सिगरेट पीती स्त्री मुझे
अच्छी लगती है
अच्छा लगता है
उसका मुंह से धुंआ उड़ाना
अच्छा लगता है मुझे उसका
दो उंगलियों के बीच
सिगरेट को उन्मुक्तता के साथ पकड़ना
मानो कश-ब-कश समाज को वो अपने
ठेंगे पर रखे हुए है
समाज की निगाह में
स्त्री का सिगरेट पीना जायज नहीं
किसे परवाह है इस समाज की
लोग ठहर गए
ठहरना नहीं था उन्हें
चलते रहना था निरंतर
शायद ठहरने का मजा ले रहे हों
शायद...
पता है, शायद पर आकर
सब ठहर जाता है
ये भी एक किस्म की
जिद है, अकड़ है
पर आनंद तो है
बोसीदा जिंदगी में
कुछ पल ठहर कर ही
देखें जाएं
वही देखने निकलने हैं लोग
लोग हैं;
लोगों पर किसका इख्तियार
जितना तेरा हुक्म था उतनी सँवारी ज़िंदगी
अपनी मर्ज़ी से कहाँ हम ने गुज़ारी ज़िंदगी
मेरे अंदर इक नया ग़म रोज़ रख जाता है कौन
रफ़्ता रफ़्ता हो रही है और भारी ज़िंदगी
सिर्फ़ थी ख़ाना-बदोशी या मोहब्बत का जुनूँ
हिजरतें करता रहा इक शख़्स सारी ज़िंदगी
- अज़्म शाकरी
तुमने इंतजार किया
हमने इजहार किया
तुमने तन्हा किया
हमने एतबार किया
तुमने इलाज किया
हमने दीदार किया
तुमने रुसवा किया
हमने कत्ल किया
तुमने ख्याल किया
हमने पागल किया
तुमने पेमेंट किया
हमने कमेंट किया
तुमने झगड़ा किया
हमने तगड़ा किया
तुमने क्या किया
हमने क्यों किया
रात थी
मुलाकात थी
बात थी
मुस्कुराहट थी
बेचैनी थी
नाराजगी थी;
कॉलेज था
क्लास था
खत थे
शायरी थी
इंतजार था;
नौकरी थी
पैसा था
घर था
परिवार था
सहूलियत थी
अकेलापन था;
अंतिम वक्त था
लोग थे
आंसू थे
सुगबुगाहट थी
खामोशी थी;
एक रास्ता था
एक मंजिल थी
लेकिन
विचार एक न थे
@awesh29 अवसरवाद अपने उरूज पर है. राजनीति में जो जितना बड़ा अवसरवादी उसका उतना सम्मान.
राजनीति में रहकर प्रतिबद्धता की उम्मीद रखना अब बेमानी है. नेता किसी भी क्षण अपने दल को छोड़ दूसरे दल में आ–जा सकता है; कतई बेशर्म होकर. यही आज के दौर की उज्जड राजनीति है. यही सबको पसंद भी.
अखबारों पे ठहरी उम्मीद
अब ज़ाया होने लगी
सुना करते थे कभी-
"जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो"
अभी ये ऐसा दौर आया
अखबार ही तोप का मुकाबिला करने से डरने लगे
जमीन पे रेंगने लगे
लेखक-पत्रकार केंचुआ बन गए
सबकुछ मनमाना छपने लगा
संपादकीय दरकने लगा
व्यंग्य का भी मुंह बंद कर दिया गया
इंसान मूलतः ‘अवसरवादी’ प्राणी है.जिधर जहां अवसर मिले,वो मुंह मारना नहीं छोड़ता.छोड़ना चाहिए भी नहीं!‘प्रतिबद्धता’ किस चिड़िया का नाम है,उसे नहीं पता.मर–खप चुके वे लोग जो अपने विचार के प्रति प्रतिबद्ध थे.
मैदान चाहे राजनीति का हो साहित्य या निजी जीवन में भी अवसरवादी ही जीतते हैं.
@MediaHarshVT "#भारत की सही मायने में पहचान कराई है।"
ओह! तो इससे पहले भारत की कोई पहचान ही नहीं थी! इतनी ऊंची खींचने से पहले जनाब थोड़ा इतिहास के पन्ने देखने चाहिए थे. आजादी के बाद भारत का राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक तानाबाना कैसा था. नेहरू को पढ़ेंगे तो जानेंगे. अंध-भक्ति से कुछ हासिल नहीं.
@chitraaum व्यक्ति के पास शब्द हैं, जबान है तो वो कैसी भी 'लफ्फाजी' करने के लिए स्वतंत्र है. रही बात रिकार्ड तोड़ने की; यह कोई भी तोड़ सकता है. इसमें आश्चर्य जैसा कुछ नहीं.
नेहरू सरीखी वैज्ञानिक अप्रोच और धर्मनिरपेक्ष नजरिया बहुत कम नेता-राजनेता बना पाए.
न यहां शून्य है न शिखर!
ट्वीटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम इन सब पर कितना, कहां तक लिखा जाए. एक ही बात तीनों जगह साझा करना बोर करता है. मैंने यहां तक देखा है, लिखने वाले एक दिन में दस–बीस पोस्ट लिख मारते हैं. कमाल है. उनकी सोच, बुद्धि और लिखने के साहस को सलाम!
जब हाथ–कलम से लिखा करते थे, तब रचनात्मकता बची थी.
मैं एक रीढ़ की तलाश में हूं
मगर मिल नहीं रही
बहुत खोजा, बहुतों से पूछा
कुछ लोग सामने आए भी
लेकिन फिर चलते बने
बोले- "उनकी रीढ़ में बाल आ गया है"
जानता हूं, मजबूत रीढ़ की अपनी दिक्कतें हैं
अनजानना डर रीढ़ को खा रहा है
इसीलिए लोग हिम्मत नहीं कर पाते
खुद मेरी रीढ़ भी
सहमी-सी रहती है
सिर्फ बदनाम होने से काम न चलेगा. बदनाम हुए हैं तो बदनामी निभाना भी सीखिए. हजार नामवर के बीच एकाध बदनाम न हो तो दुनिया बदरंग हो जावेगी.
क्या ही उम्दा दौर था वो कि मोहल्ले भर में हम बदनाम थे. कि, सारा दिन इसे या तो छत पर पतंग उड़ाते देख लो या गली में गुल्ली -डंडा खेलते.
हाय...