मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान करने वाले वीर एवं अपनी कुल मर्यादा ,सतीत्व ,धर्म रक्षार्थ, जोहर करने वाली कुल ललनाओं को कोटिश: नमन 🚩🙏 #शौर्यदिवस#जैसलमेर#क्षत्रिय और #सनातन_विचार
जैसलमेर माँ देगराय की कृपा से आलोकित है। भाटी राजवंश की आराध्या और जैसलमेर की रक्षक देवी के रूप में पूजित माँ देगराय के प्रति जैसलमेरवासियों की आस्था शताब्दियों पुरानी है। भाटी राजवंश के संस्थापक से लेकर महारावल जैसल तक, अनेक महान योद्धाओं ने रणभूमि में जाने से पूर्व माँ का आशीर्वाद लिया। आज भी प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु माँ देगराय के दर्शन के लिए यहाँ आते हैं, ऐसे में उनकी सुविधा और आस्था का सम्मान हमारी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में है।
इसी उद्देश्य से इस पावन पीठ के विकास के लिए स्वदेश दर्शन योजना के अंतर्गत 11.84 करोड़ रुपए की राशि स्वीकृत की गई है। इससे मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के लिए बेहतर सुविधाओं का विकास होगा और देश-दुनिया से आने वाले पर्यटकों के लिए भी इस ऐतिहासिक धरोहर को बेहतर ढंग से प्रस्तुत किया जा सकेगा। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के ‘विकास भी, विरासत भी’ के विजन के अनुरूप हमारा प्रयास है कि आस्था और विरासत से जुड़े ऐसे केंद्रों का विकास हो, जिससे स्थानीय पर्यटन, रोजगार और अर्थव्यवस्था को भी नई ऊर्जा मिले। माँ देगराय की यह धरती हमारी आस्था, शौर्य और गौरवशाली विरासत की प्रतीक है।
मेरा प्रयास है कि जैसलमेर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक उसी गरिमा के साथ पहुँचे।
विकास भी, विरासत भी!
जय देगराय माता!
ईडब्ल्यूएस सरलीकरण की मांग को लेकर व्यापक सामाजिक मुहिम का आज आगाज
मारवाड़ राजपूत सभा के हाल ही में संपन्न चुनाव के दौरान जारी हमारे घोषणा-पत्र के महत्वपूर्ण बिंदु-ईडब्ल्यूएस सरलीकरण को लेकर व्यापक मुहिम शुरू करने का संकल्प लिया गया था। इसी दिशा में विगत कुछ समय से हम विभिन्न क्षेत्रों में जा कर सवर्ण समाज के समाज बंधुओं से इस बारे में संवाद कर रहे थे व आज उदयपुर स्थित मेवाड़ क्षत्रिय महासभा संस्थान में विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ हुई बैठक एवं संवाद के बाद हम इसकी सामाजिक मुहिम शुरू करने की औपचारिक घोषणा करते हैं ।
#EWSसरलीकरण #EWSReform #मारवाड़राजपूतसभा
मैं @ReallySwara को जौहर पर डिबेट की चुनौती देती हूँ।
भयावह क्षणों को एक सस्ती punchline में बदलना आसान है। दरिंदों से घिरी औरतों के सामने मौजूद उस ख़ौफ़ को A.C. Hall में बैठकर कायराना कह देना आसान है।
एक होता है रहमोकरम पर जीना— एक होता आन बान शान से जीना..
