रोशनी की राहों में, अपनी चाँदनी छोड़,
बेहद मैं, अपनी गलतियों की सजा पाता हूँ।
इंसानियत की खोज, हर रोज़ नयी राहों में,
खता का पुतला हूँ, मैं यहाँ सफर करता हूँ।
सीखना है मुझे, हर गलती से,
क्योंकि इंसान हूँ, खता का पुतला हूँ। 3/3
इंसान हूँ, खता का पुतला हूँ,
आँसुओं के रंग, दर्द में बहाता हूँ।
फूलों की तरह मुस्कानें खिलाता हूँ,
पर अपनी खता से हर बार सजाता हूँ।
रातों की तन्हाई, दिल में छुपा दर्द,
बातें अनकही, मैं खुद से सुनाता हूँ। 1/3
जीवन के सफर में, हर कदम पर,
खता का सिलसिला, मैं यहाँ बनाता हूँ।
ख्वाबों की दुनिया, रात के चादर में,
इंसानियत के बहाने, सपनों में आता हूँ।
हकीकत और ख्वाब, दोनों की मिलती-जुलती,
इंसान हूँ, खता का पुतला हूँ, सब कुछ सहता हूँ। 2/3