मुझे अक्सर गलत समझा गया है. इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ. लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिसके लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ. यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमें मैंने जन्म लिया है. और मैं इस सदन में पुरजोर कहना चाहता हूँ कि जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव् होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा. अगर कोई ‘आततायी बहुमत’ देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूंगा. मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसीलिए नहीं करूंगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है. जो यहाँ हों और जो यहाँ नहीं हैं, सब मेरी भूमिका को समझ लें. मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव् होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा. लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा.
-बाबा साहब अम्बेडकर
तथाकथित रूप से जितने भी सवर्ण प्रगतिशील बने फिरते हैं. उनके रूख से नकाब हट रहा है.. आहिस्ता ...आहिस्ता
ये लोग ना पत्रकार हैं, ना आलोचक है, ना समाजसेवी हैं , ना एक्टविस्ट है. ये केवल और केवल जातिवादी हैं. जो लोग अपने नाम से सरनेम नहीं हटा पाए , वो ज्ञान ना दे..
दलितों बहुजनों ने रोहित वेमुला मामले में आंदोलन किया. प्रधानमंत्री को सार्वजनिक रूप से रोना पड़ा. स्मृति ईरानी को मानव संसाधन मंत्री पद से जाना पड़ा. वाइस चांसलर को कई महीने छुट्टी पर रहना पड़ा. उना आंदोलन में गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को इस्तीफा लिखना पड़ा. एससी एसटी एट्रोसिटी एक्ट पर आंदोलन किया तो सरकार को बैकफुट पर आना पङा ।
ये होता है आंदोलन.
मनुवादियों . कुछ सीख लो. तुम तो घास भी नहीं उखाड़ पाऐगे। क्योंकि तुम लोग गलत मुद्दे पर हंगामा कर रहे हो। तुम्हारा आंदोलन न्याय का आंदोलन नहीं है.
आंदोलन जरूरी है. लेकिन उसे सत्य और न्याय की ताकत भी चाहिए. वरना आदमी स्कूल बस तोड़ने लगता है.
SC, ST, एक्ट क्यूं ??.... लाया गया...
इस कानून को लागू करने के बाद भी, आज भी लोगों के साथ जातीय भेदभाव जारी है!
जब ये कानून नहीं बनी थी तब, क्या स्थिति होगी सोच सकते हैं!
@ShyamMeeraSingh आतंकी अनिल मिश्रा को छुड़ाने के लिए बाबासाहेब आंबेडकर के संविधान का सहारा नहीं लेना चाहिए। उसके आतंकी समर्थकों को यज्ञ या मंत्र ट्राई करना चाहिए या बागेश्वर से पर्ची निकलवानी चाहिए।
क्रिसमस का विरोध, ईसाइयों के विरोध।
प्रश्न:करने वाले कौन?
उत्तर : जिनके पिता, माँ, स्वयं और बच्चे मिशनरी स्कूलों में पढ़े है या पढ़ रहे है।
हर जिले में अँग्रेजी स्कूली शिक्षा के लिए कम से कम 3 मिशनरी स्कूल आजादी से पहले से चल रहे है। प्रश्न है कि इनमे पढ़ने कौन गया?
दलित = नही। क्योंकि उनके पास इतना पैसा नही था। दूसरा ईसाई मिशनरीज वर्तमान में जितना अब दलित बस्तियों में घुस रहे है उसका 1% भी आजादी के समय दलितो के पास नही गए। जबकिं तब जाते तो आज से आसान उनके लिए रहता।
तो फिर ईसाई मिशनरीज स्कूलों में कौन गया?
वो ही गए जो अपने धर्म के कट्टर बने घूमते है, बकायदा वो पढाई के समय क्रिसमस सेलिब्रेट करते आये है और अब दलितो की बस्तियों में जाकर देखते है कि कोई ईसाई तो नही बन रहा है। क्या आपने कभी सुना कि;
"ऐसा कोई आह्वान ऐसे लोगो ने किया कि ईसाई मिशनरीज के स्कूलों में नही पढ़ना है?"
वास्तव में;
"इन लोगो के लिए अच्छा रहा कि भारत मे जर्मन व पुर्तगलियो को हराकर अंग्रेजो ने राज किया। क्योंकि जँहा जँहा जर्मन व पुर्तगलियो ने शासन किया है, वँहा आसानी से उन्होंने ईसाई धर्म को फैला दिया जबकिं अंग्रेज धर्म को कोई महत्व नही देते थे"
दलितो को अंग्रेजी शिक्षा पर सबसे ज्यादा फोकस करना चाहिए क्योंकि इसके बिना न तो धाराप्रवाह रूप से बोलने का तरीका पैदा कर पाओगे, न मनोबला आएगा और प्राइवेट सेक्टर तो भूल जाए।
16 करोड़ साल पुराने डायनासोर था इसका प्रमाण मिल गया लेकिन आजतक किसी भी 33 करोड़ देवी देवताओं (ईश्वर ) का प्रमाण नहीं मिला क्यों ?
अब सवाल है कि 33 करोड़ देवी देवताओं (ईश्वर) पहले आए थे कि डायनासोर एक भी देवी देवताओं की सवारी डायनासोर नहीं था।
क्या भक्त इसका जवाब दे पाएंगे?
