विगत कई वर्षों से पर्यावरण एवं वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में सतत कार्य करते हुए ओरण, गौचर एवं पारंपरिक चरागाहों के संरक्षण में उल्लेखनीय भूमिका निभाने वाले जैसलमेर के सावंता गांव निवासी श्री सुमेर सिंह भाटी को 'रेंजलैंड रेस्टोरेशन अवार्ड्स 2026' हेतु नामित होने पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
यह हम सभी के लिए गर्व का विषय है कि उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान UNCCD के मंगोलिया में आयोजित अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में प्रदान किया जाएगा।
आपकी यह उपलब्धि न केवल जैसलमेर, बल्कि पूरे राजस्थान और देश के लिए प्रेरणास्रोत है। आपके प्रयास आने वाली पीढ़ियों को प्रकृति संरक्षण, जैव विविधता और पारंपरिक चरागाहों के महत्व के प्रति जागरूक करने में महत्ती भूमिका निभाते रहेंगे। #Jaisalmer
जैसलमेर के सुल्ताना गाँव में पारंपरिक बेरीयों को पुनर्जीवित करने के लिए ग्रामीणों द्वारा किए जा रहे सामूहिक प्रयास अत्यंत सराहनीय है। जल संरक्षण के साथ-साथ हमारी पारंपरिक जल संरचनाओं को सहेजने की यह पहल पूरे क्षेत्र के लिए एक मिसाल है।
वर्तमान में मानसून का समय है। यदि अभी से तालाबों के आगोर की सफाई, नाड़ियों, बेरीयों, कुओं और अन्य पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण एवं पुनर्जीवन का अभियान चलाया जाए, तो वर्षा जल का अधिकतम संचयन संभव होगा और भविष्य में जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकेगा।
जैसलमेर सहित प्रदेश के सभी गाँवों में ऐसे जनसहभागिता आधारित प्रयासों की आवश्यकता है। जल संरक्षण केवल सरकार का नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। आइए, जल संरक्षण अभियान चलाकर आने वाली पीढ़ियों के लिए हर बूंद पानी सहेजें।
#SaveWater #WaterConservation #Jaisalmer
हाल ही में गुजरात के ऊंझा जीरा को भौगोलिक संकेतक (GI Tag) प्रदान किया गया है। किसी भी उत्पाद को जीआई टैग उसकी विशिष्ट गुणवत्ता, भौगोलिक परिस्थितियों, स्थानीय जलवायु, मिट्टी तथा उस क्षेत्र की पारंपरिक पहचान के आधार पर दिया जाता है, न कि केवल उसके विपणन (मार्केटिंग) के आधार पर।
कभी जीरा उत्पादन में अग्रणी रहा गुजरात आज उत्पादन के मामले में पश्चिमी राजस्थान से बहुत पीछे है। जैसलमेर, बाड़मेर, जालोर और नागौर जैसे जिले देश के प्रमुख जीरा उत्पादक क्षेत्रों के रूप में उभर चुके हैं। राजस्थान का जीरा अपनी उत्कृष्ट गुणवत्ता और बढ़ते उत्पादन के कारण राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत पहचान बना चुका है। ऐसे में पश्चिमी राजस्थान का जीरा जीआई टैग का प्रबल दावेदार था। दुर्भाग्यवश, प्रभावी पैरवी के अभाव में हम पीछे है।
ऊंझा जीरा को जीआई टैग मिलने से वहाँ के किसानों को निश्चित रूप से लाभ मिलेगा, जबकि राजस्थान के किसानों के सामने भविष्य में अपनी उपज के अपेक्षाकृत कम मूल्य मिलने की आशंका है।
दुर्भाग्य की बात यह भी है कि राजस्थान में जीरे की कोई बड़ी और सुव्यवस्थित कृषि मंडी विकसित नहीं की गई है, जहाँ किसानों को पर्याप्त प्रतिस्पर्धा, बड़े खरीदार और उचित मूल्य मिल सके। परिणामस्वरूप प्रदेश के अनेक किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए गुजरात की ऊंझा मंडी का रुख करना पड़ता है।
राज्य सरकार को चाहिए कि वह पश्चिमी राजस्थान के जीरे के लिए जीआई टैग की मजबूत और प्रभावी पैरवी करे, ताकि यहाँ की विशिष्ट कृषि पहचान को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल सके। साथ ही, पश्चिमी राजस्थान में ऊंझा की तर्ज पर आधुनिक कृषि मंडी विकसित की जाए, बड़े खरीदारों एवं निर्यातकों को आकर्षित करने के लिए प्रोत्साहन दिया जाए तथा जीरा आधारित प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन उद्योग स्थापित किए जाएँ।
