राहुल गांधी ने एक चक्रव्यूह की बात की है। क्या है वो चक्रव्यूह जिसमें हिंदुस्तान का युवा फंसा हुआ है:-
1. महंगी शिक्षा हासिल करो
2. डिग्री मिलेगी, डिग्री से रोज़गार नहीं मिलेगा
3. बेरोज़गार रहो, खूब रील्स देखो, डेटा क्रिएट करो
4. सरकार में बैठा एक सौदागर आपके इस डेटा का सौदा करेगा
5. सौदागर के दोस्त करोड़ों अरबों कमाएंगे, सौदागर को सत्ता में बैठे रहने के लिए मदद करेंगे
6. आपके हिस्से क्या आया? ब्लिंकिट, स्विगी, उबर, ओला जैसी कंपनियों में बंधुआ मज़दूरी और बेशुमार रील्स
#ChhatronKiGoonj
दिल्ली में 20 जुलाई को छात्रों और युवाओं पर हुई बर्बरता के खिलाफ 22 जुलाई को छात्र पटना में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले थे।
लेकिन बिहार सरकार और बिहार पुलिस ने उनके साथ क्रूरता की।
छात्रों को मारा-पीटा गया और उन्हें रातों-रात गैरकानूनी तरीके से हिरासत में ले लिया। बिहार में ये सिलसिला कई दिनों तक चला।
फिर सीवान में प्रदर्शन करने वाले छात्रों और युवाओं पर AK-47 से फायर कर दिया जाता है, जिसमें छात्र गंभीर रूप में घायल हुए।
हम छात्र हैं, प्रोटेस्टर नहीं।
आज छात्रों की हालत ये है कि पहले वो पढ़ाई करें, लेकिन जब पेपर लीक हो जाए और हक के लिए प्रोटेस्ट करे तो उनपर लाठीचार्ज किया जाता है।
देश के युवा इसी चक्रव्यूह में फंसे रहते हैं।
#ChhatronKiGoonj
ब्रेकिंग न्यूज 🚨
लोकसभा नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आज प्रयागराज में पूरे Systumm को हैंग कर दिया है🔥🔥
प्रयागराज में कई हज़ार छात्रों से खचाखच भरे स्टेडियम में पैर रखने की जगह नहीं बची थी।
लेकिन मीडिया अपनी हरकत से बाज नहीं आ रहा है।
लगभग 3 घंटे हो गए हैं लेकिन एशिया के सबसे बड़े न्यूज़ एजेंसी ANI ने एक भी पोस्ट राहुल गांधी को लेकर नहीं किया है।
हमने PTI का भी हैंडल खंगाला लेकिन वहाँ भी पोस्ट नहीं दिखी।
आख़िर राहुल गांधी से इन चैनल वालो को किसी बात का डर सता रहा या फिर ऊपर से किसी तरह का दबाव है।
राहुल गांधी आज देश में एक बहुत जबरदस्त युवा आइकन, कद्दावर नेता बनकर उभरे हैं। अभी कुछ देर पहले मैंने सत्य और तथ्य का जिक्र किया। आप राहुल गांधी की बातों को देखें तो आप उसमें सत्य भी पाएंगे, तथ्य भी पाएंगे और तर्क भी पाएंगे
- शत्रुघ्न सिन्हा
BJP के लिए एक और 'मोये-मोये' मोमेंट्स 😭
राहुल गांधी ने भारतीय समाज में महिलाओं के संघर्ष को दिखाते हुए एक वीडियो पोस्ट किया।
मोदी सरकार के मंत्री किरेन रिजिजू ने ज़्यादा होशियार बनने की कोशिश की, राहुल गांधी का मज़ाक उड़ाया और महिला आरक्षण बिल का समर्थन करने को कहा।
राहुल गांधी ने तुरंत उन्हें याद दिलाया कि महिला आरक्षण बिल तो 2023 में ही कांग्रेस पार्टी के पूरे समर्थन से पास हो चुका था। 🤣
“अब BJP को महिला आरक्षण बिल लागू करने से क्या रोक रहा है? लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए इसे डिलिमिटेशन से क्यों जोड़ा जा रहा है?” 🔥
मोदी सरकार के मंत्री चुप हो गए और BJP के ट्रोल राहुल गांधी को गालियां देने लगे। 😭
आजकल राहुल गांधी ज़बरदस्त फ़ॉर्म में हैं।
शहर के बीच सत्ता के महल, शहर के बाहर ज्ञान का निर्वासन
राजस्थान सरकार ने हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के लिए एक शानदार परिसर बनवाया। दहमी कलां में करीब 1.24 लाख वर्गमीटर यानी लगभग 30.5 एकड़ जमीन विश्वविद्यालय को मिली।
पहले चरण के निर्माण के लिए 109.92 करोड़ रुपए मंजूर हुए और विश्वविद्यालय के अपने दस्तावेज बताते हैं कि आगे के अधूरे तथा दूसरे चरण के कामों के लिए 292.10 करोड़ रुपए की अतिरिक्त प्रशासनिक-वित्तीय मंजूरी का प्रस्ताव भी रखा गया।
यानी सरकार ने संस्था की भव्यता की कल्पना तो छोटी नहीं की; लेकिन सवाल इमारत का नहीं है। सवाल यह है कि विश्वविद्यालय बनाया किसके लिए गया? इमारत के लिए या विद्यार्थियों के लिए?
