भारत में कैंसर, हृदय , गुर्दा रोग महामारी की तरह फ़ैल रहा है, Erectile dysfunction (ED) बहुत तेजी से बढ़ रहा है...इसके कई कारणों में से एक मुख्य कारण Food Adulteration हैं पर इसके लिए capital punishment नहीं है, गिरफ्तारी भी नहीं ह���ती.कभी भी किसी बड़े रेस्टोरेंट पर न छापा पड़ता है और न कार्रवाई होती है क्यों ??? यह तो जंगलराज से भी गंभीर अपराध है , इसके अपराधियों का सामाजिक , आर्थिक एनकाउंटर क्यों नहीं ????
भारत में कैंसर, हृदय , गुर्दा रोग महामारी की तरह फ़ैल रहा है, Erectile dysfunction (ED) बहुत तेजी से बढ़ रहा है...इसके कई कारणों में से एक मुख्य कारण Food Adulteration हैं पर इसके लिए capital punishment नहीं है, गिरफ्तारी भी नहीं होती.कभी भी किसी बड़े रेस्टोरेंट पर न छापा पड़ता है और न कार्रवाई होती है क्यों ??? यह तो जंगलराज से भी गंभीर अपराध है , इसके अपराधियों का सामाजिक , आर्थिक एनकाउंटर क्यों न��ीं ????
1. आज श्री अशोक सिद्धार्थ द्वारा राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा अति-देर से उठाया गया यह सही क़दम है।
2. वैसे लोगों का यही कहना है कि अगर यह फैसला वे काफी पहले ही ले लेते तो बी.एस.पी., बहुजन समाज व बहुजन मूवमेन्ट तथा उनके दामाद श्री आकाश आनन्द को भी लगातार विपरीत परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ता और ना ही मुझे विधानसभा आमचुनाव एवं ख़ासकर यूपी में पाँचवीं बार सरकार बनाने की ज़बरदस्त तैयारियों के बीच, पार्टी व मूवमेन्ट के व्यापक हित के मद्देनज़र इनके बारे में कई बार कड़े फैसले लेने आदि की ज़रूरत पड़ती���
3. वैसे यह भी सर्वविदित है कि बहुजन समाज पार्टी की अम्बेडकरवादी राजनीति की परम्परा, परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के पदचिन्हों पर चलने वाली ज़बरदस्त त्याग, तपस्या, संघर्ष व कुर्बानी आदि के साथ-साथ सबसे बढ़कर निजी व पारिवारिक स्वार्थ से दूर रहने की विशिष्ठ पहचान की है, जिसे मान्यवर श्री कांशीराम जी की तरह ही मैं भी समर्पित हूँ और जिससे पार्टी के सभी लोगों को ज़रूर सबक़ सीखकर बी.एस.पी. में आगे बढ़ाने के लिये निजी व पारिवारिक स्वार्थ एवं पद आदि की लालसा से ऊपर उठना चाहिये तभी फिर यहाँ सदियों से शोषित, पीड़ित, उपेक्षित व तिरस्कृत ’बहुजन समाज’ ’शासक वर्ग’ बन पायेगा और इस क्रम में हमेशा याद रहे कि जितना महान लक्ष्य, उतनी ही बड़ी कुर्बानी की भी ज़रूरत होती है।
4. कुल मिलाकर, श्री अशोक सिद्धार्थ का राजनीति से संन्यास लेने का फैसला ’देर आये दुरुस्त आये’ की कहावत की तरह ही यह अच्छी बात है।
5. किन्तु श्री अशोक सिद्धार्थ को, अपने दामाद श्री आकाश आनन्द के उज्जवल भविष्य के साथ ही बी.एस.पी. पार्टी व इसके अम्बेडकरवादी बहुजन मूवमेन्ट के व्यापक हित के प्रति थोड़ी भी सही चिन्ता होती, (जो कि उनमें स्वाभाविक तौर पर होनी ही चाहिये), तो वे बिना देरी किये कल फ़ौरन ही राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर देते और जिससे श्री आकाश आनन्द की पार्टी व मूवम���न्ट के प्रति सक्रियता काफी हद तक सुनिश्चित हो सकती थी, किन्तु ऐसा कुछ नहीं होना यह साबित करता है कि श्री अशोक सिद्धार्थ की नीयत में खोट व अभिलाषा कम नहीं हुई है बल्कि अभी तक भी पूरी तरह से बरक़रार है।
6. इतना ही नहीं बल्कि श्री आकाश आनन्द द्वारा भी अपने कैरियर से अधिक अपने ससुर श्री अशोक सिद्धार्थ के प्रति इस हद तक लगाव क़ायम है कि उन्होंने बी.एस.पी प्रमुख के सोशल मीडिया एकाउण्ट ’एक्स’ पर तत्स��्बंधी पोस्ट को रिपोस्ट करना भी उचित नहीं समझा, हालाँकि यह पोस्ट उनके ही सकारातमक व भलाई के लिये था।
