🙏 *सादर जय संघशक्ति* 🙏
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ShaktiSeva (USA) द्वारा 12वीं के बाद उच्च शिक्षा के लिए पात्र बालिकाओं को आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। वर्तमान में 14 बाईसा इस पहल का लाभ ले रही हैं।
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*संपर्क: जितेंद्र सिंह देवली*
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🙏 *सादर जय संघशक्ति* 🙏
उत्तर प्रदेश राज्यसभा चुनाव 2026 में निर्विरोध निर्वाचित भाजपा के सभी प्रत्याशियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
यशस्वी प्रधानमंत्री श्री @narendramodi जी के नेतृत्व में आप सभी अपनी संसदीय जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों को सशक्त बनाने तथा विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में महत्वपूर्ण योगदान देंगे, ऐसी अपेक्षा है।
आपका आगामी कार्यकाल उत्तर प्रदेश एवं देश की प्रगति, जनकल्याण और विकास को नई दिशा प्रदान करे, इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ।
#RajyaSabhaElection2026 #BJP4ViksitUP
@BJP4India
पूरे विषय का अध्ययन करने पर संगीत सिंह सोम जी ने स्वयं अपने पोस्ट में राष्ट्रीय अध्यक्ष के व्यस्त कार्यक्रम व समय की कमी के कारण काफिला न रुकने का उल्लेख किया। कार्यकर्ताओं को मायूसी हुई पर उन्होंने इसे अनादर नहीं बताया बल्कि उनके समर्पण व जोश की सराहना की। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स इसे आंतरिक प्रतिद्वंद्विता से जोड़ते हैं पर सोम जी के बयान में कोई शिकायत नहीं।
आज मेरठ भाजपा जिला कार्यकारिणी के निर्देशन में माननीय राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री नितिन नबीन जी के मेरठ से सहारनपुर प्रस्थान के दौरान दौराला टोल प्लाजा पर स्वागत कार्यक्रम निर्धारित किया गया था।
इस अवसर पर सरधना विधानसभा क्षेत्र एवं आसपास के क्षेत्रों से हजारों की संख्या में कार्यकर्ता, पदाधिकारी एवं सम्मानित जनमानस पूरे उत्साह और आत्मीयता के साथ अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष जी के स्वागत के लिए पहुंचे।
सच कहूं तो आज सरधना के कार्यकर्ताओं का उत्साह देखकर मन भावुक हो गया। इतनी बड़ी संख्या में लोग अपने समय की परवाह किए बिना केवल संगठन के प्रति अपने प्रेम और सम्मान के कारण वहां पहुंचे थे।
माननीय राष्ट्रीय अध्यक्ष जी के व्यस्त कार्यक्रम एवं समयाभाव के कारण उनका काफिला बिना रुके आगे निकल गया। स्वाभाविक रूप से इतने उत्साह से प्रतीक्षा कर रहे कार्यकर्ताओं को थोड़ी मायूसी जरूर हुई, लेकिन उनके चेहरे पर संगठन के प्रति विश्वास और दिल में जोश कम नहीं हुआ।
मैं विशेष रूप से सरधना विधानसभा से आए हर उस कार्यकर्ता और नागरिक का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं, जिसने यह साबित किया कि सरधना का कार्यकर्ता संगठन के आह्वान पर सदैव मजबूती से खड़ा है।
आप सभी का यह स्नेह मेरे लिए किसी सम्मान से कम नहीं है। सरधना के कार्यकर्ताओं का अपनापन और समर्पण हमेशा मेरे हृदय में रहेगा।
आपका - संगीत सोम
@NitinNabin@BJP4India@BJP4UP
