रश्मिरथी" में दिनकर ने आर्य संस्कृति के नायक के रूप में कर्ण को प्रतिष्ठित कर उनके जीवन मूल्य के विशेष पक्ष को रेखांकित किया है। यह भी कि जन्म से कोई अछूत नहीं होता, मनुष्य की निर्मिति में उसका कर्म बलवान है, वही आदर दिलाता है या तिरस्कार। आज दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा आलेख.
The two-day Yuva Dharma Sansad was inaugurated on Friday at Kanchipuram in the divine presence of the revered Shankaracharya Swami Jayendra Saraswati Ji Maharaj of Kanchi Kamakoti Peeth.
🐍 नाग पंचमी का विशेष इतिहास – सनातन परंपरा का गौरव 🐍
नाग पंचमी, सनातन धर्म का एक अत्यंत पावन एवं आस्था से परिपूर्ण पर्व है, जो श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व विशेष रूप से नागों की पूजा, श्रद्धा एवं उनकी प्रकृति में भूमिका को सम्मान देने हेतु मनाया जाता है।
🌿 नाग पंचमी का पौराणिक महत्व
नाग पंचमी से जुड़ी अनेक कथाएँ हमारे शास्त्रों में वर्णित हैं। सबसे प्रमुख कथा महाभारत से संबंधित है, जिसमें जनमेजय द्वारा किए गए सर्पसत्र यज्ञ की कथा आती है। जनमेजय ने अपने पिता परीक्षित की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए सम्पूर्ण सर्प जाति के विनाश का यज्ञ आरंभ किया। परंतु आस्तिक मुनि के हस्तक्षेप से यह यज्ञ रोका गया और तभी से नागों की पूजा की परंपरा आरंभ हुई, जिससे यह मान्यता बनी कि इस दिन नागों की पूजा करने से भय और पाप का नाश होता है।
🔱 नागदेव और शिव का संबंध
भगवान शिव को 'नागराज' से विशेष लगाव है। उनके गले में विराजमान वासुकी नाग इस बात का प्रतीक हैं कि जीवन में शक्ति और विनम्रता दोनों का संतुलन आवश्यक है। शिव ही सर्पों के अधिपति माने जाते हैं और नाग पंचमी पर नागों की पूजा वास्तव में शिव जी की पूजा का ही एक रूप मानी जाती है।
🐍 नागों के प्रमुख नाम और महत्व
स्कंद पुराण और अन्य धर्मग्रंथों में आठ प्रमुख नागों का वर्णन है, जिनकी इस दिन विशेष रूप से पूजा की जाती है:
1. अनन्त
2. वासुकी
3. शेषनाग
4. पद्म
5. महापद्म
6. तक्षक
7. कुलीर
8. कर्कोटक
इन नागों की पूजा से जीवन के सारे दोष—विशेष रूप से कालसर्प दोष, नागदोष आदि से मुक्ति मिलती है।
🌾 परंपरा और पूजा विधि
नाग पंचमी के दिन लोग घरों के दरवाज़ों, दीवारों और पूजा स्थलों पर नागदेव के चित्र बनाकर या मिट्टी से नाग की आकृति बनाकर दूध, चावल, पुष्प, कुशा आदि अर्पित करते हैं। ब्राह्मणों को भोजन कराना, नाग मंत्रों का जप और शिव जी की विशेष आराधना की जाती है।
💫 नाग पंचमी का आध्यात्मिक संदेश
नाग पंचमी हमें सिखाता है कि प्रकृति की प्रत्येक रचना का आदर करना चाहिए—चाहे वह जीव हो, वनस्पति हो या कोई ऊर्जा। यह पर्व भय नहीं, बल्कि समर्पण और संतुलन का प्रतीक है। यह शिव और शक्ति के प्रतीक नागदेवताओं के प्रति हमारी श्रद्धा का उत्सव है।
इस नाग पंचमी पर हम भगवान शिव और नाग देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करें और जीवन में स्वास्थ्य, समृद्धि और शांति की कामना करें।
ॐ नमः शिवाय।
हर हर महादेव।
#NagPanchami2025 #SanatanSanskriti
#NagDevta
शब्द लज्जा से भरे हैं, अर्थ नंगे हैं।
धर्म धृति को त्याग ध्वज की कर रहा बातें
स्वाद से बोझिल हुईं उपवास की रातें।
चाँद-सूरज पर ग्रहण देखे सुने थे पर
आज-कल तो जुगनुओं पर हैं लगी घातें।
अब सुहृत्-संवाद पर सौ-सौ अड़ंगे हैं।
स्नेह, संशय के अँधेरे में मलिन सा है।
कौन क्या है, आज ये कहना कठिन सा है।
तानते आए समय का तन्तु जो अब तक
वह युगों का तान घटकर एक छिन सा है।
व्यर्थ परिचय, रंग सारे ही दुरंगे हैं।
धन्य हैं, अब भी कहीं जो दीप जलते हैं
रुष्ट जिनसे, आँधियों के दल मचलते हैं।
थरथराती एक लौ अब तक विजयिनी है
क्षुब्ध तारे व्योम में करवट बदलते हैं।
आज भी बलिहार दीपक पर पतंगे हैं।
चुप रहें या गीत गाऍं बात निकलेगी
हर कथा अन्तःस्थ सच कहने को मचलेगी।
भूप तजते थे कभी साम्राज्य भी, सच है
आज मधुकर वृत्ति भी मधुकोष रच लेगी।
भिक्षुओं की भूति पर अब रोज दंगे हैं।
@idamittham_
@idamittham_ सेवाज्ञ के संरक्षक, भारतीय ज्ञान परंपरा के यशस्वी नेतृत्वकर्ता पूज्य आचार्य श्री मिथिलेशनंदिनीशरण जी महाराज को जन्मदिन की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं!