7. जबकि इससे पहले वे बी.एस.पी. प्रमुख के ’एक्स’ पर पोस्ट को रिपोस्ट करके अपनी वफादारी का सबूत देने का प्रयास करते रहे हैं। इससे भी यही लगता है कि श्री अशोक सिद्धार्थ व श्री आकाश आनन्द दोनों को पार्टी व मूवमेन्ट की सफलता में कम व अपने निजी व पारिवारिक स्वार्थ का ज़्यादा मोह है, जबकि बी.एस.पी. ने ही इन दोनों को व अन्य अनेकों लोगों को भी फर्श (ज़मीन) से अर्श (आसमान) की बुलन्दी पर पहुँचाया है और जिसके लिये उन सभी लोगों द्वारा बी.एस.पी. व उसके नेतृत्व का जितना भी वे लोग अहसान मानें व शुक्रगुज़ार हों, वह कम ही होगा, ऐसा सभी लोगों का मानना है।
8. ऐसे हालात में श्री आकाश आनन्द को पार्टी व मूवमेन्ट के वास्तविक हित तथा इससे जुड़े अपने कैरियर की भी परवाह कम तथा रिश्ते-नातों आदि का मोह ज़्यादा है तो ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि श्री आकाश आनन्द डबल माइण्ड होकर फिर बी.एस.पी. पार्टी व मूवमेन्ट का भला कैसे कर सकते हैं?
9. इसीलिये पार्टी के लोगों को यही बेहतर लगता है कि उन्हें पहले दिनांक 3 सितम्बर 2026 को जिस प्रकार से पार्टी के ��ाष्ट्रीय संयोजक के अति-महत्वपूर्ण पद की सभी अहम ज़िम्मेदारियों से मुक्त कर दिया गया था, उसी प्रकार अब उन्हें पार्टी में भी आज से पूरी तरह से फ्री (आज़ाद) कर दिया जाये। अतः श्री आकाश आनन्द पार्टी में अब स्वतंत्र रहना चाहते हैं तो वे स्वतंत्र हैं अर्थात ऐेस में अब इनको पार्टी से पूरेतौर से मुक्त कर दिया गया है।
10. अन्त में यही कहना है कि बी.एस.पी के सभी लोगों को, विरोधियों के साम, दाम, दण्ड, भेद आदि ��भी प्रकार के हथकण्डों का डट कर सामना करते हुये ख़ासकर यूपी में फिर से पूर्ण बहमत की अपनी ’सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय’ की ज़बरदस्त क़ानून-व्यवस्था व बेहतरीन विकास वाली आयरन हुकूमत बनाने के संघर्ष में, पूरे जी-जान से अर्थात पूरे तन, मन, धन की लगन से लगे रहें, बस यही लक्ष्य सर्वोपरि है।
@parvezahmadj@Satya1345 Ye prashn aapka zayaz hai..upar wala nhi...qki akhilesh, chandrashekhar, ya tamaam ias ips ko arakshan se dur kar diya jayega...to mentally ve aarakshan pane wale varg se hi dur ho jayenge....fir haq ki ladayi, Samajik daan kaun karenga Jiske pas kuch nhi h usse ummeed na kare
@JayantAmbedkar_ Aisa sirf gonda me nhi lag bhag har jile me bahan ji subah subah pahuch jati thi... officers on duty rha krte the...iron lady to unhe janne wale kahte hi hain.....magar jab waqt gujar jayega to unhe super cm super lady kaha jayega..kayi kitaabe kayi filme bnayi jayengi
“कोई एक *महेंद्र प्रधान* हैं, पता नहीं क्या करते हैं, उन्हीं का इस्तीफ़ा चाहिए”
भीम आर्मी के अनपढ़ कार्यकर्ता जंतर मंतर पर अपने चीफ़ का स्वागत करने पहुँचे हैं 😎
प्रिय बसपाई भक्तों,
आज मेरे द्वारा किए गए एक पोस्ट पर आपकी भावनाएं सिर्फ इस बात पर आहत हो गईं कि मैंने 'मायावती जी' कहने के बजाय
मायावती कह दिया।
जितना तुम लोगों ने म��रे शब्दों पर गौर किया है अगर उतना अपनी नेता पर करते तो शायद कुछ सुधार हो जाता।
शायद मेरठ वाले मुद्दे पर मायावती जी, चंद्रशेखर जी को सत्ता पक्ष की तरह न घेरतीं।
अगर तुम सबने उनसे ये सवाल किया होता जो कुछ दिनों पहले दैनिक भास्कर की स्टिंग ऑपरेशन में पता चला था (5 लाख वाला) तो शायद कुछ सुधार होता।
थोड़ा और ध्यान दिया होता तो मायावती जी से ये सवाल पूछते कि आपके प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल टिकट के लिए पैसों की बात क्यों कर रहे हैं?