रानी पद्मावती और हज़ारों औरतों ने अपनी देह, अस्मिता सम्मान पर आख़िरी फैसला किसी हवसी आक्रांता पर नहीं छोड़ा…
महत्वपूर्ण सूचना
शिक्षा विभाग में चयनित सभी सहायक कर्मचारियों से निवेदन है कि इन दोनों आदेशों/पत्रों को अपने-अपने विद्यालय के WhatsApp ग्रुप एवं PEEO ग्रुप में अवश्य शेयर करें। साथ ही, संभव हो तो इनका प्रिंट निकलवाकर संस्था प्रधान को भी उपलब्ध करवाएं।
आदेशों के अनुसार विद्यालय परिसर को सामुदायिक भवन के रूप में माना गया है तथा स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत विद्यालय परिसर एवं विद्यालय के शौचालयों की साफ-सफाई की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत की है। इसके लिए स्वच्छ भारत मिशन के माध्यम से ग्राम पंचायतों को अलग से बजट/फंड उपलब्ध करवाया जाता है।
👉 इसलिए सहायक कर्मचारी की जिम्मेदारी पूरे विद्यालय परिसर की साफ-सफाई करना नहीं है। सहायक कर्मचारी विद्यालय भवन के कमरों आदि की निर्धारित साफ-सफाई के कार्य के लिए जिम्मेदार है, लेकिन पूरे विद्यालय परिसर एवं शौचालयों की साफ-सफाई की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत की व्यवस्था के अनुसार की जानी चाहिए।
इस संबंध में सभी सहायक कर्मचारी अपने संस्था प्रधान से विनम्रतापूर्वक अनुरोध करें कि वे संबंधित ग्राम विकास अधिकारी (VDO) से संपर्क कर ग्राम पंचायत के माध्यम से विद्यालय परिसर एवं शौचालयों की साफ-सफाई की व्यवस्था सुनिश्चित करवाएं।
✊ अब विद्यालय परिसर की सफाई के लिए सहायक कर्मचारी अपनी जेब से पैसा नहीं देगा।
सभी साथी नियमों एवं उपलब्ध सरकारी आदेशों के अनुसार ही अपनी बात रखें और किसी भी प्रकार के विवाद से बचते हुए संबंधित अधिकारी के समक्ष उचित तरीके से अपनी समस्या रखें।
एकता बनाए रखें — नियमों की जानकारी रखें — अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें।
महाराजाधिराज श्री गज सिंह बापजी के मुख्य आतिथ्य में आयोजित चौपासनी स्कूल पूर्व छात्र सम्मेलन के समापन समारोह में बतौर विशिष्ट अतिथि सहभागिता कर आत्मीयता, गौरव एवं अपनत्व का विशेष अनुभव प्राप्त हुआ। जय मां चामुण्डा माता _जय चौपासनी
रवींद्रसिंह भाटी, अपने आप पर पेट्रोल नहीं, शासन और प्रशासन की संवेदना की सूखी जड़ों पर थोड़ा पानी डालिए!
हिंसा ख़ुद पर हो या समाज पर या किसी दूसरे पर उससे बुरा कुछ नहीं है। वह त्याज्य है।
लेकिन रवींद्र सिंह भाटी ने पेट्रोल छिड़ककर ठीक किया या ग़लत; न तो यह बहस का विषय है और न यह अच्छा है कि हम उस विडियो को शेयर करें, जिसमें भाटी अपने आप पर पेट़्रोल डाल रहे हैं। यह दोनों ही बातें एक ही जैसी निर्रथक हैं।
किसी भी संघर्ष में किसी का भी शरीर नहीं जलना चाहिए, बस शासन और प्रशासन के ही नहीं, जो लोग मज़दूरों को न्याय नही दे रहे, उन सब ताक़तवर शक्तियों के अहंकार जलने चाहिए। सत्ता में संवेदना रहनी चाहिए। लेकिन सत्ता शक्ति का ऐसा स्वीमिंग पूल है, जहाँ संवेदना के वस्त्र उतार कर ही प्रवेश किया जा सकता है। वे चाहे कम्युनिस्टों ही की सत्ता क्यों न हो। इसलिए वह सत्ता जब कुछ दूसरे विचार वालों के हाथ होती है तो वहाँ संवेदना का शायद अधोवस्त्र भी एक थोंग में बदल जाता है।
इसलिए पेट्रोल को दूर ही रखा जाए। लड़ाई सड़क, विधानसभा, अदालत, मीडिया, श्रम विभाग और प्रशासन की मेज पर लड़ी जाए। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक विधायक, मजदूर और स्थानीय नागरिक ऐसी चरम बेचैनी तक पहुँचते क्यों हैं?