इससे किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिलेगा, युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे, राज्य के राजस्व में वृद्धि होगी और पश्चिमी राजस्थान की कृषि अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिलेगी।
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सेवण (Lasiurus sindicus) पश्चिमी राजस्थान की सबसे महत्वपूर्ण देशी घासों में से एक है, लेकिन इसके क्षेत्रफल में लगातार हो रही कमी अत्यंत चिंताजनक है। आज जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर और जोधपुर जिलों में सेवण के प्राकृतिक चरागाह तेजी से सिकुड़ते जा रहे हैं।
जैसलमेर के रामगढ़, शाहगढ़, सुल्ताना, नाचना, म्याजलार, करड़ा और गुंजनगढ़, बाड़मेर के गढ़रा, सुंदरा, द्राभा और रोहिड़ी तथा बीकानेर के बज्जू और पूगल जैसे क्षेत्रों में कभी बड़े पैमाने पर सेवण के विस्तृत मैदान हुआ करते थे। दुर्भाग्यवश, पिछले एक दशक में इनका क्षेत्रफल लगातार घटते-घटते कई स्थानों पर लगभग समाप्ति की कगार पर पहुँच गया है।
सेवण घास केवल एक चारा नहीं, बल्कि पश्चिमी राजस्थान की पारिस्थितिकी और पशुधन आधारित अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यह पशुओं के लिए अत्यंत पौष्टिक एवं सुपाच्य चारा है, जो विशेष रूप से दुधारू पशुओं की दूध उत्पादन क्षमता बढ़ाने में सहायक माना जाता है। इसकी गहरी एवं मजबूत जड़ प्रणाली (राइजोम तंत्र) इसे सूखा सहन करने योग्य बनाती है, साथ ही यह रेतीली भूमि को स्थिर रखने और चरागाहों की उत्पादकता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
सेवण घास गोडावण, चिंकारा तथा अनेक सरीसृप एवं अन्य वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण आवास और विचरण क्षेत्र भी उपलब्ध कराती है। यह बहुवर्षीय घास है, जो एक बार स्थापित होने के बाद लगभग 3 से 4 वर्षों तक लगातार उपयोगी रहती है। सूखे की स्थिति में इसे काटकर संरक्षित किया जा सकता है, जिससे आवश्यकता पड़ने पर पशुओं के लिए चारे के रूप में उपयोग किया जा सके।
इतनी महत्ता होने के बावजूद सेवण और धामण जैसी रेगिस्तानी घासों को आज भी वन एवं चरागाह प्रबंधन की नीतियों में अपेक्षित प्राथमिकता नहीं मिल रही है। स्टेट फॉरेस्ट रिपोर्ट्स में इनका समुचित आकलन नहीं किया जाता। सरकार के पास इनके क्षेत्रफल, उत्पादन और संरक्षण से जुड़े पर्याप्त शोधपरक आँकड़ों का भी अभाव है।
यह अत्यंत विडंबना है कि राजस्थान का विशाल मरुस्थलीय क्षेत्र सेवण घास पर निर्भर होने के बावजूद अब तक इसके संरक्षण के लिए किसी विशेष संरक्षित क्षेत्र का विधिक प्रावधान नहीं किया गया है। न ही इसके उत्पादन, संरक्षण, बीज संवर्धन, चरागाह प्रबंधन एवं प्रशिक्षण के लिए कोई समर्पित संस्थान स्थापित किया गया है।
यदि सेवण घास के प्राकृतिक मैदान इसी गति से सिकुड़ते रहे तो केवल इस महत्वपूर्ण घास का ही अस्तित्व संकट में नहीं पड़ेगा, बल्कि पशुपालकों की आजीविका, स्थानीय अर्थव्यवस्था, वन्यजीव संरक्षण और पूरे मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
इसलिए आवश्यक है कि राज्य सरकार सेवण घास के प्राकृतिक चरागाहों को विधिक संरक्षण प्रदान करे, इनके लिए समर्पित भूमि का आवंटन सुनिश्चित करे। जैसलमेर, बीकानेर और बाड़मेर जैसे जिलों में सेवण घास के संरक्षण, उत्पादन एवं पुनर्स्थापना हेतु विशेष अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थानों की स्थापना करे। साथ ही स्थानीय समुदायों, पशुपालकों और ग्राम पंचायतों की सक्रिय भागीदारी से बड़े स्तर पर पुनर्स्थापना अभियान चलाए जाएँ।
वर्तमान में मानसून का समय सेवण घास के पुनर्स्थापन के लिए सबसे उपयुक्त है। यह सुखद है कि विभिन्न सामाजिक संस्थाएँ और स्थानीय समूह कई स्थानों पर सेवण घास के पुनरोपण एवं संरक्षण की मुहिम चला रहे हैं। ऐसे प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इन पहलों को ग्राम स्तर से लेकर राज्य सरकार की योजनाओं तक संस्थागत रूप दिया जाए, ताकि सेवण घास का संरक्षण एक जनआंदोलन बन सके।
