मोदी सरकार में ही वित्त सचिव रहे सुभाष चंद्र गर्ग ने तो हिंदी में भी ख़ुलासा कर दिया कि GDP ग्रोथ रेट 7.8% नहीं बल्कि 2.6% है। मुद्रास्फीति 2.5% है और उसे घटा देंगे तो ग्रोथ लगभग 0% है!
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने UP सरकार को बड़े सबक वाला फैसला दिया है।
13 अप्रैल को नोएडा में मज़दूर प्रोटेस्ट के दौरान हुई हिंसा हुई थी। उस मामले में एक्टिविस्ट आकृति चौधरी पर NSA लगा कर जेल में डाल दिया। तब नक्सल,फॉरेन कनेक्शन की बातें सरकार की तरफ से हुई थी।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा- सरकार की कहानी मनगढ़ंत है। तुरंत रिहाई के आदेश। साथ ही नोएडा की DM, IAS मेघा रूपम की तनख़्वाह से काटकर 5 लाख मुआवजा भी देने को कहा
सवाल सिर्फ एक महिला सफाई कर्मचारी को लात मारने का नहीं… सवाल कानून और इंसानियत का है!
हिसार में प्रदर्शन कर रही सफाई कर्मचारियों और पुलिस के बीच हुई झड़प का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें एक पुलिसकर्मी महिला सफाई कर्मचारी को लात मारता हुआ दिखाई दे रहा है।
सवाल है क्या किसी महिला प्रदर्शनकारी के साथ इस तरह बल प्रयोग करना सही है?
अगर प्रदर्शनकारियों ने कानून तोड़ा है तो कार्रवाई का रास्ता कानून है… लेकिन क्या पुलिसकर्मी को भी कानून अपने हाथ में लेने की इजाजत है?
दूसरी तरफ प्रदर्शनकारियों पर भी पुलिस से धक्का-मुक्की और कचरा वाहन के चालक के साथ मारपीट के आरोप हैं। यानी पूरे मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
अब बड़ा सवाल क्या हरियाणा सरकार इस वायरल वीडियो का संज्ञान लेकर संबंधित पुलिसकर्मी पर कोई कार्रवाई करेगी?
क्योंकि वर्दी की ताकत जनता की सुरक्षा के लिए है, किसी महिला को लात मारने के लिए नहीं।
सरकार जवाब दे… आखिर इस मामले में कार्रवाई कब होगी?
@Prakash_psk@Queen510619151 अपना नंगा खड़े होकर अपना सामान दिखाए चलेगा
खुद कपडे नहीं पहनने हैं दुसरो को पहनाएंगे
मंदिर जाना जरुरी है क्या घर में मंदिर नहीं है क्या
बड़ी ख़बर 🔥
अब KYC के चलते लाखों किराना और छोटी दुकानें बंद होने के कगार पर आ जाएँगी, 15 सितंबर की आखिरी तारीख ने दुकानदारों को डर से भर दिया है।
ऑनलाइन कंपनियों से पहले ही परेशान छोटी किराना दुकानें अब RBI के नए KYC नियम में उलझ गई हैं, करीब 6 करोड़ लोग बुरी तरह प्रभावित होंगे।
पेमेंट के लिए QR कोड नए भारत की पहचान और सिस्टम सब बन गया है , जिसकी 15 सितंबर तक KYC नहीं होगी, उसका QR कोड बंद हो जाएगा।
10 लाख व्यापार भी एक झटके में बंद हो जाएँगे, पेमेंट लेना और देना दोनों बंद हो जाएँगे।
सरकार और RBI को कैंप लगाने चाहिए थे लेकिन सरकार जनता पर थोप कर चलती बनती है, जनता धक्के खाने के लिए रह जाती है।
2014 में एक पिता ने अपनी बेटी के ऑपरेशन के लिए AIIMS में पैसे और खून जमा कराया था। उसे भरोसा था कि अब उसकी बेटी ठीक हो जाएगी लेकिन 12 साल तक अस्पताल के चक्कर लगाने के बाद सर्जरी नहीं हुई और उसकी बेटी की 2026 में अभी मौत हो गई।
12 साल तक तारीखें मिलती रहीं, जांचें होती रहीं, शिकायतें होती रहीं और एक पिता अपनी बेटी को लेकर AIIMS के चक्कर लगाता रहा।
2026 में उसकी 15 साल की बेटी की मौत हो गई।
यह कहानी है मुकेश परियानी और उनकी बेटी की, जिसके इलाज को लेकर पिता ने AIIMS पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
मुकेश के मुताबिक, वह पहली बार 10 अक्टूबर 2012 को अपनी बेटी को लेकर AIIMS की OPD पहुंचे थे। बच्ची के इलाज के लिए एक कमरे से दूसरे कमरे तक भेजा गया और शुरुआती जांचों में करीब एक साल लग गया।
