बाकी नेता आपसे कहते होंगे की जिले में कोई काम हो तो बताना
मैं आपसे कह रहा हूं कि हिंदुस्तान के किसी भी शहर में कोई काम हो तो बताना....!
~इमरान प्रतापगढ़ी भाई❤️
@ShayarImran Bhai❤️
बच्चों को माफ़ करने के बजाय देश के बच्चों से माफ़ी मॉंगनी चाहिये प्रधानमंत्री जी।
बच्चे मन के सच्चे होते हैं, उन्होंने देखा कि आप गालीबाज़ों को ट्विटर पर फॉलो करते हैं तो उन्होंने भी सीख लिया, बच्चों ने देखा कि आपका कैबिनेट मंत्री दिल्ली में “गोली मारो…सा…को का नारा लगा रहा था तो उन्हें भी लगा कि सीख लेनी चाहिये।
आपका हैदराबाद का एक विधायक हज़ारों की भीड़ में खुलेआम मॉं बहन की गाली देता है तो बच्चों ने भी सीख लिया।
बच्चों को माफ करने के बजाय देश के छात्रों से माफी मॉंगिये जिन पर पैलेट गन चली, जिन पर लाठियॉं चली, जिन बेटियों के प्राइवेट पार्ट की तरफ़ पुलिस ने डंडे घुसेड़ने की कोशिश की।
कब तक विक्टिम कार्ड खेलियेगा प्रधानमंत्री जी ?
छात्र आंदोलन की एक और बड़ी सफ़लता ये है कि पिछले एक महीने में पूरे देश में एक भी बड़ी सांप्रदायिक घटना नहीं हुई है।
दिन भर हिंदू मुस्लिम एजेंडा चलाने वाली मीडिया के लिये भी छात्रों का मुद्दा सेलेबस के बाहर की चीज़ बन गया है।
दिल में इक लहर सी उठी है अभी
कोई ताज़ा हवा चली है अभी.
कुछ तो नाज़ुक मिज़ाज हैं हम भी
और ये चोट भी नई है अभी.
शोर बरपा है ख़ाना-ए-दिल में
कोई दीवार सी गिरी है अभी.
भरी दुनिया में जी नहीं लगता
जाने किस चीज़ की कमी है अभी.
तू शरीक-ए-सुख़न नहीं है तो क्या
हम-सुख़न तेरी ख़ामुशी है अभी.
याद के बे-निशाँ जज़ीरों से
तेरी आवाज़ आ रही है अभी.
शहर की बे-चराग़ गलियों में
ज़िंदगी तुझ को ढूँडती है अभी.
सो गए लोग उस हवेली के
एक खिड़की मगर खुली है अभी.
तुम तो यारो अभी से उठ बैठे
शहर में रात जागती है अभी.
वक़्त अच्छा भी आएगा 'नासिर'
ग़म न कर ज़िंदगी पड़ी है अभी..!
~नासिर क़ज़मी
निय्यत-ए-शौक़ भर न जाए कहीं
तू भी दिल से उतर न जाए कहीं.
आज देखा है तुझ को देर के ब'अद
आज का दिन गुज़र न जाए कहीं.
न मिला कर उदास लोगों से
हुस्न तेरा बिखर न जाए कहीं.
आरज़ू है कि तू यहाँ आए
और फिर उम्र भर न जाए कहीं.
जी जलाता हूँ और सोचता हूँ
राएगाँ ये हुनर न जाए कहीं.
आओ कुछ देर रो ही लें 'नासिर'
फिर ये दरिया उतर न जाए कहीं...!
~नसीर काज़मी
इस को क़िस्मत की ख़राबी ही कहा जाएगा
आप का शहर में आना मिरा बाहर होना.
मुझ को क़िस्मत ही पहुँचने नहीं देती वर्ना
एक ए'ज़ाज़ है उस दर का गदागर होना.
सोचता हूँ तो कहानी की तरह लगता है
रास्ते से मिरा तकना तिरा छत पर होना.
सिर्फ़ तारीख़ बताने के लिए ज़िंदा हूँ
अब मिरा घर में भी होना है कैलेंडर होना..!
~मुनव्वर राणा
लोकतंत्र में सत्ता स्थायी नहीं होती जवाबदेही स्थायी होती है जनता सवाल भी पूछती है जवाब भी चाहती है जो भी जनप्रतिनिधि है उसकी असली ताक़त जनता का भरोसा है और उसी भरोसे की कसौटी पर हर नेता को खरा उतरना चाहिए ।
#Loktantra#JantaKiAwaaz#Democracy
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा इस बात की याद दिलाता है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज़ और जवाबदेही सबसे ऊपर होती है ।
अगर किसी मुद्दे पर देशभर में छात्र और नागरिक लगातार सवाल उठाते हैं, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में नैतिक ज़िम्मेदारी स्वीकार करना भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है ।
उम्मीद है कि यह केवल एक इस्तीफ़े तक सीमित न रहे, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता जवाबदेही और व्यापक सुधार का रास्ता भी खोले ।
इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिए
आप को चेहरे से भी बीमार होना चाहिए.
आप दरिया हैं तो फिर इस वक़्त हम ख़तरे में हैं
आप कश्ती हैं तो हम को पार होना चाहिए.
ऐरे-ग़ैरे लोग भी पढ़ने लगे हैं इन दिनों
आप को औरत नहीं अख़बार होना चाहिए.
ज़िंदगी तू कब तलक दर-दर फिराएगी हमें
टूटा-फूटा ही सही घर-बार होना चाहिए.
अपनी यादों से कहो इक दिन की छुट्टी दे मुझे
इश्क़ के हिस्से में भी इतवार होना चाहिए..!
~मुन्नवर राणा