बाड़मेर की गिरल लिग्नाइट माइंस को लेकर श्रमिकों और ग्रामीणों का आंदोलन कई दिनों से चल रहा है। रिपोर्टों के अनुसार आरोप स्थानीय रोजगार, भूमि-अधिग्रहण और मजदूरों के साथ अन्याय से जुड़े हैं; इसी आंदोलन के बीच भाटी ने बाड़मेर कलेक्ट्रेट के बाहर खुद पर पेट्रोल छिड़का, जिसके बाद कहा जा रहा है कि पुलिस-प्रशासन ने स्थिति संभाली। लेकिन यह स्थिति पैदा किसने की? शायद रवींद्रसिंह भाटी ने नहीं ही पैदा की।
असल मुद्दा पेट्रोल की बोतल नहीं, वह व्यवस्था है जिसमें गरीब की आवाज़ पहले फाइल में दबती है, फिर धरने में बैठती है, फिर सड़क पर उतरती है और अंत में किसी खतरनाक प्रतीक की ओर धकेल दी जाती है।
हम पत्रकार बहुत जल्दी कहते हैं, “यह ग़लत कर दिया, यह नाटकीयता कर दी।” लेकिन जो इससे कहीं अधिक ग़लत है; मजदूर की मजदूरी दबना, स्थानीय नौजवानों से रोजगार का वादा टूटना, प्रशासन का कंपनी के आगे झुक जाना, श्रम विभाग का मौन रहना आदि पर हमारा "ग़लत" शब्द खो सा जाता है।
राजस्थान में निवेश सम्मेलन होते हैं। बड़े-बड़े मंच सजते हैं। औद्योगिक घरानों के लिए लाल कालीन बिछता है। इन घरानों में किसी को छींक भी आती है तो मुख्यमंत्री स्तर के लोग विमान से यात्रा करके उनके हाल पूछने जाते हैं, लेकिन मजदूरों के कुनबे के कुनबे ग़र्क़ हो जाएं तो भी कोई कहाँ पूछने जाता है? माइनिंग वाले इलाकों में पूरे के पूरे गांवों में सिर्फ़ युवा विधवाएँ वास करती हैं, अकेली कराहती हैं, लेकिन मजाल कि किसी ने कभी वहाँ जाकर हालात देखे हों। इसलिए ये कुदरती "नरसंहार" चलते रहते हैं और कोई देखता नहीं और एक उद्योगपति की एक छींक की अहमियत इतनी बड़ी हो जाती है। मैं नहीं कहता कि उद्योगपति के यहाँ न जाएँ, लेकिन अगर मजदूर बड़ी तादाद में आंदोलन कर रहे हों तो उनकी सुन तो लो। माना कि आप बांग्लादेशियों को निकाल रहे हैं, लेकिन इन भारतवासियों से तो प्रेम कर लो और इनके घरों में तो थोड़ी खुशियाँ भर दो ताकि इनके चूल्हे जल जाएँ।
कांग्रेस हो या भाजपा, सत्ता में आते ही दोनों विकास की भाषा में ग़रीब की ज़मीन, गोचर, ओरण, पहाड़ और श्रम को “संसाधन” कहने लगती हैं।
जिन धरतियों पर गायें चरती थीं, जहाँ लोकदेवताओं की स्मृति थी, जहाँ कृष्ण की गोचारण-कल्पना तक हमारे धर्म-संस्कारों में बसी है, वहाँ खनन, मुनाफा और ठेकेदारी की मशीनें उतर आती हैं। दिन भर गाय, धर्म, राम और ईमान की बात करने वाले लोग अगर मजदूर के बच्चे की भूख नहीं देख सकते तो यह धर्म नहीं—सिर्फ नारा है।मजदूर आतंकवादी नहीं है। वह इस धरती का सबसे असुरक्षित नागरिक है। वह कंपनी का उत्पादन खड़ा करता है, मशीन के नीचे पसीना छोड़ता है, धूल फेफड़ों में भरता है और अंत में उसी से कहा जाता है—तुम्हारा नाम सूची में नहीं है, तुम्हारा ठेका खत्म है, तुम्हारी बात बाद में देखेंगे।
भले लोगो, आखिर जाएगा कहाँ अंतिम निर्धन राजस्थानी? दिल्ली? सूरत? अहमदाबाद? खाड़ी देशों की मजदूरी? या अपने ही गाँव में बेगाना होकर खदान के बाहर धरना?
