देश और विशेष रूप से पश्चिम उत्तर प्रदेश में सावन के महीने में भोलेनाथ का ये कांवड़ उत्सव सैकड़ो साल से चला आ रहा है , 5 करोड़ कांवड़ियें इकट्ठे होते है जिसमे सड़क पर कुछ छिट पुट घटनाओ के आलावा आज तक कांवड़ियों ने कहीं भी संगठित हिंसा नहीं की.
संगठित मतलब इकट्ठे होकर दंगे करना , जैसे जुम्मे पर और हिन्दुओ के खिलाफ इस देश में होते आये है.
मुज़फ्फरगर में आइये आप भी बम भोले पर इन्ही कांवड़ियों की तरह नाचने लगोगे.
बहुतों को पढ़कर असहमति बनती है. वैचारिक असहमति. मगर जाहिर कम ही कर पता हूं. दरअसल, अब यह समय वो नहीं कि आप अपनी असहमति सामने वाले पर खुलकर रख दो. और, वो सुन भी ले. शालीनता से उत्तर भी दे दे.
समय कह लीजिए या हवा कुछ ऐसी बदली कि असहमतियां ट्रोलिंग की भेंट चढ़ गईं. व्यक्तिगत हो गईं. दूरियां बढ़ गईं. बातचीत कम हो गई. इसका एक बड़ा नुकसान यह हुआ कि हम असहमतियों के साथ भीतर ही भीतर घुटते चले गए. विचार का दायरा सिकुड़ गया. समझने का माद्दा जाता रहा. दिमाग कुंद दर कुंद होता चला गया. खाली दिमाग उधार के ज्ञान (!) पर निर्भर हो गया. कम्युनल सोच ने इस कदर घेर लिया कि हम उसके गुलाम बनते चले गए. और, अब हश्र देख ही रहे हैं सभी.
इतिहास हम अपेक्षाकृत कम पढ़ते हैं. पढ़ना चाहिए. इतिहास हमारी समझ विकसित करता है. पिछले दौर का खाका सामने रखता है. लेकिन, नकली इतिहास लिखने वालों ने वास्तविक इतिहास को मिट्टी में मिलाने की कोशिश तो बहुत की. किंतु सफल न हो सके. यही वजह है कि वे अपने नकली नायकों की नकली बहादुरी के किस्से व्हाट्सएप पर फैला देते हैं. देश–समाज के मध्य इसके नुकसान हम देख पा रहे हैं.
असहमति या आलोचना निरंतर होती रहनी चाहिए. इन्हें अगर यों ही रोका गया तो हम दिमागी स्तर पर और अधिक पिछड़ जाएंगे.
एक चोर , बाहुबली और घटिया सोच के आदमी को पुजारी बनाकर उसे चंदा चोर बताके उसको घसीटा जा रहा है 😡
देश में हजारों फ़र्ज़ी मदरसे चलते है, सैकड़ो पादरी कन्वर्शन के काम में जुटे हुए है-
ऐसा ही इस हिंदू विरोधी विपक्ष से किसी टोपीबाज मौ/लाना या पादरी बनकर करवाकर दिखा दीजिए।
ये अयोध्या के हमदर्द नहीं बल्कि राम द्रोही है।
प्रभु राम से प्रेम करने वाला कोई भी हिंदू भगवा वस्त्र का ऐसा अपमान कर ही नहीं सकता - ये भेष तो आजकल इस देश में G हा दी भरकर घूमते है, हमारा नुकसान करने के लिए।
हितेश लखानी नाम के एक व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ डॉक्यूमेंटेशन प्रक्रिया के लिए कलेक्टरेट कार्यालय, इंदौर (मध्य प्रदेश) गए थे। उन्होंने लगभग 1.5 घंटे इंतज़ार किया।
जब उन्होंने विनम्रता से पूछा कि अभी और कितना समय लगेगा, तो उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया गया, जबकि स्टाफ का एक सदस्य इंस्टाग्राम स्क्रॉल करने में व्यस्त था।
इसके बाद हितेश लखानी नाम के उस व्यक्ति ने वही सवाल पूछने के लिए दूसरे अधिकारी के पास गए। इससे पहले कि वे अपनी बात पूरी कर पाते, एक महिला पुलिस अधिकारी उनके पास आई और बोली:
"चुपचाप बैठ जा, बक-बक मत कर। एक थप्पड़ मारूँगी, कुछ नहीं कर पाएगा।"
हितेश लखानी न तो चिल्ला रहे थे और न ही कोई हंगामा कर रहे थे। वे केवल धैर्यपूर्वक इंतज़ार करने के बाद जानकारी पूछ रहे थे।
सम्मान इस बात पर निर्भर नहीं होना चाहिए कि आप कौन हैं या कहाँ हैं। हर नागरिक के साथ गरिमा और सम्मान से व्यवहार किया जाना चाहिए।
यह वीडियो इसलिए साझा किया जा रहा है क्योंकि चुप्पी ऐसे व्यवहार को जारी रहने देती है।
उम्मीद है कि संबंधित अधिकारी इस मामले की जाँच करेंगे और सुनिश्चित करेंगे कि किसी और को ऐसा अनुभव न झेलना पड़े।
@indorecollector@cmmadhyapradesh@Drmohanyadav51@IDA_indore@advpushyamitra
सफलता की असली तस्वीर रिज़ल्ट नहीं, उसकी तैयारी होती है। 📖
लोग सिर्फ जीत देखते हैं, लेकिन उसके पीछे की कहानी इन खाली पेनों और भरी कॉपियों में लिखी होती है। NEET इस बेटी के लिए सिर्फ एक परीक्षा नहीं, बल्कि दो साल की मेहनत, अनुशासन और अनगिनत रातों का परिणाम था।
सफलता चमत्कार से नहीं, रोज़ के अटूट संकल्प से मिलती है। 😎
गलती मानना इस बात का प्रतीक है कि आप अपने अहंकार (Ego) से बड़े हैं। महान दार्शनिकों का भी मानना है कि भूल करना मानवीय है, लेकिन उस पर अड़े रहना मूर्खता है। अपनी गलती को स्वीकार करना और उससे सीख लेकर आगे बढ़ना ही जीवन में वास्तविक सफलता और सम्मान की कुंजी है।
इसी माइक से मैंने सवाल पूछे थे।
जब 2024 में नीट रिजल्ट के बाद 67 टॉपर निकले- जब झज्जर सेंटर पर सवाल उठे, जब NTA जवाब देने से बच रही थी - तब मैं पहले दिन से आपके लिए सवाल कर रहा था।
2026 में भी मैने वही किया लेकिन !