अब थोड़ा और आगे बढ़ोगे तो एक सवाल ये भी बनेगा कि मायावती जी सत्ता पक्ष के लिए हमेशा सॉफ्ट कॉर्नर क्यों रखतीं हैं?
लेकिन प्रिय बसपाई भक्तों तुम्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता है, तुम अपने नेता से सवाल करना सीख लो शायद Team B से A की तरफ बढ़ जाए।
प्रिय बसपाई भक्तों,
आज मेरे द्वारा किए गए एक पोस्ट पर आपकी भावनाएं सिर्फ इस बात पर आहत हो गईं कि मैंने 'मायावती जी' कहने के बजाय
मायावती कह दिया।
जितना तुम लोगों ने मेरे शब्दों पर गौर किया है अगर उतना अपनी नेता पर करते तो शायद कुछ सुधार हो जाता।
शायद मेरठ वाले मुद्दे पर मायावती जी, चंद्रशेखर जी को सत्ता पक्ष की तरह न घेरतीं।
अगर तुम सबने उनसे ये सवाल किया होता जो कुछ दिनों पहले दैनिक भास्कर की स्टिंग ऑपरेशन में पता चला था (5 लाख वाला) तो शायद कुछ सुधार होता।
थोड़ा और ध्यान दिया होता तो मायावती जी से ये सवाल पूछते कि आपके प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल टिकट के लिए पैसों क��� बात क्यों कर रहे हैं?
अब थोड़ा और आगे बढ़ोगे तो एक सवाल ये भी बनेगा कि मायावती जी सत्ता पक्ष के लिए हमेशा सॉफ्ट कॉर्नर क्यों रखतीं हैं?
लेकिन प्रिय बसपाई भक्तों तुम्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता है, तुम अपने नेता से सवाल करना सीख लो शायद Team B से A की तरफ बढ़ जाए।
आज #विश्व_पर्यावरण_दिवस है।
हम पेड़ काटते रहे, नदियाँ मैली करते रहे, हवा को ज़हर बनाते रहे और फिर हर साल एक दिन पर्यावरण बचाने की बात करते हैं।
सच तो यह है कि प्रकृति को हमारी ज़रूरत नहीं, हमें प्रकृति की ज़रूरत है।
अगर आने वाली पीढ़ियों को स��र्फ़ किताबों में जंगल, नदियाँ और पक्षी नहीं दिखाने हैं, तो आज से ही एक छोटा कदम उठाना होगा।
एक पेड़ लगाइए, पानी बचाइए, प्लास्टिक कम कीजिए।
धरती हमारी विरासत नहीं, आने वाली पीढ़ियों से लिया गया उधार है। 🌱 #EnvironmentDay #WorldEnvironmentDay
बड़े भाई, क्या आपको नहीं पता, दिलीप चाचा पुरानी नौकरी छोड़कर नई नौकरी पा गए हैं, जो सबको आलोचना करते थे अब पिछले 8-9 महीने से ��ोदी जी को प्रमोट कर रहे हैं, जिसके लिए उन्हें पूरे 17 लाख 75 हजार रुपए मिल रहे हैं वो भी महीने के। अपनी तार्किक शक्ति से सबको प्रभावित करने वाला आदमी कुछ रुपयों के लिए अपनी लाइन छोड़ देगा ये तो नहीं सोचा था न।
आराम से बच्चे बड़े हो रहे है, मछली खा थे थे, जीवन में और क्या चाहिए? जिसके लिए जमीर बेचना पड़ जाए।
सोती हुई सरकार...
