🚨#Important
I have filed a formal complaint with the Delhi Police against those who unlawfully entered my residence in my absence, seeking charges of criminal house-trespass, criminal intimidation, defamation, and criminal conspiracy.
Such acts of intimidation will neither silence me nor cower me down. When the time comes, they will pay.
Thank you to my lawyers @_ayushrivastava and Krishnesh Bapat for doing this at such short notice. Youth will prevail! ✊🏻
Safai Karmacharis from more than 10 states, families of persons killed in sewer & septic tanks, MPs, civil society, writers, students, gathered to condemn the continuing illegal practice of forcing citizens into cleaning of sewer & septic tanks, and getting killed. #stopkillingus
PM Abhijeet Dipke should tell how he managed to study in foreign
HM Saurav Das should tell how much his rent is & how he affords that house
Only Common man Narendra Modi shouldn’t be questioned on
-PM Cares fund,
-Zero press conference &
-Entire political science degree🙂🙂
Why is nobody talking about them? Simple. Because they are India’s marginalised!
India’s middle-class and the so-called upper castes are deaf, blind and mute to the cries of the Dalits and Adivasis. There is no outrage. No candlelight protest. No solidarity.
Mark my words. This very lack of accountability in governance and authoritarianism that harms the marginalised will soon begin to affect the middle-class. The systematic decay will consume them too!
By the time the urban middle class finally decides to care, because the rot has finally reached their own doorstep, it will be too late.
“50 ग्राम ड्रग्स की पुड़िया जेब में रख दूंगा जमानत भी नहीं होगी”
प्रदर्शन में आए students को देवेंद्र फडणवीस की पुलिस झूठे केस में फँसाने की धमकी दे रही थी
लेकिन students का reaction बता रहा है उन्हें रत्तीभर भी डर नहीं है
शाबाश Gen Z - so proud of you!
प्रधानमंत्री मोदी ने छात्रों को लेकर फास्ट ट्रैक कोर्ट की बात कही। यह एक तरह का जुमला है। इस मामले के मुख्य सूत्रधार को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया गया है।
मोदी जी, लोग बेवकूफ नहीं हैं। आपकी चाल लोग समझ रहे हैं। मोदी जी, देश बेचने का काम मत कीजिए।
#महाराष्ट्र_बंद
आरएसएस और भाजपा ने अपना असली रंग दिखाना शुरू किया है। अगर आप हमारी बात मानते नहीं हो, तो आपको मिटाया जाएगा। यही बात दिल्ली के विद्यार्थियों के साथ भाजपा ने की। छात्रों को पीटा गया, घायल किया गया।
एक नया जनरल डायर उभरा है। इसके खिलाफ वंचित बहुजन आघाड़ी और छोटे-छोटे दलों ने एक साथ मिलकर 23 जुलाई को महाराष्ट्र बंद का ऐलान किया है।
सभी से दरखास्त है कि अपने बच्चों का भविष्य उज्ज्वल बनाने के लिए इस बंद में पूरी ताकत से शामिल होइए।
: ॲड. प्रकाश आंबेडकर
राष्ट्रीय अध्यक्ष, वंचित बहुजन आघाडी
#23_जुलै_महाराष्ट्र_बंद #महाराष्ट्र_बंद #Students #NEETExam
“जल्दी निकल जाओ, वरना कपड़े फाड़कर तुम्हें नंगा भगाएंगे”
एक रोती हुई लड़की ने बताया कैसे कई पुलिसवाले सिविल ड्रेस में थे और मां-बहन की भद्दी गालियां देकर मार रहे थे
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ वालों की असलियत
आज जंतर-मंतर से सैकड़ों छात्रों को हिरासत में लिया गया, जिनमें से लगभग 80 छात्रों को दिल्ली पुलिस छत्रसाल स्टेडियम लेकर गई। उन्हें वहाँ रात लगभग 9 से 9:30 बजे तक रखा गया और उसके बाद अलग-अलग पुलिस वाहनों में बैठाकर विभिन्न पुलिस स्टेशनों में ले जाया गया।
