एक कचौड़ी दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा के नारे लगानी वाली पहले ये नारा अपने ब!प भ!ई द!द! के सामने लगाओ
अगर तुमको उन पर भरोसा है इसका मतलब वो न!मर्द है 😂😂
JUST SAYING 😝
हमारे देश में बैंकिंग सेक्टर वालों की गजब की नौटंकी चल रही हैं।
आज Sunday को बैंक खुला है तो सोशल मीडिया पर बवाल काट रहे हैं, साथ ही 5 Day वार्किंग की मांग कर रहे हैं,
जबकि इनके आधे काम तो अब मिनी ब्रांच वाले कर रहे हैं, UPI की वजह से Cash की निकासी न के बराबर रह गई हैं,
अकाउंट तो लोग ऑनलाइन भी खोल रहे हैं।
इसलिए अब सरकार को 5 डे वर्किंग कर देना चाहिए क्योंकि दो शनिवार को बैंंक तो पहले से ही बंद रहता हैं, दो शनिवार और बंद हो जाएगा,
कम से कम कन्फ्यूजन तो दूर हो जाएगी कि चलो अब हर शनिवार बंद रहता हैं ।
नहीं तो आम आदमी इसी में परेशान रहता हैं कि कौन से शानिवार को खुला रहेगा और कौन से वाले शनिवार को बंद।
देश की आधी से ज्यादा आबादी 12 घंटे और 30 दिन काम करती हैं, तब जाकर देश में पैसा आता हैं और फिर बैंक चलता हैं।
लेकिन उस आधी आबादी के बारे में कोई भी नहीं सोच रहा हैं जो असल में देश का निर्माण कर रहे हैं।
न संडे की छुट्टी भी बड़ी मुश्किल से मिलती हैं, होली दीवाली के अलावा और कोई छुट्टी की तो वो सोच भी नहीं सकता हैं, फिर भी वो कोई शिकायत नहीं करता हैं।
भारत और अफगानिस्तान के बीच खेली गई क्रिकेट सीरीज़ ने सिर्फ खेल भावना ही नहीं, बल्कि आपसी सम्मान और मित्रता की भी मिसाल पेश की। भारत ने अफगानिस्तान को अपना घरेलू मैदान उपलब्ध कराया, उनकी ज़रूरतों के अनुसार सुविधाएँ और माहौल उपलब्ध कराया ताकि वे अपने मैच बेहतर तरीके से खेल सकें।
मैदान पर मुकाबला खत्म होने के बाद अफगानिस्तान के दर्शकों ने भी एक शानदार उदाहरण पेश किया। उन्होंने स्टैंड में फैली प्लास्टिक की बोतलें और अन्य कचरा स्वयं उठाकर साफ किया तथा स्वच्छ भारत अभियान की भावना को सम्मान दिया।
जीत-हार अपनी जगह है, लेकिन इस तरह का अनुशासन, जिम्मेदारी और मेजबान देश के प्रति सम्मान ही खेल की असली खूबसूरती है। अफगानिस्तान के दर्शकों का यह व्यवहार दिल जीत लेने वाला है और भारत-अफगानिस्तान की दोस्ती को और मजबूत करता है। 🇮🇳❤️🇦🇫
हिन्दुत्व का चूरन..
जिनको नहीं चाटना
हिन्दुत्व का चूरन...
वो न चाटें..
हमारे लिए
हिन्दुत्व कभी चूरन था ही नहीं..
न हमने इसे 2014 में खोजा
न नरेंद्र मोदी ने हमें हिन्दू बनाया..
राम मोदी से पहले थे
काशी मोदी से पहले थी
केदार, महाकाल, गीता, उपनिषद
शंकराचार्य, तुलसी, मीरा
हमारे पर्व, हमारे तीर्थ
हमारी स्मृतियां..
ये किसी राजनीतिक दल की देन नहीं हैं...
