कभी तिमिर की तह में, रवि रश्मि उतारती सी।
कभी दिए की लौ सा, मेरा पंथ निहारती सी।
हर धार के आधार और सार सतत बनके।
कभी ऋचा भोर की तो कभी आरती सी।
ॐ की ध्वनि हो, या मौन की तरंगे।
तुम सब में शामिल रहके, सौभाग्य संवारती सी।
आलोचना की हद से सराहना की जद तक।
मां मेरी सदा तुमको हरदम पुकारती सी।
मां मेरी सदा तुमको हरदम पुकारती सी...
गत 1मई (मजदूर दिवस) पर क्षेत्र के कद्दावर किसान मजदूर नेता भारतीय किसान यूनियन "टिकैत" के राष्ट्रीय सचिव और समय-समय पर हमारा मार्गदर्शन करने वाले श्री अजयपाल शर्मा जी से मिलकर उनके स्वास्थ्य का हालचाल लिया। मुलाकात के दौरान उनसे काफी कुछ सीखने को मिला।
व्यथित क्या होना मिले जो धूल पथ पर
ग्रहण सा दिखने लगे जब सत- शपथ पर
वंचितों की वीथिका से कृष्ण- रज ले ,
कर्म के कुरुक्षेत्र में चढ़ विजय रथ पर
कर्म के कुरुक्षेत्र में चढ़ विजय रथ पर....!
कुछ भावचित्र....
वो चाहे तो दृश्य बदल दे, वो चाहे तो दृष्टि
वही सृजन है, वो ही सृष्टा, वो ही सारी शक्ति...1
ग्रह से प्रिय प्रियतर लगे, बद लगे बदतर
कालखण्ड सब बदलते, बाहर या भीतर...2
विस्मरण के दौर में, सुमिरन मेरा काम
सुबह तेरा पैगाम है, शाम तुम्हारा नाम...3
सम विषम कुछ भी रहे, समन्वय हो जाए
देह मन और आत्मा, सब तन्मय हो जाए...4
सुमिरन हर इक भाव में, जब तू मेरी नाव
प्रति पल हिय अनुकूल हो, जब हो तेरी छांव...5¹
कभी तुच्छ भी सब लगे, कभी सर्व भी तुच्छ
तेरे भावों की कृपा से, प्रफुल्लित वक्ष...6
तुम से ही सब राह है, तुम से ही सब थाह
एक क्षण वाह नवाज दे, एक क्षण भर दे आह...7
पल तो चपल है बहुत, शुभकर है तो और
जब भी ये आभास हो, थामो उसकी डोर...8
जब अपनों के बीच में, मिले न मन को ठांव
भीतर वृक्ष तलाश के, बैठो उसकी छांव...9
नियति नटी की नीति में, नित नए निशिकांत
देश काल सापेक्ष है जग के सब सिद्धांत...10
काया की माया रचे, नए नए प्रतिमान
जो छाया में ही रहे, उनका कौन बखान...11
जब भी अपेक्षा रही, करे उपेक्षा घात
अभिलाषा की शून्यता, में अनंत लख जात...12
जैसे नभ नीरद रहे, मारुति अंचल थाम
वैसे मेरे संग तू, दक्षिण हो या वाम...13
गिरिधर की सम्मोहना, जैसे शीत में घाम
निर्झर के नैमिष्य में, बिन सावन घनश्याम...14
कोई कहे ये नाम जप, कोई कहे वो नाम
मेरे भीतर तू रमे, काम,अनाम, सकाम...15
तुमसे ही खुसरो हुआ, तुमसे ही ख़य्याम
तुम हो तो मैं खास हूँ, वरना अतिशय आम...16