#Operation_2030#AcharyaPrashant
🕯क्यों जरूरी है एक इसे एक बार ध्यान से जरूर पढ़े।
🔮 2030 तक Climate Change के संभावित प्रभाव:
अगर ग्लोबल वार्मिंग 1.5°C या उससे ऊपर चली जाती है, तो 2030 तक ये गंभीर असर दिख सकते हैं:
🌡️ 1. अत्यधिक तापमान और हीटवेव:
गर्मी की लहरें और लू ज़्यादा बार और ज़्यादा खतरनाक होंगी, खासकर भारत, अफ्रीका, और मिडिल ईस्ट में।
🌊 2. समुद्र स्तर में वृद्धि और बाढ़:
समुद्रों का स्तर बढ़ेगा, जिससे तटीय इलाकों में बाढ़ और विस्थापन (displacement) बढ़ेगा।
निचले द्वीप (जैसे मालदीव) डूबने के कगार पर होंगे।
🌾 3. खेती और खाद्य संकट:
सूखा, बेमौसम बारिश, और गर्मी से फसलें खराब होंगी।
खाद्य आपूर्ति घटेगी और महंगाई बढ़ेगी।
🦠 4. स्वास्थ्य पर असर:
गर्मी से मौतें बढ़ेंगी।
मच्छरजनित बीमारियाँ (जैसे डेंगू, मलेरिया) नए क्षेत्रों में फैलेंगी।
🏃♂️ 5. जलवायु शरणार्थी (Climate refugees):
लाखों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर होंगे, खासकर सूखा या बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में।
🇮🇳 भारत में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव (2025–2030)
🌡️ 1. अत्यधिक गर्मी और हीटवेव
2025 में भारत और पाकिस्तान में रिकॉर्ड-तोड़ गर्मी दर्ज की गई, जिसमें तापमान सामान्य से 5–8°C अधिक रहा।
भविष्य में "oppressive heatwaves" (उच्च तापमान और उच्च आर्द्रता) की आवृत्ति में वृद्धि की संभावना है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए अधिक खतरनाक हैं।
🌾 2. कृषि पर प्रभाव
2015 से 2021 के बीच, भारत ने अत्यधिक वर्षा और सूखे के कारण लगभग 69 मिलियन हेक्टेयर फसलों का नुकसान झेला।
2030 तक, गर्मी के तनाव के कारण कार्य घंटे में 5.8% की कमी (लगभग 34 मिलियन पूर्णकालिक नौकरियों के बराबर) होने की संभावना है।
🌊 3. समुद्र स्तर में वृद्धि और तटीय क्षेत्रों पर प्रभाव
2030 तक, मुंबई, कोलकाता, कटक और कोच्चि जैसे प्रमुख भारतीय शहरों के कुछ हिस्से समुद्र के स्तर से नीचे आ सकते हैं, जिससे बाढ़ और विस्थापन की संभावना बढ़ेगी।
@Prashant_Advait
भारत के तटीय क्षेत्रों, विशेषकर सुंदरबन, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और ओडिशा, समुद्र स्तर में वृद्धि और तटीय क्षरण के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं।
🦠 4. स्वास्थ्य पर प्रभाव
गर्मी से संबंधित बीमारियों और मौतों में वृद्धि हो रही है, विशेषकर बुजुर्गों और बाहरी श्रमिकों के बीच।
@Advait_Prashant
जलजनित रोगों और मच्छर जनित बीमारियों (जैसे डेंगू, मलेरिया) के प्रसार में वृद्धि हो रही है।
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Posted by Tejpratap Kumar on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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जो भी हो, हर हाल में उपस्थित होने के नाम!
खुद को हर दिन, बीते हुए कल से ज़्यादा धकेल रही हूँ!!
हर पल, हर दिन, खुद को ही मात देना सीख रही हूँ!!
धन्यवाद, आचार्य जी💪🙏
#AcharyaPrashant
Deepti Singh on Acharya Prashant App.
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तुम गहरी भ्रांति में डूबी हो, बड़े खुश-खुश होकर...
...घड़ी की सुइयाँ चल रही हैं और तुम नशे में हो ⏰
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Posted by Nivyanshi on Acharya Prashant App.