आज के हालात बताते हैं कि हरिदेव जोशी विश्वविद्यालय तक सार्वजनिक परिवहन की स्थिति क्षोभकारी है। निकटतम बस स्टॉप से भी विद्यार्थियों को ढाई किलोमीटर का सफर पैदल, ई-रिक्शा या किसी से लिफ्ट लेकर पूरा करना पड़ता है।
गर्मियों की जलती-तपती दोपहर हो, आजकल की बहुत ही मूडी और स्वेच्छाचारी बारिश हो, सर्दियों की शामें हों और जयपुर-अजमेर रोड का यातायात हर दिन शिक्षा प्राप्त करने से पहले विद्यार्थी को यह छोटी-सी प्रतियोगी परीक्षा पास करनी है कि वह विश्वविद्यालय तक पहुँचे कैसे। और वह भी जाओ तो टोल दो। और आओ तो टोल दो। क्या कभी शहर के बीच कहीं टोल लगा है? बस आम नागरिक को कैसे लूटा जा सके, इसके तरीके तलाश करो। बेहतर होता अगर यह टोल 200 फुट बाईपास पर ही लगा दिया जाता।
सरकारी योजनाओं में एक विचित्र सरकारी दर्शन दिखाई देता है। उन लोगों का दर्शन जिनसे मिलो तो उन जैसा ज़हीन नहीं दिखे, उन जेसा बुद्धिमान कहीं नहीं हो और सदाशयी तो वैसा कहीं हो ही नहीं सकता। लेकिन जब परियोजनाएं सामने आती हैं तो लगता है कि चेहरे, भावभंगिमाएं, सदाशयताएं और उनके प्रदीप्त चरित्र कुछ और हैं और सच में संचालन करने वाली शक्तियां जाने किन आसुरी प्रभावों में रहती हैं।
इसी जयपुर में विधानसभा के निकट करीब 90 करोड़ रुपए का संविधान क्लब बनाया गया। रेस्तरां, कॉफी हाउस, स्विमिंग पूल, जिम, सैलून, ऑडिटोरियम, कॉन्फ्रेंस हॉल और अतिथि कक्षों जैसी सुविधाओं के साथ। अभी विदेश से आए मेरे एक मित्र तो इसकी भव्यता देखकर हतप्रभ रह गए।
राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर लगभग 140 करोड़ रुपए की परियोजना है। सेंट्रल पार्क जैसे शहर के सबसे मूल्यवान और सुलभ इलाके में गांधी वाटिका पर करीब 87 करोड़ रुपए खर्च हुए। गांधी वाटिका अगर 2021 या 22 तक बनवा ली जाती और उसमें से राजधानी के विद्यार्थियों को गुजार दिया जाता तो जाती हुई कांग्रेस वैचारिक रूप से दौड़कर लौट आती।
इन संस्थाओं के औचित्य पर प्रश्न नहीं है। राजस्थान को अच्छे सम्मेलन केंद्र चाहिए, गांधी पर संग्रहालय भी चाहिए और निर्वाचित प्रतिनिधियों के संवाद के लिए स्थान भी हो सकता है। प्रश्न प्राथमिकताओं के भूगोल का है।
सत्ता जिन संस्थानों का इस्तेमाल करती है, वे शहर के हृदय में क्यों होते हैं और जिन संस्थानों में सामान्य परिवारों और देश के नौनिहाल अपना भविष्य बनाने आते हैं, उन्हें शहर की परिधि में भेजते समय सरकार परिवहन, छात्रावास और आवास को उसी परियोजना का अनिवार्य हिस्सा क्यों नहीं मानती?
