भावों की अभिव्यक्ति, संस्कृति की पहचान है हिन्दी।
हिन्दी हमारी संस्कृति की सशक्त संवाहिका और जनभावनाओं की सहज अभिव्यक्ति है। यह केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी विविधता में एकता, राष्ट्रीय चेतना और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जोड़ने वाली भाषा है।
हिन्दी के सम्मान, संवर्धन और व्यापक प्रसार के संकल्प के साथ, समस्त देशवासियों को हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
#HindiDiwas
@HMOIndia
इकलौता बेटा पहली बार अपने पिता को वृद्धाश्रम में छोड़कर लौट रहा था। रास्ते में अचानक फोन आया। उसकी पत्नी ने फोन करके कहा....
“तुम एक बार फिर वृद्धाश्रम लौट जाओ, एक बात कहना भूल गई हूँ।
वहाँ जाकर अपने पिता को अच्छी तरह समझा देना कि पूजा-पर्व हो, यहाँ तक कि तुम्हारा जन्मदिन ही क्यों न हो—तुम्हारे पिता को उसी वृद्धाश्रम में रहना होगा। हमारे घर नहीं आएँगे।”
मजबूर होकर पत्नी की बात मानते हुए वह फिर वृद्धाश्रम लौट गया। वहाँ जाकर उसने एक अजीब-सा दृश्य देखा। उसका बूढ़ा पिता वृद्धाश्रम के बुज़ुर्ग मालिक के साथ बहुत हँस-हँसकर बातें कर रहा था। यह देखकर बेटे के मन में संदेह हुआ। उसने मन ही मन सोचा—क्या पिता पहले से ही इस वृद्धाश्रम के मालिक को जानते थे? कौन जाने!
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शिक्षा व्यवस्था बचाने की ख़ातिर मध्य प्रदेश से आए एक छात्र को सुनिए और देखिए… मूँगफली के बचे खुचे दाने खाकर जुटा जंतर मंतर पर… जब इस तरह से छात्र जुड़ते हैं तो बात दूर तलक जाती है…
आज विदेश मंत्रालय ने औपचारिक रूप से स्वीकार लिया कि कुछ लोगों ने “निजी तौर “ पर पाकिस्तान डेलीगेशन से मुलाक़ात की। इसे सरकारी प्रयास नहीं माना जाए। जिन लोगों ने मुलाक़ात की उनमें बीजेपी नेता भी शामिल थे। बाक़ी बीजेपी के करीबी लोग इसमें थे। कोई ग़लत नहीं या। सामान्य प्रकिया है। होना भी चाहिए।
बस अब यहाँ सवाल है कि अगर कोई निजी तौर पर पाकिस्तानी डेलीगेशन से मिल रहा है,पार्टी कर रहा है तो इसका कहीं गुस्सा टीवी चैनल पर दिखा?
अब यही सोच कर देखिए कि किसी विपक्षी नेता के मित्र के ससुर का समधी का मामा भी ऐसे बातचीत/पार्टी में दिख जाता तो पूरी विपक्ष को पाकिस्तानी बुलाकर अंतहीन टीवी डिबेट हो रहे होते। तमाम न्यूज़ एजेंसी के कैमरा उन सभी लोगों के घर के हर छेद में लग गए होते जो ऐसी मीटिंग में शामिल हुए होते।
चाहे धर्म के नाम पर करोड़ों के चढ़ावा घोटाला हो या राष्ट्रवाद के नाम पर पाकिस्तान के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाना,यह कुछ “खास” लोगों के लिए मानो आरक्षित कर दिया गया है!
अगस्त 2019 में दिल्ली में होटल ताज महल में सुप्रीम कोर्ट के चार साथी न्यायाधीशों के साथ भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, रंजन गोगोई (बीच में). गोगोई की अध्यक्षता में पांच न्यायाधीशों ने अयोध्या विवाद में फैसला सुनाया. अदालत ने माना कि विध्वंस "गंभीर" था, लेकिन पूरे स्थल को हिंदुओं को सौंप दिया. अपनी आत्मकथा जस्टिस फॉर द जज में गोगोई लिखते हैं कि, फैसले के बाद शाम को, वह जजों को रात के खाने के लिए बाहर ले गए. उन्होंने इस तस्वीर को किताब में शामिल किया, जिसका कैप्शन था, “अयोध्या के ऐतिहासिक फैसले का जश्न.”