भगवान राजा श्री रामचंद्र जी और देवी मां सीता जी की अनुकम्पा आप पर सदा बनी रहे।
भारतीय सशस्त्र बलों ने, ऑपरेशन सिन्दूर के अंतर्गत, पाकिस्तानी आतंकवादी अड्डों को नेस्तनाबूद करने के साथ-साथ, 100 से ज़्यादा उग्रवादियों को ज़मींदोज़ कर दिया, जिसमे IC814 के अपहरणकर्ता और पुलवामा के दहशतगर्द भी शामिल हैं। हमारी सेना और सरकार, सामरिक कारणों से, देश के हित को सर्वोपरि रखते हुए, ज़्यादा करती है और कम बोलती है।
ये समय भारतीय सशस्त्र बलों, भारत सरकार और हमारे दृढ़ निश्चयी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के साथ एकजुटता से खड़े रहने का है। इसी भाव के साथ रामधारी सिंह दिनकर जी की ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ से ये पंक्तियाँ, भारतीय सेना को समर्पित करना चाहूँगा, जो हमें एकसूत्र में बंधे रहने का सन्देश देती हैं और ये बताती हैं की यदि घर में हम एक हैं तो सदा देश का मंगल ही होगा।
हम दें उस को विजय, हमें तुम बल दो,
दो शस्त्र और अपना संकल्प अटल दो।
हों खड़े लोग कटिबद्ध वहाँ यदि घर में,
है कौन हमें जीते जो यहाँ समर में ?
#OperationSindoor #JaiHind #JaiHindKiSena #PahalgamAvenged #IndianArmedForces #JusticeServed #IndiaPakistanCeasefire @PMOIndia@narendramodi@adgpi@mygovindia@SpokespersonMoD@EduMinOfIndia@UnivofDelhi
University of Delhi Academic Council on 10.05.2025 unanimously resolved to stand by the Nation, its Citizens, Govt. of India and valiant Armed Forces for thwarting Pakistan through Operation Sindoor while extending every possible support to the Government during this time.
@amazonIN मैंने इस प्रोडक्ट को ऑर्डर किया था इसका कुछ पार्ट मिसिंग है कई बार कंप्लेन करने पर भी कोई सुनवाई नहीं हो रही है , फ़ोन कॉल भी रिसीव्ड नहीं किया जा रहा है जबकि आज मेरे से बोला गया था आपकी समस्या का समाधान कर दिया जाएगा
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नव सम्वत् का प्रवेश हो रहा है। नूतनता का चतुर्दिक् प्रसार दिखाई देता है। रस-राग और सुगन्ध से भरी हुई प्रकृति में तितलियाँ, भ्रमर और कोयलें अपने उन्मुक्त उल्लास के द्वारा मानो समृद्धि का संकेत कर रहे हैं। भारत देश इस अर्थ में विलक्षण है। यहाँ वर्ष का नवीकरण मात्र आंकिक गणनाओं के अधीन नहीं है, अपितु सम्पूर्ण पर्यावरण नवीनता को अंगीकार करके नये सम्वत्सर के आगमन का उत्सव मनाता सा प्रतीत होता है। पारम्परिक रूप से भारत में नव वर्ष को ‘नव सम्वत्सर’ कह कर मनाया जाता है। जिसमें ऋतुयें बसती हैं, उसे सम्वत्सर कहते हैं। सम्वत्सर शब्द का अर्थ इसकी अन्तःक्रिया को व्यक्त करता हुआ इसकी चरितार्थता को भी स्पष्ट करता है। सम्वत्सर के प्रथम ऋतु के रूप में वसन्त का आगमन होता है। वसन्त ऋतु के चैत्र और वैशाख नामक दो महीने हैं, जिन्हें क्रमशः मधुमास और माधवमास कहा जाता है- ‘वसन्तौ मधुमाधवौ’। यह मधुऋतु है, मधु अर्थात् जीवन का सत्त्व। इसी से जीवन की गति है। इसी मधु की न्यूनता, इसका सूख जाना शिशिर ऋतु के रूप में दिखाई पड़ता है। पत्ते वृक्षों से गिर जाते हैं। वनस्पतियाँ अपने रस-राग से रहित प्रतीत होने लगती हैं। इन दोनों के बीच ग्रीष्म, वर्षा, शरद और हेमन्त ऋतु का क्रम रहता है।