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जयपुर में आयोजित राजस्थान स्टेट ओपन शूटिंग चैंपियनशिप में जैसलमेर के पिथला निवासी श्री हर्षवर्धन सिंह भाटी ने डबल ट्रैप यूथ मेन वर्ग में शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक जीतकर जैसलमेर सहित पूरे क्षेत्र का नाम गौरवान्वित किया है।
इस स्वर्णिम सफलता पर श्री हर्षवर्धन सिंह को हार्दिक बधाई एवं उज्ज्वल भविष्य के लिए अनंत शुभकामनाएँ।
साथ ही, इस सफलता में महत्ती भूमिका निभाने वाले जैसलमेर शूटिंग रेंज के वरिष्ठ कोच श्री केसरी सिंह नाचना को भी हार्दिक बधाई एवं मंगलकामनाएँ। #Jaisalmer
राजस्थान के विश्वविद्यालयों में मराठी भाषा पढ़ाने का निर्णय कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े करता है। जब वर्षों से राजस्थान की जनता राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर उसे संवैधानिक मान्यता दिलाने की मांग कर रही है, तब प्राथमिकता राजस्थानी भाषा के अध्ययन, शोध और संवर्धन सहित संवैधानिक दर्जे की होनी चाहिए थी।
राजस्थान का गौरवशाली इतिहास, समृद्ध लोक साहित्य, लोक संस्कृति और असंख्य ऐतिहासिक ग्रंथ राजस्थानी भाषा में सुरक्षित हैं। यदि विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा के अध्ययन एवं शोध केंद्र स्थापित किए जाएँ, तो यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण, संवर्धन और नई पीढ़ी तक उसके प्रभावी हस्तांतरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि हमारा किसी भी भाषा के प्रति न तो विरोध है और न ही कोई पूर्वाग्रह। मराठी सहित भारत की सभी भाषाएँ समान रूप से सम्मान की पात्र हैं। किंतु राजस्थान में अपनी मातृभाषा की उपेक्षा कर किसी अन्य भाषा को प्राथमिकता देना उचित प्रतीत नहीं होता।
राजस्थान के जनप्रतिनिधियों, शिक्षाविदों और नीति-निर्माताओं को इस गंभीर विषय पर प्रदेश की भावनाओं के अनुरूप आवाज़ उठानी चाहिए, ताकि राजस्थानी भाषा को उसका उचित सम्मान और संस्थागत स्थान मिल सके।
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मानसून के बाद जैसलमेर में कुरजां (डेमोसाइल क्रेन) सहित अनेक प्रवासी पक्षियों का आगमन शुरू हो जाता है। यदि वन विभाग और प्रशासन दूरदृष्टि के साथ कार्य करे, तो फलोदी के खींचन संरक्षण मॉडल की तर्ज पर जैसलमेर में भी प्रवासी पक्षियों के लिए अनुकूल वातावरण विकसित किया जा सकता है।
यह पहल केवल पक्षी संरक्षण तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि जैसलमेर को बर्ड टूरिज्म का एक नया केंद्र बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इससे पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी, स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे और पर्यावरण संरक्षण को भी मजबूती मिलेगी। #Jaisalmer
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"द हिन्दू" में प्रकाशित एक शोध-आधारित रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के कारण मैदानी क्षेत्रों में दुग्ध उत्पादन प्रभावित हो रहा है। इसका प्रमुख कारण हीट स्ट्रेस है, जिससे पशुओं की दूध देने की क्षमता घटती है। साथ ही अत्यधिक गर्मी पशुओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है और चारे का संकट भी उत्पन्न करती है।
इसका सबसे अधिक असर संकर (हाइब्रिड) गायों और भैंसों पर देखने को मिलता है। वहीं यदि पश्चिमी राजस्थान के परिप्रेक्ष्य में देखें तो थारपारकर, राठी और अन्य स्थानीय देशी नस्लें इस प्रकार की जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल हैं। ये नस्लें भीषण गर्मी को बेहतर ढंग से सहन करती हैं और अपेक्षाकृत स्थिर दुग्ध उत्पादन बनाए रखने में सक्षम होती हैं।
पशुपालन भारत की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है और दुग्ध उत्पादन खाद्य एवं पोषण सुरक्षा से भी सीधे जुड़ा हुआ है। ऐसे में जलवायु परिवर्तन और हीट वेव की बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए सरकार को स्थानीय एवं देशी नस्लों के संरक्षण और संवर्धन पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