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पिछली बार जब मैं महा शिवरात्रि सत्र में आई थी, तो मैं यह पुस्तक लेकर आई थी — *The Lover You Have Been Missing.*
आचार्य जी 24वें अध्याय में समझाते हैं;
_प्रेम मूलतः एक आध्यात्मिक संबंध है। भले ही आप किसी की बुद्धि या शरीर की ओर आकर्षित हों, फिर भी यदि आप अपने मन में गहराई से जाएँ, तो आप पाएँगे कि अंततः आप शब्दों, धन या रूप की चाह नहीं रखते। आप उस चीज़ की चाह रखते हैं जो सदा सर्वोपरि, अंतिम और मानव जीवन का परम लक्ष्य है — मुक्ति।_
_मनुष्य मुक्ति की खोज कई तरीकों से करता है। जिसे आप 'सांसारिक प्रेम' कहते हैं, वह उन तरीकों में से एक है। कोई भी वस्तु आपके लिए तभी शुभ होती है जब वह आपको परम की ओर ले जाए।_
_शब्द 'गुरु' की व्युत्पत्ति ही कितनी शिक्षाप्रद है। गुरु का अर्थ है — वह जो आपको अंधकार से बोध की ओर ले जाए, अंधकार 🌑 से प्रकाश 🪔✨ की ओर।
और यही प्रेमी की परिभाषा भी है।_ *गुरु ही प्रेमी है, प्रेमी ही गुरु है, और इन दोनों में कोई भेद नहीं हो सकता।*
*~ आचार्य प्रशांत✨*
*पुस्तक से — The Lover You Have Been Missing*
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Posted by Monika bisht on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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अवलोकन~
आज मैं पहली बार Theatre गई थी movie देखने, मैं मेरी बहन और एक स्कूल की दोस्त के साथ।
मैं जब Thearte मैं movie देखी तो एक अलग सा ही लग रहा था फ़िर जब मैं वहा से बाहर निकली तो एक छोटी बच्ची आई मुझसे पैसें मांगने लगी मुझे उस समय तो उतना कुछ समझ नही आया मैं थोड़े पैसे दे दिये बाद मैं मैं ऑटो में बैठी तो सोचने लगी क्या जिंदगी है इसका, इसका क्या कसूर था इस छोटी बच्ची का ,हमे पहले लगता था की हमारा ही लाइफ इतनी कठिन क्यों है हम बस इसी मैं परेशान रहते थे लेकिन आचार्य जी को सुनने के बाद दूसरे की परेशनी को चाहे वह इंसान हो या जानवर अंदेखा नहीं कर पा रहे पता नही क्यों ऐसा लगता है जैसे आचार्य जी को सुनने बाद जिंदगी में ख़ुशी सी चली गयी है पहले सिर्फ अपना दुख दिखाई देता था अब दुनिया की दुःख भी दिखाई देने लगी है
धन्यवाद आचार्य जी बहुत ही गलत जिन्दगी जी रही
थी लेकिन आपको सुनने के बाद जंदगी मे थोड़ा बदलाव आ रहा है।
#AcharyaPrashant #Movies
Posted by Muskan kumari on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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आज मन थोड़ा भरा-भरा है। कल हमने अपनी साढ़े ग्यारह साल पुरानी कार बेच दी। जब उसे आख़िरी बार घर के बाहर खड़ा देखा, तो लगा जैसे कोई अपना विदा हो रहा हो। यह वही कार थी जो हमारी बेटी के जन्म के समय घर आई थी। उसकी पहली डॉक्टर विज़िट, पहली छोटी-सी यात्रा, स्कूल के शुरुआती दिन — सबकी साक्षी वही रही।
पर क्या सचमुच वह कार ही इन स्मृतियों का आधार थी? या मेरा मन उन पलों को किसी वस्तु से बाँधकर बैठा था?