पढ़ें नवंबर 2022 का सीमा चिश्ती का लिखा यह लेख: https://t.co/0wutOdS1h8
अब ये स्वीकारा गया है कि ऑपरेशन सिंदूर में 6 भारतीय सैनिक शहीद हुए
पर सुनिए
संसद में 28 जुलाई 2025 को जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने विपक्ष को ललकारते हुए कहा था
“आपको प्रश्न पूछना है तो यह पूछिए की क्या इस ऑपरेशन में हमारे जवान सैनिकों को कोई क्षति हुई? तो उसका उत्तर है नहीं”
और इस पर सत्ता पक्ष ने जमकर ताली बजायी थी… मेज़ थपथपाई थी
जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र में यूपीए सरकार के समय सोनिया गांधी से केरल के दो मछुआरों की हत्या को लेकर कड़े सवाल पूछे थे।
मार्च 2014
‘विकसित भारत’ के लिए 2047 का लक्ष्य रखने के लिए धन्यवाद प्रधानमंत्री मोदी जी
वैसे गुजरात के सीएम के तौर पर आपने कहा था
“अब लंबा इंतज़ार नहीं करना है भइया… 2050 में ऐसा होगा… अरे होगा तो होगा हम कहां होंगे…”
आइंस्टीन के जो ड्राइवर थे, उन्होंने एक दिन आइंस्टीन से कहा- " सर,आप हर सभा में जो भाषण देते हैं, वह मैंने याद कर लिया है।''
-आइंस्टीन हैरान रह गये!
फिर उन्होंने कहा, "ठीक है, मैं अगली बैठक में जहां जा रहा हूं, वे मुझे नहीं जानते, आप मेरे स्थान पर भाषण दीजिए और मैं ड्राइवर बनूंगा।"
- ऐसे ही हुआ अगले दिन बैठक में ड्राइवर मंच पर चढ़ गई और ड्राइवर ने हूबहू आइंस्टीन की भाषण देने लगा....
दर्शकों ने जमकर तालियां बजाईं. फिर वे यह सोचकर गाड़ी के पास आए कि ड्राइवर आइंस्टीन है।
- तभी एक प्रोफेसर ने ड्राइवर से पूछा, ''सर, रिश्तेदार ने क्या कहा, क्या आप एक बार फिर संक्षेप में बताएंगे?''
- असली आइंस्टीन ने देखा बड़ा खतरा !!
इस बार ड्राइवर पकड़ा जाएगा। लेकिन ड्राइवर का जवाब सुनकर वह हैरान रह गये....
ड्राइवर ने उत्तर दिया. -"क्या यह साधारण बात आपके दिमाग में नहीं आई?
मेरे ड्राइवर से पूछिए वह आपको समझाएंगे "
नोट : "यदि आप बुद्धिमान लोगों के साथ चलते हैं, तो आप भी बुद्धिमान बनेंगे और मूर्खों के साथ ही सदा उठेंगे-बैठेंगे तो आपका मानसिक तथा बुद्धिमता का स्तर और सोच भी उन्हीं की भांति हो जाएगी..!!
