जौहर यूनिवर्सिटी बचाने के लिए आगे आया
अधिवक्ता समाज, कहा
"
"यूनिवर्सिटी बनाने में ज़िंदगी गुज़र जाती है और
आप इसे तोड़ रहे हैं हम चाहते हैं आप और यूनिवर्सिटी बनाएं हमें खुशी होगी इसे न तोड़े "
आज रामपुर में मौलाना मोहम्मदी अली जौहर यूनिवर्सिटी बचाने के लिए वकीलों ने
राष्ट्रपति और मुख्यन्यायधीश महोदय को ज्ञापन दिया है।
लेकिन जिस समाज का वोट लेकर कुर्सी को
अपनी जागीर समझी वो नहीं पहुंच पा रहे हैं
अफ़सोस है।
#StandWithUniversity
जम्मू कश्मीर के कटरा में श्री माता वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज था। कॉलेज के MBBS के पहले बैच में 50 छात्रों में से 44 मुस्लिम थे। शिक्षा के दुश्मनों को यह बर्दाश्त नहीं हुआ! मुस्लिम छात्रों के एडमिशन के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन हुआ जिसका परिणाम यह हुआ कि मेडिकल कॉलेज की मान्यता ही रद्द कर दी गई।
इस घटना के खिलाफ संसद में आवाज़ उठी! कुछ सांसदों ने तर्क एवं तथ्यों के साथ बेहतरीन भाषण दिया। लेकिन नतीजा! क्या मेडिकल कॉलेज की मान्यता बहाल हुई? नहीं! मुस्लिम छात्रों के एडमिशन के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन करने वालो के खिलाफ कोई एक्शन हुआ? नहीं! अब सवाल यह है कि संसद में सांसदों द्वारा दिए गए भाषण का फायदा क्या हुआ? सिर्फ संसद की कार्यवाही के रिकॉर्ड में अपनी बात दर्ज कराने के अलावा कोई एक फायदा हो तो बताएं?
अब सवाल यह है कि रास्ता क्या है? जब संसद में मांग पूरी ना हो तो सड़क ही रास्ता है! लेकिन सड़क पर उतर कौन रहा है? कौन उतरने के लिए तैयार है? समाजवादी विचारक डॉ. राम मनोहर लोहिया का कथन है कि "अगर सड़कें सूनी हो जाएं, तो संसद आवारा हो जाती है।" सवाल यह है कि लोहिया का यह कथन क्या सिर्फ भाषणों में तालियां बजवाने के लिए ही है?
सोंच कर ज़रूर देखिए
आज़म खान साहब की जगह अगर शिवपाल यादव होते, तो क्या तब भी अखिलेश यादव का रवैया इतना ही ढीला रहता?
आज़म खान साहब की जगह अगर रामगोपाल यादव होते, तो क्या तब भी यही खामोशी रहती?
आज़म खान साहब की जगह अगर धर्मेंद्र यादव होते, तो क्या तब भी ज़मीनी स्तर पर कोई आंदोलन नज़र नहीं आता?
111 विधायक और 37 सांसद होने के बावजूद आज़म खान साहब के समर्थन में ज़मीन पर कोई बड़ा संघर्ष दिखाई नहीं देता।
और जब ओवैसी कुछ बोलते हैं, तो उन्हें "बीजेपी की B-Team" कह दिया जाता है।
याद रखिए, अगर आज़म खान साहब या जौहर यूनिवर्सिटी के साथ कुछ भी होता है, तो मुस्लिम समाज इसे इतनी आसानी से नहीं भूलेगा।
जब 80% से 95% तक मुस्लिम वोट समाजवादी पार्टी को मिला है, तो सवाल भी उसी से पूछा जाएगा।
#मौलाना_मोहम्मद_अली_जौहर
विश्व विद्धालय पर सिर्फ इसलिए कार्यवाही हो रही है
क्युकी उसके साथ
#आज़म_खान का नाम जुड़ा है
सरकार अगर चाहे तो
" कंपाउंडिंग " जमा करवा कर नक्शा पास किया जा सकता है
गिराने से बेहतर है सरकार उस university को अपने आधीन लेकर संचालित कर सकती है
वरना नक्शा तो उत्तर प्रदेश मे हज़ारों
multy story इमारतों का भी नही पास है
जंतर-मंतर से समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव का संदेश
"यह सिर्फ़ छात्रों की लड़ाई नहीं, बल्कि देश के भविष्य की लड़ाई है जब शिक्षा व्यवस्था की लापरवाही पर युवा सड़क पर हों, तब चुप रहना विकल्प नहीं हो सकता।
20 जुलाई को होने वाले विशाल मार्च में हर नागरिक को अपनी भागीदारी निभानी चाहिए आज अगर हम नहीं बोले, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे सवाल करेंगी।"
अगर 111 विधायक और 37 सांसद होने के बावजूद भी जौहर यूनिवर्सिटी को नहीं बचाया जा सकता, तो फिर जनता यह सवाल पूछने का पूरा हक़ रखती है कि इतने बड़े जनादेश का इस्तेमाल आखिर किस काम के लिए हो रहा है?