राजनीति की शायद सबसे बड़ी विडंबना यही है। कोई मंत्री चुनाव हार जाए, कोई अफसर सेवानिवृत्त हो जाए, सत्ता बदल जाए या शहर के अच्छे इलाकों, सिविल लाइंस और सुविधाओं से उनका रिश्ता अचानक समाप्त नहीं होता। लेकिन एक शिक्षक, जिसका वास्तविक काम अगली पीढ़ी तैयार करना है, उसे रोज शहर के एक छोर से दूसरे छोर तक ट्रैफिक में जीवन का कीमती समय खर्च करना पड़े और टोल चुकाना पड़े; यह उन राजनेताओं को सामान्य लगता है, जो बिजली, पानी, दवा, एयर किराया से लेकर न जाने क्या क्या सरकारी खर्च से चलाते हैं और पांच बार जीतने की पांच पेंशन और आठ बार जीतने की आठ पेंशन लेकर भी सरकारी पैसे की पिपासा से परितृप्ति नहीं पाते। विद्यार्थी बस बदलता रहे, ऑटो का किराया देता रहे, पैदल चलता रहे, परेशान होता रहे, यह भी राजनेताओं को सामान्य लगता है।
इमारत पर सौ करोड़ खर्च करना आसान है; संस्था बनाना कठिन है।
विश्वविद्यालय तभी विश्वविद्यालय होता है जब वहाँ विद्यार्थी रात तक पुस्तकालय में बैठ सके; शोधार्थी को निर्बाध हाई-स्पीड इंटरनेट मिले; इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विद्यार्थी के लिए उत्कृष्ट स्टूडियो और न्यूज़-लैब हों; डेटा जर्नलिज्म, एआई, मोबाइल जर्नलिज्म और डिजिटल फॉरेंसिक्स की प्रयोगशालाएँ हों; देश-दुनिया के अखबार, जर्नल और डेटाबेस चौबीस घंटे उपलब्ध हों। वहाँ नियमित सुयोग्य शिक्षक हों और कोई पद खाली नहीं हो।
दूर परिसर बनाया है तो लड़कियों और लड़कों के सुरक्षित, अच्छे छात्रावास होने चाहिए। शिक्षकों के लिए परिसर में सुंदर आवास हों। चिकित्सा, भोजन, खेल, कैफेटेरिया और नियमित सार्वजनिक परिवहन हो। विश्वविद्यालय के पुराने प्रॉस्पेक्टस में छात्रावास, ऑडिटोरियम, जिम, अस्पताल, खेल मैदान, बैंक और दूसरी सुविधाओं की बाकायदा परिकल्पना भी की गई थी। आपने किसी को कुलपति बनाया है तो सिर्फ नाम से नहीं खेलते रहें कि इसे कुलपति कहेंगे, उपकुलपति कहेंगे, कुलगुरु कहेंगे या गुरुकुल अधिष्ठाता कहेंगे। आप यह तो बदलते हैं, लेकिन अपने को अमात्य या महाअमात्य कहलाना पसंद नहीं करते। कोई गांधी के नाम से खेल जाता है और कोई दीनदयाल उपाध्याय के नाम से। ऐसा लगता है कि शिक्षा के केंद्र नहीं, ये किसी गांव के फुटबाल मैदान हैं।
दरअसल दहमी कलां की दूरी स्वयं समस्या नहीं है। दुनिया के अनेक महान विश्वविद्यालय महानगरों के बीचोबीच नहीं हैं। दूरी तब समस्या बनती है जब राज्य विश्वविद्यालय तो दूर बनाता है, लेकिन उसके साथ विश्वविद्यालय-नगर नहीं बनाता।
यही इस सरकार के सामने अवसर है।
भजनलाल सरकार को इसे पिछली सरकार की परियोजना समझकर नहीं देखना चाहिए। विश्वविद्यालय सरकारों के नहीं होते, पीढ़ियों के होते हैं। राजस्थान को एक ऐसा राष्ट्रीय स्तर का पत्रकारिता विश्वविद्यालय चाहिए जहाँ से बेहतरीन रिपोर्टर, संपादक, फोटो जर्नलिस्ट, डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार, मीडिया शोधकर्ता और डिजिटल पत्रकार निकलें। पूर्ण नियुक्तियाँ कीजिए। शिक्षक आवास बनाइए। छात्रावास तत्काल पूरे कीजिए। अत्याधुनिक पुस्तकालय और डिजिटल मीडिया लैब बनाइए। जयपुर से विश्वविद्यालय तक निश्चित अंतराल वाली समर्पित लो-फ्लोर बस सेवा शुरू कीजिए।
अरे और कुछ मत समझिए। इसे गौशाला ही समझ लीजिए। यह सोचकर ही इसका भला कर दीजिए।
आज जिस दूरी को विद्यार्थी अभिशाप समझ रहा है, वही तीस एकड़ का परिसर उसकी सबसे बड़ी ताकत बन सकता है।
राजस्थान को तय करना है कि उसकी आधुनिकता की पहचान क्या होगी? शहर के बीच चमकते सत्ता-स्मारक या शहर की सीमा पर जगमगाता ज्ञान का ऐसा परिसर जहाँ किसी विद्यार्थी को कक्षा तक पहुँचने के लिए पहले व्यवस्था से लड़ना न पड़े। मुझे एक पुराने दोस्त ने बताया था कि हरिदेव जोशी विश्वविद्यालय सीपी जोशी की बहुत ख़तरनाक ढंग से बढ़ती ताकत को रोकने का एक उपक्रम था; वह उस उद्देश्य में सफल रहा। लेकिन मुझे लगता है कि यह उस व्यक्ति का एक विभ्रम था। पर जो भी था, वह आज एक नई चेतना का केंद्र बन सकता है।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा साहब और उच्च शिक्षा के सजग मंत्री डॉ. प्रेमचंद बैरवा साहब से मेरा अनुरोध है कि वे इस शिक्षा के केंद्र पर ध्यान दें, इसमें नियमित नियुक्तियां करवाएं और इसे राजस्थान का एक गर्वीला केंद्र बनाने में अपना योगदान दें। पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने इस उच्च शिक्षा केंद्र के रूप में प्रदेश और पत्रकारिता को एक नायाब तोहफा दिया था। वह अब हर तरह से नायाब होना ही चाहिए। शहर के बीच सत्ता के महल अंधेरे में भी जगमगा सकते हैं तो शहर के बाहर ज्ञान का निर्वासन समाप्त भी हो सकता है। हमारे राजनेता क्या नहीं कर सकते!