इसी वसन्त से प्रारम्भ होता है हमारा नव सम्वत्सर। यह सम्वत्सर कालपुरुष के अनवरत चंक्रमण का ही प्रतिफल है। महाभारत में राजा जनक एवं ऋषि अष्टावक्र के संवाद के क्रम में अष्टावक्र ने कहा है -“चौबीस पर्व, छः नाभि, बारह अंश और तीन सौ साठ अरे वाला संवत्सर रूप कालचक्र आप की रक्षा करे।” यह संवाद सम्वत्सर में निहित भारतीय विज्ञान को प्रकट करता है। इस कालचक्र को समझने चलेंगे तो हमें अपने जीवन के गहरे सन्देश अनुभव होंगे। नव सम्वत्सर अपने आगमन से ही हमारा ध्यान मधु की ओर ले जाता है। सारा जीवन अन्तर्निहित मधु का ही विलास है, तो हमारे जीवन का मधु क्या है ? क्या है जिसे हमें सुदीर्घ जीवन में भोगते और चुकाते जाते हैं। वेद कहते हैं - मधु। भूयासं मधु सदृशः - हम मधु सदृश हो जायें। यही मधु हमारे जीवन में ‘आनन्द’ कहलाता है। यह आनन्द जीवन का मधु है, इसी से परमात्मा ने सृष्टि को रचा है। अपने सत् और चित् से असावधान होकर भी जीव की लालसा इस आनन्द के प्रति कम नहीं होती। इस आनन्द तत्त्व को स्वयं में पहचानने का अवसर है नव सम्वत्सर। बदलते जाते ऋतुचक्र में हमारा आनन्द क्षरित होता जाता है, शुष्कता आती जाती है। ग्रीष्म, वर्षा और शरद जीवन की ऋतु बनकर बीत जाते हैं। नव सम्वत्सर का स्वागत करते हुये हम अपने आनन्द तत्त्व को पहचानने का यत्न करें। अपना मधु खोजने में लगें। देखें कि जगा हुआ मधु प्रसादन करता है, यह हमें खिलाता है। यह हमारे भीतर की दिव्यताओं को रूप-आकार देता है, हमें सुरभित करता है। नव सम्वत्सर अपनी नवीनता को प्रकृति के माध्यम से व्यक्त करता है। हम भी अपनी प्रकृति में जीने का अभ्यास करें। कृत्रिमता के छल से उबरकर अपने मधु का अनुसन्धान करते हुये हम अपने भीतर सूख रहे रस-रुचि-राग को जगाने का संकल्प ले सकें तो सम्वत्सर की नवीनता हमारे जीवन में भी खिल सकेगी।
@JagranNews
हमारा अपना रंग कहाँ है !
श्वेत-श्याम निद्राओं पर
सतरंगे सपने छाए
क्वाँरी आँखों को छलने
अनगिनत उजाले आए।
जलती रहीं होलिकाओं में
कच्ची आकांक्षायें
परम्पराओं के प्रवाह का
पुण्य प्रसंग कहाँ है।
युग-युग से प्रह्लादों को
घेरती रहीं ज्वालाऍं।
कब तक हम पाषाणों से
कोई नृसिंह प्रगटाएँ।
जो दुर्मद हिरण्यकशिपों के
कठिन खड्ग के नीचे
अभय अकुंठ जगा दे वह
पावन सत्संग कहाँ है।
ॲंजुरी भर श्रद्धा
धरती भर संदेहों के विषधर।
कहाँ सुलभ सब संकल्पों को
विश्वासों के शंकर।
सरस आम्र मंजरियों पर
रसलोलुप शत-शत मधुकर।
क्या जाने शिव के त्रिनेत्र से
दग्ध अनंग कहाँ है।
फिर होली आई है
आने को आ ही जाती है।
कहना किन्तु कठिन है
कितना रंग जगा पाती है।
बेसुध पीढ़ी में उत्सव का
निर्मल उत्स जगा दे
शिथिल प्रथाओं में ऐसी
उद्रिक्त उमंग कहाँ है।
बाजारों से हारे
वंचक विज्ञापन के मारे।
फिरते हैं उदास आकुल
रुचियों के चाँद-सितारे।
ढोल-मॅंजीरे हैं, बजते भी हैं
पर बदले स्वर में
भंग न हो जिसकी लय ऐसा
छंद अभंग कहाँ है।
होली मंगलमय हो
फिर भी, उतरे रंग न कोई।
खिलती रहे सदा बगिया
रस-रुचि की राग भिगोई।
गूॅंजे फाग, भाग जागे
अनुराग भरे जन-जन में
दंग रहें सब, आओ देखें
वह हुड़दंग कहाँ है।
होलिकोत्सव की अनेकानेक शुभकामनायें..!