डॉ. अंबेडकर ड्राफ्टिंग कमिटी के चेयरमैन थे। बीएन राऊ ने प्रारंभिक ड्राफ्ट बनाया। अंबेडकर ने उसे संशोधित किया, असेंबली में पायलट किया और सामाजिक न्याय, समानता, आरक्षण जैसे प्रावधानों में प्रमुख योगदान दिया। वे मुख्य वास्तुकार माने जाते हैं। यह सामूहिक प्रयास था। अंबेडकर ने खुद राऊ का श्रेय माना।
राय का 2016 का बयान विवादास्पद था। मूर्ति तोड़ने के दावे अलग हैं।
बाबासाहेब के अपमान और संविधान की अवमानना के लिए भाजपा और उनके संगी-साथी समय-समय पर तरह-तरह के कुतर्क देते रहते हैं। इसी कड़ी में संविधान को बदलने या पूरी तरह से ख़त्म करने की साज़िश करनेवाले अपंजीकृत व भूमिगत रहनेवाले इनके विचारवंशी कह रहे हैं कि बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर जी ने संविधान लिखा ही नहीं। इनका बस चले तो यह ये भी कह सकते हैं कि संविधान है ही नहीं। दरअसल ऐसे संकीर्ण मानसिकता के लोगों ने संविधान को हमेशा ही नकारा है। यही वो लोग हैं जो बाबासाहेब की मूर्तियों को तोड़ते हैं, ख़ासतौर से बाबासाहेब की मूर्तियों के हाथों को क्योंकि उन हाथों में संविधान की किताब होती है।
सच तो ये है कि एकरंगी-सुरंगजीवी नकारात्मक सोच के लोगों ने संविधान को कभी माना ही नहीं क्योंकि ये संविधान ही ग़ैरबराबरी को दूर करने के लिए समता-समानता की बात करता है। यही संविधान इन प्रभुत्ववादियों के उस वर्चस्व को चुनौती देता है, जिस वर्चस्व की वजह से इन्होंने पाँच हज़ार सालों से शोषित, वंचित, ग़रीब ‘पीडीए समाज’ का लगातार दमन किया है।
आज संविधान ‘पीडीए समाज’ की ढाल भी है और रक्षा कवच भी। संविधान से मिला हुआ ‘आरक्षण’ आज इन परंपरागत शक्तिशाली लोगों को फूटी आँख नहीं सुहाता है। ये वो पुरातनपंथी-रूढ़िवादी-दक़ियानूसी लोग हैं जो परिवर्तन चाहते ही नहीं है, जबकि संविधान सकारात्मक परिवर्तन का एक बेहद ताक़तवर दस्तावेज़ है।
हमने पहले भी कहा है, आज फिर दोहरा रहे हैं : शोषणकारियों के ख़िलाफ़, बाबासाहेब हमें संविधान के रूप में काग़ज़ का एक ऐसा ताक़तवर दस्तावेज़ देकर गये हैं, जो लोहे की तलवार से भी ज़्यादा मजबूत है।
संविधान ही पीडीए के भविष्य का विधान है।
संविधान ही संजीवनी है। इसमें संजीवनी की तरह को देश को अच्छा करने की और अच्छा बनाए रखने की अद्भुत शक्ति है। इसीलिए देश का नया नारा ‘जय जवान! जय किसान!! जय संविधान!!! होना चाहिए।
संविधान को चुनौती देनेवाले पाँचों इंद्रियों को सक्रिय करके सुन लें कि ‘देश संविधान से चलेगा, किसी संघ-विधान या मन-विधान से नहीं।’
संविधान था, संविधान है, संविधान रहेगा!
Dear @Javedakhtarjadu. I'm afraid your response is as boring and overloaded as your similes and metaphors. When countered with facts, you shift the goalpost, bring in the RSS, berate the right wing, take refuge in context, cushion the bigotry, and claim Kafirs were Colonialists not Hindus.
I know countering you again is like watering a cactus and praying for leechis, but in the hope that all that knee massaging with Doctor Ortho would have sprouted some neurons, here goes:
You asked for a source because you said the quote was “quite unlike” Azad’s “lifelong sociopolitical stances.” I gave you the source: Calcutta, 27 October 1914, published in Khutbat-e-Azad. The words are his. That should have ended the enquiry. It did not. So let us walk through your new script, line by line.
