Indians have made a major contribution to America's technological prowess. Yet, a big part of America no longer wants us.
Indians who are on a visa in the US face the painful prospect of uprooting the life you have built with hard work.
Let this be the birth pains of a bold new future.
Come back, let's build India 🙏
मुझे नहीं लगता कोई सत्य की प्रतिमूर्ति हो सकता है। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनका पूरा व्यक्तित्व ही झूठ का पुलिंदा होता है।
कॉकरोच जनता पार्टी के कंपनी कमांडर अभिजीत दीपके ने बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की जीवनी हाथ में ले रखी है। यह किताब लगातार उनके हाथ में रही जबकि सच्चाई यह है कि बाबा साहब ने कभी कोई आत्मकथा नहीं लिखी।
डॉ आंबेडकर की 20 पन्नों की एक अधूरी आत्मकथा है, जिसका नाम है "वेटिंग फॉर अ वीजा" (Waiting for a Visa)। यह लेख की शक्ल में उन्होंने 1935-36 के आसपास लिखी थी, जिसमें उन्होंने अपने जीवन में झेले छुआछूत के अनुभवों को बयां किया है। उसी आत्मकथा में एक सच्ची कहानी है जो सुनाने का मन कर रहा है। स्टारबक्स की कॉफी और कार की एसी फुल पर चलाकर जिंदगी जीने वाले कभी नहीं जान सकते कि बाबा साहब होना क्या होता है
"सन 1901 में, जब बाबा साहब करीब 10 साल के थे, वे अपने भाई और भतीजे के साथ मसूूर (सतारा) में काम कर रहे अपने पिता से मिलने जा रहे थे। वे ट्रेन से पदली स्टेशन पहुंचे, लेकिन आगे ले जाने के लिए कोई तैयार नहीं था। बड़ी मुश्किल से एक बैलगाड़ी वाले को दोगुने पैसे देकर वे राजी हुए, लेकिन शर्त यह थी कि गाड़ी बच्चे खुद चलाएंगे और गाड़ीवान पैदल चलेगा, ताकि उसकी गाड़ी "अपवित्र" न हो।
रास्ते में बच्चों को भयंकर प्यास लगी। उन्होंने एक जगह पानी मांगा, तो स्थानीय लोगों ने गंदे पानी के तालाब की तरफ इशारा कर दिया। पानी इतना दूषित था कि चाहकर भी वे उसे पी नहीं सके। पूरी यात्रा में अपमान और प्यास से तड़पते हुए वे किसी तरह अपने पिता के पास पहुंचे।"
एक वो थे एक तुम हो झूठ, सिर्फ झूठ