तो फिर मोदी में ऐसा क्या था
जिसके कारण मेरे जैसे व्यक्ति ने
उनकी राजनीति को अपनी
सभ्यतागत आकांक्षा के करीब पाया?
शायद इसका उत्तर
किसी एक कानून में नहीं है..
यह उस परिवर्तन में है
जिसमें हिन्दू होना
राष्ट्रीय सार्वजनिक जीवन में
धीरे धीरे क्षमा मांगने वाली पहचान नहीं रहा..
मोदी ने हिन्दुत्व नहीं बनाया..
लेकिन उनके समय में
सत्ता की भाषा बदली..
प्रधानमंत्री काशी में
हर हर महादेव बोल सकता है..
केदारनाथ में
आदि शंकराचार्य की समाधि का पुनर्निर्माण
राष्ट्रीय परियोजना का हिस्सा बन सकता है..
उज्जैन में महाकाल लोक का लोकार्पण
सिर्फ स्थानीय धार्मिक कार्यक्रम नहीं
राष्ट्रीय दृश्य बन सकता है..
और देश का प्रधानमंत्री
इन सबको आधुनिक भारत के विरोध में नहीं,
आधुनिक भारत की continuity के रूप में प्रस्तुत कर सकता है..
काशी विश्वनाथ धाम का उद्घाटन 2021 में मोदी ने किया
केदारनाथ में आदि शंकराचार्य समाधि और व्यापक पुनर्विकास परियोजनाएं उनके कार्यकाल में आगे बढ़ीं
और 2022 में उन्होंने महाकाल लोक के पहले चरण को राष्ट्र को समर्पित किया..
मेरे लिए यही परिवर्तन छोटा नहीं है..
क्योंकि राष्ट्र केवल GDP से नहीं बनता
राष्ट्र स्मृति से भी बनता है..
और फिर अयोध्या है..
रामलला की प्राण प्रतिष्ठा में
प्रधानमंत्री स्वयं उपस्थित रहे..
मेरे लिए उसका अर्थ
सिर्फ एक मंदिर का बन जाना नहीं था।
वह इस बात का संकेत था
कि सदियों पुरानी सभ्यतागत स्मृति
अब सार्वजनिक जीवन में
संकोच से नहीं बोली जाएगी..
फिर Citizenship Amendment Act को देखता हूं..
उससे हर समस्या हल नहीं होती..
उस पर राजनीतिक और संवैधानिक बहस भी हुई..
लेकिन पहली बार भारतीय कानून में
Pakistan, Bangladesh और Afghanistan से आए
हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई
उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों के लिए
नागरिकता का विशेष रास्ता बनाया गया..
उसमें हिन्दू अकेले नहीं थे
लेकिन पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों में
धार्मिक अल्पसंख्यक हिन्दुओं की दशकों पुरानी समस्या को
भारतीय राज्य ने केवल humanitarian footnote मानकर छोड़ भी नहीं दिया..
इसलिए मेरे समर्थन का आधार
सिर्फ कोई नारा नहीं है..
मैं एक pattern देखता हूं..
अयोध्या
काशी
केदारनाथ
महाकाल
सभ्यतागत प्रतीकों को
राष्ट्रीय भाषा में पुनः प्रतिष्ठित करना..
उस भारतीयता को यह कहना
कि आधुनिक होने के लिए
अपनी प्राचीनता से शर्मिंदा होना जरूरी नहीं है..
कि satellite भी हमारा हो सकता है
और शंकराचार्य भी
semiconductor भी
और संस्कृत भी
AI भी
और अध्यात्म भी
expressway भी
और तीर्थ भी
मेरे लिए यही आधुनिक हिन्दू आत्मविश्वास है
मैं यह दावा नहीं करता
कि सब कुछ हो गया..
बहुत कुछ किया जाना बाकी है..
SC/ST Act हो,
UGC हो,
आरक्षण हो,
जहां लगे
कि सरकार का संतुलन गलत है,
तो बेशक सवाल करो..