सिर्फ़ ट्वीट, प्रेस कॉन्फ्रेंस और बयानबाज़ी से विपक्ष की भूमिका पूरी नहीं होती। जब ज़मीन पर लड़ने का समय आता है, तब जनता अपने प्रतिनिधियों की मौजूदगी और संघर्ष देखना चाहती है। RT रुकने नहीं चहिये 😑
आज़म खान का पुराना बयान फिर वायरल, यूनिवर्सिटी पर कार्रवाई की चर्चाओं के बीच बढ़ी चर्चा
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आज़म खान का एक पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर फिर से वायरल हो रहा है। वीडियो में वह कहते हैं, "ज़माना तुम्हें अनपढ़ और जाहिल देखना चाहता है, हिंदुस्तान के मुस्तकबिल का हिस्सेदार नहीं बनाना चाहता।" यह वीडियो ऐसे समय चर्चा में आया है, जब उनकी यूनिवर्सिटी को लेकर प्रशासनिक कार्रवाई की खबरों पर बहस चल रही है।
तो क्या अब ये तय है कि आज़म खान की यूनिवर्सिटी पर बुलडोज़र चलेगा?
रामपुर प्रशासन ने यूनिवर्सिटी प्रबंधन को 15 दिन का समय दिया है। कहा गया है कि जिन इमारतों को नियमों के विरुद्ध बताया गया है, उन्हें स्वयं हटाया जाए, अन्यथा प्रशासन कार्रवाई करेगा।
ये कोई छोटी इमारत नहीं, बल्कि एक पूरा शैक्षणिक परिसर है। दर्जनों इमारतों में क्लासरूम, लैब और अलग-अलग विभाग हैं। आरोप है कि 40 में से 38 भवन बिना स्वीकृत नक्शे के बनाए गए।
एक समय यहाँ इंजीनियरिंग, बी.फार्मा, बीएससी, बीए समेत 25 से अधिक पाठ्यक्रमों की पढ़ाई होती थी। सरकार बदली, पढ़ाई ठप पड़ गई और अब पूरा संस्थान अस्तित्व के संकट में है।
अगर निर्माण में नियमों का उल्लंघन हुआ था, तो कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन सवाल ये भी है कि क्या एक शिक्षण संस्थान को बचाने का कोई रास्ता नहीं निकाला जा सकता था?
सरकार चाहती तो इसे अपने अधीन लेकर नया नाम दे सकती थी, कमियों को दूर कर सकती थी और हज़ारों छात्रों की पढ़ाई जारी रख सकती थी। इमारतें गिराने से ज़्यादा ज़रूरी शिक्षा बचाना नहीं था?
जब प्राथमिकता शिक्षा से ज़्यादा राजनीतिक टकराव बन जाए, तब सबसे बड़ा नुकसान छात्रों और समाज का होता है।
@MR_COOL77777 इस सरकार को स्कूल और यूनिवर्सिटी बंद करनी है सिर्फ व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी ही चालू रहेगी।
अगर लोग पड़ लेंगे तो बीजेपी को वोट कैसे मिलेंगे ।