NEET पेपर लीक और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर कांग्रेस ने राजस्थान में सिस्टम हैंग कर दिया,
UP में भी विपक्ष नाम की कोई चीज है क्या,
हाथी, पंजा यहाँ सब फेल है,
बदलाव के लिए सड़क के आंदोलन ही काम आयेंगे।
सोशल मीडिया उसके लिए लोगों को तैयार करने का मंच ही हो सकता है केवल।
राजस्थान में विपक्ष दिख रहा है, यह संतोष की बात है।
आोमप्रकाश राजभर जी को यादवों के द्वापर से लेकर कलयुग तक के गौरवशाली इतिहास का अध्ययन करना चाहिए, योगेश्वर भगवान कृष्ण से लेकर माननीय अखिलेश यादव तक सदैव कमजोर के पक्ष में खड़ा रहने का इतिहास है , और मुगलो के ग़ुलामी करने वालों की ग़ुलामी आोमप्रकाश राजभर स्वयं कर रहे हैं ।
आज अखिलेश यादव ने तमाम इंटरमीडिएट के बच्चों को लैपटॉप दिया।
इसमें कई लैपटॉप विधायक अतुल प्रधान की की तरफ से थे।
खुशी की बात ये भी है कि इसमें 90% लड़कियां हैं 🤩
उसमें कुछ ‘स्पेशल एबिलिटी’ वाले बच्चे भी थे।
सुश्री मोईन,
अंकिता यादव,
रिद्धि तिवारी,
अनन्या यादव,
सपना सैनी,
पायल (जाटव),
किंजल कुमार,
सुश्री आंचल,
नित्या कुमार,
दिव्यांशी शर्मा,
महसर अली,
हर्ष,
सोफिया,
अमन जाटव।
समाजवादी पार्टी के सांसद राजीव राय यूपी में स्मार्ट मीटर की क्रोनोलॉजी समझा रहे हैं 👇
1. पहले बिजली व्यवस्था को प्राइवेट कंपनियों को देने का प्लान आया
2. फिर घरों में जबरदस्ती स्मार्ट मीटर लगाए गए
• इसके पीछे साजिश हो सकती है कि पहले स्मार्ट मीटर की कंपनियों को फायदा पहुंचाया जाए
• फिर उन प्राइवेट कंपनियों को फायदा पहुंचाया जाए, जो बिजली व्यवस्था को संभालने वाली हैं
• इसके बाद इन कंपनियों से अपना हिस्सा लिया जाए
राजीव राय ने इस मामले पर मोदी को पत्र भी लिखा है.
“लड़के हैं, लड़कों से गलती हो जाती है”
नेताजी के इस बयान को राजकुमार भाटी जी ने बहुत अच्छे से समझा दिया है।
ये विषय फर्जी मुकदमों को लेकर था, ना कि तब जब वाकई में दुष्कर्म की घटना हुई हो।
कल का ही उदाहरण ले लीजिए,
चंदौली का अंकित सिंह डूडा में कार्यरत था,
वहां वो एक लड़की के साथ कई साल से रिलेशनशिप में था,
जनवरी में लड़की ने शादी का झांसा देकर रेप का मुकदमा करवाकर जेल भिजवा दिया,
जेल से छूटने के बाद अंकित सिंह की शादी तय हो गई,
कल अंकित सिंह का तिलक समारोह था,
वहां जाकर उस लड़की ने हंगामा किया और समारोह रोकने की कोशिश की।
अब क्या इसके लिए अंकित सिंह को फांसी पर चढ़ा दिया जाए?
अगर आप सोचते हैं कि मुलायम सिंह यादव जी ने गलत कहा था तो अंकित सिंह को फांसी से कम की सजा तो नहीं बनती है।
एक अकेली लड़ जाएगी
जीतेगी और बढ़ जाएगी!
पहले चरण में ही दीदी की सरकार की बेहद मजबूत बुनियाद बन गई है दूसरे चरण में बंगाल की अस्मिता बचानेवाली दीदी की सरकार की बुलंद इमारत खड़ी हो जाएगी।
दीदी हैं, दीदी रहेंगी!
