जजसाहब अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल करते हुए,ये कैसे तय करलिए की इस परFIRकरो इस पर निरस्त करो,बिना कोई जांच करे।ऐसा ही चलता रहा तो आगे इससे भी बुरे हालात बनेंगे और कोर्ट कचहरी पर से भी लोगों का विश्वास घट जाएगा,माननीय अपनी गरिमा को खुद ही गिरा रहे है,क्या नजीर पेश करना चाहते है?
आज जो हुआ उसमें पहला केस था कि CJP के आंदोलन के दौरान जो पत्थरबाज़ी हुई, हिंसा हुई, जो भी घटनाएँ हुईं, उन पर जितनी FIR हैं, न केवल दिल्ली में भारत सरकार के अंतर्गत, बल्कि भाजपा शासित प्रदेशों में जहाँ-जहाँ भी FIR हुई है, वो सारी FIR सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दीं। इसकी लिस्टिंग आज के लिए की गई थी।
और दूसरा केस था कि CJP 5 सितंबर को इंडिया गेट से प्रोटेस्ट मार्च निकालने वाली थी। पुलिस ने उसे रोक लिया था। सरकार के विरोध में यह कहा गया कि हमें शंका है कि कुछ हो सकता है। अरे, सरकार का काम क्या है? तुम्हारा काम है लॉ एंड ऑर्डर मेंटेन करना। प्रोटेस्ट करने वाले तो प्रोटेस्ट करेंगे।
हालाँकि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उन 40 दिनों में जो कुछ घटित हुआ, उसका उदाहरण दिया गया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि, नहीं-नहीं, हमें लगता है कि यह पीसफुल ही होगा, चिंता मत करिए। हम अलाउ करेंगे, हम इंटरवीन नहीं करेंगे।
सरकार पैनिक में थी। और उसके बाद आज सुप्रीम कोर्ट ने FIR निरस्त कर दी। पर वहाँ यह भी बोला गया कि जो 2800 कुछ लोग आपराधिक छवि के हैं, जिनके खिलाफ कोई पास्ट रिकॉर्ड है या जो भी एविडेंस है, उन सब पर फ्रेश FIR होगी। ठीक?
और सरकार, यह बात मानते हुए, वापस हो गई।
अब आपका प्रश्न होगा कि यह तो अच्छी बात है न? भाई, आपराधिक छवि के लोग हैं, तो उन पर कार्रवाई होनी चाहिए। नहीं, अच्छी बात नहीं है।
यदि किसी स्टूडेंट ने भी प्रोटेस्ट किया और चूँकि उसके पीछे कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, तो आप उसे कैसे माफ करोगे?
फिर सरकार पिछले कुछ दिनों में, जब दंगे चल रहे थे और पूरा माहौल गर्म था, उस वक्त पुलिस के लोगों को बुलाकर प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों करवा रही थी? क्या दिखाना था? उस वक्त तो ये तीन-चार लोग आपके दुश्मन थे। अभी अचानक से, how can you ask the court to quash the FIRs?
और कोर्ट ने क्या-क्या देखा? जो एफआईआर दर्ज की गई हैं, उनका ग्राउंड क्या है? कोई जांच हुई है इन FIR की?
