|| क्षत्रिय इतिहास विकृतिकरण || thread 🧵
क्षत्रिय केवल राजपूत को ही कहा गया है अन्य किसी जाति का क्षत्रिय होने का कोई प्रमाण नही है और ये बात लगभग सारे हिंदू बुद्धिजीवियों को पता है।
फिर हिंदुओं को दूसरे जातियों को क्षत्रिय बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है ?
माननीय जी बात तो आप बड़ी अच्छी कर रहे हैं
बस जो बोल रहे हैं वो कर दीजिएगा,
हमारी टीम का एक एक सदस्य आप की इस मुहिम के साथ है और पैनी नज़र बनाये हुए है।
रोहित मिश्रा के युवा मोर्चा अध्यक्ष बनते ही बढ़ा विवाद। प्रयागराज का एक परिवार इनके ऊपर गर्ल्स हॉस्टल के सामने गुर्गों के साथ घुमने पर बहुत गंभीर आरोप लगाया था। मिश्रा और गुर्गों ने परिवार के साथ मारपीट किया था।
रसूख ऐसा कि FIR कराने के लिए मुख्यमंत्री को हस्तक्षेप करना पड़ा।
ठाकुरों चुल्लू भर पानी में डूब मरो।
तुम्हारी बहन बेटियों को छेड़ने और उनके परिवार वालों के साथ मारपीट करने वाले रोहित मिश्रा को भांडपा ने उपहार दिया है। भांडपा में और भी मिश्रा दूबे चौबे के बनाते कोई दिक्कत नहीं था लेकिन इसे बनाकर एक संदेश दिया गया है।
अपने फायदे के लिए राजपूतों के दबदबा का गाना गाने वाले ब्रजभूषण कहां हैं? वाराणसी के फूलपुर में अपने घर के इकलौते बेटे 40 वर्षीय कारोबारी मनीष सिंह की ईंटों से कूच कूच कर हत्या कर दी गई।
एक वर्ग द्वारा क्षत्रियों के खिलाफ फैलाए गए नफरत और ठाकुरवाद के फर्जी नैरेटिव की कीमत अब आम क्षत्रिय चुकाने लगा है। मुस्लिमों के बाद क्षत्रियों की लींचिंग की जा रही है।
गाजीपुर में विश्वकर्मा की बेटी की एक ब्राह्मण गर्दन काट देता है तो कथित शूरवीर की गुलाम औलादें उसे बचाने के लिए तलवार भांजने लगती हैं, लेकिन मनीष सिंह जैसे लोगों की मॉब लींचिंग जातीय नफरत में कर दी जाती है तो हर तरफ चुपी छा जाती है।
मनीष के माता-पिता की मौत हो चुकी है। वे अपने मां-बाप के इकलौते बेटे थे। उनकी 8 और 6 साल की दो बेटी और 1 साल का एक बेटा है।
मनीष घर के इकलौते थे। जबकि उनकी दो बहनों मनीषा सिंह और मोनिका सिंह की शादी मनीष सिंह 26 अप्रैल को देर रात दोना पत्तल बनाने की अपनी फैक्ट्री से घर लौट रहे थे। रास्ते में घमहापुर गांव में घुसते ही बिंदु प्रजापति नाम की एक महिला उनकी गाड़ी के सामने आकर जख्मी हो गई।
महिला को गिरा देखकर मनीष कार से उतरे और आसपास मौजूद लोगों को मदद के लिए बुलाया। मनीष ने सभी से महिला को अस्पताल लेकर चलने को कहा। उन्होंने कहा कि महिला की इलाज का पूरा खर्चा भी वो ही देंगे।
लेकिन, महिला की मदद करने के बजाए वहां के लोग मनीष पर हमला कर दिए। उनकी गाड़ी तोड़ दी। लाठी डंडों से उन्हें तब तक मारा गया, जब तक वो गिर नहीं गए।
इसके बाद भी दरिंदों ने नहीं छोड़ा। ईंट और पत्थर से मनीष के कुचलते रहे। इससे उनकी दोनों आँखें बाहर आ गई और मनीष की मौत हो गई। उन