पुलिस और प्रशासन को भी यह समझना होगा कि वे किसी कंपनी के निजी सुरक्षा-कर्मी नहीं हैं। वे भी ऐसे ही राजस्थानियों और हिन्दुस्तानियों के बेटे बेटियां हैं। लेकिन इतने क्या असहाय कि पूरी की पूरी रीढ़ ही इस्पात से सूतली हो जाए। पुलिस के लोगों को अगर स्वतंत्रता और नैतिक विवेक से काम करने दिया जाए तो एक ईमानदार हैड कांस्टेबल भी कभी-कभी वह न्याय करा सकता है जो बड़ी ट्रेड यूनियनें नहीं करा पातीं। पर जब पुलिस को आदेशों की जंजीर में बाँध दिया जाता है तो हर जगह वही दृश्य दोहरता है—गरीब सामने, बैरिकेड बीच में, सत्ता पीछे और न्याय कहीं गायब।
रवींद्र भाटी के जज्बे का सम्मान इसलिए है कि वे मजदूरों के बीच खड़े दिखे। लेकिन संघर्ष की गंभीरता यही कहती है कि पेट्रोल, आग और आत्मघाती प्रतीकों से दूर रहना होगा। आप पेट्रोल क्या, बंदूक से भी नहीं लड़ सकते। जिस किसी ने कभी हिंसा और बंदूक से प्रशासन और सरकार के मुक़ाबिले का विचार दिया था, वह बहुत अपरिपक्व और आत्मघाती विचार था। इस तरह के रास्तों से आप जीत ही नहीं सकते। इससे आप कुछ अधिक समय तक सरकार, प्रशासन और अफसरशाही को विलंबित कर सकते हैं, लेकिन उन्हें परास्त नहीं कर सकते।
रवींद्रसिंह भाटी ने पेट्रोल की बॉटल हाथ में ली और उसे उंड़ेला तो यह विडियो देखकर मेरा दिमाग़ घूम गया। राजस्थान ने ऐसे राजनीतिक कार्यकर्ता देखे हैं, जो लड़ते-लड़ते चले गए; लक्ष्मण खीची जैसे नाम स्मृति में तड़प बनकर रह जाते हैं। बाद में उनके नाम पर नगर बस जाता है, स्मारक बन जाता है, पर जिस मनुष्य ने अपने जीवन से सवाल पूछा था, उस सवाल का उत्तर सत्ता कभी नहीं देती। इसलिए असली मांग साफ होनी चाहिए: गिरल माइंस के मजदूरों और स्थानीय ग्रामीणों की मांगों पर खुली वार्ता हो। भूमि-अधिग्रहण के वादों की समीक्षा हो। स्थानीय रोजगार पर लिखित नीति बने। बकाया मजदूरी, सुरक्षा, ठेका-शोषण और निकाले गए युवाओं पर समयबद्ध निर्णय हो।
प्रशासनिक अधिकारी धरनास्थल पर सिर्फ़ कानून-व्यवस्था देखने न जाएँ; वे मज़दूरों के घर भी जाएँ, उनके बच्चों से मिलें, उनकी बेटियों के हाल देखें कि वे पढ़ पा रही हैं या नहीं? उनके नन्हे मुन्नों को देखें कि उनके पास खिलौने और संगीत के उपकरण या किताबें हैं कि नहीं? उनकी बूढ़ी माँओं से मिलें। बुजुर्ग लोगों से बात करें। उनकी रसोई देखें। तब शायद फाइल में दर्ज “मामला” मनुष्य में बदल जाएगा। उनके घरों के पशुओं को देखें कि उनके लिए चारा है कि नहीं?