मजे में कॉर्पोरेट...
लावारिस जनता...
कहते हैं स्वस्थ लोकतंत्र वहीं होता है जहां जनता का शासन, जनता के द्वारा और जनता के लिए होता है
लेकिन दुनिया भर में लोकतंत्र के तात्पर्य अब बदल चुके हैं।
लिंकन के अमरीका से लेकर गांधी और अम्बेडकर के भारत तक सब कुछ बदल चुका है।
सरकारें अब कॉर्पोरेट के लिए चुनी जाती है और कॉर्पोरेट के द्वारा चुनी जाती हैं।
यूं तो सरकार जनता / प्रजा के लिए एक अभिभावक की तरह होती है जो अपने नागरिकों के हितों और अधिकारों को रक्षा करे, उसे न्याय दिलाए और सुनिश्चित करे कि कोई भी शक्तिशाली वर्ग उसका शोषण न कर पाए।
लेकि�� जब जनता को अपने ही अधिकारों के लिए लड़ना पड़े, जब कर्मचारी अपनी मेहनताना के उचित सम्मान को पाने के लिए आवाज उठाने से डरे। और अंततः जब शिकायतों से ज्यादा मुनाफे की चिंता दिखाई दे तो प्रश्न तो खड़ा होता ही है के व्यवस्था आखिर किसके लिए काम कर रही है???
निजी कंपनियों में काम करने वाले लाखों कर्मचारी आज ऐसी स्थिति में हैं जहाँ उनसे 12 से 14 घंटे तक काम लिया ��ाता है, लेकिन बदले में मिलने वाली तनख्वाह अक्सर 10 से 15 हजार रुपये के बीच ही सिमट जाती है। अतिरिक्त समय का कोई उचित भुगतान नहीं, आराम का कोई निश्चित अधिकार नहीं।
विडंबना यह है कि इन कर्मचारियों के लिए " घर, अब रहने की जगह नहीं, बल्कि केवल सोने की जगह बनकर रह गया है। दिन भर काम करने के बाद वे किराया, यात्रा और रोज़मर्रा के खर्चों का बोझ उठाते हुए देर रात घर पहुँचते हैं, और सुबह अधूरी नींद के साथ फिर उसी चक्र में लौट जाते हैं।
ऐसा लगता है मानो जीवन जीने के लिए नहीं, केवल काम करने के लिए बचा हो।
सवाल यह है कि यदि किसी व्यक्ति का अधिकांश समय और ऊर्जा सिर्फ जीवित रहने की जद्दोजहद में ही खर्च हो जाए, तो विकास और प्रगति के बड़े-बड़े दावों का लाभ आखिर किसे मिल रहा है???
नीतियां तो जनता के नाम बनती है मगर उनका फायदा कॉर्पोरेट जगत को ही मिलता है।
ऐसा भी नहीं है सरकार को कुछ पता ��हीं है या ये सब अंडरवर्ल्ड में हो रहा हो।
बस सरकार धन्ना सेठों की हो गई है, जहां से भारी चंदा मिलता है।
#cocroachjantaparty
#bjp_बनाम_cjp
#BJP_Exposed
#bjp_बनाम_cjp
#bsp
#congress
#indiaglobalreview
#aajtk
वैभव हर सुबह उसी ट्रेन से शहर जाता था। एक दिन स्टेशन पर उसे एक पुरानी डायरी मिली। पहले पन्ने पर लिखा था, “अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो शायद तुम्हें भी अपनी मंज़िल नहीं पता।” उत्सुक होकर वह रोज़ एक नया पन्ना पढ़ने लगा। डायरी किसी ऐसे व्यक्ति की थी जिसने असफलताओं के बावजूद सपने देखना नहीं छोड़ा था। आखिरी पन्ने पर लिखा था, “मंज़िल मिलना ज़रूरी नहीं, चलते रहना ज़रूरी है।” उस दिन ��ैभव ने महसूस किया कि वह नौकरी नहीं, अपने डर से भाग रहा था। पहली बार उसे लगा कि शायद उसका रास्ता अभी खत्म नहीं हुआ है।