चित्रा जी का Moye Moye हो गया🤣
🚨प्रियंका भारती :
⚡मुझे तो चित्रा त्रिपाठी
⚡चित्रा पासवान
⚡चित्रा मुर्मू
⚡चित्रा पाल
⚡चित्रा यादव
⚡चित्रा महतो समेत जितने भी वंचित महिलाएं है सभी संसद में चाहिए।
पत्रकार चित्रा का चेहरा देखिए।👇
“घास काटने वाली महिला, जो भारत की बेटी है, उसे संसद में ले आओ - हम साथ देंगे।” :- लालू प्रसाद यादव
मुद्दा केवल महिलाओं की संख्या बढ़ाने का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय को वास्तविक रूप में लागू करने का है। यदि आरक्षण के भीतर ही बराबरी सुनिश्चित नहीं की जाएगी, तो क्या सचमुच दलित, पिछड़ी और वंचित समाज की महिलाओं को उसका पूरा अधिकार मिल पाएगा?
लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब भागीदारी सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि वास्तविक और समावेशी हो। महिला आरक्षण के साथ “कोटा में कोटा” की मांग इसी व्यापक और न्यायपूर्ण सोच का हिस्सा है - ताकि हर वर्ग की महिलाओं की आवाज़ संसद तक पहुंचे।
मरहूम शरद यादव जी ने संसद में एक बहुत साफ और ईमानदार बात कही थी "हम महिला आरक्षण के विरोधी नहीं हैं, आप चाहें तो इसे और बढ़ा दीजिए, लेकिन इसमें “कोटा में कोटा” क्यों नहीं?" यह सवाल आज भी उतना ही अहम है, क्योंकि मुद्दा सिर्फ महिलाओं की संख्या बढ़ाने का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय को सही मायनों में लागू करने का है। अगर आरक्षण के भीतर ही बराबरी का ध्यान नहीं रखा जाएगा, तो क्या सचमुच दलित, पिछड़ी और वंचित समाज की महिलाओं को उसका पूरा लाभ मिल पाएगा?
भारत का सामाजिक ढांचा पहले से ही असमान रहा है। ऐसे में यह मान लेना कि महिला आरक्षण का लाभ अपने आप सभी वर्गों की महिलाओं तक बराबर पहुंच जाएगा, हकीकत से आंखें मूंदना है। समाजवादी धारा शुरू से कहती रही है कि महिला आरक्षण ज़रूरी है, लेकिन उसके भीतर भी प्रतिनिधित्व का संतुलन सुनिश्चित होना चाहिए, ताकि राजनीतिक हिस्सेदारी कुछ चुनिंदा वर्गों तक सीमित न रह जाए।
आज जब महिला आरक्षण लागू करने की बात हो रही है, तो यह जरूरी है कि उस मूल सवाल को नजरअंदाज न किया जाए जिसे शरद यादव ने उठाया था। लोकतंत्र की मजबूती तभी संभव है जब भागीदारी केवल प्रतीकात्मक न होकर वास्तव में समावेशी हो। महिला आरक्षण के साथ “कोटा में कोटा” की मांग इसी समावेशी सोच का हिस्सा है।
#Quota_Within_Quota
#WomenReservationBill
महिला आरक्षण बिल में जब तक पिछड़े समाज की महिलाओं और मुसलमान भाइयों की महिलाओं को शामिल नहीं किया जाता,
हम समाजवादी लोग इस बिल का साथ नहीं देंगे,
@MPDharmendraYdv
पीस, कट पीस और लाल लेजर की कहानी।
बिना किसी जलन के ये बात स्वीकारी जानी चाहिए कि इस पीस प्रॉसेस में पाकिस्तान सिर्फ़ मैसेंजर बॉय नहीं था। इस शुक्रवार अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में मुलाक़ात होगी। इस पूरे समझौते को इस्लामाबाद एकॉर्ड नाम दिया जा रहा है।
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ की ये सलाहियत नहीं है कि इतनी काम्प्लेक्स डील करवा सकें। पर्दे के पीछे से आसिम मुनीर इस पूरे खेल को चला रहे थे। उन्हें चीन का साथ मिला हुआ था। उन्होंने ईरान की शर्तों पर ट्रम्प को राजी कर लिया।