जैसाआचार्य जी समझाते हैं — दुख का कारण वस्तु का जाना नहीं, “मेरी” भावना की पकड़ है। वस्तु तो जड़ है, परिवर्तनशील है। मैंने ही उसमें भावनाएँ भर दीं और फिर उसी से अपेक्षा कर ली कि वह स्थायी रहे।
कार का जाना जीवन का एक स्वाभाविक परिवर्तन है। समय आगे बढ़ रहा है। बेटी बड़ी हो रही है। परिस्थितियाँ बदल रही हैं। यदि मैं हर बीतते पड़ाव को पकड़कर बैठ जाऊँ, तो जीवन का प्रवाह रुक जाएगा।
आज देख पा रही हूँ कि स्मृतियाँ किसी धातु और पहियों में कैद नहीं थीं। वे मेरे भीतर हैं। कार साधन थी, सहारा नहीं।
थोड़ा दुख था, आँसू भी आए, पर साथ ही भीतर एक समझ भी उभरी — पकड़ ढीली करना ही मुक्ति की दिशा है। शायद यही साधना है… चलती हुई ज़िंदगी के साथ चलना, बिना चिपके, बिना रोके।
आज कार नहीं है, पर कृतज्ञता है। और वही पर्याप्त है। 👍🏻
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Posted by Meenakshi Jain on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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*प्रश्न - मुझे स्त्री पुस्तक दे रहे हो! क्योंकि मैं स्त्री हूँ?*
*उत्तर - नहीं आपको स्त्री पुस्तक इसलिए दी गयी है कि आप जान पाएं कि आप स्त्री बाद में, पहले कुछ और हैं।*
मोक्ष वाणी बुक स्टाल उज्जैन
13-02-26
#AcharyaPrashant#Books#WomenEmpowerment
Posted by Dinesh Chandrawanshi on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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प्रणाम आचार्य जी 🙏🏻🙏🏻 🙏🏻
आज हमारी मुलाकात लखनऊ के best dentist Vikram Ahuja ji से हुई
इन्होंने आपका नाम सुनते ही इतनी ख़ुशी जताई इतनी बातें कह दिया एक सांस में की मैं आश्चर्यचकित रह गया।
आज से पहले हम बहुत बार मिले लेकिन ऐसी मुलाकात पहली बार ही हो पाई आपकी सारी बातों पर उन्होंने अपना पूरा पूरा समर्थन दिया सुन कर मुझे भी बहुत अच्छा लगा मेरी भी एक मान्यता टूटी की इतनी बड़ी दुनियां में सिर्फ़ मैं ही सुनता हूं क्या आचार्य जी को बाकी जन कहा चले गये है और अगर है तो मुझसे कोई क्यों नहीं मिला अब तक
जवाब मिला क्योंकि मैने किसी को बताया ही नही कहां ही नहीं कि मेरे पास हीरा है मुझे ख़ुद भी शायद इसका अंदाजा नहीं था होगा इस लिए ख़ैर अब सब अच्छा लग रहा जो भी हो रहा ठीक है आचार्य जी है तो ये भरोसा हैं।
धन्यवाद ❤️ आचार्य जी 🙏🏻
#AcharyaPrashant #Books
Posted by ARJUN SONKAR on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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कल मैंने अपने कॉलेज के *स्पोर्ट्स डे* (एथलेटिक मीट) में भाग लिया।
मैंने इन प्रतियोगिताओं में भाग लिया:-
• 100 मीटर दौड़
• 200 मीटर दौड़
• 400 मीटर दौड़
• 100 मीटर×4 रिले
• 200 मीटर×4 रिले
• भाला फेंक
• लंबी कूद
मैंने 100 मीटर रिले में *स्वर्ण पदक* 🥇 और 200 मीटर रिले में *रजत पदक* 🥈 जीता।
इस आयोजन में हमारी कक्षा का अन्य कक्षाओं से कड़ा मुकाबला था। 16 टीमों में से हमें दौड़ जीतनी थी, और स्कोरिंग इस पर आधारित थी कि कौन सबसे कम समय ⏳ में फिनिश लाइन 🏁 तक पहुंचे।
मेरे पास रिले के लिए एक रणनीति थी कि हम बैटन को दौड़ते हुए पास करेंगे 🏃♂️, क्योंकि रुककर पास करने से गति कम हो जाती और समय का अंतर बनता।
यह तरीका स्वर्ण पदक 🏅 जीतने में बहुत उपयोगी रहा। जबकि अन्य रुककर बैटन पास कर रहे थे, हम दौड़ते हुए उसे पास कर रहे थे। यह तरीका ओलंपिक में आमतौर पर उपयोग किया जाता है।