पुलिस ने 2 लोगों को गिरफ्तार किया है, लेकिन आरोपियों पर मॉब लॉन्चिंग की धाराएं नहीं जोड़ी हैं।
इस देश में क्षत्रियों के खिलाफ एक संस्थानिक अभियान चलाया जा रहा है। इसमें उनके जमीनों पर कब्जा, उनकी हत्या, राजनीति, न्यायपालिका, मीडिया, प्रशासन से खत्म करने के लिए हर तरह के वैध और अवैध हथकंडे आजादी के बाद से ही अपनाए जा रहे हैं।
इसके बावजूद, बृजभूषण और पवन जैसे लोगों दबदबा-दबदबा की बात करके समाज को रसातल में धकेल रहे हैं।
परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार हैं तो गौतम बुद्ध 9वें।
ये शास्त्रों का कहना है।
जब परशुराम की आलोचना के नाम पर निखिल चावड़ा नाम के एक दलित को गिरफ्तार किया जा सकता है तो गौतम बुद्ध के चरित्र हनन पर कथावाचकों को क्यों नहीं गिरफ्तार किया जाना चाहिए?
क्या कारण है कि ऐसा नहीं होता?
सारण का वो mc एमपी bsdika मर गया या जिंदा है?
और कहां गए उसके चेले चपटे जो उसके कंस्टीट्यूशन क्लब के चुनाव के समय समाज की इज्जत दाव पर लगी हुई है; बोल रहे थे।
यदि राम-कृष्ण क्षत्रियों के पूर्वज है तो जैन तीर्थंकर-बुद्ध भी पूर्वज है, जैन-बुद्ध से दूरी क्यों है क्षत्रियों की??
क्षत्रियों को जैन-बुद्ध की ओर जाना पड़ेगा एक दिन।
दिक्कत केवल राजपूत राजपरिवारों से होती तो समझ में भी आती, लेकिन दिक्कत तुम्हे पूरी राजपूत कम्युनिटी से है।
राजपरिवार तो छोड़ो, जहां तुम्हे राजपूत वर्ल्ड थोड़ा बहुत ग्लोरीफाई करता हुआ दिख जाएं,वहीं चले जाते हो अपने गंदे मुंह से हगने।
माननीय सुप्रीम कोर्ट इन मुद्दो पर भी ध्यान दे 👇
1-असंवैधानिक EWS कोटे को तत्काल समाप्त किया जाए,सिर्फ दुरूपयोग हो रहा है
2-ओबीसी कोटे का पिछड़ा/अतिपिछड़ा आधार पर वर्गीकरण हो
3-आरक्षण की अधिकतम सीमा 50% नियत रहे
मोदी पर भरोसा नही किया जा सकता, सर्वोच्च न्यायालय ही देश को बचाए 🙏
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, यूजीसी द्वारा देश के सरकारी व निजी विश्वविद्यालयों मे जातिवादी घटनाओं को रोकने के लिए जो नये नियम लागू किये गये है, जिससे सामाजिक तनाव का वातावरण पैदा हो गया है। ऐसे वर्तमान हालात के मद्देनजर रखते हुये माननीय सुप्रीम कोर्ट का यूजीसी के नये नियम पर रोक लगाने का आज का फैसला उचित
जबकि देश में, इस मामले में सामाजिक तनाव आदि का वातावरण पैदा ही नहीं होता अगर यूजीसी नये नियम को लागू करने से पहले सभी पक्ष को विश्वास में ले लेती और जाॅच कमेटी आदि में भी अपरकास्ट समाज को नेचुरल जस्टिस के अन्तर्गत उचित प्रतिनिधित्व दे देती।
कपसाड कांड में भी वही होगा जो हाथरस कांड में हुआ था?
पर क्यों?
हाथरस वाले वीडियो में आख़िर के पांच मिनट शायद इस बात का जवाब दे रहे हैं
लिंक: https://t.co/3ZLb4yTg9u