मतलब आप सोचिए कि सरकार किस तरह की पावर्स का प्रयोग कर रही है यहाँ पर। आप दंगा कर दो, छुरा मार दो किसी को, हत्या कर दो किसी की, it doesn’t matter, सरकार आकर FIR खारिज करवाने की सिफारिश कर सकती है क्योंकि वह कहेगी कि, “ये तो हमारा वोटर है।”
ये सरकार exactly यही कर रही है। अपने राजनीतिक हितों के कारण ये न्यायालय जैसी संस्था से रिक्वेस्ट कर रही है कि आप FIR खारिज कर दीजिए।
जबकि न्यायालय भी, जहाँ तक मेरी जानकारी है, बिना चार्जशीट या बिना किसी प्रामाणिक जांच के संबंधित मामले को खारिज नहीं कर सकता।
इसमें जो वकील लोग हैं, वो थोड़ा जाकर इसके बारे में देखें। कोई रिव्यू पिटीशन या उस तरह की कोई चीज़ डालें। भाई, ये कैसे होता है? अखिलेश का शासन आएगा और आज़म खान के सारे अपराध वापस ले लिए जाएँगे? उसका एक पूरा प्रोसेस होता है। आपको कोर्ट को बताना पड़ता है कि ग्राउंड्स क्या हैं।
अगर कोई एक्ट कमिट हुआ है, अगर FIR लिखी गई है, तो उसे निरस्त करने के लिए आपके पास उचित तर्क होने चाहिए, कारण होने चाहिए।
तो गवर्नमेंट के पास ऐसा क्या तर्क होगा? भाजपा अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए FIR निरस्त करवा रही है।
आप देखते जाइए कि ये लोग आगे क्या-क्या करते हैं।
आज जो हुआ उसमें पहला केस था कि CJP के आंदोलन के दौरान जो पत्थरबाज़ी हुई, हिंसा हुई, जो भी घटनाएँ हुईं, उन पर जितनी FIR हैं, न केवल दिल्ली में भारत सरकार के अंतर्गत, बल्कि भाजपा शासित प्रदेशों में जहाँ-जहाँ भी FIR हुई है, वो सारी FIR सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दीं। इसकी लिस्टिंग आज के लिए की गई थी।
और दूसरा केस था कि CJP 5 सितंबर को इंडिया गेट से प्रोटेस्ट मार्च निकालने वाली थी। पुलिस ने उसे रोक लिया था। सरकार के विरोध में यह कहा गया कि हमें शंका है कि कुछ हो सकता है। अरे, सरकार का काम क्या है? तुम्हारा काम है लॉ एंड ऑर्डर मेंटेन करना। प्रोटेस्ट करने वाले तो प्रोटेस्ट करेंगे।
हालाँकि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उन 40 दिनों में जो कुछ घटित हुआ, उसका उदाहरण दिया गया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि, नहीं-नहीं, हमें लगता है कि यह पीसफुल ही होगा, चिंता मत करिए। हम अलाउ करेंगे, हम इंटरवीन नहीं करेंगे।
सरकार पैनिक में थी। और उसके बाद आज सुप्रीम कोर्ट ने FIR निरस्त कर दी। पर वहाँ यह भी बोला गया कि जो 2800 कुछ लोग आपराधिक छवि के हैं, जिनके खिलाफ कोई पास्ट रिकॉर्ड है या जो भी एविडेंस है, उन सब पर फ्रेश FIR होगी। ठीक?
और सरकार, यह बात मानते हुए, वापस हो गई।
अब आपका प्रश्न होगा कि यह तो अच्छी बात है न? भाई, आपराधिक छवि के लोग हैं, तो उन पर कार्रवाई होनी चाहिए। नहीं, अच्छी बात नहीं है।
यदि किसी स्टूडेंट ने भी प्रोटेस्ट किया और चूँकि उसके पीछे कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, तो आप उसे कैसे माफ करोगे?
फिर सरकार पिछले कुछ दिनों में, जब दंगे चल रहे थे और पूरा माहौल गर्म था, उस वक्त पुलिस के लोगों को बुलाकर प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों करवा रही थी? क्या दिखाना था? उस वक्त तो ये तीन-चार लोग आपके दुश्मन थे। अभी अचानक से, how can you ask the court to quash the FIRs?
और कोर्ट ने क्या-क्या देखा? जो एफआईआर दर्ज की गई हैं, उनका ग्राउंड क्या है? कोई जांच हुई है इन FIR की?