1. “The khutbats were about Khilafat and British colonialism.”
Yes. That is what I wrote. Maulana Azad was telling Indian Muslims that a Turk’s battlefield thorn must be felt in a Hindustani Muslim’s heart; that Millat-e-Islam is one body; that friendship and enmity are for the religion of Allah. Then he quoted Quran 48:29 and added his own gloss: be extremely hard against disbelievers, extremely kind among yourselves, and do not pass over this as if you had not heard it. You asked for the when and where. You received both. “It was about Khilafat” is not a rebuttal. It is the context in which he said it.
2. “To claim he was quoting this about the Hindus of India will not be true. The Kafir here was the colonialist.”
I did not say the 1914 speech was a municipal circular against the Hindus of Howrah. I quoted what Azad quoted: a Quranic verse about kuffar, and his commentary on unbelief, Tawhid, and hardness toward disbelievers. If Azad had meant “kafir = only the British officer,” he knew Urdu enough to say Angrez. He did not. He used the Book’s word, then told his flock not to skip it.
And if “kafir” in Azad’s mouth was a temporary colonial nickname, kindly explain the 1920 Hijrat fatwa, published in Ahl-e-Hadith of Amritsar, in which he said Indian Muslims had no choice but to migrate, and that those who stayed and kept connection with “the enemy of Islam” would themselves be counted as the enemy of Islam. That is not a lecture on income-tax collectors. That is a theology of the land.
3. “When Ataturk took over, Azad called it a closed chapter and condoned the secular government.”
Men change. Texts do not. If later Azad made peace with the death of the Caliphate, good for the later Azad. It does not unsay 1914, nor the Khilafat years, nor Masala-e-Khilafat, nor the call that any government hostile to Turkey was hostile to Islam, not the belief in the Quranic verse damning the Kafirs. You began by saying the paragraph was unlike his lifelong stances. Lifelong includes the years he spent as a pan-Islamist firebrand. Evolution is not an eraser. It is a timeline.
4. “Read his Calcutta High Court statement. An honour no member of the Mahasabha or RSS was ever given.”
Sedition charges from the Raj are not a unique family heirloom. Tilak got them. Aurobindo got them. Savarkar was given two life terms and sent to Cellular Jail, where the honour included the oil mill, the lash, and years in a cell the size of a cupboard.
And of course, knowing your pitiful knowledge of Indian History, I guess you would not know legendary RSS names like Devipad Chaudhary, Jagatpati Kumar, Anna Saheb Deshpande, Ramakant Keshav, Vasantrao Oak, Narayan Singh, Chandrakant Bhardwaj, Dada Naik Chimur, Baburao Begade, Lala Hansraj, Balaji Raipurkar who participated in our freedom struggle and were jailed or shot.
5. “Azad was in British jails for nine years. Name one from your right wing who can match that.”
Vinayak Damodar Savarkar: roughly a decade in Kala Pani, further years in mainland jails, then thirteen years of internment in Ratnagiri. Sentence on paper: fifty years. Conditions: not Ahmednagar Fort with time to write Ghubar-e-Khatir.
By the way, you might know that your great-great-grandfather Fazl-e-Haq Khairabadi was also incarcerated at Kala Pani. What you might not know, or would want to hide, is that he wrote a grovelling mercy petition to the British, pleading to be released.
6. “In 1946 Jinnah refused to shake Azad’s hand. He hated Azad for his patriotism.”
How does this turn “be severe against the kafirs, merciful among themselves” into a sonnet about communal harmony? A man can spend 1946 refusing Partition and still have spent 1914 telling Indian Muslims that their first body is the ummah. Fairness is holding both pages open. What you are doing is hiding the 1914 page and waving the 1946 one like a flag.
