दीपावली का त्यौहार हमें अपने अंदर प्रज्ञा-दीप प्रज्वलित करने की याद दिलाता है ,विग्रहवान धर्म,मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जीवनादर्श को आचरण में उतारने की याद दिलाता है । दीपावली का त्यौहार आपका कल्याण साधे।आपका मंगल हो ।
बाहर के अँधियारे को रवि,शशि,अग्नि,विद्युत् दूर कर देते हैं।हमारे अंदर के अंधेरे को ये दूर नहीं कर सकते।राग,द्वेष,मोह और इन्हीं के अनुषंगी काम,क्रोध,लोभ,ईर्ष्या,अहंकार,नफरत आदि विकारों ने अंदर जिस गहन अन्धकार का घेरा बना रखा है उसे आप अंदर ज्ञान का दीप जला कर ही दूर कर सकते हैं
सदाचार ही धर्म है, दुराचार ही पाप।
परसेवा ही धर्म है, परपीड़न ही पाप।।
बाहर भीतर स्वच्छ हों, करें स्वच्छ व्यवहार।
सत्य प्रेम करुणा जगे, यही धर्म का सार।।
"मंगल हुआ प्रभात" से साभार।
"सहा नहीं है जिसने पीड़ा परतंत्रता दुसाधिन की।
वह क्या जाने स्वतंत्रता का सुख अगाध क्या होता है।"
इन पंक्तियों के साथ स्वतंत्रतादिवस का 76वाॅं वार्षिक आवर्ती उत्सव आपके लिए मंगलप्रद हो।
आदर्श कोई और प्रस्तुत करें और नेतृत्व हम करें,अब यह बात नहीं चलनी चाहिए।हमें अपनी आस्था की प्रामाणिकता अपने आचरण द्वारा सिद्ध करनी होगी,कारगिल के वीर शहीदों और देश पर ज़िन्दगी निछावर करने वाले अन्य शहीदों की तरह।नमन ,वीर शहीदों नमन।
तथागत बुद्ध ने कहा था-
सभी धर्म (विचार,अवस्थायें)पहले मन में उत्पन्न होते हैं।मन ही मुख्य है,ये धर्म मनोमय हैं। प्रदुष्ट मन से मनुष्य जो कुछ बोलता व करता है तो दु:ख उसके पीछे उसी तरह लग जाता है जैसे गाड़ी के पहिये बैल के पैरों के पीछे पीछे।
@flyingbeast320 धर्म स्वयं रक्षित है ।वह अखिल ब्रह्माण्ड की रक्षा करता है, बशर्ते लोग धर्म को आचरण में उतारें।अधिकांश को तो पता ही नहीं है कि धर्म है क्या।
जंगल काटे गये,पहाड़ तोड़े गये,भूमि के जैविक तत्त्व नष्ट किये गये। पर्यावरण का सबसे बड़ा शत्रु मानसिक प्रदूषण है जो दिनोंदिन बढ रहा है।
बुद्ध कहते थे- प्रदुष्ट मन से जो कुछ बोला जाता है या किया जाता है तो विपत्तियाँ ऐसे पीछे लगती हैं जैसे गाड़ी के पहिये बैल के पीछे लगे रहते हैं।