@narendramodi अरे काकरोचों,अब देश की जनता जाग चुकी है बहुरूपियों । तुम आए तो थे दिलों में जगह बनाने सही मुद्दे पर लेकिन बहुत जल्दी तुमने अपना नक़ाब उठा दिया । तुमको देश की संस्थाओं पर अविश्वास पैदा करना और देश की विकास की रफ़्तार को रोकने के लिए विदेशी ताकतों के द्वारा प्रायोजित किया गया है । अब तुम दौड़ा दौड़ा कर पीटे जाओगे । जल्दी भागो और अपने आका जॉर्ज सोरोस के आँचल में छिप जाओ ।
@yati_Official1 माननीय @narendramodi जी अगर आपसे इनका इलाज नहीं हो पा रहा तो इस कार्य को आप पूज्य @myogiadityanath जी को सौंप दीजिए । उनको ऐसे लोगों को ठीक करने में महारत हासिल है । हो सकता है उनका नाम आते ही ये काकरोच और दीमक विलुप्त कीट पतंगों की श्रेणी में आ जाएँ ।@BJP4India
अच्छा हुआ जो ये आंदोलन हुआ, इसी बहाने देश के सारे दुश्मन बिल से बाहर निकल आए । कम से कम उनकी पहचान तो हो गई ।
परीक्षा का मुद्दा अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील था इसलिए आम लोगों ने भी समर्थन किया लेकिन ये काकरोच तो बहुत जल्दी अपने असली कलेवर में आ गए । लोकतंत्र, न्यायपालिका , व्यवस्थापिका सब को धत्ता बताने लगे । इनको लगने लगा है कि ये समर्थन देश के ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर लेंगे । अरे काकरोचों ये देश एक एक देशभक्त के खून पसीने से बना है , तुम्हारे जैसे भाड़े के टट्टुओं से नहीं । तुम्हारा सम्पूर्ण विनाश होगा और शीघ्र होगा ।
@narendramodi@AmitShah@BJP4India@indSupremeCourt@myogiadityanath अब ये काकरोच सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अनर्गल प्रलाप कर मारीच की तरह अपना असली चेहरा दिखा रहे हैं । भारत माता रूपी सीता का हरण ही इनका असली मकसद है । साधू वेश तो इन्होंने लोगों का विश्वास जीतने के लिए धारण किया था , वो शुरुआती मक़सद पूरा हुआ । लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त करना , भारत वर्ष के विकास के इंजन को रोकना इनका उद्देश्य है और इस कुत्सित प्रयास में इनको विदेशी ताकतों की तरफ़ से तकनीक और पैसा भरपूर दिया जा रहा है । सभी मौकापरस्त ताक़तें इनके साथ हो चली हैं ।अब समय आ गया है कि इन राक्षसों को चिन्हित करके इनका समूल नाश किया जाए । ये लोग वेश बदलने में मारीच की तरह माहिर हैं , इनके छलावे में नहीं आना है और इन कॉकरोच और दीमकों को नासूर बनने से पहले समाप्त करना है ।
@narendramodi@AmitShah@BJP4India@indSupremeCourt@myogiadityanath अब ये काकरोच सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अनर्गल प्रलाप कर मारीच की तरह अपना असली चेहरा दिखा रहे हैं । भारत माता रूपी सीता का हरण ही इनका असली मकसद है । साधू वेश तो इन्होंने लोगों का विश्वास जीतने के लिए धारण किया था , वो शुरुआती मक़सद पूरा हुआ । लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त करना , भारत वर्ष के विकास के इंजन को रोकना इनका उद्देश्य है और इस कुत्सित प्रयास में इनको विदेशी ताकतों की तरफ़ से तकनीक और पैसा भरपूर दिया जा रहा है । सभी मौकापरस्त ताक़तें इनके साथ हो चली हैं ।अब समय आ गया है कि इन राक्षसों को चिन्हित करके इनका समूल नाश किया जाए । ये लोग वेश बदलने में मारीच की तरह माहिर हैं , इनके छलावे में नहीं आना है और इन कॉकरोच और दीमकों को नासूर बनने से पहले समाप्त करना है ।
