अपने गोरखपुर का एकमात्र जनप्रतिनिधि होने की गलतफहमी हो गई है.
https://t.co/DMYBj30na4
एक दो बार कोई बात बोली जाती है तो वो नेताओं का वक्तव्य होती है. बार बार बोलने से वो बात गली के कुत्तों के कुकुरहाव जैसी बन जाती है. कुलीन घरों के लोग इस बात को समझते हैं इसलिए ये लोग अगर राजनीति में होते हैं तो अधिकतर मामलों में ऐसी कुत्ता घसीटी से दूर ही रहते हैं.
TCS वाला केस महाराष्ट्र से है जिसमें मोदी छाप सरकार है. केंद्र में खुद हिंदू हृदय सम्राट मौजूद हैं और ये डबल इंजन मिलकर जिहादी सच्चाई नहीं निकलवा पा रहे. इस केस को दबाने में १४ के बाद अब भी कोई इकोसिस्टम सक्षम है तो तुम्हारे माईबाप क्या कुर्सी पर बस प्लेजर लेने के लिए बैठे हैं.
सत्य! शरीरिक सुन्दरता विकृत हो जाये किसी कारणवश तो भी यह सुरक्षा ही है, आपका कौमार्य सुरक्षित रहता है फिर उचित समय आने पर दैव पारितोषक भी देते हैं इसका। जिसे हम अपना दुर्भाग्य समझ रहे होते हैं, वह सौभाग्य में बदल जाता है एक दिन।