एक निर्णय से नाराज़ होकर
मैं उस पूरी यात्रा को
चूरन नहीं कह सकता
जिसमें मेरी सभ्यता
राजनीतिक हाशिये से निकलकर
फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में दिखाई दी..
इसीलिए
जिनको नहीं चाटना
हिन्दुत्व का चूरन..
वो न चाटें..
मेरे लिए यह
किसी चुनाव की दवा नहीं है..
यह स्मृति है।
यह continuity है..
यह उस सभ्यता का आत्मबोध है
जो हजारों वर्षों से
अपने आपको बदलती भी आई है
और बचाती भी आई है..
और मोदी का मेरे लिए महत्व
इसलिए नहीं है
कि उन्होंने मुझे हिन्दू बनाया..
बल्कि इसलिए है
कि मेरे जीवनकाल में
उन्होंने भारत की सर्वोच्च राजनीतिक सत्ता को
अपनी हिन्दू सभ्यतागत स्मृति के साथ
सार्वजनिक रूप से सहज होने में
एक बड़ी भूमिका निभाई...
सरकार का हिसाब पांच साल का हो सकता है..
सभ्यता का हिसाब सदियों का होता है..
* रोड रेज से बचिए।
* सड़क पर अजनबियों को Civic Sense सिखाने की कोशिश मत कीजिए।
* जहाँ संभव हो, भीड़भाड़ से बचिए।
* सार्वजनिक जगह पर राजनीति की बहस से दूर रहिए।
* गलती हो जाए तो हाथ जोड़कर “सॉरी” बोलिए और आगे बढ़ जाइए।
लोग बेहद बेचैन, चिड़चिड़े और हिंसक होते जा रहे हैं।
रील्स, स्मार्टफोन, व्हाट्सऐप स्टेटस, फेसबुक, OTT हर वक्त मिलने वाला मनोरंजन और सस्ता डोपामिन भारतीयों का मानसिक संतुलन बिगाड़ रहा है।
न ढंग के पब्लिक पार्क,
न साफ़ नदियाँ, न झीलें,
न सुकून की कोई जगह।
नतीजा ? पूरा भारत फोन में घुसा हुआ है।
यह दिमाग़ और ज़िंदगी की महामारी है...शायद उससे भी ख़तरनाक।
ये पांच बातेँ आज के समय का सबसे प्रैक्टिकल survival guide है।
हम सबको लग रहा है कि हम लोगों को सुधार रहे हैं, पर सच में हम सिर्फ अपना खून जला रहे हैं।
रोड पर किसी को रोक कर Civic Sense सिखाओगे तो वो सुनेगा नहीं, हमारे साथ झगड़ा ही बढ़ेगा।
भीड़ में, चौक-चौराहे पर,
चाय की दुकान पर राजनीति की बहस में जीतता कोई नहीं है, सिर्फ आपसी दुश्मनी बनती है।
"सॉरी" बोलने में हमारी इज्जत कम नहीं होती, बल्कि जान बच जाती है।
और आखिरी बात वो सबसे गहरी है -
पहले आदमी थक कर घर आता था तो बैठकों में बैठते थे , पार्कों में जाता थे, नदी किनारे बैठते थे, लोगों से मिलते थे। अब थक कर फोन में घुस जाते है।
जोहड़ नहीं बचे, पार्क नहीं बचे, नदियाँ नालियाँ बन गईं, खेल के मैदानों पर कब्जे हो गए और हाथ में 24 घंटे सस्ता डोपामिन वाला फोन है। दिमाग को कभी शांत होने का मौका ही नहीं मिल रहा । इसीलिए हम सब चिड़चिड़े हैं।
अनुभवी व्यक्ति जब ये बात समझता है तो ये भी समझता है कि इस माहौल में शांत रहना ही सबसे बड़ी जीत है।
आज के भारत में भीड़ से बचना, कम बोलना, अपना काम करना और शाम को परिवार के साथ समय बिताना- यही असली लग्जरी है l
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पुतिन कुछ अलग ही साँचे और माटी के बने हुए हैं. उनको सुनना उनके खुलने जैसा है. आज पुतिन ने दिल्ली से यूरोप के लोगों को अपना मैसेज भेजा. नीचे उनके कहे का अनुवाद है.