प्रोन्नति में आरक्षण के विरोध में भेड़िया समाज कैसी हूँ हूँ मचाता है, 4000 साल की धूर्तता सिर चढ़ कर बोल रही है। भारत के सभी संसाधनों पर हजारो साल से लठ, ताकत, सत्ता और संपत्ति पर एकाधिकार जमा कर बैठे चन्द मुट्ठी भर बौद्धिक जोंकों ने खुद अपने वास्ते जो आरक्षण दिया था उसकी जवाबदेही कौन करेगा? जातिगत श्रेष्ठता का अहस...ास इन चंद मुट्ठीभर मनुवादियों के दिलो दिमाग पर कितना हावी है कि उनसे यह बर्दाश्त नहीं हो पा रहा कि उनका मातहत कल उनका अधिकारी हो जाएगा? मैं इसी अहसास को उन्हें याद दिलाना चाहता हूँ कि तुम्हारे मातहत रहने वाला युगों से इसी अहसास के साथ जी रहा है। असली मालिक होकर भी वे गुलाम क्यों बना दिए गए, दरिद्र क्यों बना दिए गए उन्हें कुछ कथित सदाचारी दलित क्यों कहने लगे? इतिहास का चक्र किसी को माफ़ नहीं करता, जिसे बुरा लगे नौकरी से इस्तीफ़ा दे- जगह खाली करे, बेरोजगारों की कतार देश में बहुत लम्बी है। योग्यता के भाषण कृपा करके सुनाना बंद करें दुनिया तुम्हारी योग्यता से बहुत वाकिफ हो चुकी है, इन तिलों में कोई तेल नहीं है, फ़ोकट का फूँस है जो जब जलता है तो धुआं अधिक आग कम देता है।
भारत कोई मठ नहीं, बल्कि एक संवैधानिक गणराज्य है। और राज्य किसी धर्म-विशेष की जागीर नहीं।
इस स्पष्ट उल्लेख के बावजूद एक कथावाचक पुंडरीक गोस्वामी को उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा परेड और सलामी (Guard of Honour) दी जाती है—यह सिर्फ़ एक प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि संविधान पर खुला हमला है।
सलामी और परेड राज्य की संप्रभु शक्ति का प्रतीक होती है। यह सम्मान संविधान, राष्ट्र और शहीदों के नाम पर दिया जाता है।किसी कथावाचक, बाबा या धर्मगुरु का रुतबा बढ़ाने के लिए नहीं।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के तथाकथित रामराज्य में अब हालात ये हैं कि—आस्था को संविधान से ऊपर,धर्म को कानून से ऊपर और कथावाचकों को संवैधानिक पदों से ऊपर बैठाया जा रहा है।
यह घटना बताती है कि उत्तर प्रदेश का प्रशासन अब संविधान के प्रति जवाबदेह नहीं, बल्कि धार्मिक सत्ता के आगे नतमस्तक है। यह एक ख़तरनाक परंपरा की ओर इशारा करता है, जहाँ राज्य धीरे-धीरे अपने संवैधानिक चरित्र को त्याग रहा है।
सवाल उठते है— पुंडरीक गोस्वामी हैं कौन?, वे कौन-सा संवैधानिक पद धारण करते हैं?, किस कानून या प्रोटोकॉल के तहत उन्हें Guard of Honour दिया गया?, क्या अब उत्तर प्रदेश में धार्मिक पहचान ही नया सरकारी प्रोटोकॉल है?
मुख्यमंत्री @myogiadityanath को याद दिलाना ज़रूरी है—
1. संविधान की प्रस्तावना भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित करती है, किसी एक धर्म का सेवक नहीं।
2. अनुच्छेद 15: धर्म के आधार पर विशेषाधिकार देना असंवैधानिक है।
3. अनुच्छेद 25–28: राज्य धर्म से दूरी बनाए रखेगा, चरणवंदना नहीं करेगा।
इसका साफ़ मतलब है—संविधान सर्वोच्च है—कोई धर्म नहीं। राज्य का कोई धर्म नहीं होता।
जय भीम,जय भारत,जय संविधान,जय विज्ञान
@UPGovt@CMOfficeUP@dgpup
डॉ० राजेंद्र प्रसाद सिंह कहते हैं कि बहुजनों के लिए नौकरी पा लेना आसान है लेकिन नौकरी निभा लेना बहुत मुश्किल है।क्योंकि मनुवादी हर शाख पर बैठा है।यदि बहुजन सरकारी सेवा में जाकर मनुवादी एजेंडा को आगे बढ़ाते हुए रीढ़ झुका लेता है तो शायद आप बच भी जाएं लेकिन जैसे ही आपने स्वाभिमान के साथ बिना रीढ़ झुकाए नौकरी करना चाहा तो कभी भी किसी झुठे मुकदमे में फँसाकर वर्षों कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगवाकर आपको बर्बाद कर दिया जाएगा।
"RSS अपने चार पुरखों के नाम बताए, जो वन्दे मातरम का नारा लगाकर जेल गए,"
"RSS के मुख्यालय पर 52 साल तक तिरंगा नहीं फहराया, और जिन 3 लोगों ने जबरन तरंगा फहरा दिया उसके खिलाफ RSS 13 साल तक मुकदमा लड़ी.."
~ मा० सांसद @SanjayAzadSln जी
आज देश के असली गद्दारों की पोल खुल रही है!