मैं कहूंगा कि दौड़ते समय मैं सबसे शांत 😎 व्यक्ति था। मुझे बिल्कुल भी दबाव महसूस नहीं हुआ, क्योंकि मेरे पास स्पष्ट रणनीति थी और मेरी टीम का मजबूत प्रयास था, जिसने मेरी कक्षा को मजबूत बढ़त दिलाई।
अन्य कक्षाओं में स्वर्ण पदक जीतने की क्षमता थी, लेकिन उनमें चतुराई की कमी थी। वास्तव में, अगर उन्होंने वही रणनीति अपनाई होती, तो हम शायद *शीर्ष 🔝 3* में भी नहीं आ पाते।
तब मुझे याद आया कि एक सत्र में आचार्य जी कह रहे थे, *"इस दुनिया 🌍 में जीतने के लिए चतुराई चाहिए। बिना चतुराई के जीत असंभव है।"*
रणनीति का उपयोग करने से जीत मिली और इसने मेरे सहपाठी को *सर्वश्रेष्ठ एथलीट पुरुष पुरस्कार* 🏆 (इस वर्ष और पिछले वर्ष दोनों) जिताने में बड़ी भूमिका निभाई।
______________________________
*अवलोकन:-*
पिछले वर्ष भी मैंने स्पोर्ट्स डे में भाग लिया था और उन्हीं प्रतियोगिताओं में वही पदक 🏅 जीते थे, वही चतुराई अपनाकर। लेकिन इस बार मुझमें एक बदलाव आया है।
(गीता सत्रों में शामिल हुए मुझे केवल 1 महीना ही हुआ था।)
• पिछले वर्ष मैं *रडार सिंह* था (एक असुरक्षित व्यक्ति, जो हमेशा डरा रहता था और खतरों ⚠️ की तलाश में रहता था)। मैं केवल कुछ चुनिंदा लोगों से ही बात करता था और जानबूझकर दूसरों से बात करने से बचता था।
• मुझे कुछ लोगों के प्रति *घृणा* थी, और इसलिए मैं चाहता था कि वे न जीतें।
• मैं लोगों से इसलिए बचता था क्योंकि मुझे अपमानित होने या नीचा दिखने का डर था (गहरी असुरक्षा)।
• मैं हमेशा सोचता रहता था कि दूसरे मेरे बारे में क्या सोच रहे हैं 💭।
अब जो मैं देखता हूँ वह है एक *पूर्ण परिवर्तन* भीतर 🤯। मैं शांतिपूर्वक घूम रहा था और उन्हीं लोगों के साथ बैठा था जिनसे मैं पहले असुरक्षित और डरा हुआ महसूस करता था।
इस बार मेरे मन में यह विचार नहीं था कि कोई विशेष व्यक्ति जीते या हारे क्योंकि वह मेरे साथ अच्छा या बुरा था।
इस बार मैं *स्वयं को* (अहंकार) भी *देख* सका। मैंने कुछ अवलोकन नीचे नोट किए हैं:
• 100 मीटर दौड़ में अंतिम स्थान पर आना अहंकार के लिए *शर्म* जैसा लगता है।
• रिले में पहले स्थान पर आने के बाद, अहंकार ने स्वामित्व जताना शुरू कर दिया:
देखो, *मैं* ने किया है। *मैं* ने हासिल किया है। यह *मेरी* रणनीति थी।
• भीड़ के साथ दौड़ना (न तो पहले और न ही अंतिम) अहंकार के लिए अधिक सुरक्षित लगता है। इसमें *सांत्वना* मिलती है।
• जैसे ही कोई धावक आगे बढ़ने लगता है, अहंकार महसूस करने लगता है:
-> *"चलो, मुझे जीतना है।"* (प्रेरणा)
-> *"मैं हारने वाला हूँ।"* (निराशा)
इन दोनों स्थितियों में कोई वास्तविक समझ नहीं होती।
• लेकिन मुझे पता था कि जब आप सर्वश्रेष्ठ कर रहे हों, *तो भले ही आप हार जाएं* (बाह्य रूप से), *आप पहले ही जीत चुके होते हैं*।
मुझे इसका निरंतर स्मरण चाहिए 👆।
• मैं लोगों से इसलिए दूर रहता था क्योंकि मुझे विश्वास था कि *मैं कुछ हूँ* (कुछ विशेष)। मैं सभी से अलग हूँ।
यही विश्वास (अहंकार) *गीता* 🛞 की शिक्षाओं के कारण विलीन हो रहा है।
• मैं खुद को एक वर्ष पहले की तुलना में बहुत *हल्का* महसूस करता हूँ। ऐसा लगता है जैसे किसी ने मेरे वर्षों से उठाए जा रहे बोझ को कम कर दिया हो।
धन्यवाद ♥️🙏 आचार्य जी मुझे *निर्भार* करने और अहंकार की पकड़ को कम करने के लिए।
आपकी शिक्षाओं ने मुझे भीतर की ओर देखने 👀 में बहुत मदद की है। मैंने अपने जीवन में कभी भी अपने बारे में इतना नहीं जाना था जब तक कि मैं *गीता* 🛞 सत्रों में नहीं आया।
यह भीतर की ओर देखना मुझे बहुत *शक्ति* दे रहा है।