रूस कभी आपका दुश्मन नहीं रहा और न कभी होगा!
हमें यूरोप के कच्चे माल या उसकी संपदा की कोई आवश्यकता नहीं है; हमारे पास अपना पर्याप्त संसाधन है. हमें आपके कच्चे माल की बिल्कुल जरूरत नहीं है. रूस प्राकृतिक संसाधनों के मामले में दुनिया का सबसे समृद्ध देश है.
हमें न आपकी जमीन चाहिए और न आपका क्षेत्र.
नक्शे पर रूस की विशालता देखिए. रूस पूरे यूरोप से लगभग दोगुना बड़ा है. आपकी जमीन हमारे किस काम आएगी? हम उसका क्या करेंगे?
आप क्यों सोचते हैं कि रूस यूरोप का दुश्मन है?
रूस ने आपके साथ ऐसा क्या किया है जिससे आपको नुकसान पहुँचा हो?
क्या हमने आपको आपके ‘दोस्तों’ द्वारा वसूली गई कीमतों से कम कीमत पर गैस और कच्चा माल बेचा? हाँ।
क्या द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाज़ियों से छुटकारा दिलाने के लिए रूस ने 2 करोड़ लोगों की जान गंवाई? हाँ.
क्या कोविड-19 महामारी के दौरान रूस यूरोप की मदद करने वाले शुरुआती देशों में था? हाँ.
क्या हमने यूरोप में आग और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान मदद की? हाँ.
आखिर रूस ने ऐसा क्या किया है कि वे उससे इतनी नफरत करते हैं?
रूस आपका दुश्मन नहीं है; आपके असली दुश्मन आपके नेता हैं, जो आप पर शासन करते हैं.
— राष्ट्रपति व्लादिमीर व्लादिमीरोविच पुतिन
@Ashokkrsagar Thank you, TI/Rohini circle, @TIROHINI Mob. No.8750871469 has been informed, who will look into the matter. You may also contact ACP-T/Rohini District at Mob. No. 8750871408. @DCP_T_NR
हनुमान अंश’ ने सिनेमाघरों को मंदिर जैसा बना दिया। ❤️🚩
गोरखपुर के INOX City Mall में फिल्म देखने आए रामभक्तों को लड्डू, पानी और सुंदरकांड की प्रति प्रसाद स्वरूप दी जा रही है।
यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि संस्कार, मर्यादा और अच्छे कर्मों की सीख है। ऐसे समय में जब अश्लीलता परोसी जा रही है, ‘हनुमान अंश’ परिवार और बच्चों के साथ देखने लायक एक सकारात्मक प्रयास है।
पूरा परिवार लेकर जाइए और श्री हनुमान जी का आशीर्वाद लीजिए।
जिस आवाज़ ने कभी ट्रेनों में परिवार का पेट पाला, आज वही आवाज़ देश दुनिया के दिलों तक पहुंच रही है।
सुनील लोधी जन्म से ही दृष्टिबाधित है उन्होंने तमूरा की धुन और भक्ति के सुरों से अपनी अलग पहचान बनाई। फ़िल्म हनुमान अंश में उनकी आवाज़ ने उन्हें नई ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया।
ये सिर्फ एक गायक की सफलता नहीं, उस हौसले की जीत है जिसने परिस्थितियों के आगे कभी हार नहीं मानी।
सुनील भाई को दिल से सलाम।
कभी कभी रुक जाना भी संतोष होता है ...
