@noreservation_8 यदि तर्क यह है कि 'जो गरीब है उसे आरक्षण मिले', तो क्या देश के शीर्ष संस्थानों, उच्च न्यायपालिका, मीडिया और उच्च पदों पर आज भी बहुजन समाज (SC/ST/OBC) की आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी है? जब तक शक्ति के केंद्रों में हर वर्ग की भागीदारी सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक लोकतंत्र अधूरा है
@noreservation_8 आरक्षण कोई गरीबी हटाओ योजना नहीं है, बल्कि यह सदियों के सामाजिक अन्याय के खिलाफ प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी का अधिकार है।
पेट की आग आर्थिक नीतियों से बुझती है, लेकिन सदियों का सामाजिक भेदभाव और तिरस्कार सिर्फ आरक्षण और भागीदारी से ही मिटता है|
@JaikyYadav16 दूसरों की मेहनत पर पानी फेरकर अपनी पीठ थपथपाना बहुत आसान होता है, लेकिन हकीकत यह है कि जब-जब पिछड़तों, शोषितों और युवाओं के हक की बात आएगी, तब-तब चंद्रशेखर भैया का नाम सबसे आगे रहेगा। थोड़ा चश्मे का नंबर बदलो या जलन की गोली खाओ, क्योंकि हकीकत को झुठलाने से सच नहीं बदल जाता|
@JaikyYadav16 लगता है भाई, जलन इतनी गहरी है कि सच आंखों से ओझल हो गया है| जब ज़मीन पर खून पसीना एक करके चंद्रशेखर भैया और आम युवा तानाशाही व्यवस्था से लोहा ले रहे थे, तब कुछ लोग एसी कमरों में बैठकर सिर्फ सोशल मीडिया पर नैरेटिव सेट करने में व्यस्त थे|
@JaikyYadav16 जो खुद कभी संघर्ष की धूप में एक मिनट नहीं खड़ा हुआ, वो छांव में बैठकर क्रांति पर लेक्चर दे रही है-और वाहवाही लूटने वाले जैकी जैसे लोग इसे भईया के संघर्ष को ना बता कर बैलेंस ट्वीट करते हैं|ज़मीनी नेताओं से मुकाबला करने के लिए जिगर चाहिए होता हैं |
भईया ने दिल्ली पुलिस की इस कार्रवाई को सीधे तौर पर 'जलियांवाला बाग जैसी बर्बरता' करार दिया। उन्होंने सोशल मीडिया पर दहाड़ते हुए लिखा-"ज़ुल्म जब भी हद से आगे बढ़ने लगता है, वहीं से बदलाव का सूरज निकलने लगता है|
संसद परिसर में रातभर का ऐतिहासिक धरना-पुलिस की इस बर्बरता और क्रूरता से खून खौल उठा, तो भईया ने रात में ही मोर्चा संभाल लिया। दिल्ली की मूसलाधार बारिश और सर्द हवाओं की परवाह किए बिना, वे सीधे संसद भवन परिसर में बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा के नीचे धरने पर बैठ गए
जंतर-मंतर से सीधी ललकार- चंद्रशेखर भईया ने डंके की चोट पर ऐलान कर दिया कि "अन्याय सहना, अन्याय करने से बड़ा पाप है", उन्होंने साफ कहा कि देश के युवाओं और छात्रों के साथ जो जुल्म हो रहा है, उसे सदन के अंदर भी ईंट से ईंट बजाकर उठाया जाएगा।
ज़ुल्म जब भी हद से आगे बढ़ने लगता है,
वहीं से बदलाव का सूरज निकलने लगता है।
आज जंतर-मंतर पर बच्चों और बच्चियों के साथ जिस प्रकार का बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया गया, उसने मन को गहराई तक झकझोर दिया। मैंने जलियांवाला बाग का वह दौर नहीं देखा, लेकिन आज जो दृश्य सामने आए, उन्होंने इतिहास के उस काले अध्याय की याद अवश्य दिला दी।
लोकतंत्र में अपनी बात शांतिपूर्ण ढंग से रखना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। यदि उस अधिकार का उत्तर बल प्रयोग से दिया जाए, तो यह केवल कुछ लोगों पर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी आघात है।
इसी पीड़ा और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के संकल्प के साथ, आज से मैं संसद भवन परिसर में परम पूज्य बाबा साहेब की प्रतिमा के नीचे धरने पर बैठ रहा हूँ। जब तक न्याय सुनिश्चित नहीं होता और इस घटना के लिए जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध उचित कार्रवाई नहीं होती, मेरा यह शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक संघर्ष जारी रहेगा।
@Voiceofpavan डिग्रियों की नुमाइश करना योग्यता हो सकती है, लेकिन जनादेश और जनसेवा का कोई सब्स्टीट्यूट नहीं होता। लोकतंत्र में डिग्रियां नहीं, ज़मीनी संघर्ष और जनता का भरोसा मायने रखता है। अगर डिग्रियों से ही राजनीति होती, तो हर प्रोफेसर सांसद होता। जनहित सर्वोपरि है, कागजी डिग्रियां नहीं|
@SurajKrBauddh कानून का सम्मान करना एक आदर्श स्थिति है, लेकिन जब कानून खुद ही पीड़ित की रक्षा करने में अक्षम साबित हो, तो पीड़ित को चुप रहने के लिए कहना उसके जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है|समाज का सड़कों पर उतरना अराजकता नहीं, बल्कि व्यवस्था को जगाने की एक विवश प्रतिक्रिया है |
@SurajKrBauddh जब तक अपराधी को यह डर नहीं होगा कि समाज तत्काल प्रतिक्रिया देगा, तब तक कानून का डर समाप्त हो जाएगा। न्यायपालिका की प्रक्रिया लंबी है, और अपराधी इसका फायदा उठाकर सबूत मिटाने या पीड़ित को डराने में सक्षम हो जाते हैं।
@SurajKrBauddh कानून का पालन तब किया जाता है जब राज्य सुरक्षा की गारंटी दे। यदि राज्य नागरिक की अस्मिता (सम्मान और सुरक्षा) की रक्षा करने में विफल रहता है, तो नागरिक के पास आत्मरक्षा और विरोध के लिए सड़कों पर आने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचता।
@SurajKrBauddh कानून केवल कागजों पर 'सर्वोच्च' है, लेकिन जमीनी स्तर पर FIR दर्ज न होना या पुलिस की निष्क्रियता यह साबित करती है कि पीड़ित के पास न्याय की प्रतीक्षा करने का 'विशेषाधिकार' नहीं है, क्योंकि तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
SSP अविनाश पांडेय को बर्खास्त करो।
मेरठ में ललिता गौतम हत्याकांड में पुलिस ने दलितों के साथ जिस तरह का अपमानजनक एवं तानाशाही से भरा हुआ रवैया अपनाया है, इसे कतई स्वीकार नहीं किया जाऐगा।
CM योगी से हमारी मांग है कि SSP अविनाश पांडेय को तत्काल बर्खास्त किया जाए। @myogiadityanath