(मैं अपने ‘राइट टू रिप्लाई’ के तहत ये X पोस्ट कर रहा हूं क्योंकि मेरे पास @DDNewsHindi जैसा प्लेटफ़ॉर्म नहीं है जिसका बेजा इस्तेमाल करते हुए @sudhirchaudhary ने मुझे टारगेट किया है)
सुनो सुधीर चौधरी,
तुम एक घटिया पत्रकार ही नहीं घटिया इंसान भी हो। जानता तो पहले से था, आज ये कहने को इसलिए मजबूर हुआ हूं क्योंकि तुमने मेरे साथ फिर एक घटियापन किया है। दूरदर्शन के प्रोग्राम में ‘समोसे जलेबी’ वाली स्टोरी का ज़िक्र कर तुमने मुझ पर निशाना साधा है। और ये तुमने पहली बार नहीं किया है। पहली बार तो तुमने तब किया था जब तुम ज़ी न्यूज़ में थे और तुमने प्रधानमंत्री मोदी का एक लल्लो चप्पो वाला इंटरव्यू किया था। 2019 चुनाव से पहले। और फिर जब तुम्हारी जगहंसाई शुरु हुई तो फिर तुमने अपना चेहरा बचाने के लिए एक DNA कार्यक्रम पूरी तरह मुझे और राजदीप सरदेसाई को समर्पित कर बनाया था। तब मेरी रिपोर्ट की क्लिपिंग्स भी लगायी थी। ख़ैर। तुम्हारा चेहरा तब भी नहीं बचा था। अब तो तुम्हारे पास कोई चेहरा है ही नहीं। तुमने हमेशा सरकारों की गोद में बैठ कर ही पत्रकारिता की है। कांग्रेस कार्यकाल में भी तुम जैसे पत्रकार ही बहुत बड़े चापलूस थे। यहां पर एक प्रदेश की कांग्रेस सरकार का ज़िक्र करना बेमानी होगा जिसके बूते तुम तब पत्रकारिता में पले बढ़े।
क़रीब सवा मिनट के क्लिप से तुम्हारा चेहरा बचता है तो बचा लो, जनता के टैक्स के पैसे से 15 करोड़ का सरकारी पैकेज जस्टिफ़ाई कर रहे हो कर लो। और ऐसा करने के लिए ही तुमने इस क्लिप के नीचे लिखे ‘राजनीति के हल्के फुल्के पल’ को नज़रअंदाज़ किया। क्योंकि तुम संपादक नहीं चंपादक हो। अरे वो एक मोमेंट था फील्ड रिपोर्टिंग का जब राहुल गांधी यूपीए सरकार के दौरान कथित घोटाले से जुड़े सवालों का जवाब नहीं दे रहे थे। फिर मैंने यही पूछना शुरु किया। इसकी डिटेलिंग फिर कभी। यहां तुमको सफ़ाई के तौर पर नहीं दूंगा।
मैं जानता हूं कि तुम मुझसे सिर्फ़ इस बात का बदला ले रहे हो कि मैंने 2003 में एनडीटीवी में मेरी नौकरी लगने में तुम्हारी मदद नहीं कर पाया। 2002-03 में सहारा में तुम्हारे साथ मैंने चंद महीने काम किया था। तब तुम शेखी बघारा करते थे कि मैं तो एनडीटीवी जाने वाला हूं मेरी बात हो गई है। लेकिन तुम शेखी बघारते ही रहे लेकिन जा नहीं पाए। जब तुम्हें पता चला कि मेरी नौकरी वहां लग गई है तो पहले तो सहसा तुम्हें भरोसा नहीं हुआ... फिर तुमने कहा कि जब जा ही रहे हो तो मेरे लिए भी बात करना कि मामला कहां अटका है। मैंने कोशिश भी की और राजदीप सरदेसाई से अनुरोध भी किया था तुम्हारे लिए। लेकिन क्योंकि संस्थान में मैं ख़ुद नया था इसलिए तुम्हारे लिए ज़ोर नहीं डाल पाया था। तुम्हारी नौकरी वहां लगा नहीं पाया। आई एम सॉरी फॉर दैट। पर तुम अब कभी डीडी से निकाले जाओ तो एनडीटीवी जा सकते हो। अब माहौल तुम्हारे अनुरुप है वहां।