7. “Your reference to Rahul Gandhi was unnecessary, I expect decency and class.”
And I expected you to have some sense of humour. The PS was a reminder that this is the second time I have had to fetch your hero’s paperwork. Last time it was Nehru’s India: books banned, editors sacked, films blocked, Majrooh jailed for a couplet.
You lecture me on class after moving from “this cannot be Azad” to “it is Azad but you must read kafir as colonialist” to “anyway he went to jail” to “Jinnah was rude to him” to “please don’t mention Rahul.” That is not class. That is a guided tour of every exit except the text.
Look, Javed sahab, let us end this here. I like you. Doubtless a lot of your work is incredible, truly it is. So in that spirit, permit me to pen an ode to you:
Javed Akhtar ko dekha toh aisa laga, jaise chhal ka nawab, jaise jhoot ki kitaab, jaise dhong ki kiran, jaise adambar ka van, jaise kapton ki baat, jaise pakhand ki raat, jaise janpath mein ho ek jalta diya.
Alvida, Shabba khair. WDTP
गणपति बप्पा मोरया! 🙏🌺
श्री गणेश जी आपके जीवन से सभी विघ्न हरें, सुख-समृद्धि और सफलता से आपका घर-आँगन भरें। गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएँ! 🐘✨
।।ॐ गणेशाय नमः।। 🙏🚩
लहसुन और प्याज औषधी हो सकते हैं, पर भोजन नहीं
कोई भी औषधी भोजन नहीं होती...
लेकिन जैन मुनि ने जिस तरीके से समझाया, यह एंगल एकदम सटीक है। शायद हम ब्राह्मणों के पूर्वज भी इसीलिए लहसुन प्याज नहीं खाते थे। अब भी बहुत सारे ब्राह्मण परिवार हैं जहाँ लहसुन प्याज वर्जित है।
श्रीकृष्ण पौराणिक ग्रंथों (महाभारत, भागवत) में यदुवंशी चंद्रवंशी क्षत्रिय, वसुदेव के पुत्र हैं। मोरा कूप शिलालेख (लगभग 15 ई.) वृष्णि पंचवीरों की प्रतिमाएं बताता है। घोसुंडी-हाथीबाड़ा (2-1 शताब्दी ईसा पूर्व) संकर्षण-वासुदेव पूजा सिद्ध करता है। अहीरों का यादव नाम 1910 महसभा से शुरू संस्कृतीकरण है।
पौराणिक ग्रंथों (महाभारत, भागवत) में श्रीकृष्ण यदुवंशी चंद्रवंशी क्षत्रिय हैं, वसुदेव के पुत्र। घोसुंडी-हाथीबाड़ा (ईसा पूर्व) और मोरा कूप शिलालेख वृष्णि वीरों की पूजा सिद्ध करते हैं। जादौन-भाटी का वंश दावा मध्यकालीन अभिलेखों से जुड़ा है। अहीरों का यादव नाम मुख्यतः 20वीं सदी की संस्कृतीकरण प्रक्रिया है। दोनों पक्षों के दावे मौजूद, विद्वानों में मतभेद।
#Thread
क्या भगवान श्री कृष्ण क्षत्रिय (राजपूत) थे, या अहीर (ग्वाले)? और अहीर से यादव बनने का खेल कब शुरू हुआ?
ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ विस्तृत पोस्ट...
पौराणिक ग्रंथों जैसे श्रीमद्भागवत पुराण, महाभारत, विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण के अनुसार, श्री कृष्ण का जन्म चंद्रवंश की यदुवंश शाखा में हुआ था। श्री कृष्ण के जन्मदाता पिता वसुदेव थे, जो शूरसेन (मथुरा के राजा) के पुत्र थे।
श्री कृष्ण का उपनयन संस्कार (जनेऊ) हुआ था, उन्होंने सांदीपनि आश्रम में क्षत्रिय और वेदोक्त शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने कंस का वध किया, जरासंध से युद्ध लड़े, द्वारका नगरी बसाई और महाभारत युद्ध में अर्जुन के सारथि बनकर 'गीता' का उपदेश दिया। यह सभी कर्म और उत्तरदायित्व स्थापित परंपरा के अनुसार एक क्षत्रिय के हैं।
★श्री कृष्ण का क्षत्रिय वंश से होना पौराणिक (शास्त्र) प्रमाणों के साथ...विस्तार से.