रात लगभग 12:30 बजे से 1 बजे के बीच हमें कुछ छात्रों के परिवारजनों का फोन आया। उन्होंने बताया कि लगभग 6–7 छात्रों को मुखर्जी नगर थाने लाया गया है। परिवार वालों का आरोप था कि उन्हें अपने बच्चों से मिलने नहीं दिया जा रहा, कई छात्रों के फोन तोड़ दिए गए हैं और पुलिस अधिकारी यह तक बताने को तैयार नहीं हैं कि उन्हें केवल हिरासत में लिया गया है या गिरफ्तार किया गया है, अथवा उनके विरुद्ध कोई FIR दर्ज की गई है। यहाँ तक कि वकीलों को भी उनसे मिलने की अनुमति नहीं दी जा रही थी।
रात लगभग 2 बजे हम मुखर्जी नगर थाने पहुँचे। वहाँ जो हुआ, उसे देखकर यकीन करना मुश्किल था कि जिस पुलिस को हम कानून का रक्षक मानते हैं, वह कभी-कभी नागरिकों के अधिकारों के प्रति इतना असंवेदनशील व्यवहार भी कर सकती है।
हमने पहले बिना कैमरा चालू किए लगभग 15 मिनट तक अधिकारियों से बातचीत करने और जानकारी लेने की कोशिश की। लेकिन किसी भी अधिकारी ने कोई उत्तर देने से इनकार कर दिया। मजबूर होकर हमें कैमरा चालू करना पड़ा।
हमने देखा कि छात्रों को अलग-अलग पुलिस वाहनों में बैठाया जा रहा था और उन्हें किसी अन्य स्थान पर ले जाने की तैयारी हो रही थी। जब पूछा गया कि उन्हें कहाँ और क्यों ले जाया जा रहा है, तो कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिला। कई पुलिस अधिकारी कैमरे से अपना चेहरा छिपाते दिखाई दिए। हमने थाना प्रभारी से मिलने की भी कोशिश की, लेकिन उन्होंने भी मिलने से मना कर दिया।
इसी पुलिस स्टेशन में महात्मा गांधी की तस्वीर लगी हुई है और डी.के. बसु (D.K. Basu) दिशानिर्देशों का उल्लेख भी किया गया है। कानून स्पष्ट है—किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने पर उसके परिवार को सूचित किया जाना चाहिए और उसे अपनी पसंद के वकील से मिलने तथा कानूनी सलाह लेने का अवसर दिया जाना चाहिए।
पुलिस का कहना था कि छात्रों को मेडिकल परीक्षण के लिए ले जाया जा रहा है। लेकिन यदि उन्हें कई घंटे पहले ही हिरासत में लिया गया था, तो रात 2 बजे अचानक मेडिकल कराने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इस प्रश्न का भी किसी के पास कोई उत्तर नहीं था।
यह वीडियो लगभग 17 मिनट का है, लेकिन यदि आप इसे पूरा देखेंगे तो समझ पाएँगे कि किस प्रकार जवाबदेही की जगह केवल “ऊपर से आदेश है” कहकर संवैधानिक और कानूनी दायित्वों से बचने की कोशिश की जाती है।
कई छात्रों ने आशंका व्यक्त की है कि जंतर-मंतर से हिरासत में लिए गए छात्रों के विरुद्ध झूठे या अनुचित FIR दर्ज किए जा रहे हैं। परिवारजनों ने हमें यह भी बताया कि जब उन्होंने पुलिस अधिकारियों से जानकारी माँगी तो उन्हें कहा गया कि “घर चले जाइए, नहीं तो आपके ऊपर भी FIR दर्ज कर दी जाएगी।”
यदि कोई सामान्य नागरिक अपने हिरासत में लिए गए बेटे, बेटी, भाई या बहन से मिलने की भी कोशिश न कर सके और पुलिस का रवैया ऐसा हो, तो सोचिए उन परिवारों पर क्या बीतती होगी।
यदि इस देश के युवा शांतिपूर्ण ढंग से अपने अधिकारों की माँग कर रहे हैं, तो क्या उनके साथ लाठीचार्ज करना और आधी रात को इस प्रकार का व्यवहार करना उचित है? क्या पुलिस की भी कोई जवाबदेही नहीं है?
हर अधिकारी का केवल एक ही उत्तर था - “ऊपर से आदेश है।” लेकिन यह “ऊपर” कौन है? आदेश किसने दिए? और क्या कोई भी आदेश संविधान और कानून से ऊपर हो सकता है?
यह वीडियो लंबा है, लेकिन यदि संभव हो तो इसे पूरा अवश्य देखिए। विशेष रूप से मेरे सभी अधिवक्ता साथियों और कानूनी समुदाय से मेरा आग्रह है कि इस पर अपनी आवाज़ उठाएँ। कानून-व्यवस्था की पहली सीढ़ी एक पुलिस थाना होता है। यदि राजधानी दिल्ली में, हर विरोध प्रदर्शन के दौरान, पुलिस मानवाधिकारों और कानूनी दिशानिर्देशों की अनदेखी करती रहे, तो यह केवल प्रदर्शनकारियों का नहीं बल्कि पूरे विधि-तंत्र का प्रश्न बन जाता है।
यदि देश की राजधानी में यह स्थिति है, तो देश के दूर-दराज़ इलाकों में नागरिकों के साथ क्या हो रहा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है।
सवाल बड़े हैं। लड़ाई लंबी है। लेकिन जहाँ भी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की आवश्यकता होगी, हम अपने साथियों के साथ खड़े रहेंगे।
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