@narendramodi@AmitShah@BJP4India@indSupremeCourt@myogiadityanath अब ये काकरोच सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अनर्गल प्रलाप कर मारीच की तरह अपना असली चेहरा दिखा रहे हैं । भारत माता रूपी सीता का हरण ही इनका असली मकसद है । साधू वेश तो इन्होंने लोगों का विश्वास जीतने के लिए धारण किया था , वो शुरुआती मक़सद पूरा हुआ । लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त करना , भारत वर्ष के विकास के इंजन को रोकना इनका उद्देश्य है और इस कुत्सित प्रयास में इनको विदेशी ताकतों की तरफ़ से तकनीक और पैसा भरपूर दिया जा रहा है । सभी मौकापरस्त ताक़तें इनके साथ हो चली हैं ।अब समय आ गया है कि इन राक्षसों को चिन्हित करके इनका समूल नाश किया जाए । ये लोग वेश बदलने में मारीच की तरह माहिर हैं , इनके छलावे में नहीं आना है और इन कॉकरोच और दीमकों को नासूर बनने से पहले समाप्त करना है ।
आज आपने जो लिखा, ठीक यही बात आपने लगभग पाँच महीने पूर्व हमारी व्यक्तिगत मुलाक़ात के दौरान भी कही थी। उस समय भी मुझे यह भविष्यवाणी अत्यंत असंभव और अविश्वसनीय लगी थी, और सच कहूँ तो आज भी वैसी ही प्रतीत होती है।
फिर भी, ज्योतिष एक प्राचीन एवं गंभीर शास्त्र है, जिसका अपना सिद्धांत, आधार और अपनी सीमाएँ हैं। यदि आपकी यह भविष्यवाणी अक्षरशः सत्य सिद्ध होती है, तो निस्संदेह ज्योतिष के मर्मज्ञ के रूप में आपका स्थान शिरोमणि के समान होगा। यह केवल एक सटीक भविष्यवाणी नहीं, बल्कि ज्योतिष विद्या की प्रामाणिकता का भी एक अद्भुत उदाहरण माना जाएगा।
धर्मेंद्र प्रधान जी व्यक्ति अच्छे हैं , मेहनती हैं , पार्टी के लिए समर्पित हैं लेकिन शिक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने सतत् ग़लतियाँ की हैं । उदाहरण के लिए यू जी सी जैसे ग़ैर ज़रूरी मुद्दे पर जनता में जो नाराज़गी देखने को मिली थी वो स्थाई रूप से लोगों के दिलों में घर कर गई है तथा परीक्षा प्रणाली को शुचिता पूर्ण बनाने एवं समय पर कराने में सरकार अभी तक फिसड्डी ही साबित हुई है । अब मोदी जी ने इस मामले की गंभीरता को समझा है तो दिल में उम्मीद जरूर जगी है ।
@narendramodi@AmitShah ये लोग अवसर की तलाश में थे , मिल गया । सही उद्देश्य के साथ शुरू हुआ आंदोलन अब फिसल गया । मसलने का समय आ गया है इन राष्ट्र विरोधी ताकतों को ।
परीक्षा प्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन आवश्यक है और ये देश के हर एक नौनिहाल के भविष्य को प्रभावित करने वाला मुद्दा है , मोदी जी को जरूर ये करना चाहिए । आख़िर आप नहीं कर पाएंगे तो कौन करेगा ?
Dear Students,
I urge you to look at the bigger picture while expressing your concerns. Peaceful protest is a democratic right, but let us ensure that it is not misused by those who seek political or personal advantage at the cost of the nation.
India is making remarkable progress economically, technologically, and globally. This progress belongs to every Indian, especially the youth, whose future depends on a strong and stable nation.
If there are genuine grievances, they should be resolved through constructive dialogue. Let us protect India’s hard-earned global reputation and work together for a brighter future.
If India wins, every student wins.
Jai Hind.