अमेरिका के झुकने के एक वजह ये भी है कि अमेरिका और इजराइल की 25000 से ज़्यादा स्ट्राइक के बाद भी ईरान मिसाईल दागने की सलाहियत ख़त्म नहीं की जा सकी।
जंग की शुरुआत में मोसाद का अनुमान था कि ईरान के पास 2500 मिसाइल हैं। इजराइल ने हिज़्बुल्लाह को ख़त्म मान लिया था। ये दोनों ही अनुमान ग़लत साबित हुए। ईरान ने पाकिस्तानी मीडियेटर्स को बताया कि अभी उनके पास 15000 मिसाइल और 45000 ड्रोन का जखीरा पड़ा हुआ है। 14 लाख लोगों ने ग्राउंड इनवेजन की सूरत में आख़िर दम तक लड़ने की क़सम उठाई है। ईरान को तोड़ना अमेरिका और इजराइल के बस की बात नहीं है।
अब आख़िर में बात हमारी भी।
हमारे विदेश मंत्री का पाकिस्तानी मध्यस्थता पर बयान था कि हम किसी के दलाल नहीं है। दरअसल हमने इस युद्ध में विदेश नीति के स्तर पर ब्लंडर किए हैं। हम खुले तौर पर इजराइल के पक्ष में खड़े थे। हमने ईरानी सुप्रीम लीडर की हत्या पर एक बयान देना तक जरूरी नहीं समझा। पाँच दिन बाद IRS डेना के मारे जाने के बाद नैतिक दबाव में हमने ईरान के दूतावास जाकर श्रद्धांजलि दी। जिस ईरान ने कश्मीर के मुद्दे पर भारत का साथ दिया, जिसके साथ हमारी सिविलाइजेशनल संबंध रहे हैं, उस ईरान एक आयल टैंकर निकालने के हमें चिरौरी करनी पड़ी। हम इस शर्त पर आयल टैंकर निकाल पाए कि हम ईरान से आयल ख़रीदेंगे।
पाकिस्तान की जगह हर लिहाज़ से इस युद्ध में मध्यस्थता करवाने की बेहतर स्थिति में थे। इजराइल अमेरिका और ईरान तीनों से हमारे अच्छे संबंध थे। लेकिन हमने ख़ुद को एक ऐसी स्थिति में डाल दिया कि अब ये फादरलैंड हमसे ना निगलते बन रहा है, ना उगलते बन रहा है।
ऑयल टैंकर और गैस कैरियर निकाल लेना डिप्लोमेटिक जीत बताया जा रहा है। जबकि ये कारनामा कई प्राइवेट शिपिंग कंपनिया भी कर पा रही थीं।
लिखने को बहुत कुछ है लेकिन डर लग रहा कि आँख से लेजर मारकर भस्म कर दिया जाऊँगा।
बड़ी खबर,
बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर जी के प्रपौत्र राजरतन आंबेडकर ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव से मुलाकात करके नारा दिया,
“मिले आंबेडकर और अखिलेश, खुल जाएंगे साधुओं के भेष”
आज डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया अपने सबसे निचले स्तर पर पहुँच चुका है।
संसद में आज इस मुद्दे पर माननीय वित्त मंत्री जी से जानकारी मांगी,
यह केवल एक मुद्रा की गिरावट नहीं है, बल्कि यह भाजपा सरकार की दिशाहीन आर्थिक नीतियों का प्रमाण है।
पता नहीं क्यों, लेकिन लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला जी प्रधानमंत्री का नाम सुनते ही ऐसे सतर्क हो जाते हैं, मानो कोई संवेदनशील अलार्म बज उठा हो। सरकार यदि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में चलती है, नीतियाँ उनके नाम पर बनती हैं, तो सवाल भी स्वाभाविक रूप से उन्हीं से पूछे जाएँगे।
लोकतंत्र का सीधा नियम है — जहाँ नेतृत्व, वहाँ उत्तरदायित्व। प्रशंसा स्वीकार्य और प्रश्न असुविधाजनक हो जाएँ, तो संसद की आत्मा थोड़ी असहज जरूर हो जाती है।
@MPDharmendraYdv