मदिरालय जाने को घर से
चलता है पीनेवाला,
'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस
में है वह भोलाभाला,
अलग अलग पथ बतलाते सब
पर मैं यह बतलाता हूँ -
'राह पकड़ तू एक चला चल,
पा जाएगा मधुशाला..!!
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क्रोध अत्यंत कठोर होता है। वह देखना चाहता है कि मेरा एक-एक वाक्य निशाने पर बैठा है या नहीं। वह मौन को सहन नहीं कर सकता। ऐसा कोई घातक शस्त्र नहीं है जो उसकी शस्त्रशाला में न हो, पर मौन वह मन्त्र है जिसके आगे उसकी सारी शक्ति विफल हो जाती है।
- मुंशी प्रेमचंद