मतलब आप सोचिए कि सरकार किस तरह की पावर्स का प्रयोग कर रही है यहाँ पर। आप दंगा कर दो, छुरा मार दो किसी को, हत्या कर दो किसी की, it doesn’t matter, सरकार आकर FIR खारिज करवाने की सिफारिश कर सकती है क्योंकि वह कहेगी कि, “ये तो हमारा वोटर है।”
ये सरकार exactly यही कर रही है। अपने राजनीतिक हितों के कारण ये न्यायालय जैसी संस्था से रिक्वेस्ट कर रही है कि आप FIR खारिज कर दीजिए।
जबकि न्यायालय भी, जहाँ तक मेरी जानकारी है, बिना चार्जशीट या बिना किसी प्रामाणिक जांच के संबंधित मामले को खारिज नहीं कर सकता।
इसमें जो वकील लोग हैं, वो थोड़ा जाकर इसके बारे में देखें। कोई रिव्यू पिटीशन या उस तरह की कोई चीज़ डालें। भाई, ये कैसे होता है? अखिलेश का शासन आएगा और आज़म खान के सारे अपराध वापस ले लिए जाएँगे? उसका एक पूरा प्रोसेस होता है। आपको कोर्ट को बताना पड़ता है कि ग्राउंड्स क्या हैं।
अगर कोई एक्ट कमिट हुआ है, अगर FIR लिखी गई है, तो उसे निरस्त करने के लिए आपके पास उचित तर्क होने चाहिए, कारण होने चाहिए।
तो गवर्नमेंट के पास ऐसा क्या तर्क होगा? भाजपा अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए FIR निरस्त करवा रही है।
आप देखते जाइए कि ये लोग आगे क्या-क्या करते हैं।
जौहर एक तरह की शहादत थी. उसके लिये जिगरा चाहिए. उन महिलाओं ने हमें सिखाया कि दुश्मन की गुलाम या दासी बनकर हर रोज मरने से बेहतर है खुद से मौत चुने. गर्व को अपने आप में भरकर.
वो हमारे लिये हमेशा अमर रहेंगी…
उनके साहस, समर्पण और बलिदान को हमेशा याद किया जाएगा 🙏🏻🙏🏻
#जौहर
आरक्षण और UGC मुद्दे पर संत समाज से आंदोलन में शामिल होने की अपील
नई दिल्ली: परशुराम दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष गंगाधर शर्मा ने एक सवर्ण बैठक के दौरान संत समाज से आरक्षण और UGC से जुड़े आंदोलन में शामिल होने की अपील की है।
उन्होंने कहा कि अब इस मुद्दे पर संत समाज को भी खुलकर आगे आना चाहिए और सड़कों पर आंदोलन का हिस्सा बनना चाहिए। शर्मा ने आरक्षण व्यवस्था और UGC से जुड़े मुद्दों को लेकर व्यापक सामाजिक समर्थन जुटाने की बात कही।
उनकी इस अपील के बाद चर्चा तेज है कि आने वाले दिनों में संत समाज के कुछ संगठन भी इन आंदोलनों के समर्थन में उतर सकते हैं।
मीणा जी,
EWS आर्थिक आधार पर मिलता है, जाति के आधार पर नहीं!
और EWS में सिर्फ ब्राह्मण नहीं, बहुत जातियाँ आती हैं! और सिर्फ हिन्दू नहीं, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, जैन सब आते हैं!
तो इसको सुदामा कोटा कैसे बोलते हो?
मतलब पूरे ST सीट पर एकाधिकार जमाकर, दूसरों को ज्ञान दे रहे हो?
जब डेटा सामने है, तो मीणा जी को खुद के आरक्षण से बाहर जाने का डर सताने लगा है!
और इसी डर से अब बहाने बना रहे हैं और लोगों को बरगला रहे हैं!
इससे कुछ नहीं होगा मीणा जी,
बाहर तो आप जाओगे ही!😂
आरक्षण की समीक्षा और उसकी माँगों पर बात करने के लिए, दिखावे के लिए ही सही, इस सरकार के सलाहकारों की मूर्खता देखिए कि उन्होंने एक ब्राह्मण मंत्री @JPNadda को आगे किया है।
जहाँ माँगों में 'उपवर्गीकरण' एक प्रमुख माँग है, वहाँ भील, मुसहर, बाल्मीकि, लोहार, घुमंतू आदि जातियों के नेताओं के दल को आगे करना क्या उचित नहीं रहता?
ये लोग एकदम ही नहीं सोचते कि ऑप्टिक्स कैसा रहेगा? मुझे क्या, मैंने तो माँग पत्र दे ही दिया है, अब इन्हें जो करना है करें!