महाभारत (आदिपर्व):- महाराज ययाति के पुत्र यदु से यदुवंश चला। ययाति चंद्रवंशी क्षत्रिय सम्राट थे। चंद्रवंश के संस्थापक महाराज पुरुरवा क्षत्रिय थे। अतः यदु के समस्त वंशज क्षत्रिय ही हुए।
श्रीमद्भागवत पुराण (9वाँ स्कंध):- में स्पष्ट लिखा है- "यदोर्वंशं नरः श्रुत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते" - यदु क्षत्रिय राजा थे।
भगवद गीता में स्वयं श्री कृष्ण कहते हैं:- "चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं"
अर्थात- क्षत्रिय धर्म का पालन उन्होंने स्वयं कुरुक्षेत्र में क्षत्रिय के रूप में युद्ध करके किया। उन्होंने कभी गौ-पालन को अपना वर्ण नहीं बताया, वो उनकी लीला थी, उनका धर्म तो क्षात्र धर्म था।
शिलालेखीय प्रमाण- जिससे साबित होता है श्री कृष्ण क्षत्रिय थे।
1:- घोसुण्डी - हाथीबाड़ा शिलालेख, चित्तौड़गढ़ (ईसा पूर्व पहली शताब्दी)-
राजस्थान में मिला सबसे पुराना शिलालेख। इसमें स्पष्ट लिखा है- "संकर्षण वासुदेवाभ्यां" अर्थात- संकर्षण (बलराम) और वासुदेव (श्री कृष्ण) की पूजा के लिए एक पत्थर की चारदीवारी बनवाई गई।
ये शिलालेख सिद्ध करता है कि श्री कृष्ण उस काल में भी क्षत्रिय वृष्णि वंश के पूज्य राजा के रूप में पूजे जाते थे।
2:- मोरा कूप शिलालेख, मथुरा (10-25 ईस्वी)-
मथुरा में मिले इस शिलालेख में लिखा है- "वृष्णीनां पंचवीराणां" अर्थात- वृष्णि वंश के पाँच वीरों की मूर्ति स्थापना। वृष्णि वही क्षत्रिय वंश है जिसमें श्री कृष्ण का जन्म हुआ था। ये शिलालेख मथुरा के शूरसेन क्षत्रियों का है, अहीरों का नहीं।
3:- विजयमंदिरगढ़ शिलालेख, बयाना (1040 ईस्वी)-
बयाना किले में मिले इस शिलालेख में करौली के जादौन राजवंश की पूरी वंशावली लिखी है। इसमें "धर्मपाल" जो श्री कृष्ण की 77वीं पीढ़ी में हुए से लेकर "विजयपाल" तक के नाम हैं। इसी वंश ने आगे करौली बसाया।
यह प्रमाणित करता है कि करौली के जादौन, श्री कृष्ण की 181वीं पीढ़ी हैं, जो आज भी जीवित हैं।
4:- जैसलमेर के भाटी शिलालेख (1152 ईस्वी)-
जैसलमेर किले और लोद्रवा में मिले शिलालेखों में स्पष्ट लिखा है- "यदुवंशोद्भव भाटी" और "चंद्रवंशी क्षत्रिय भाटी"। भाटी खुद को वज्रनाभ जी से मानते हैं, जो श्री कृष्ण के प्रपौत्र थे।
5:- टिमनगढ़ और करौली के ताम्रपत्र - मेडाम्बर छत्र का प्रमाण-