बाद में उन्हें डॉ. सचिन तलवार के पास भेजा गया। पिता के अनुसार, डॉक्टर ने ऑपरेशन के लिए पैसे और खून जमा कराने को कहा। उन्होंने 4 अप्रैल 2014 को पैसे और खून दोनों जमा करा दिए।
फिर आई 2 सितंबर 2015 की तारीख। पिता ऑपरेशन की उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंचे, लेकिन उन्हें बताया गया कि ऑपरेशन दिवाली के बाद होगा।
इसके बाद उनका आरोप है कि ऑपरेशन की तारीख लगातार टलती रही।
उन्होंने PMO में शिकायत की। शिकायत के बाद अस्पताल से बुलाया गया। लेकिन पिता का आरोप है कि डॉक्टर ने शिकायत वापस लेने तक ऑपरेशन करने से इनकार कर दिया।
2018 में फिर जांचें हुईं। 2023 में फिर AIIMS पहुंचे। 2025 में दोबारा शिकायत की। 28 जुलाई 2025 को अस्पताल बुलाया गया, लेकिन डॉक्टर छुट्टी पर थे। बाद में परिवार से कहा गया कि बच्ची दवाइयों से संभाल सकती है।
9 फरवरी 2026 को पिता ने फिर शिकायत की। जांचें चलती रहीं, लेकिन उनके मुताबिक ऑपरेशन नहीं हुआ।
और फिर वह दिन आया, जिसका डर एक पिता को सबसे ज्यादा होता है।
उसकी 15 साल की बेटी की मौत हो गई।
अब मुकेश का सवाल है—अगर 2015, 2016 या 2017 में ऑपरेशन से बेटी ठीक हो सकती थी, तो इतने साल तक ऑपरेशन क्यों नहीं हुआ?
क्या इलाज में देरी हुई? क्या समय पर ऑपरेशन से बच्ची की जान बचाई जा सकती थी? इतने वर्षों में अस्पताल और डॉक्टरों की ओर से क्या-क्या कदम उठाए गए?
पिता के आरोप बेहद गंभीर हैं। इनका सच सामने आना जरूरी है।
AIIMS और संबंधित स्वास्थ्य अधिकारियों को पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर यह स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर 2012 से 2026 के बीच इस बच्ची के इलाज में क्या हुआ और उसकी मौत के लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो वह कौन है?
जुबानी किंग, फर्जी बतकही के मास्टर और दगे कारतूस निशिकांत दुबे के चुनाव क्षेत्र गोड्डा से वोट चोरी की बड़ी खबर आ रही है। खबर ऐसी है कि आपको हैरान कर देगी।
झारखंड में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद 5 अगस्त को ड्राफ्ट इलेक्टोरल रोल प्रकाशित हुआ था। जिसके बाद बीजेपी के कई बूथ लेवल एजेंट्स (BLA) फॉर्म 7 लेकर आ रहे हैं और वोटरों को हटाने की मांग कर रहे हैं। सबसे अहम बात यह है कि जिन नामों पर वे आपत्ति जता रहे हैं, उनमें से ज्यादातर मुस्लिम समुदाय से हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने इसको लेकर एक इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट छापी है।
ख़बर है कि झारखंड के गोड्डा जिले में पिछले एक महीने से यही पैटर्न सामने आया है। हालांकि बीएलओ इन दावों को स्वीकार नहीं कर रहे। यकीनन यह कवायद लोकसभा चुनाव के लिए हो रही है।
पहले तो प्लान कर रहे थे कि GDP ग्रोथ 78% बता दें. फिर किसी पढ़े लिखे इंसान ने बताया, ये बहुत ज्यादा हो जाएगा.
तब जाकर 7 और 8 के बीच में दशमलव लगाया गया.
Amit Shah in a public rally in Uttarakhand.
Public — UGC wapas lo, UGC roll back.
Amit Shah with nationalism card— Bharat Mata ki Jai
Public — Rollback UGC
Amit Shah with emotional card — Uttarakhand ke Janta ko kya ho gaya hai.
Public — UGC wapas lo
Unreal cooking of sasta chanakya 😭
कर्ज़ में डूबा भारत, कागज़ों पर विश्वगुरु!
2014 बनाम 2026: कर्ज़ लेकर घी पीने वाली अर्थव्यवस्था का पूरा कच्चा-चिट्ठा!
▫️ गोल्ड लोन: 14.4 गुना बढ़ा (घर का सोना गिरवी!)
▫️ पर्सनल लोन: 6.5 गुना बढ़ा (रोज़मर्रा के खर्च के लिए कर्ज़!)