@narendramodi@AmitShah@BJP4India सोनम वांगचुक के अनशन समाप्त करने के बाद अब वक़्त आ गया कि इन असामाजिक तत्वों को जो एक शांतिपूर्ण माँग प्रदर्शन को माध्यम बना कर देश और सरकार को अस्थिर करने का प्लेटफार्म बनाते जा रहे थे , ठीक से उन्हीं की भाषा में जवाब देखकर खदेड़ा जाए । अब ये आंदोलन विदेशी फंडिंग से पलने वाला जेहादी और वामपंथी अड्डा बनता जा रहा है जिसमें वर्षों से ताक लगा कर बैठे देश विरोधी तत्व शामिल होकर नंगा नाच करने लगे हैं । दीमक और काकरोच को निपटाने का वक्त आ चुका है , इससे पहले कि ये देश के जड़ो को और नुकसान पहुंचाएं ।
@narendramodi@AmitShah@BJP4India@NitinNabin@JPNadda@aajtak@ABPNews@ndtv
विनम्र आग्रह।
पेपर लीक का मुद्दा राजनीति से कहीं बड़ा है। यह देश की युवाशक्ति, उनकी प्रतिभा, उनके आत्मविश्वास और पूरी परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न है। यह भाजपा, कांग्रेस, सपा या किसी एक दल का विषय नहीं, बल्कि उन करोड़ों विद्यार्थियों के भविष्य का सवाल है जो वर्षों की मेहनत, त्याग और उम्मीदों के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं।
भारतीय लोकतंत्र में नैतिक उत्तरदायित्व की एक गौरवशाली परंपरा रही है। अतीत में रेल दुर्घटनाओं के बाद रेल मंत्रियों ने नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा दिया, जबकि दुर्घटना का प्रत्यक्ष कारण वे स्वयं नहीं होते थे। यह लोकतांत्रिक मर्यादा और जवाबदेही का सर्वोच्च उदाहरण था।
इसी भावना के साथ मेरा मानना है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान जी को भी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा देना चाहिए तथा संगठन या सरकार में कोई अन्य दायित्व संभालना चाहिए। इससे सरकार का कद छोटा नहीं होगा, बल्कि जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि सरकार युवाओं की पीड़ा को गंभीरता से समझती है और जवाबदेही निभाने का साहस रखती है।
यह तर्क दिया जा सकता है कि पेपर लीक की घटनाएँ पहले की सरकारों में भी होती रही हैं। लेकिन यही तो वह व्यवस्था थी जिसे बदलने के लिए देश की जनता ने भाजपा को ऐतिहासिक जनादेश दिया था। जनता ने केवल सरकार बदलने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था बदलने के लिए विश्वास व्यक्त किया था। इसलिए आज तुलना अतीत से नहीं, बल्कि जनता की अपेक्षाओं से होनी चाहिए।
सबसे गंभीर चिंता यह है कि यदि युवाओं का परीक्षा प्रणाली से विश्वास उठ गया, तो वे अपनी असफलता को अपनी प्रतिभा की कमी नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता मानने लगेंगे। यह किसी भी राष्ट्र के लिए अत्यंत खतरनाक स्थिति होगी। जिस व्यवस्था पर विश्वास समाप्त हो जाए, वहाँ प्रतिभा भी हतोत्साहित हो जाती है।
यह विषय इतना व्यापक है कि देश का लगभग हर परिवार इससे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। यदि इसका शीघ्र, पारदर्शी और कठोर समाधान नहीं निकाला गया, तो असंतोष स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा और समाज विरोधी तत्व भी इसका लाभ उठाने का प्रयास करेंगे।
इसलिए समय की माँग है कि सरकार केवल दोषियों को दंडित करने तक सीमित न रहे, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाए जहाँ पेपर लीक की संभावना ही समाप्त हो जाए। यही युवाओं के साथ न्याय होगा और यही राष्ट्र के भविष्य के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता होगी।
समय रहते लिया गया साहसिक निर्णय नेतृत्व की शक्ति का परिचायक होता है; देर से लिया गया निर्णय अक्सर परिस्थितियों की विवशता बन जाता है।
@narendramodi@AmitShah@BJP4India@NitinNabin@JPNadda@aajtak@ABPNews@ndtv
विनम्र आग्रह।
पेपर लीक का मुद्दा राजनीति से कहीं बड़ा है। यह देश की युवाशक्ति, उनकी प्रतिभा, उनके आत्मविश्वास और पूरी परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न है। यह भाजपा, कांग्रेस, सपा या किसी एक दल का विषय नहीं, बल्कि उन करोड़ों विद्यार्थियों के भविष्य का सवाल है जो वर्षों की मेहनत, त्याग और उम्मीदों के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं।
