@realwajidkhan महिलाए बच्चे मालेगनीमत समझे जाते हैं इस्लामिक वार में '
बांदी , लौण्डी शब्द यही से प्रचलन में आया है ।
खलीफाओं का इतिहास ऐसे विवरण से भरा पड़ा है।
मुहम्मद बिन कासिम ने खुद मालेगनीमत खलीफा के पास भेजा था ।
अगर अच्छे इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए कोई भूख हड़ताल पे बैठ जाये तो वो बेचारा भूखा ही मर जाएगा।
आप लोग जंतर मंतर से बोर हो गए होंगे
फ़िलहाल जैसलमेर रेलवे स्टेशन पर छेद वाले टीनशेड का आनंद लीजिए।
सुना है कि 17 जुलाई को ही उद्घाटन हुआ है।
अगर अच्छे इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए कोई भूख हड़ताल पे बैठ जाये तो वो बेचारा भूखा ही मर जाएगा।
आप लोग जंतर मंतर से बोर हो गए होंगे
फ़िलहाल जैसलमेर रेलवे स्टेशन पर छेद वाले टीनशेड का आनंद लीजिए।
सुना है कि 17 जुलाई को ही उद्घाटन हुआ है।
पिछले एक घंटे से धर्मेंद्र प्रधान को महान शिक्षा सुधारक बताकर जिस स्पीड से स्थापित किया जा रहा है उससे लग रहा है कि वो ज्योति फुले के अवतार हैं। हमसे ही देर हो गई। यूजीसी कानून जब लाए थे तभी समझ जाना चाहिए था और आज का ज्योति फुले होने की उपाधि दे देनी चाहिए थी।
सौ नंबर से कट ऑफ से पीछे रहने वाले लोग अक्सर सबको यह बताते हैं कि उसका एक नंबर से सिलेक्शन रुक गया ।
जबकि सच्चाई यह है कि एक नंबर से सिलेक्शन रुकने वाले का सिलेक्शन किसी न किसी अन्य एग्जाम में निश्चित ही हो जाता है। घूम घूम कर वो बकैती नहीं करता ।
अब कोई खुद को दोष तो देगा नहीं , तो वो अपने फेलियर का कोई न कोई बहाना ढूंढ लेता है। और उस पर अपनी हार का सारा ठीकरा फोड़ देता है।
>UPSC और अन्य परीक्षा में फर्जी सर्टिफिकेट ,
>YeThikKarkeDikhao मूवमेंट
>तमाम inevestigative रिपोर्ट और expose किए
>लेकिन किसी जर्नलिस्ट, पार्टी अख़बार ने कभी सपोर्ट नहीं किया
>केवल FIR और नोटिस मिली,
अब इस्तीफे का तरीका समझ आ गया है,
>किसी पार्टी की गोद में बैठो
>तरह तरह की नारेबाजी करो ,जिससे लोग जुड़ें
>फैक्ट् और सिस्टम सुधारने की बात मत करो
>इससे FIR भी नहीं होगी
>तरह तरह की ideology वाले ख़बरें छापेंगे
>और सरकार भी झुक जायेगी
घरेलू मोर्चे पर अराजक तत्वों के सामने घुटने टेक देना मोदी जी के लिए कोई नई बात नहीं है। एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के एक बहुत तार्किक और न्यायपूर्ण फैसले को पलटना हो, शाहीन बाग की दादियों के सामने नतमस्तक होकर दिल्ली में हिंसा का नंगा नाच होने देना हो या फिर खालिस्तानी झंडे को ठीक 26 जनवरी के दिन लाल किले पर फहराने देना हो और उसके बाद महीनों तक दिल्ली को बंधक रखवा कर कृषि कानूनों को वापस लेना हो। हमने अपना सबक कृषि कानूनों को वापस लिए जाने के समय ही पढ़ लिया था जब खालिस्तानियों की सक्रियता वाली बेल्ट में रहते हुए उनके विरोध में जमकर लिखा और बाद में मोदी जी ने उनसे माफी मांग ली थी। इसलिए इस बार इस सबको बस मनोरंजन के तौर पर ही लिया। धर्मेंद्र प्रधान को तो वैसे भी महीनों पहले हटा दिया जाना चाहिए था जब मोदी जी के समर्थक यही मांग कर रहे थे। पर अपनों को लात और दुश्मनों को भात, यही मोदी जी की रीति-नीति बन चुकी है।
नड्डा हाथ मिलाने को इतना आतुर क्यों थे? ये कोई क्रेडिट लेने की बात है? फिर याद आता है कि चापलूसों को भर रखा है भाजपा ने पार्टी में ऊपर से ले कर नीचे तक, तो जो जितना इन्हें पेलेगा वो उतना यही कहेंगे:
पीड़ा में आनंद जिसे हो, आए मेरी मधुशाला