▫️ परिवारों पर कर्ज़: 6.1 गुना बढ़ा
▫️ राज्यों पर कर्ज़: 5.2 गुना बढ़ा
▫️ राष्ट्रीय कर्ज़: 3.8 गुना बढ़ा
जब GDP से तेज़ रफ़्तार से देश का कर्ज़ बढ़ रहा हो, तो समझ जाइए कि सरकार सिर्फ 'उधार की खपत' को विकास बताकर बेच रही है!
यह कैसी तेज़ी है?
❌ न रोज़गार है
❌ न उत्पादन है
❌ न आमदनी है
❌ न निवेश है
India's GDP | India’s Credit Rating | Subhash Chandra Garg | Modi Government | BJP | Congress
आधा दर्जन अर्थशास्त्री पद छोड़कर क्यों भागे?
हमारी अर्थव्यवस्था बहुत तेज भाग रही है तो उसे छोड़कर अर्थशास्त्री क्यों भाग रहे हैं?
उर्जित पटेल, विरल आचार्य, अरविंद सुब्रह्मण्यम, केवी सुब्रह्मण्यम, सुरजीत भल्ला, अरविंद पनगढ़िया - इतने सारे अर्थशास्त्री वक्त से पहले पद छोड़कर क्यों गए?
उर्जित पटेल आरबीआई के गवर्नर थे। कार्यकाल समाप्त होने के पहले ही, दिसंबर 2018 में उन्होंने अचानक पद छोड़ दिया। पटेल के बारे में, पूर्व वित्त सचिव सुभाषचंद्र गर्ग ने दावा किया था कि एक मीटिंग में प्रधानमंत्री, उर्जित पटेल पर भड़क गए और उनकी तुलना "खजाने पर बैठे सांप" से कर दी। कुछ समय बाद उर्जित पटेल ने पद छोड़ दिया। इसके बाद आरबीआई ने लगभग 1.76 लाख करोड़ का अपना लाभांश और सरप्लस पूंजी सरकार को सौंप दी।
उर्जित पटेल के इस्तीफे के बाद, अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला प्रधानमंत्री ने भी आर्थिक सलाहकार परिषद से इस्तीफा दे दिया। दिसंबर 2018 में एक दिन उन्होंने ट्वीट किया कि वे आर्थिक सलाहकार परिषद से इस्तीफा दे चुके हैं। इस्तीफ़ा क्यों दिया, इसकी जानकारी सामने नहीं आई।
विरल आचार्य रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर थे। उर्जित पटेल के इस्तीफे के करीब 7 महीने बाद जून 2019 में विरल आचार्य ने कार्यकाल पूरा होने से पहले ही पद से इस्तीफ़ा दे दिया। इस्तीफ के कुछ महीने पहले 26 अक्तूबर, 2018 में आरबीआई के डिप्टी गवर्नर के रूप में विरल आचार्य ने एक भाषण में सरकार पर आरबीआई की स्वायत्ता से समझौता करने का आरोप लगाया था।
अर्थशास्त्री अरविंद सुब्रमण्यन ने जून 2018 में देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार पद से अचानक इस्तीफ़ा दे दिया। इसके पीछे उन्होंने निजी कारण बताया।
इसी तरह मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे केवी सुब्रमण्यम ने अक्टूबर 2021 में अचानक ऐलान किया कि अपना तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा करने के बाद वे शिक्षा क्षेत्र में लौट जाएंगे। नवंबर 2022 में उन्हें आईएमएफ के कार्यकारी बोर्ड में नियुक्त किया गया। लेकिन कार्यकाल पूरा होने के छह महीने पहले, मई 2025 में उनका कार्यकाल तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया।
अरविंद पनगढ़िया जनवरी 2015 में नीति आयोग के पहले उपाध्यक्ष बने। करीब दो साल बाद अगस्त 2017 में उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा कि "मुझे चयन करना था कि कोलंबिया यूनिवर्सिटी की जॉब और नीति आयोग के उपाध्यक्ष में से कोई एक चुनें। मैं जिस तरह का जॉब कोलंबिया यूनिवर्सिटी में कर रहा हूं वो इस उम्र में मिलना लगभग नामुमकिन है।" उन्हें यूनिवर्सिटी की जॉब, नीति आयोग के बेहतर लगी।
अब सवाल ये है कि दुनिया में सबसे तेज गति से भाग रही अर्थव्यवस्था में ऐसा क्या है कि तमाम अर्थशास्त्री इस व्यवस्था में योगदान देने की जगह इसे छोड़कर भाग रहे हैं? इसका जवाब फर्जी आंकड़ों की बाजीगरी, नोटबंदी और इलेक्टोरल बॉन्ड जैसे कांड में छुपा है।