भारतीय लोकतंत्र में नैतिक उत्तरदायित्व की एक गौरवशाली परंपरा रही है। अतीत में रेल दुर्घटनाओं के बाद रेल मंत्रियों ने नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा दिया, जबकि दुर्घटना का प्रत्यक्ष कारण वे स्वयं नहीं होते थे। यह लोकतांत्रिक मर्यादा और जवाबदेही का सर्वोच्च उदाहरण था।
इसी भावना के साथ मेरा मानना है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान जी को भी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा देना चाहिए तथा संगठन या सरकार में कोई अन्य दायित्व संभालना चाहिए। इससे सरकार का कद छोटा नहीं होगा, बल्कि जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि सरकार युवाओं की पीड़ा को गंभीरता से समझती है और जवाबदेही निभाने का साहस रखती है।
यह तर्क दिया जा सकता है कि पेपर लीक की घटनाएँ पहले की सरकारों में भी होती रही हैं। लेकिन यही तो वह व्यवस्था थी जिसे बदलने के लिए देश की जनता ने भाजपा को ऐतिहासिक जनादेश दिया था। जनता ने केवल सरकार बदलने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था बदलने के लिए विश्वास व्यक्त किया था। इसलिए आज तुलना अतीत से नहीं, बल्कि जनता की अपेक्षाओं से होनी चाहिए।
सबसे गंभीर चिंता यह है कि यदि युवाओं का परीक्षा प्रणाली से विश्वास उठ गया, तो वे अपनी असफलता को अपनी प्रतिभा की कमी नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता मानने लगेंगे। यह किसी भी राष्ट्र के लिए अत्यंत खतरनाक स्थिति होगी। जिस व्यवस्था पर विश्वास समाप्त हो जाए, वहाँ प्रतिभा भी हतोत्साहित हो जाती है।
यह विषय इतना व्यापक है कि देश का लगभग हर परिवार इससे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। यदि इसका शीघ्र, पारदर्शी और कठोर समाधान नहीं निकाला गया, तो असंतोष स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा और समाज विरोधी तत्व भी इसका लाभ उठाने का प्रयास करेंगे।
इसलिए समय की माँग है कि सरकार केवल दोषियों को दंडित करने तक सीमित न रहे, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाए जहाँ पेपर लीक की संभावना ही समाप्त हो जाए। यही युवाओं के साथ न्याय होगा और यही राष्ट्र के भविष्य के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता होगी।
समय रहते लिया गया साहसिक निर्णय नेतृत्व की शक्ति का परिचायक होता है; देर से लिया गया निर्णय अक्सर परिस्थितियों की विवशता बन जाता है।
@narendramodi@AmitShah@dpradhanbjp@BJP4India पेपर लीक का मुद्दा किसी एक सरकार, किसी एक राजनीतिक दल या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। यह देश की युवाशक्ति, प्रतिभा और भविष्य से जुड़ा ऐसा राष्ट्रीय संकट है, जिस पर राजनीति नहीं बल्कि ईमानदारी से आत्ममंथन और निर्णायक सुधार की आवश्यकता है।
यदि हमारे नौनिहालों और देश के भावी कर्णधारों का यह विश्वास ही समाप्त हो जाए कि परीक्षाएँ और साक्षात्कार निष्पक्ष, पारदर्शी और शुचितापूर्ण हैं, तो वे अपने जीवन की दिशा कैसे तय करेंगे? जिस व्यवस्था के भरोसे वे दिन-रात मेहनत करते हैं, यदि उसी पर संदेह हो जाए तो उनके सपने, उनका आत्मविश्वास और उनका भविष्य तीनों संकट में पड़ जाते हैं।
आज हम देखते हैं कि अनेक विद्यार्थी परीक्षा में अपेक्षित अंक न आने या असफल होने पर गहरे अवसाद में चले जाते हैं। कुछ तो आत्महत्या जैसा अत्यंत दुखद कदम भी उठा लेते हैं। लेकिन क्या उन्हें यह पता होता है कि कई बार जिस परीक्षा परिणाम को वे अपनी योग्यता का अंतिम प्रमाण मानकर स्वयं को दोषी ठहरा रहे हैं, वह वास्तव में उनकी प्रतिभा का सही मूल्यांकन नहीं, बल्कि भ्रष्ट लोगों के षड्यंत्र और बेईमान तंत्र का शिकार हो सकता है? इससे बड़ी त्रासदी किसी राष्ट्र के लिए क्या हो सकती है?