पशुपालकों को देशी नस्लें अपनाने के लिए प्रोत्साहन, आधुनिक ब्रीडिंग सेंटर, डेयरियों में प्रोत्साहन योजनाएँ, बेहतर पशु स्वास्थ्य सेवाएँ तथा चारा विकास जैसी योजनाओं को प्राथमिकता देना समय की आवश्यकता है। इससे दुग्ध उत्पादन को दीर्घकालीन रूप से सस्टेनेबल बनाया जा सकेगा और पशुपालकों की आय के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
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सीमा सुरक्षा बल (BSF) राजस्थान द्वारा फ्रंटियर मुख्यालय, जोधपुर में आयोजित प्रथम स्पंदन खेलो इंडिया राज्य स्तरीय बास्केटबॉल प्रतियोगिता में जैसलमेर बास्केटबॉल अकादमी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए अंडर-19 वर्ग में स्वर्ण पदक एवं अंडर-17 वर्ग में कांस्य पदक जीतकर पूरे जैसलमेर का गौरव बढ़ाया है।
इस उल्लेखनीय उपलब्धि पर अकादमी के सभी प्रतिभाशाली खिलाड़ियों एवं कोचिंग स्टाफ को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ। #Jaisalmer
सन् 1971 के भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तान के 48 टैंको को नेस्तनाबूद करते हुए बसंतर की लड़ाई में अपनी अदम्य वीरता, अद्भुत युद्ध कौशल और पराक्रम से राष्ट्र का गौरव बढ़ाने वाले, माँ भारती के महान सपूत, महावीर चक्र से अलंकृत लेफ्टिनेंट जनरल हणुत सिंह जी जसोल की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन।
जय हिंद 🇮🇳
आधुनिक जैसलमेर के निर्माता, स्मृतिशेष महारावल श्री जवाहिर सिंह जी के राजतिलक दिवस पर उन्हें सादर स्मरण एवं कोटि-कोटि नमन।
आज ही के दिन (26 जून 1914) को महारावल श्री जवाहिर सिंह जी का राजतिलक हुआ था। उनका शासनकाल जैसलमेर के विकास, जनकल्याण और सुशासन का स्वर्णिम अध्याय रहा।
चिकित्सा, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार, जल संरचनाओं के निर्माण, शहर के बुनियादी ढांचे के विकास तथा सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करने में उनका योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा। उनके दूरदर्शी नेतृत्व ने आधुनिक जैसलमेर की मजबूत नींव रखी।
आज राजतिलक दिवस के पावन अवसर पर उनके महान कार्यों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि एवं कोटि-कोटि नमन।
#Maharawal #JawahirSinghJi #Jaisalmer
जैसलमेर की समृद्ध लोक संस्कृति, गौरवशाली परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को शब्दों में सहेजने वाले विख्यात साहित्यकार श्री लक्ष्मीनारायण खत्री को उनकी नवीन कृति "जैसलमेर की सांस्कृतिक सुरम" के प्रकाशन पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह पुस्तक जैसलमेर की सांस्कृतिक धरोहर, लोकजीवन एवं परंपराओं को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनेगी तथा पाठकों को इतिहास और संस्कृति से और अधिक गहराई से जोड़ने का कार्य करेगी।
इस उत्कृष्ट कृति की सफलता एवं व्यापक लोकप्रियता के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ। #Jaisalmer
भगवान महादेव की आराधना के पावन पर्व एवं सकल माहेश्वरी समाज के वंशोत्पति दिवस 'महेश नवमी' की हार्दिक शुभकामनाएं।
भगवान महेश की कृपा से सभी के जीवन में सुख, समृद्धि एवं खुशहाली का संचार हो, यही कामना है।
ॐ नमः शिवाय॥
#MaheshNavmi#महेश_नवमी
कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य को टाइगर रिज़र्व घोषित करने के प्रस्ताव पर राजसमंद सांसद श्रीमती @BjpMahimakumari जी द्वारा व्यक्त की गई चिंताएँ गंभीर और विचारणीय हैं।
प्रश्न यह नहीं है कि बाघों का संरक्षण होना चाहिए या नहीं। निश्चित रूप से होना चाहिए। प्रश्न यह है कि क्या किसी नए प्रयोग के लिए हम एक ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र को दांव पर लगा सकते हैं, जो पहले से ही अनेक महत्वपूर्ण और दुर्लभ वन्यजीव प्रजातियों का सुरक्षित आवास है?