करौली के जादौन राजवंश के राजमहल के ताम्रपत्रों और टिमनगढ़ शिलालेख में "मेडाम्बर छत्र" का उल्लेख है। यह वो छत्र है जो भगवान श्री कृष्ण के वंशजों द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी धारण किया गया।
करौली के राजकीय ताम्रपत्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि यह छत्र स्वयं द्वारका से वज्रनाभ जी के साथ मथुरा होते हुए करौली लाया गया था। यह केवल एक छत्र नहीं, एक राजचिन्ह है जो सिद्ध करता है कि करौली नरेश सीधे श्री कृष्ण के रक्त वंशज हैं।
कोई भी अहीर रियासत के पास ऐसा कोई राजचिन्ह नहीं है।
6:- प्रद्युम्न हवेली और वज्रनाभ टीला (मथुरा-वृंदावन)-
वृंदावन में आज भी *प्रद्युम्न जी की हवेली* के अवशेष और मथुरा में *वज्रनाभ का टीला* मौजूद है। प्रद्युम्न जी, श्री कृष्ण के पुत्र थे और कामदेव के अवतार। वज्रनाभ जी ने ही श्री कृष्ण की रानियों के कहने पर वृंदावन में 4 प्रमुख मंदिरों (गोविंद देव, गोपीनाथ, मदन मोहन, युगल किशोर) की स्थापना की थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) भी मानता है कि ये टीले ईसा पूर्व काल के क्षत्रिय साम्राज्य के हैं।
7:- अजयपाल जादौन का शिलालेख (1150 ईस्वी)-
इस पुरालेखीय साक्ष्य के अनुसार, राजा अजयपाल को 'यदुवंशी राजपूत' के रूप में संबोधित किया गया है, जो प्राचीन काल से मथुरा और सूरसेन प्रदेश पर शासन करने वाले यदुवंशियों की निरंतरता को दर्शाता है।
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#Thread
क्या भगवान श्री कृष्ण क्षत्रिय (राजपूत) थे, या अहीर (ग्वाले)? और अहीर से यादव बनने का खेल कब शुरू हुआ?
ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ विस्तृत पोस्ट...
पौराणिक ग्रंथों जैसे श्रीमद्भागवत पुराण, महाभारत, विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण के अनुसार, श्री कृष्ण का जन्म चंद्रवंश की यदुवंश शाखा में हुआ था। श्री कृष्ण के जन्मदाता पिता वसुदेव थे, जो शूरसेन (मथुरा के राजा) के पुत्र थे।
श्री कृष्ण का उपनयन संस्कार (जनेऊ) हुआ था, उन्होंने सांदीपनि आश्रम में क्षत्रिय और वेदोक्त शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने कंस का वध किया, जरासंध से युद्ध लड़े, द्वारका नगरी बसाई और महाभारत युद्ध में अर्जुन के सारथि बनकर 'गीता' का उपदेश दिया। यह सभी कर्म और उत्तरदायित्व स्थापित परंपरा के अनुसार एक क्षत्रिय के हैं।
★श्री कृष्ण का क्षत्रिय वंश से होना पौराणिक (शास्त्र) प्रमाणों के साथ...विस्तार से.