यह समस्या आज की नहीं है। दशकों से विभिन्न रूपों में हमारी परीक्षा प्रणाली को खोखला किया जाता रहा है कभी संगठित नकल, कभी उत्तर पुस्तिकाओं में हेराफेरी, कभी मूल्यांकन में अनियमितताएँ, कभी डिजिटल प्रक्रियाओं का दुरुपयोग और अब पेपर लीक। इसके साथ-साथ परीक्षाओं का समय पर न होना, बार-बार स्थगित होना, परिणामों का अनावश्यक विलंब और फिर न्याय की लंबी प्रतीक्षा ये सब मिलकर युवाओं के मन में व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करते हैं।
किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी उसकी प्रतिभा होती है। यदि प्रतिभा के चयन की प्रक्रिया ही संदिग्ध हो जाए, तो यह केवल कुछ परीक्षाओं का संकट नहीं, बल्कि राष्ट्र की नींव को दीमक के हवाले करने जैसा है। जिस देश के युवाओं का विश्वास व्यवस्था से उठ जाता है, वहाँ निराशा, कुंठा और असंतोष का बढ़ना स्वाभाविक है। यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए अत्यंत चिंताजनक है।
समय की माँग है कि परीक्षा प्रणाली में केवल छोटे-मोटे सुधार नहीं, बल्कि आमूलचूल परिवर्तन किए जाएँ। ऐसी व्यवस्था बने जहाँ तकनीक, पारदर्शिता, जवाबदेही और कठोर दंड के माध्यम से पेपर लीक और धांधली की संभावना लगभग समाप्त हो जाए। हर विद्यार्थी को यह विश्वास होना चाहिए कि उसकी सफलता किसी सिफारिश, धनबल या भ्रष्टाचार से नहीं, बल्कि केवल उसकी मेहनत और प्रतिभा से तय होगी।
इस्तीफ़ा नैतिक उत्तरदायित्व का प्रतीक हो सकता है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है कि ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जहाँ भविष्य में किसी युवा का सपना किसी पेपर लीक, किसी माफिया या किसी भ्रष्ट अधिकारी की वजह से न टूटे। यदि हम देश के भविष्य को सचमुच सुरक्षित करना चाहते हैं, तो युवाओं का व्यवस्था पर विश्वास हर कीमत पर लौटाना होगा। यही भारत के उज्ज्वल भविष्य की सबसे मजबूत नींव होगी।
यह कार्य भी राम मंदिर बनवाने जैसा और 370 हटाने जैसा पवित्र और बहुप्रतीक्षित कार्य है ।
नेताजी @b_bhushansharan की यही बात उन्हें अन्य राजनेताओं से अलग पहचान दिलाती है। यदि हमारी किसी बात, व्यवहार या टिप्पणी से किसी की भावनाएँ आहत होती हैं, तो उस पर खेद व्यक्त करना या आवश्यक हो तो क्षमा माँग लेना कमजोरी नहीं, बल्कि बड़प्पन, परिपक्वता और बड़े हृदय का परिचायक है। यही गुण एक सच्चे जननेता की पहचान भी है। @b_bhushansharan@narendramodi@AmitShah@myogiadityanath@BJP4India
नेताजी @b_bhushansharan की यही बात उन्हें अन्य राजनेताओं से अलग पहचान दिलाती है। यदि हमारी किसी बात, व्यवहार या टिप्पणी से किसी की भावनाएँ आहत होती हैं, तो उस पर खेद व्यक्त करना या आवश्यक हो तो क्षमा माँग लेना कमजोरी नहीं, बल्कि बड़प्पन, परिपक्वता और बड़े हृदय का परिचायक है। यही गुण एक सच्चे जननेता की पहचान भी है। @b_bhushansharan@narendramodi@AmitShah@myogiadityanath@BJP4India