कंपनियाँ इतनी विशाल, लेकिन इतनी हृदयहीन हो चुकी हैं कि कई बार उनके सामने लोकतंत्र भी लचकता दिखाई देता है। लेकिन राज्य की रीढ़ यदि सचमुच बची है तो उसे सबसे पहले मज़दूर के पक्ष में सीधा खड़ा होना चाहिए। निवेश ज़रूरी है, उद्योग जरूरी हैं, विकास भी ज़रूरी है; लेकिन अगर इस विकास की नींव में मज़दूर की हड्डी, किसान की ज़मीन, गोचर की धूल और ओरण की हत्या दबा दी जाए, तो यह विकास नहीं, राजकीय क्रूरता है।
कृपा करके थोड़ा दया-धर्म रखिए। गाय की बात करते हैं तो गोचर बचाइए। धर्म की बात करते हैं तो न्याय कीजिए। राम की बात करते हैं तो शोषित के पक्ष में खड़े होइए। और ईमान की बात करते हैं तो मज़दूर की मज़दूरी दिलाइए। कृष्ण से प्रेम है तो उनकी यशकथा लिखने वाले रसखान के कुल का संरक्षण कीजिए और उस पूरे गोवर्धन पर्वत को खनन से बचाइए, जहां कभी उस बांसुरीवादक ने गाएँ चराई थीं। उस ओरण को बचाइए, जिसके लिए लड़ते-लड़ते शूरवीर लोग बिना धड़ के ही सैकड़ों किलोमीटर तक दुश्मन को भगा आए थे। यही असली परीक्षा है सरकार की भी, प्रशासन की भी, राजनीति की भी और पत्रकारिता की भी। रवींद्रसिंह भाटी के जज्बे को सलाम। हमारी सभी विधायक उन जैसे हों!
@RavindraBhati__
जो लोग अपने-अपने क्षेत्र की बोलियों को मान्यता दिलाने के नाम पर राजस्थानी को मान्यता देने का विरोध कर रहे हैं, उनसे एक बात -
अपनी स्थानीय भाषा को जीवित रखने का रास्ता किसी दूसरी भाषा का विरोध नहीं, बल्कि अपनी बोली के साहित्य, शोध और दस्तावेज़ीकरण को मजबूत करना है।
यदि आपको लगता है कि किसी एक बोली का प्रभाव अधिक है, तो उसका समाधान विरोध नहीं बल्कि अपनी स्थानीय बोली को साहित्यिक और अकादमिक स्तर पर समृद्ध बनाना है।
लोकगीत, लोककथाएँ, कहावतें, लोकनाट्य, इतिहास …इन सबका जितना अधिक दस्तावेज़ीकरण होगा, उतना ही आपकी बोली का योगदान मान्यता प्राप्त राजस्थानी के स्वरूप में दिखाई देगा।
और जो लोग कहते हैं कि “इसमें साहित्य या विमर्श नहीं”, तो उसका उत्तर भी यही है -
लेखन कीजिए, शोध कीजिए, अपनी भाषा को राज्य ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर तक ले जाइए।
भाषाएँ विरोध से नहीं, संरक्षण और सृजन से जीवित रहती हैं।
राजस्थानी को मान्यता न देना और अपनी बोली के लिए भी कोई ठोस प्रयास न करना ….यह भाषा-चिंता कम और विरोध की प्रवृत्ति अधिक लगती है।
कड़वा है, पर सत्य है!