अंत में एक बात। ये तुम ही हो जिसका 100 करोड़ वाला वीडियो क्लिप आज भी इंटरनेट तैर रहा है। जिस भी तरह तुमने समझौता कर लिया हो लेकिन वो एक ऐसा बदनुमा दाग़ है जो कभी तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेगा। डीडी पर कभी उस क्लिप की बात भी करो। और हां। लाइव इंडिया में रहते हुए कैसे तुमने स्कूल टीचर को लेकर फर्ज़ी ख़बर चलायी वो भी पत्रकारिता जगत नहीं भूला है आज तक। जिनको नहीं पता वे गूगल का ग्रोक कर सकते हैं। दो बार जेल भी गए तुम। कोई तिहाड़ी शब्द का ज़िक्र करता है तो सभी समझ जाते हैं कि तुम्हारे बारे में कुछ कहा जाता है। और तुम हो कि समोसे जलेबी वाली स्टोरी का ज़िक्र कर महान बनने की कोशिश करते हो! बनो। और क्योंकि तुमने मेरी स्टोरी का ज़िक्र किया है, अगर क़ूवत है तो किसी दिन मुझे इसी डीडी के प्लेटफ़ॉर्म पर बहस के लिए आमंत्रित करो। तुम्हारी और मेरी पत्रकारिता का अंतर तुम्हारे प्रोग्राम के ज़रिए ही पता चल जाएगा। उन दर्शकों को जिनको तुम एक तरफ़ा तरीक़े से गुमराह कर रहे हो। ये मेरा हक़ भी बनता है क्योंकि तुमने मेरी स्टोरी का ज़िक्र किया।
तुम्हारे जवाब का इंतज़ार रहेगा
उमाशंकर सिंह
(पुनश्च: प्रिय पाठकों, सुधीर चौधरी को संबोधित करते हुए मैंने ‘आप’ लिखने की बहुत कोशिश की, लेकिन सहज मानवीय मूल्यों और व्यवहार कुशलता का अनुपालक होते हुए भी ऐसा नहीं कर पाया हूं। इसके लिए मैं पाठकों से बहुत माफ़ी चाहता हूं)
“रेस्क्यू टीम के सामने चुनौती लोगों और ईरानी सैनिकों को पायलट से दूर रखने की थी। इसके लिए अमेरिका सेना ख़ासतौर पर उन फोर्सेज पर लगातार फायरिंग कर रही थी जो पायलट के लोकेशन के कहीं भी आसपास नज़र आ रहीं हों।”
https://t.co/2qUcVFXR4S
देश में चल रहे LPG संकट के बावजूद IIT बॉम्बे कैंटीन चालू है। यह इसके बड़े कैंपस से गिरी पत्तियों का इस्तेमाल करके पेटेंटेड बायोमास गैसीफिकेशन टेक्नोलॉजी की वजह से है। देखिए @journovidya की रिपोर्ट
#LPGCrisis#IITBombay#ReporterDiary
👉🏾 धो दियाः जंग का एक महीना, ओNew York Times के पहले पन्ने पर #Trump को खरी-खरी. पढ़ें
“ ट्रम्प के तेजी से बदलते रुख -आशावाद से लेकर निराशा और ग़ुस्से तक, तनाव कम करने से लेकर उसे बढ़ाने तक- ने उनके युद्ध मैनेजमेंट को अनिश्चित और ‘जैसा-चलता-जाए-वैसा-बनाते-जाओ’ जैसा बना दिया है.
28 फरवरी से, जब से U.S. ने इज़राइल के साथ मिलकर जंग शुरू की, ट्रम्प अमेरिकी सैन्य श्रेष्ठता को लेकर शेखी बघारने और इस बात पर गहरी निराशा जताने के बीच झूलते रहे हैं कि युद्ध के मैदान में सामरिक (tactical) उपलब्धियां अनुमानित रणनीतिक (strategic) नतीजा नहीं दे रही हैं.
हालांकि सुप्रीम लीडर और कई बड़े सैन्य व खुफिया अधिकारी मारे जा चुके हैं, लेकिन तेहरान में सरकार का कंट्रोल अब भी बना हुआ है. ईरान के नेताओं ने Strait of Hormuz को लगभग बंद कर दिया है, जिससे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं. साथ ही, ईरान के पास वो सभी चीजें हैं जो परमाणु हथियार बनाने के लिए ज़रूरी होती हैं. इसी खतरे का हवाला देकर ट्रम्प ने जंग करने का फैसला किया था.
ट्रम्प का कहना है कि वह समझते हैं कि युद्ध से थोड़े वक्त के लिए दर्द होगा, लेकिन इसे वो इस बात की जरूरी कीमत मानते हैं कि ईरान के पास परमाणु हथियार न हों.
लेकिन अब, ईरान के सामने होर्मुज स्ट्रेट को शिपिंग के लिए पूरी तरह खोलने या अपने पावर प्लांट्स पर हमलों का सामना करने की नई समय-सीमा के बीच, ट्रम्प को लड़ाई के अगले कदम पर फैसला करना है.
ट्रम्प ईरान पर जंग ख़त्म करने के लिए अमेरिकी प्रस्ताव मानने का दबाव बढ़ा रहे हैं. साथ ही, वो वहाँ सैनिक भेज रहे हैं और चेतावनी दे रहे हैं कि अगर ईरान समझौता नहीं करता, तो हमले जारी रहेंगे. उधर, ईरान लगातार हमले कर रहा है.