आज मेरी रिपोर्ट देखे बिना, मेरा काम जाने बिना, मुझे “गोदी मीडिया” कहकर घेरा गया, दौड़ाया गया, धमकाया गया, गालियाँ दी गईं और पानी फेंका गया।
फिर भी कोई शिकायत नहीं।
कल फिर माइक उठाऊँगा।
फिर आपके सवाल पूछूँगा।
फिर आपके हक़ की खबर दिखाऊँगा।
क्योंकि भीड़ की गलतफहमी मेरा काम तय नहीं करेगी।
सवाल पूछता था।
सवाल पूछता हूँ।
और आपके लिए सवाल पूछता रहूँगा।
#cjp_पार्टी #CJP #delhi #jantarmantar #studentprotest
पत्रकार देव कोटक के साथ जो हुआ, बिल्कुल ग़लत है. चैनल का गुस्सा इन पर निकालना बिल्कुल ठीक नहीं.
जो भी लोग मारपीट और हिंसा का रास्ता अपना रहे. वो बिल्कुल ठीक नहीं कर रहे. समझें इसे 🙏🏼
कल जब पुलिस वाले मुझे घसीट रहे थे तो वो मेरे कान में कह रहे थे कि इस सरकार को हटाइये- राहुल बाबा 😄
सफेद झूठ बोलने में महारत हासिल है इन्हें।
सैकड़ो की भीड़ और बेहिसाब शोर में इन्हें “कान की बात” सुन गई।
पंशुल बंसल UGC NEET ऑल इंडिया टॉपर
है, सुनिए-
मैंने सोचा की प्रोटेस्ट में अपना टाइम खराब करने के बजाय मुझे पढ़ना चाहिए और मैंने एग्जाम के लिए मेहनत की ❤️👏👏
यही है सच्चाई - जिन्हें पढ़ लिखकर कुछ करना है वो इस उत्पात में शामिल नहीं।
22 लाख ने पेपर दिया था, पास 1 लाख के आस पास ही होने थे।
अब 21 लाख कह सकते है कि हम तो पढ़े थे पर पास नहीं हुआ , पेपर लीक हुआ , बहानेबाजी-
वही हो रहा है।
As soon as @RitikaChandola started questioning these naxali SFI cadre on “Bhramanvaad”, they said they want a casteless society.
Ritika replied - then why do you want reservations 🤣
Speechless Naxali started shouting Godi Media 😭
They have a problem with casteism, but not with the caste based reservation.
They have no answer, so they started labelling the reporter as Godi Media. Lol 😂
आंदोलन की आड़ में दंगा और हिंसा!
आंदोलन की सच्चाई आप स्वयं देख लीजिए..
एक युवक केमिकल स्प्रे शांत खड़ी हुई पुलिस पर छिड़कने लगता है,
फिर पुलिस उसे पकड़ती है और पीटने लगती है,
फिर प्रदर्शनकारी ऐसा दिखाने लगते हैं जैसे पुलिस ने युवक को बिना गलती पीटा हो..
'तुम्हारे देश का सैनिक तुम्हारा दुश्मन है'
'सच्चा दोस्त सिर्फ जेल में बंद उमर खालिद है'
पिछले 1 माह में जंतर-मंतर पर यही कूट-कूट कर दिमाग में भरा गया,
जहाँ भी दिखा कोई वर्दी वाला, उसी पर किया गया जानलेवा हमला
दिल्ली में कॉकरोचों ने खुद से ही स्वयं कर कर दिया Expose ..
#Delhi #Protest @DelhiPolice@CJP_for_India
इसे कहीं से भी जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।
भीड़ ने भी आख़िर कमजोर इकाई को चुना, निशाना बनाया, जिसपर ज़ोर चल सकता था। यहाँ अपने साथ हो रहे बर्ताव पर वो रिपोर्टर क्या कहता इन लोगों से…ये प्रदर्शनकारी कभी भी रिपोर्टर लिए वो बन सकते थे जो पुलिस इनके लिए बन गई थी।