#Rajasthani #RajasthaniLanguage #Marwari #Mewari #Shekhawati #Hadoti #Bagri #Dhundhari #RajasthaniCulture #Matribhasha #LokSahitya @Rajasthanwalla@Rajsthanikaka@Shaikshiksraj
उदयपुर प्रवास कार्यक्रम
15 मई 2026 | सुबह 09:00 बजे
EWS जन जागृति मंच के तत्वावधान में आयोजित होने वाले‘विचार गोष्ठी’ कार्यक्रम की पूर्व तैयारी बैठक में सर्किट हाउस, उदयपुर में उपस्थित रहूँगा।
आप सभी से इस महत्वपूर्ण संवाद में शामिल होने का सादर अनुरोध है।
स्व जसवंत सिंह जसोल साहब के लिए कर्णप्रिय
"विरुदावली"
जसोल साहब बेहद काबिल और देश के बड़े नाम रहे। जिनकी विरुदावली जायज भी है।
आज दौर बदला है
आज एक पक्ष मोदी जी - शाह साहब की विरुदावली गाता है।
तो दूसरा पक्ष सोनिया जी राहुल साहब की विरुदावली गाता है।
ये भी जायज हैं।
बाकी वैसे हर काल खंड में विरुदावली कायम रही हैं।
लेकिन जनाब आजकल एक अलग वाली विरुदावली और होती है जो
हर और चलती है
राजनीति में देखें तो
बड़े वालो की मंझले और छोटे गाते हैं
मंझले वालो की छोटे गाते हैं और सबसे छोटे गला फाड़ फाड़कर बस नारे लगाते हैं। जो अच्छा गायक होता है उसके गले को आराम मिलता है।
बाकी कंसल्टेंट्स या लाइजनर या दला.. बड़े बाबुओं के लिए विरुदावली गाते हैं।
कुछ उनके मातहतों के लिए गाने के लिए जाने जाते हैं।
नेताओ के चुनाव जीतने से पहले अलग विरुदावली गायक होते हैं
और जीतने या मंत्री बनने पर मार्केट में नए विरुदावली गायक आ जाते हैं।
फिर नेता के गर्दिश में नए वाले कहीं और गला फाड़ फाड़ विरुदावली गाते हैं।
और पुराने वाले विरुदावली गायक नेता की गर्दिश देख गरियाते हैं।
फिर गर्दिश वाला नेता पुराने ही विरुदावली गायकों की फिर विरुदावली गाते है और समय निकलता जाता है।
बाकी बख्शीश न जाने कौन ज्यादा पाता है कौन कम पाता है।
#बस_यूँ_ही
जैसलमेर क्षेत्र में ओरणों के संरक्षण एवं उन्हें राजस्व अभिलेखों में विधिवत दर्ज कराने की माँग को कोलायत विधायक अंशुमान सिंह भाटी द्वारा प्रमुखता से उठाया गया।
अपनी विरासत को बचाने के लिए ढाल बनकर खड़ी है.....जिन्हें इस उम्र में अपने लिए कुछ नहीं चाहिए न सुख-सुविधा, न नाम उनकी संघर्षरत आँखों में केवल एक ही सपना है मेरी ओरण और गोचर जमीन बच जाए, ताकि मेरे बच्चों का भविष्य सुरक्षित रहे।धन्य है ऐसी मातृ शक्ति.... #ओरण_बचाओ_जैसाण_बचाओ
बीकानेर का खेजड़ी बचाओ आंदोलन हो….
या जैसलमेर का ओरण बचाओ आंदोलन हो….
दोनों शुद्ध रूप से आम जनता के आंदोलन हैं…
और इन दोनों आंदोलनों में जनता की ऊर्जा और गंभीरता देखकर….
इस बात का यक़ीन तो हो गया…
कि मारवाड़ क्षेत्र में विकास के नाम पर जितनी बर्बादी करनी थी, वो कर ली…
अब और उजाड़ने नहीं दिया जाएगा इस क्षेत्र को….!!!
#ओरण_बचाओ
ओरण केवल भूमि का टुकड़ा नहीं, यह हमारी देवीय आस्था और जीव-जंतुओं के सुरक्षित जीवन का आधार है।
यहाँ प्रकृति, परंपरा और संरक्षण एक साथ सांस लेते हैं, ओरण हमारी सांझी धरोहर है।
हमारा ध्येय, इसका संरक्षण….
#ओरण_बचाओ_जैसाण_बचाओ