मैं स्वयं को देख सका और स्पष्ट रूप से देख सका कि भीतर क्या चल रहा था और उसका बाहर क्या प्रभाव पड़ रहा था।
@Prashant_Advait@Advait_Prashant
#AcharyaPrashant #Sports
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मेरे अनुसार आचार्य प्रशांत जी को इसलिए सुनें;
• सीधे और तार्किक तरीके से बात करना
वे आध्यात्मिक विषयों को केवल भावनात्मक या धार्मिक ढंग से नहीं, बल्कि तर्क और विश्लेषण के साथ रखते हैं।
वे वेदांत, गीता, उपनिषद आदि को आधुनिक जीवन से जोड़ते हैं।
कठिन विषयों को सरल भाषा में समझाते हैं।
• समसामयिक मुद्दों पर खुलकर बोलना
वे केवल अध्यात्म तक सीमित नहीं रहते, बल्कि
शिक्षा, समाज, राजनीति, पर्यावरण
युवाओं की समस्याएँ, करियर, रिश्ते
जैसे विषयों पर भी स्पष्ट राय देते हैं।
इससे युवा वर्ग को लगता है कि उनकी बातें सीधे उनकी ज़िंदगी से जुड़ी हैं।
• डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सक्रियता
उनके वीडियो यूट्यूब और सोशल मीडिया पर लगातार उपलब्ध हैं, जिससे
पहुँच आसान हो जाती है
लोग कभी भी सुन सकते हैं
छोटे क्लिप्स वायरल होते हैं
• तीखा और स्पष्ट व्यक्तित्व
उनकी शैली कभी-कभी कठोर या सीधी लगती है, जो
कुछ लोगों को बहुत आकर्षित करती है
कुछ लोगों को असहज भी कर सकती है
यही स्पष्टता उन्हें अलग पहचान देती है।
• अनुयायियों की मजबूत गीता कम्युनिटी
उनके समागम, ऑनलाइन सत्र और स्वयंसेवक नेटवर्क
एक समुदाय का अनुभव देते हैं
लोगों को जुड़ाव और उद्देश्य का अहसास कराते हैं
•निष्कर्ष
लोग उन्हें इसलिए सुनते हैं क्योंकि वे आध्यात्म को व्यावहारिक जीवन, तर्क और समकालीन मुद्दों क्लाइमेट चेंज से जोड़ते हैं।
आचार्य प्रशांत को “कॉपी” कहना बेवकूफी है।
1. पद्धति का अंतर:
ओशो का मार्ग अनुभव, ध्यान-प्रयोग, प्रतीक, ऊर्जा, तंत्र आदि पर आधारित था।
आचार्य प्रशांत का कार्य तर्क, आत्म-परीक्षण और शास्त्रीय स्पष्टता पर आधारित है। वे किसी तकनीक या रहस्यवाद का सहारा नहीं लेते।
2. अंधविश्वास का प्रश्न:
ज्योतिष, पुनर्जन्म, ऊर्जा-चक्र आदि पर ओशो के कथन बहस के विषय रहे हैं।
आचार्य प्रशांत लगातार हर प्रकार की मान्यता और अंधविश्वास पर प्रश्न खड़ा करते हैं — चाहे वह धार्मिक हो या आधुनिक।
3. संरचना का अंतर:
ओशो का मॉडल कम्यून-आधारित था।
आचार्य प्रशांत का मॉडल डिजिटल, सार्वजनिक और व्यापक है — न्यूनतम योगदान पर खुला।
4. लक्ष्य:
सांत्वना देना आसान है।
भ्रम तोड़कर स्पष्टता देना कठिन।
आचार्य प्रशांत का मार्ग दूसरे प्रकार का है — इसलिए असुविधाजनक है।
व्यक्ति-पूजा या व्यक्ति-निंदा छोड़िए।
विचारों की तुलना कीजिए — विशिष्ट उद्धरण और तर्क के साथ।
पंद्रह हज़ार वीडियो आचार्य प्रशांत जी के उपलब्ध हैं। तूने कोई एक भी ढंग से देख लिया होता तो ये बकवास न करता।
ओशो ने
- पुनर्जन्म
- Aura
- Vibrations
- कुंडलिनी
- Energy fields
- Enlightenment
- यहाँ तक कि अटलांटिस जैसी सभ्यताओं
को भी सत्य बता दिया था।
इनमें से कोई भी विज्ञान की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।
दूसरे सज्जन जिनकी तूने फ़ोटो लगाई है उनका तो कहना ही क्या।
ये दोनों भ्रम और चमत्कार की बैसाखी से ही लोकप्रिय हुए।
अब फर्क समझ।
आचार्य प्रशांत बार-बार कहते हैं कि वेदांत अंधविश्वास नहीं है। वो ज्योतिष, कर्मकांड, चमत्कारवाद का खुला विरोध करते हैं।
उनकी बातों में ‘वाइब्रेशन फील करो’ नहीं, बल्कि ‘अपने जीवन के तथ्य देखो' है।
वो सवालों से बचते नहीं, सवालों को बढ़ावा हैं।
और असर?