जौहर पर स्वरा भास्कर के बयान को लेकर बहस तेज
नई दिल्ली: स्वरा भास्कर के जौहर पर दिए एक पुराने बयान को लेकर सोशल मीडिया पर फिर बहस छिड़ गई है।
इस पर राजवीर सर ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “स्वरा जैसी महिलाओं की बुद्धि पर तरस आता है, जो कहती हैं कि यदि मैं पद्मिनी की जगह होती तो मरने की बजाय अलाउद्दीन खिलजी के हरम में जाना पसंद करती ;
दो चीज़ होती हैं, एक होता है जीवन और एक होता है गरिमा युक्त जीवन। यदि पद्मिनी अलाउद्दीन खिलजी के साथ चली जातीं, तो उनके पास जीवन तो होता, लेकिन गरिमा नहीं होती। और दूसरी चीज़, पर यदि ऐसा होना असंभव ही हो गया है, तो मेरी पवित्र देह को मेरे पति के अलावा कोई हाथ नहीं लगा सकता। यही होता है गरिमा युक्त जीवन।
जंतर-मंतर के उपद्रवियों की FIR हट सकती है…
तो स्वर्ण समाज पर लगाए गए झूठे SC/ST Act के मुकदमे क्यों नहीं?
अगर सरकार के पास FIR हटाने का रास्ता है,
तो न्याय सिर्फ कुछ लोगों के लिए क्यों?
लगातार आप सब के विचारों के सुनने के उपरांत, हमने एक सरलीकृत माँग पत्र बनाया है। एक बार आम सहमति बन जाए, फिर डिजिटल से धरातल की योजना बनाई जाएगी। तब तक, नीति निर्धारकों के लिए यह पत्र हम सार्वजनिक कर रहे हैं ताकि उन्हें AI से हिन्दी लिखवा कर, उसमें प्राइवेट में आरक्षण जैसी बकलोली न करनी पड़े।
@JPNadda जी, कॉपी ही करना है, तो ठीक से करो। वैसे, आपको दोबारा झुका देख कर दुख हुआ।
दिल्ली: CJP मार्च पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाने से इनकार किया। 5 सितंबर को दिल्ली में मार्च होगा। कोर्ट ने कहा, अप्रिय घटना की कोई ठोस आशंका नहीं है।
सामान्य वर्ग को आंदोलन की अनुमति इतनी आसानी से क्यों नहीं मिलती? क्या यह भेदभाव नहीं है?
क्या @DelhiPolice पर केवल पूर्व अपराधियों ने ही पत्थरबाजी की? क्या उनके सर केवल अपराधियों के ही डंडों से फूटे?
जब देश का सर्वोच्च न्यायालय एक पार्टी की राजनीति चलाने के लिए संविधान की धाराओं का अनुचित प्रयोग करने लगे, समझ जाओ वह राष्ट्र डूब रहा है।
जब पार्टी का नेता, पुलिस की पुलिसिंग अपनी राजनीति को आगे करने के लिए स्वयं अपने हाथों में ले ले, तो आप यह समझ लीजिए कि कल को वह किसी नरसंहार को भी उचित ठहरा लेगा।
दिल्ली दंगे इसका साक्ष्य हैं कि जो दंगे दिल्ली पुलिस ने तीन दिन में, बिना किसी हत्या के, समेट दिए थे, इस सरकार ने उन्हें आने वाले चुनावों के आलोक में CAA प्रोटेस्ट के नाम पर जमने दिया। बाद में 16 हिन्दू और 37 मुस्लिम मरे।
किसानों के हित में जो तीन कानून आए, इस सरकार ने दंगाइयों के आगे झुक कर, उन्हें वापस किया क्योंकि इनकी दृष्टि चुनावों पर थी।
भाजपा सरकार अब एक घटिया, समाजद्रोही सरकार बनती जा रही है जहाँ दंगाई और अराजकतावादी आगे बढ़ेंगे। आप यदि तार्किक बातें करेंगे, प्रश्न करेंगे कि यह तो तुम्हारे मैनिफ़ेस्टो में नहीं था, तो आपको एक संदर्भहीन आँकड़ा थमाया जाएगा कि देश आगे बढ़ रहा है।