..कामारि शिव का मन्दस्मित
आपके लिये मंगलदायक हो !
पर्वतराज हिमवान् के यहाँ मण्डपाच्छादन हुआ है। उनकी प्राणाधिका पुत्री उमा का विवाह है। माता मैना की यह पुत्री अपने पिता की ऐसी लाडली है कि इसे पार्वती कहा जाता है।
पर्वतराज का मानो सौभाग्य ही इस कन्या के रूप में प्रगट हुआ है। ऋषि-मुनियों का तो आवागमन ही बन्द नहीं होता। देवर्षि नारद की प्रेरणा के चलते पार्वती ने अल्पवय में ही कठोर तप ठान लिया। असहनीय कष्ट सहा और वह कर दिखाया जो पहले कोई न कर सका। स्वयं ब्रह्मा जी ने कहा था न - ' अस तप काहु न कीन्ह भवानी।'
इस कन्या के कारण देवतात्मा हिमालय का प्रभाव अपूर्व हो गया है। त्रैलोक्यपति महादेव ने इस कन्या का पति होना स्वीकार किया है और दूल्हा बनकर मैना-हिमवान् के यहाँ पधारे हैं।
मण्डप में वर-कन्या बैठे हैं। लोक-वेद के विधान सम्पन्न हो रहें हैं। वेदध्वनि सुनाई देती है, मंगलगान होता है, नेग-न्योछावरें लुटती हैं, देवता पूजा पाते हैं, भूत-प्रेत आनन्द मनाते हैं। मुनियों ने दुलहा शिव से गणपति पुजाये हैं। भगवान् शिव ने पूजा भी, दुलहा तो दुलहा..सब विधियाँ नियमानुसार हो रही हैं। इसी क्रम में एक विलक्षण विधि आती है शिलारोहण।
पर्वत की पुत्री पार्वती के चरणों को पाषाण खण्ड पर रखते हुए शिव उन्हें आघात से बचाते हैं। अत्यधिक अनुराग और विह्वलता के इस सुकोमल पल में उन्हें अपना स्मरहर होना और भगवती का पर्वतराज की पुत्री होना स्मरण होता है। शिव के अधरों पर स्मित प्रकट होता है। शिव की यह मुस्कान सौम्य और रहस्यमयी है, जो उनके होठों से फूट पड़ी है जब उन्होंने हिमवान् की पुत्री उमा के चरणों को पकड़ा। यह केवल पाणिग्रहण है क्या..नहीं नहीं यह उससे बढ़कर है। इसका फल भी और महार्घ है। आचार्य कहते हैं - भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम्। क्या फल है - भजति जगदीशैक पदवीम्। शिव विभोर हैं। उनके हाथ कमल के फूल के समान कोमल हैं और पार्वती के चरण भी। भगवान् शिव उमा के चरणों को उठाकर पत्थर पर रख रहे थे जो वैवाहिक निष्ठा का प्रतीक है। वे अपने हाथ की सारी कोमलता का उपयोग करते हैं ताकि उमा के कोमल पावों को कोई कष्ट न हो।
सबसे कठिन, शाश्वत जोड़ी सिर्फ एक नवविवाहित जोड़े की भूमिका निभा रही है। यह ऐसी लीला है जिसने दाम्पत्य को चिरन्तन आश्वस्ति दी है। गौरी सौभाग्य की देवी हैं। भगवान् शिव के चेहरे पर एक गहरी मुस्कान है। भारतीय दृष्टि इसको सुरक्षित करती है, इससे आशीर्वाद रचती है। प्रत्येक कन्या को ऐसा वर मिले, प्रत्येक वर ऐसी ही समझ भरी मुस्कान के साथ जीवन की प्रतिज्ञाओं को पूरा करे।
शाश्वत युगल, उमा-महेश्वर हमें आशीर्वाद दें।
..और.. पार्वती के चरणों का शिलारोहण करते शिव का मन्दस्मित आपका मंगल करे।
यह आज ही की तो बात है..
आज शिवरात्रि है..
शिवरात्रि की अनेक मंगलकामनाएं..!