महाभारत (आदिपर्व):- महाराज ययाति के पुत्र यदु से यदुवंश चला। ययाति चंद्रवंशी क्षत्रिय सम्राट थे। चंद्रवंश के संस्थापक महाराज पुरुरवा क्षत्रिय थे। अतः यदु के समस्त वंशज क्षत्रिय ही हुए।
श्रीमद्भागवत पुराण (9वाँ स्कंध):- में स्पष्ट लिखा है- "यदोर्वंशं नरः श्रुत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते" - यदु क्षत्रिय राजा थे।
भगवद गीता में स्वयं श्री कृष्ण कहते हैं:- "चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं"
अर्थात- क्षत्रिय धर्म का पालन उन्होंने स्वयं कुरुक्षेत्र में क्षत्रिय के रूप में युद्ध करके किया। उन्होंने कभी गौ-पालन को अपना वर्ण नहीं बताया, वो उनकी लीला थी, उनका धर्म तो क्षात्र धर्म था।
शिलालेखीय प्रमाण- जिससे साबित होता है श्री कृष्ण क्षत्रिय थे।
1:- घोसुण्डी - हाथीबाड़ा शिलालेख, चित्तौड़गढ़ (ईसा पूर्व पहली शताब्दी)-
राजस्थान में मिला सबसे पुराना शिलालेख। इसमें स्पष्ट लिखा है- "संकर्षण वासुदेवाभ्यां" अर्थात- संकर्षण (बलराम) और वासुदेव (श्री कृष्ण) की पूजा के लिए एक पत्थर की चारदीवारी बनवाई गई।
ये शिलालेख सिद्ध करता है कि श्री कृष्ण उस काल में भी क्षत्रिय वृष्णि वंश के पूज्य राजा के रूप में पूजे जाते थे।
2:- मोरा कूप शिलालेख, मथुरा (10-25 ईस्वी)-
मथुरा में मिले इस शिलालेख में लिखा है- "वृष्णीनां पंचवीराणां" अर्थात- वृष्णि वंश के पाँच वीरों की मूर्ति स्थापना। वृष्णि वही क्षत्रिय वंश है जिसमें श्री कृष्ण का जन्म हुआ था। ये शिलालेख मथुरा के शूरसेन क्षत्रियों का है, अहीरों का नहीं।
3:- विजयमंदिरगढ़ शिलालेख, बयाना (1040 ईस्वी)-
बयाना किले में मिले इस शिलालेख में करौली के जादौन राजवंश की पूरी वंशावली लिखी है। इसमें "धर्मपाल" जो श्री कृष्ण की 77वीं पीढ़ी में हुए से लेकर "विजयपाल" तक के नाम हैं। इसी वंश ने आगे करौली बसाया।
यह प्रमाणित करता है कि करौली के जादौन, श्री कृष्ण की 181वीं पीढ़ी हैं, जो आज भी जीवित हैं।
4:- जैसलमेर के भाटी शिलालेख (1152 ईस्वी)-
जैसलमेर किले और लोद्रवा में मिले शिलालेखों में स्पष्ट लिखा है- "यदुवंशोद्भव भाटी" और "चंद्रवंशी क्षत्रिय भाटी"। भाटी खुद को वज्रनाभ जी से मानते हैं, जो श्री कृष्ण के प्रपौत्र थे।
5:- टिमनगढ़ और करौली के ताम्रपत्र - मेडाम्बर छत्र का प्रमाण-
करौली के जादौन राजवंश के राजमहल के ताम्रपत्रों और टिमनगढ़ शिलालेख में "मेडाम्बर छत्र" का उल्लेख है। यह वो छत्र है जो भगवान श्री कृष्ण के वंशजों द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी धारण किया गया।
करौली के राजकीय ताम्रपत्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि यह छत्र स्वयं द्वारका से वज्रनाभ जी के साथ मथुरा होते हुए करौली लाया गया था। यह केवल एक छत्र नहीं, एक राजचिन्ह है जो सिद्ध करता है कि करौली नरेश सीधे श्री कृष्ण के रक्त वंशज हैं।
कोई भी अहीर रियासत के पास ऐसा कोई राजचिन्ह नहीं है।
6:- प्रद्युम्न हवेली और वज्रनाभ टीला (मथुरा-वृंदावन)-
वृंदावन में आज भी *प्रद्युम्न जी की हवेली* के अवशेष और मथुरा में *वज्रनाभ का टीला* मौजूद है। प्रद्युम्न जी, श्री कृष्ण के पुत्र थे और कामदेव के अवतार। वज्रनाभ जी ने ही श्री कृष्ण की रानियों के कहने पर वृंदावन में 4 प्रमुख मंदिरों (गोविंद देव, गोपीनाथ, मदन मोहन, युगल किशोर) की स्थापना की थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) भी मानता है कि ये टीले ईसा पूर्व काल के क्षत्रिय साम्राज्य के हैं।
7:- अजयपाल जादौन का शिलालेख (1150 ईस्वी)-
इस पुरालेखीय साक्ष्य के अनुसार, राजा अजयपाल को 'यदुवंशी राजपूत' के रूप में संबोधित किया गया है, जो प्राचीन काल से मथुरा और सूरसेन प्रदेश पर शासन करने वाले यदुवंशियों की निरंतरता को दर्शाता है।
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In UP, GCs make up around 18% of the population.