हजारों युवा
- अंधविश्वास छोड़ रहे हैं
- करियर और रिश्तों में स्पष्ट निर्णय ले पा रहे हैं
- सामाजिक मुद्दों पर जिम्मेदार रुख अपना रहे हैं
- और सबसे अहम, किसी व्यक्ति की पूजा नहीं, बल्कि सोचने की आदत विकसित कर रहे हैं।
तेरे पास अभी भी मौका है, आचार्य प्रशांत जी को सुनना शुरू कर ले, जीवन बच जाएगा।
मान्यताएं टूटेंगी, चोट लगेगी लेकिन जिंदगी जीने लायक हो जाएगी।
यहाँ से पढ़ना शुरू कर ले:
https://t.co/yAlWWSeJeO
पहली बात तो भाई आपने न तो ओशो को ढंग से सुना है न आचार्य प्रशांत को। सुना होता तो इस तरह के बेवकूफाना ट्वीट न करते। और तीसरे सज्जन को मैं इनकी श्रेणी में भी नहीं डालूंगा क्योंकि वे कोई दार्शनिक तो हैं नहीं, क्रिया वगैरह सिखाते हैं। तो बात सिर्फ ओशो और आचार्य प्रशांत की करते हैं।
आप आचार्य प्रशांत को ओशो की कॉपी कह रहे हैं। किस आधार पर? यह जगजाहिर बातें हैं कि ओशो ने कई बार और कई जगह उन्हीं अंधविश्वासों का सहारा लिया जिनका वे किसी दूसरी जगह विरोध भी करते थे, जैसे ज्योतिष विज्ञान, पुनर्जन्म का सिद्धांत, तंत्र मंत्र इत्यादि।
आचार्य प्रशांत शायद सदियों में कोई एक ऐसे व्यक्तित्व आएं हैं जिन्होंने हर तरह से अंधविश्वास का लगातार विरोध किया है।
किसी भी AI प्रोग्राम से सीधा पूछिये: ‘ओशो और आचार्य प्रशांत में दार्शनिक और वैचारिक स्पष्टीकरण किसमें अधिक है, और क्या ओशो ने किस प्रकार पुनर्जन्म इत्यादि की अंधविश्वासी कहानियां गढ़ीं?’ उत्तर मिल जाएगा।
लेकिन हमें तथ्यों से कोई मतलब नहीं। हम तो बस बिना आधार के कुछ भी कहेंगे और मज़े लेंगे, क्यों?
सीधी बात कहे देता हूं: आचार्य प्रशांत से आप लोग इसलिए चिढ़ते हैं क्योंकि वो आपके अंदर के बेईमान अहंकार को छुपने का कोई मौका नहीं देंगे। इसलिए आप लोग ओशो की कहानियों में जाकर छुप जाते हैं।
सुधर जाइए। शायद अभी भी समय हो।
The "Rolls-Royce" Paradox of Osho
Osho’s lifestyle was a masterclass in hypocrisy. While teaching that the ego must be dissolved, he accumulated 93 Rolls-Royces and wore watches encrusted with diamonds.
It was an exploitation of wealthy, disillusioned Westerners who were essentially "buying" a feeling of enlightenment while funding a millionnaire's hobby.
An eye-opening read: https://t.co/49xAX9MSgi
अनपढ़ महोदय, आइए थोड़ा समझते हैं।
बात अगर विशुद्ध वेदांत की हो, तो आज तक इतने बड़े पैमाने पर वेदांत को घर-घर तक पहुँचाने का जिम्मा और साथ ही उसका जोखिम किसी ने नहीं उठाया है।
ओशो ने अपना एक संगठन बनाया, लेकिन आम आदमी जो दमित है, शोषित है और समाज की तमाम विकृतियाँ झेल रहा है—उनके उत्थान के लिए क्या किया?