“कौन बनेगा करोड़पति” के एक हालिया एपिसोड में नीरज सक्सेना ने “फास्टेस्ट फिंगर फर्स्ट” राउंड में सबसे तेज़ उत्तर देकर हॉट सीट पर जगह बनाई। वे बेहद शांत भाव से बैठे। न कोई शोर, न नाचना, न रोना, न हाथ उठाना और न ही अमिताभ बच्चन से गले मिलना।
नीरज एक वैज्ञानिक, पीएच.डी. धारक और कोलकाता की एक यूनिवर्सिटी के कुलपति हैं। उनका व्यक्तित्व बेहद सरल और सौम्य है। वे स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं कि उन्हें डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के साथ काम करने का अवसर मिला। उन्होंने बताया कि शुरुआत में वे केवल अपने बारे में सोचते थे, लेकिन कलाम जी के प्रभाव से उन्होंने दूसरों और राष्ट्र के बारे में भी सोचना शुरू किया।
नीरज ने खेल शुरू किया। उन्होंने एक बार ऑडियंस पोल लाइफलाइन का इस्तेमाल किया, लेकिन उनके पास “डबल डिप” लाइफलाइन होने के कारण उन्हें दोबारा मौका मिला। उन्होंने सभी प्रश्नों के उत्तर बड़ी सहजता से दिए और उनकी बुद्धिमत्ता देखकर हर कोई प्रभावित हुआ। उन्होंने ₹3,20,000 जीते और इतनी ही बोनस राशि भी मिली। इसके बाद कार्यक्रम में ब्रेक हुआ।
ब्रेक के बाद अमिताभ बच्चन ने कहा, “आइए डॉ. साहब, आगे बढ़ते हैं। ये रहा ग्यारहवाँ सवाल...” तभी नीरज ने शांत स्वर में कहा, “सर, मैं खेल छोड़ना चाहता हूँ।”
अमिताभ बच्चन भी हैरान रह गए। जो व्यक्ति इतनी अच्छी तरह खेल रहा था, जिसके पास अभी भी तीन लाइफलाइन बची थीं और जिसके पास एक करोड़ रुपये जीतने का अच्छा मौका था, वह अचानक खेल छोड़ रहा था!
अमिताभ जी ने पूछा, “ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ...”
नीरज ने बेहद सहजता से जवाब दिया, “सर, दूसरे लोग भी इंतजार कर रहे हैं और वे मुझसे छोटे हैं। उन्हें भी मौका मिलना चाहिए। मैं पहले ही काफी पैसा जीत चुका हूँ। मुझे लगता है कि मेरे पास जितना है, वह मेरे लिए पर्याप्त है। मुझे इससे अधिक की इच्छा नहीं है।”
अमिताभ बच्चन कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध रह गए। पूरे माहौल में खामोशी छा गई। फिर सभी लोग खड़े होकर काफी देर तक उनके सम्मान में तालियाँ बजाते रहे।
अमिताभ बच्चन ने कहा, “आज हमने बहुत कुछ सीखा है। ऐसे व्यक्ति बहुत कम देखने को मिलते हैं।”
सच कहूँ तो मैंने पहली बार किसी ऐसे व्यक्ति को देखा, जिसके सामने करोड़पति बनने का अवसर था, फिर भी उसने दूसरों को मौका देने और अपने पास मौजूद चीजों को पर्याप्त मानने का निर्णय लिया। मैंने मन ही मन उन्हें नमन किया।
आज के समय में अधिकांश लोग केवल पैसा कमाने की दौड़ में लगे हुए हैं। कितना भी कमा लें, संतुष्टि नहीं मिलती और लालच खत्म नहीं होता। पैसे की इस दौड़ में लोग परिवार, नींद, खुशी, प्रेम और मित्रता तक खोते जा रहे हैं।
ऐसे समय में डॉ. नीरज सक्सेना जैसे लोग हमें याद दिलाते हैं कि जीवन केवल अधिक पाने का नाम नहीं है, बल्कि जो मिला है उसमें संतुष्ट होकर दूसरों के लिए जगह बनाने का नाम भी है।
खेल छोड़ने के बाद एक लड़की हॉट सीट पर आई और उसने अपनी कहानी बताई। उसने कहा, “मेरे पिता ने सिर्फ इसलिए हम तीनों बेटियों और हमारी माँ को घर से निकाल दिया, क्योंकि हम बेटियाँ थीं। अब हम एक अनाथालय में रहते हैं...”