In the 2022 Assembly election, 89% of Brahmins, 87% of Rajputs, 83% of Banias, and 78% of Bhumihars and Kayasthas voted for the BJP.
That means roughly 85% of GC voters backed the BJP, making them its strongest and most loyal support base.
The BJP won 41% of the vote share against 32% for the SP, a gap of just 9 percentage points.
If even half of the BJP’s General Category support is taken away, it would collapse.
So the claim that General Category voters are "irrelevant" to UP politics simply does not stand up to the numbers.
Source: CSDS-Lokniti research.
PS: This post does not endorse, support or denounce any political party. It only corrects a common misconception regarding electoral numbers.
“अगर आपके बच्चे होते, तो क्या आप उन्हें ऐसी ही सुविधा देते?”
- ये सवाल उस बच्ची का है, जो स्कूल में शिक्षकों की कमी, जर्जर भवन और सुविधाओं की किल्लत पर आवाज उठा रही है
मामला राजस्थान के अलवर का है, जहां स्कूली छात्र-छात्राएं धरने पर बैठी हैं। देश में GEN Z के बाद अब GEN Alpha अपना हक मांग रहे हैं।
अच्छी शिक्षा और स्कूल में सुविधाएं बच्चों का हक हैं, BJP सरकार में जिनके लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ रहा है।
ऐसी सरकार को शर्म आनी चाहिए!!
यारों के यार , दोस्तों के दोस्त , जनता के चहेते , घमंडरहित नेता उमाशंकर सिंह जी को बलिया ने दी अंतिम विदाई , शानदार पारी खेलकर पंचतत्व में विलीन हुए उमाशंकर सिंह , शत शत नमन 🙏
अपने एकलौते विधायक उमाशंकर सिंह जी को श्रद्धांजलि देने पहुँची आदरणीय बहन जी के भावुक शब्दो को सुनिए ।
बहन जी ने परिवार का हौसला बढ़ाते हुए बोला कि वो बसपा विधायक उमाशंकर सिंह जी के बेटे को राजनीति में बढ़ावा देंगी और उनका साथ देगी ।
जब से छात्र आंदोलन और राजपूत समाज के हितों से जुड़े मुद्दों पर हमारे भाई परमवीर राठौड़ (@ParamveerS36404) ने खुलकर और मजबूती से अपनी आवाज़ उठानी शुरू की है, तब से उनकी आईडी को लगातार मास रिपोर्ट किए जाने की जानकारी मिल रही है।
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प्रॉपर्टी खरीदते समय सबसे बड़ा खतरा फर्जी रजिस्ट्री, विवादित जमीन या एक ही प्लॉट को कई लोगों को बेचने का होता है। इस तरह फंसने से लाखों रुपए का नुकसान हो सकता है।
अब घर बैठे बस 5 मिनट में किसी भी जमीन या मकान का स्टेटस ऑनलाइन चेक किया जा सकता है। इससे प्रॉपर्टी की सही जानकारी लेकर धोखाधड़ी से बचा जा सकेगा।
खबर: https://t.co/eeON2KvHzp