कुंभलगढ़ भारतीय भेड़िये (Indian Wolf) के सबसे महत्वपूर्ण आवासों में से एक माना जाता है। इसके अलावा यहाँ तेंदुए, स्लॉथ बियर, लकड़बग्घे, चिंकारा, सांभर और दुर्लभ कैराकल जैसी प्रजातियाँ वर्षों से प्राकृतिक संतुलन के साथ निवास कर रही हैं। संरक्षण का अर्थ केवल एक आकर्षक प्रजाति को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि सम्पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करना है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखे तो बाघों को दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ आबादी के लिए पर्याप्त शिकार, विस्तृत क्षेत्र की आवश्यकता होती है। यदि यह आधार पर्याप्त नहीं होगा तो मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने की आशंका और अधिक बढ़ेगी। रणथंभौर सहित देश के कई टाइगर रिज़र्व क्षेत्रों में ऐसे संघर्षों की घटनाएँ समय-समय पर सामने आती रही हैं।
कुंभलगढ़ की पहाड़ी एवं पथरीली भौगोलिक संरचना तेंदुओं, भालुओं और अन्य स्थानीय वन्यजीवों के लिए स्वाभाविक आवास रही है। कई संरक्षणवादियों और वन्यजीव विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक आधारों और भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए इस परियोजना पर पूर्व में भी अपनी आपत्तियाँ दर्ज करवाई हैं।
साथ ही इससे आदिवासी परिवारों एवं रबारी समुदाय की आजीविका, पारंपरिक चराई व्यवस्था और वन संसाधनों पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
राजस्थान पहले ही सरिस्का और मुकुंदरा जैसे टाइगर प्रोजेक्ट्स के अनुभव देख चुका है, जहाँ भारी निवेश, संसाधनों और निगरानी के बावजूद अपेक्षित सफलता प्राप्त करने में चुनौतियाँ बनी रहीं। ऐसे में नए प्रोजेक्ट्स की घोषणा से पहले मौजूदा टाइगर रिज़र्व्स को और अधिक संसाधन उपलब्ध कराकर उन्हें सुदृढ़ बनाना अधिक व्यावहारिक होगा।
मेरी सरकार से मांग है कि कुंभलगढ़ को टाइगर रिज़र्व घोषित करने की जल्दबाजी के बजाय यहाँ पहले से निवासरत वन्यजीवों के संरक्षण हेतु विशेष फंड, बेहतर आवास विकास, जल प्रबंधन और वैज्ञानिक संरक्षण योजनाएँ लागू की जाएँ। केवल पर्यटन या व्यावसायिक संभावनाओं को ध्यान में रखकर लिया गया कोई भी निर्णय भविष्य में अपूरणीय पर्यावरणीय क्षति का कारण बन सकता है।
@byadavbjp@Sanjay4India1@ntca_india@moefcc
पितृ दिवस पर पिताश्री स्मृतिशेष महारावल बृजराज सिंह जी की पावन स्मृतियों को कोटिशः नमन।
पिता की छाया में ही जीवन के मूल्य, कर्तव्य और संस्कार आकार लेते हैं। वे परिवार की सबसे सुदृढ़ नींव और जीवन के सच्चे मार्गदर्शक होते हैं।
पिताश्री द्वारा दिए गए संस्कार, आशीर्वाद, मार्गदर्शन एवं उनका विराट व्यक्तित्व आज भी मेरे लिए प्रेरणा का स्रोत हैं और हर कदम पर जीवन को नई दिशा प्रदान करते हैं।
दाता की पुण्य स्मृतियों को श्रद्धापूर्वक नमन। 🙏
#FathersDay