आज माँ कुलकुला देवी मंदिर एवं हिरण्यवती नदी क्षेत्र का स्थलीय निरीक्षण किया। क्षेत्र के समग्र विकास, स्वच्छता, सौंदर्यीकरण एवं पर्यटन विकास हेतु संबंधित अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए गए।
हिरण्यवती नदी की चरणबद्ध सफाई, प्लास्टिक अपशिष्ट निस्तारण, ड्रोन सर्वेक्षण, सिल्ट सफाई, पेयजल, शौचालय एवं स्वास्थ्य सुविधाओं की व्यवस्था सुनिश्चित कराई जाएगी।
मंदिर एवं नदी क्षेत्र के आसपास व्यापक वृक्षारोपण अभियान के अंतर्गत लगभग 2 लाख पौधे लगाए जाएंगे। जनसहभागिता एवं श्रमदान के माध्यम से इस पवित्र स्थल को एक आदर्श धार्मिक एवं पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा।
नफ़रत को दूर करने के लिए संवेदना का स्वभाव अपनाएँ, क्योंकि नफ़रत की आग बहुत ज़्यादा ताक़तवर है और मन के साथ शरीर पर भी बुरा असर डालती है। याद रखें कि बुराई अच्छाई से ज़्यादा आकर्षक ज़रूर दिखाई देती है, लेकिन उसका असर ख़राब ही होता है।
आज शाम की हवा में कुछ अलग था। शायद इसलिए मैं अब भी उसी पल में अटका हुआ हूँ, जैसे नाव अब तक किनारे नहीं लगी। गंगा शांत थी, लेकिन उसके भीतर कहीं गहराई से एक धीमा संगीत बज रहा था जिसे सिर्फ वही सुन सकता है, जिसके मन में सन्नाटा हो।
हम दोनों आमने-सामने बैठे थे। न बहुत पास, न बहुत दूर। बीच में बस उतनी ही दूरी जितनी दो धड़कनों के बीच होती है, इतनी कम कि महसूस हो जाए और इतनी ज़्यादा कि बोलने से डर लगे।
उसने अपने बालों को पीछे सरकाया और हवा में बस उसकी खुशबू रह गई। वो खुशबू जैसे किसी पुराने मौसम की याद हो, जिसे मैं भूलना चाहता था, पर वो हमेशा लौट आती थी उसी नमी के साथ, उसी एहसास के साथ।
वो कुछ नहीं बोल रही थी। बस उसकी आँखों में पानी की परछाई थी,और उस पर आसमान की हल्की सी धूप। मैंने सोचा शायद वो भी वही सोच रही है जो मैं…कि काश ये पल कभी ख़त्म न हो।
मैंने गंगा के पानी में झाँककर देखा हमारी परछाइयाँ साथ-साथ तैर रही थीं। पानी हल्के झोंकों से हिलता तो लगता जैसे हमारी परछाइयाँ भी बात कर रही हों।
शाम ढल रही थी। घाट से आती आरती की घंटियों की आवाज़ हवा में घुल रही थी। वह आवाज़ नज़दीक नहीं थी, लेकिन उसकी गूंज हमारे बीच के मौन को और भी सुंदर बना रही थी। ऐसा लग रहा था मानो पूरी काशी उस क्षण हमें देख रही हो। दो इंसान जो कुछ नहीं कह रहे, फिर भी एक-दूसरे में सब सुन रहे हैं।
मैंने धीरे से कहा “जानती हो, अगर ये नाव यूँ ही बहती रहे, तो शायद ज़िंदगी आसान हो जाए।” वो मुस्कराई। वो मुस्कान कोई उत्तर नहीं थी, बस एक स्वीकार था जैसे उसने मान लिया कि कुछ यात्राएँ मंज़िल से नहीं, एहसास से पूरी होती हैं।
पानी में पड़ती सूरज की आख़िरी किरणें अब सोने जैसी हो गई थीं। हवा थोड़ी ठंडी, थोड़ी नमी से भरी हुई। उसके गालों पर हवा से आई लाली थी, इतनी कोमल कि कोई भी शब्द उस पल की पवित्रता को बिगाड़ देता। मैंने उसकी ओर देखा, वो अब आँखें मूँदकर बैठी थी, जैसे खुद को उस हवा, उस नदी और उस पल के हवाले कर दिया हो।
उस क्षण मुझे लगा, प्रेम कोई आग नहीं है, न कोई वादा, न कोई छुअन है बल्कि प्रेम तो शायद यही है, जब कोई चुपचाप तुम्हारे सामने बैठा रहे और तुम्हारा सारा अस्तित्व उसमें घुल जाए, बिना किसी शब्द के, बिना किसी स्पर्श के।
जब नाव घाट के करीब पहुँची, उसने धीरे से आँखें खोलीं। मैं कुछ कहना चाहता था पर शब्द जैसे भीतर ही अटक गए। वो मुस्कराई, उतरी, और बस एक बार मुड़कर देखा। वो एक नज़र मेरे सारे प्रश्नों का उत्तर थी।
और मैं…मैं वहीं रह गया। नाव में, उसी जगह, उसी हवा के साथ, उसी मौन में। नदी अब बहती रही, पर मैं नहीं। मैं वहीं थम गया उस एक शाम में, उस एक नज़र में, उस एक मुस्कान में।
आज जब लिख रहा हूँ, तो लगता है कुछ मुलाकातें खत्म नहीं होतीं, वो बस समय के साथ नदी में बहती रहती हैं। और हर बार जब मैं गंगा किनारे बैठता हूँ, लगता है जैसे वो सामने बैठी है उसी तरह, उसी मौन में, उसी नाव पर।
बस फर्क इतना है कि अब नाव खाली है और वो, मेरी याद की तरह हर शाम गंगा के पानी में उतर आती है मुस्कराते हुए, बिना कुछ कहे, बिल्कुल उसी तरह जैसे उस दिन....! ❤️
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
@Raghvendra_101
इक दिन तो दूर होना ही है ..
इक दिन तुमसे बिछड़ना ही है ..
ये हर एक वक्त पता है मुझे की
कितना भी चाहूं पर तू मेरी नहीं हो सकती है..
फिर भी तुम्हें चाहना अच्छा लगता है
तेरे यादों में डूबना अच्छा लगता है!
~मनीष
क्या हो
जो लौट कर आ जाए
वो इंसान, वस्तु या इच्छाएं
जिसके लिए
हमने अपने महत्वपूर्ण पलों को
खत्म किए हो कभी,
क्या सबकुछ सामान्य रहता है
या सिर्फ हम उस भाव के
पीछे भागते है सिर्फ ,
जो अभाव की स्थिति से प्राप्त हुआ है।
✍🏻🌻