मोहन भागवत का यह वीडियो सुनते हुए आप अंदाज़ लगा सकते हैं कि संघ कैसे झूठ फैलाता है।
१- 1933 में कांग्रेस का अधिवेशन जलगाँव नहीं कोलकाता में हुआ था जहाँ मालवीय जी की गिरफ़्तारी की वजह से नलिनी सेनगुप्ता ने अध्यक्षता की थी।
२- तीन रंगों वाला झंडा कांग्रेस ने 1924 में पहली बार नागपुर में फहराया। इसे स्वराज झंडा कहा गया।
३- पंडित नेहरू ने 1929 में रावी के तट पर झंडा फहराया था, पूर्ण स्वाधीनता की घोषणा की थी।
४- 1931 के कराची सेशन में पहली बार इसे कांग्रेस के आधिकारिक ध्वज का दर्जा दिया गया।
यानी जितना बोला उसमें एक शब्द भी सही नहीं है। अब यही ह्वाट्सऐप से आपके घर पहुंचेगा और इतिहास बन जाएगा।
"He broke Gavaskar's leg with a thunderous shot—then signed the plaster cast. One of cricket's greatest images of rivalry, regret and respect."
During the 3rd Test at The Oval in July 1982, Ian Botham smashed a ferocious shot while batting that struck Sunil Gavaskar, who was fielding at silly point. The impact fractured Gavaskar's left tibia, forcing the Indian captain out of the match.
Later, in a heartfelt gesture, Botham visited Gavaskar and signed the plaster cast on his injured leg.
This photograph of Botham autographing the cast has become an enduring symbol of respect and camaraderie between fierce competitors.
Cricket was gentle mans game.
Do you find any such incident? Please share.
मनमोहन सिंह जी की सरकार को दागदार दिखाने में पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली का योगदान पूर्व कैग प्रमुख विनोद राय से भी ज्यादा रहा। अब जाकर झूठे साबित हुए कथित कोयला घोटाले को जेटली ने अभूतपूर्व, मनमाना और स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार बताया था।
गजब यह था कि इस फर्जी घोटाले को लेकर पूरी संसद को ब्लॉक कर दिया। यह वही जेटली थे जिन्होंने स्ट्रेटिजिक एनर्जी टेक्नोलोजी सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड, टाटा संस और साउथ अफ्रीकन कंपनी के एक महत्वकांक्षी जॉइंट वेंचर की तरफदारी करते हुए बिल्कुल अलग किस्म का तर्क दिया था।
2008 में कोयला खदानों को लेकर सरकार को अर्जी देते वक्त इस जॉइंट वेंचर ने, जिसे सरकार की इस आवंटन प्रक्रिया से सबसे ज्यादा फायदा पहुंचा था, यह जानने के लिए कि क्या सरकार के साथ किसी भी प्रकार का मुनाफा बांटे बगैर करार किया जा सकता था? उन्होंने जेटली से संपर्क कर इस मसले पर उनकी राय जाननी चाही थी।
कॉलेज के जमाने के अपने वकील दोस्त, रायन करांजवाला के दफ्तर के हवाले से जेटली ने अपनी एक 21-पृष्ठ लंबी कानूनी राय उन्हें दी थी, जिसमें उन्होंने साफ कहा था कि भारत सरकार को यह अधिकार है कि वह कोयला खदानों के आवंटन को लेकर मनचाही प्रक्रिया अपना सकती है, और कंपनी सरकार के साथ प्रस्तावित मुनाफा बांटने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है।यह स्टोरी कारवां ने छापी और बताया कि यह राय लीक हो गई लेकिन किसी जगह पब्लिश नहीं हुई।