आचार्य प्रशांत आज के युग में एक ऐसी आवाज़ हैं, जो समाज में चल रही विकृतियों को करारा जवाब दे रहे हैं।
जितनी बेबाकी से आचार्य प्रशांत ने आम आदमी तक अपनी बात पहुँचाई है, वैसा अतीत में किसी ने नहीं किया।
कर्मकांड और अंधविश्वास की नींव ही आचार्य प्रशांत के वक्तव्यों से हिलने लगी है।
वेदांत का भारत में पुनरुत्थान यदि कोई कर रहा है, तो वे आचार्य प्रशांत हैं।
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बात अगर जीव हिंसा के विरुद्ध आवाज़ उठाने की करें, तो शायद ही इतने बड़े पैमाने पर किसी ने व्यक्तिगत तौर पर जीवों को बचाने का कार्य किया हो, जितना आचार्य प्रशांत और उनकी संस्था कर रही है।
PETA संस्था ने “Most Influential Vegan of 2022” का पुरस्कार भी आचार्य प्रशांत को दिया था। हाल ही में “Most Impactful Environmentalist” पुरस्कार Green Society of India द्वारा दिया गया है।
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लाखों लोग एक साथ वेदांत का अध्ययन लाइव सत्रों के माध्यम से कर रहे हैं। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।
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आचार्य प्रशांत ने महिलाओं के प्रति हो रहे शोषण पर खुलकर बोला है। लाखों महिलाओं ने अपने बंधनों को तोड़कर एक नया जीवन जिया है।
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भारत का युवा आज जितना भ्रमित है और मानसिक रोगों का शिकार है, वैसा पहले कभी नहीं था।
लाखों-करोड़ों युवाओं ने आचार्य प्रशांत की शिक्षाओं से अपने जीवन को बेहतर दिशा दी है। उनके करियर, संबंधों और जीवन को परखने की क्षमता बेहतर हुई है।
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ट्विटर पर आकर बिना शोध किए, अनपढ़ों की तरह उंगलियाँ चलाना बहुत आसान होता है।
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अब बात करते हैं उनकी, जिनका तुमने गुणगान किया है।
ओशो, जिन्होंने स्वयं कई वक्तव्यों में पुनर्जन्म, past life karma, ज्योतिष और न जाने कितने कर्मकांडों का समर्थन किया है।
समस्या यह है कि बेबाक व्यक्ति को तुम सह नहीं सकते। खरी बात सुनने की हिम्मत तुममें नहीं है, इसलिए तुम्हें झूठ और अंधविश्वास का सहारा लेना पड़ता है। तुम कमजोर हो, और कमजोर व्यक्ति अपनी कमजोरी बचाने के लिए झूठ का समर्थन करता है।
तथ्यों का सम्मान कीजिए, अनपढ़ महोदय।
अच्छा तुने तो ओशो को पूरा सुना है ना अच्छे से
तु अपने आप को जागरूक और समझदार मान रहा है।
तो बताओ तुम्हारी प्रोफाइल में कहां तुम वेदांत की, गीता की, क्लाइमेट चेंज की बातें कर रहे हो? दिखी तो नहीं, बस गॉसिप दिखी।
तो तुझे पहली बात तो आचार्य प्रशांत पर कुछ बोलने का हक ही नहीं है।
वो तो जन जन तक वेदांत ला रहे हैं, वैश्विक समस्याओं पर एक बुलंद आवाज़ बनकर खड़े हैं, और तु ठहरा गॉसिप वाला आदमी।
अगर फिर भी तुझे कोई तर्क करना ही है तो pointwise बता कहां तुझे लग रहा है कि आचार्य प्रशांत किसी की "कॉपी" हैं?
AI से पूछ लेता, वही बता देता कि आचार्य प्रशांत कौन हैं और कितने मौलिक हैं। किस तरह से वे हमारी मान्यताओं, अंधविश्वासों को काटकर हमें नई जीवन की राह दिखा रहे हैं।
पर तेरा अहंकार इतना कि AI से भी कुछ पूछा नहीं बस अपनी उल्टी कर दी।
अब बस कॉमेंट्स पढ़ता रह, तुझे धीरे धीरे बात समझ आ जाएगी।
आचार्य प्रशांत को जो समझ गए वो एक हो बात बोलते हैं, ऐसे कभी कोई हुए नहीं है, इतने शुद्ध, प्रेमपूर्ण और संघर्षरत।
अब चल आचार्य जी के विडियोज देखना शुरू कर, धीरे धीरे बात समझ आएगी।
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और हां, जग्गी पर मुझे कुछ नहीं बोलना है। उसकी बातें तो जगजाहिर है कि कितनी अवैज्ञानिक है।
बिल्कुल, ओशो के ओरिजिनल और अवैज्ञानिक विचार इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। जैसे:
1️⃣ पुनर्जन्म (Reincarnation)
अनेक प्रवचनों में कहा कि व्यक्ति के वर्तमान जीवन की समस्याएँ पिछले जन्मों से जुड़ी हो सकती हैं।
ध्यान में पूर्वजन्म की स्मृतियाँ खुलने की बात की।
📌 आधुनिक विज्ञान में पुनर्जन्म का कोई सत्यापित प्रमाण नहीं।
2️⃣ कुंडलिनी और चक्र
रीढ़ में “ऊर्जा” के उठने और चक्रों के खुलने की भाषा का उपयोग।
ध्यान तकनीकों को कुंडलिनी-जागरण से जोड़ा।
📌 मानव शरीर में चक्रों या ऊर्जा-सर्प का कोई जैविक प्रमाण नहीं मिला है।
3️⃣ आभा (Aura) और ऊर्जा-क्षेत्र
व्यक्ति की ऊर्जा, वाइब्रेशन, आभा जैसी अवधारणाओं का प्रयोग।
📌 इन्हें मापने या वैज्ञानिक रूप से स्थापित करने का कोई मान्य ढाँचा नहीं है।
4️⃣ गुरु की उपस्थिति से रूपांतरण
यह विचार कि गुरु की ऊर्जा या उपस्थिति से चेतना बदल सकती है।
📌 वैज्ञानिक रूप से इसे प्लेसीबो, सुझाव या समूह-मनोविज्ञान से समझाया जाता है; “ऊर्जा हस्तांतरण” सिद्ध नहीं है।
5️⃣ टेलीपैथी / मानसिक संचार
विचार-तरंगों और मन-पढ़ने जैसी संभावनाओं का उल्लेख।
📌 नियंत्रित प्रयोगों में टेलीपैथी सिद्ध नहीं हुई है।
6️⃣ मृत्यु के बाद चेतना
आत्मा की यात्रा और मृत्यु के बाद अस्तित्व पर प्रवचन।
📌 मृत्यु के बाद व्यक्तिगत चेतना के बने रहने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
💦 दर्शन गायब, बस मनोरम कहानियों और कविताओं के चोगे में अंधविश्वास।
📜 अब आचार्य प्रशांत का शुद्ध दर्शन देखिए: https://t.co/e8Vx3Lpxzb
“‘सस्ती कॉपी’ कहना आसान है, काम को समझना मुश्किल।
आचार्य प्रशांत आज के सबसे hostile डिजिटल माहौल में रोज़ live, बिना स्क्रिप्ट, हर तरह के सवालों का सामना करते हैं—दर्शन, समाज, पर्यावरण, राजनीति, उपभोक्तावाद सब पर। साथ में एक पूरी नॉन-प्रॉफिट knowledge-ecosystem चलाना, हजारों घंटों का कंटेंट बनाना, उसे मुफ्त पहुँचाना—ये प्रवचन नहीं, मोर्चा है।
अगर ये ‘कॉपी’ है, तो बताइए: ओशो ने कब रोज़ public cross-examination में अपने विचारों को ऐसे दाँव पर लगाया?
अलग समय, अलग लड़ाई, और कहीं ज़्यादा भारी बोझ। लेबल चिपकाने से हकीकत नहीं बदलती।”
1984 Bioterror Attack
Members of Osho’s inner circle carried out the largest bioterror attack in U.S. history, contaminating salad bars with salmonella in The Dalles, Oregon.
👉 751 people fell ill.
Osho’s personal secretary Ma Anand Sheela and others were convicted and imprisoned.
How can this be possible that Osho was not aware, not involved, what kind of disciples he had raised? In that sense, was he even a TEACHER?
@sachinsgaur Osho को पेड़ पर चढ़ के ‘enlightenment’ मिल गया था।
आचार्य की के session में आकर ये सब बोलते तो बड़ी झाड़ पड़ती।
सारा enlightenment का भूत उतर जाता।
सही में ‘no mind’ में पहुँच जाते भाई साहब।
खैर!
😅
मैं पहले समय-सीमाओं से नफरत करती थी क्योंकि जब मैं समय पर काम पूरा नहीं कर पाती थी, तो मुझे गंभीर घबराहट के दौरे पड़ते थे।😥 वर्तमान में, जब मैं बिना किसी समय-सीमा के काम कर रही हूँ, तो मुझे उसकी आवश्यकता महसूस होती है क्योंकि काम में कभी न खत्म होने वाली टालमटोल और बदलाव होते रहते हैं, जिससे काम को बेहतर बनाने की अंतहीन अपेक्षाओं का एक और चक्र शुरू हो जाता है।
अब मैं समझती हूँ कि समय-सीमा क्यों महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि यह व्यक्ति को प्राथमिकता के आधार पर काम करने के लिए तैयार करती है और इस प्रकार काम समय पर पूरा हो जाता है।⏳
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Posted by Priyanka Bora on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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