तब मेरे मन में विचार आया कि अगर नीरज ने खेल नहीं छोड़ा होता, तो शायद उस दिन किसी और को हॉट सीट पर बैठने का अवसर नहीं मिलता। उनके इस त्याग के कारण उस बच्ची को आगे बढ़ने और कुछ धन जीतने का अवसर मिला।
आज के दौर में लोग अपनी विरासत में से एक पैसा भी छोड़ने को तैयार नहीं होते। संपत्ति के लिए झगड़े होते हैं, रिश्ते टूटते हैं और कभी-कभी तो हत्या तक हो जाती है। स्वार्थ चारों ओर दिखाई देता है। ऐसे माहौल में नीरज सक्सेना जैसा उदाहरण सचमुच दुर्लभ है।
ईश्वर ऐसे ही इंसानों में बसता है, जो केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों और राष्ट्र के लिए भी सोचते हैं।
मैं इस महान व्यक्तित्व को कभी नहीं भूलूँगा। आज ऐसे अनोखे इंसान के बारे में लिखने का अवसर मिला, यह मेरे लिए भी खुशी की बात है।
सीख यही है—जब आपकी जरूरतें पूरी हो जाएँ, तो वहीं रुक जाना सीखिए और किसी दूसरे को आगे बढ़ने का अवसर दीजिए। स्वार्थ छोड़िए, संतोष अपनाइए और दूसरों की खुशी में अपनी खुशी खोजिए।
यही वह सीख है, जिसकी आज हमारे समाज को सबसे अधिक आवश्यकता है।
एक सच्चा अणुव्रती - बहुत ही प्रेरणादायक आलेख,
💫✨जो है वही पर्याप्त है। 👍🌹
तीन सप्ताह पहले, नीब करोली बाबा पर आधारित "हनुमान अंश" नामक फिल्म 400 सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी।
फिल्म ने पहले हफ्ते में 80 लाख रुपये कमाए!!
दूसरे सप्ताह में, स्क्रीन की संख्या घटाकर 200 कर दी गई और कलेक्शन 2 करोड़ से कम रहा!!
सबने इसे फ्लॉप घोषित कर दिया!!
तीसरे सप्ताह में गाना "मैंने तो तेरे ही भरोसे हनुमान सागर में नैया डार दयी" वायरल हो गया और फिल्म का कलेक्शन 8 करोड़ तक पहुंच गया और ब्लॉकबस्टर बन गयी!!
वायरल गाना एक बुन्देलखंडी लड़के सुनील लोधी ने गाया है ।
जानते है, सुनील नेत्रहीन है, देख नहीं सकता!!
@JaikyYadav16 मायावती जी ने अपने शासनकाल में साबित किया है कि वह एक कुशल शासक एवं प्रशासक है।
उनका कार्यकाल ऐतिहासिक रहा है।
बहन जी ने कोई खास स्ट्रेटजी नहीं अपनाईं , उन्होंने संविधान को विधि सम्मत पूर्ण रूप से लागू करने की कोशिश की थी।
और देखिए कैसे इतिहास रच दिया।
@JaikyYadav16 मायावती देश की सबसे बेहतरीन नेता है, जब मायावती की सरकार हुआ करता था तब कोई अपराधी अपराध करने से डरता था, और विकास के नये नये रास्ते खुल गये, और अधिकारि दफ्तर पर जल्दी पहुच जाते थे