क्या पैंतीस की उम्र तक भीख माँगने वाले आदमी की तुलना नेहरू जैसे नामी बैरिस्टर से की जा सकती है?
क्या देश को IIT, AIIMS, JNU और IIM जैसे उम्दा ग्लोबल शिक्षण संस्थान देने वाले इंसान की तुलना हज़ारों स्कूल बंद करवाने वाले व्यक्ति से की जा सकती है?🤔
@dineshdangi84 अभी कम से कम साउथ में सीट तो मिल रही है फिर वो भी मुमकिन नहीं लगता..कॉंग्रेस को हर स्टेट के लीडरों को बोलना पड़ेगा कि धरातल पर काम करें, ना कि हवा हवा में बाते करें
@ashokgehlot51 कल तो आप कर्मचारियों पर कार्यवाही karwa रहे थे, आज आपका दलित प्रेम जगा है, बिना पूरी जानकारी के aap कैसे कार्यवाही करने की बोल रहे थे आपसे ये उम्मीद नहीं थी
@Flipkart 25 aprail ko a c deliver hua h ..aj tak tmhara installation ke liye technician nhi aya h ..roj ye msg ata h ki technician out for installation..kya mjak bna rkha h ..upar se customer care se bat bhi nhi hota h ajkl..what is happening that..Mjak bna ke rkha h sb kuch
कल नोएडा की सड़कों पर जो हुआ, वो इस देश के श्रमिकों की आख़िरी चीख़ थी - जिसकी हर आवाज़ को अनसुना किया गया, जो मांगते-मांगते थक गया।
नोएडा में काम करने वाले एक मज़दूर की ₹12,000 महीने की तनख्वाह,₹4,000-7,000 किराया। जब तक ₹300 की सालाना बढ़ोतरी मिलती है, मकान मालिक ₹500 सालाना किराया बढ़ा देता है।
तनख्वाह बढ़ने तक ये बेलगाम महंगाई ज़िंदगी का गला घोंट देती है, कर्ज़ की गहराई में डुबा देती है - यही है “विकसित भारत” का सच।
एक महिला मज़दूर ने कहा - “गैस के दाम बढ़ते हैं, पर हमारी तनख्वाह नहीं।” इन लोगों ने शायद इस गैस संकट के दौरान अपने घर का चूल्हा जलाने के लिए ₹5000 का भी सिलेंडर खरीदा होगा।
यह सिर्फ़ नोएडा की बात नहीं है। और यह सिर्फ़ भारत की भी बात नहीं है। दुनियाभर में ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं - पश्चिम एशिया में युद्ध की वजह से सप्लाई चेन टूट गई है।
मगर, अमेरिका के टैरिफ़ वॉर, वैश्विक महंगाई, टूटती सप्लाई चेन - इसका बोझ Modi जी के “मित्र” उद्योगपतियों पर नहीं पड़ा। इसकी सबसे बड़ी मार पड़ी है उस मज़दूर पर जो दिहाड़ी कमाता है, तभी रोज़ खाता है।
वो मज़दूर, जो किसी युद्ध का हिस्सा नहीं, जिसने कोई नीति नहीं बनाई - जिसने बस काम किया। चुपचाप। बिना शिकायत। और उसके बदले अपना हक मांगने पर उन्हें मिलता क्या है? दबाव और अत्याचार।
एक और ज़रूरी मुद्दा - मोदी सरकार ने 4 लेबर कोड जल्दबाज़ी में बिना संवाद नवंबर, 2025 से लागू कर, काम का समय 12 घंटे तक बढ़ा दिया।
जो मज़दूर हर रोज़ 12-12 घंटे खड़े होकर काम करता है फिर भी बच्चों की स्कूल फ़ीस क़र्ज़ लेकर भरता है - क्या उसकी मांग ग़ैरवाजिब है? और जो उसका हक़ हर रोज़ मार रहा है - वो “विकास” कर रहा है?
नोएडा का मज़दूर ₹20,000 माँग रहा है। यह कोई लालच नहीं - यह उसका अधिकार, उसकी जिंदगी का एकमात्र आधार है।
मैं हर उस मज़दूर के साथ हूं - जो इस देश की रीढ़ है और जिसे इस सरकार ने बोझ समझ लिया है।