राघव चड्ढा सहित सात सांसद बीजेपी में शामिल हुए।
इसमें ED सहित बाक़ी तमाम चीजें ही सकती है। लेकिन इससे अरविंद केजरीवाल भी अपनी जिम्मेदारी से निकल नहीं सकते हैं। उन्होंने राज्यसभा पद को ऐसे ही बांटा। पार्टी कैडर को इग्नोर किया। कुछ और प्राथमिकता रखी।
विपक्षी दल को भी अपने रवैये के प्रति आत्ममंथन करना चाहिए कि कोई मौक़ा मिलते ही क्यों निकल लेता है। यहाँ भी आँख मुँदने से काम नहीं चलेगा!
कभी-कभी
एक छोटा-सा मेडल
इतना भारी हो जाता है
कि गर्दन नहीं,
ज़मीर झुकाने पड़ते हैं।
उसकी चमक में
अक्सर छिपा होता है
चुप्पियों का करार
और उसकी कीमत
अरबों-खरबों से भी ज्यादा
आत्मसम्मान में वसूली जाती है।
जय हिन्द
कुछ नहीं....बस यूँ ही