@deepakbashyal88@RONBupdates १००% आरक्षण पढाई, शासन सत्तामा हुनेहरुले त साच्चै देश स्वर्ग नै बनायो होइन?
अझ प्रशासन क्षेत्रमा पनि ९१% ल्याउनेहरुले त कहिल्यै भ्रष्टाचार नै गरेन है😂
नोट: दलित दलितबिच प्रतिस्पर्धा भएर धेरै अंक ल्याउनेहरु छानिएर आउने हो।
@Gunatantra_NoNo In History, One ethnic had full reservation in upper Sectors, so they got backed.
why you don't speak about it.
he has passed the Exam in that situation where, he had problem in hand to mouth. Do you know how many people are MBBS doctor from Dalit Community?
@Gunatantra_NoNo@medsane@blackhawak32922 1st of all he has passed the exam Exam and get top between the Dalit Students. 2nd if u are talking about Professional services etc, etc, Sector like Doctor, then listen, to be a doctor he has to pass all sem. of all year, then passed license, this only Entrance for study.
रवि-बालेन-कुलमान मिल्नु अनौठो होईन। शेर बहादुर -केपी ओली-प्रचण्डको नयाँ रुप हो। तर, दुखद नयाँ झन ओली प्रवृत्तिमा बढी मग्न हुनेछ। यिनले पछाडि पारिएका समुदायहरुको हित बिपरित कार्य गर्ने सम्भावना धेरै हुनेछ। साथै मधेश आश्रीत दलको मधेशमै बिश्वास छैन र पनि बिकल्प पनि नदेखिनु दुखद छ।
बालेन-रवि सम्झौता:
१. चार दिन लगाएर जाबो यो सम्झौता?
२. बिभिन्न व्यक्ति संगको भेट बालेनको बार्गेनिङ ट्याटिक्स साबित,
३. सहमतिमा जे लेखिए पनि आन्तरिक सहमति प्याकेजमै हुन सक्छ।
४.बालेनलाई उधारो सम्झौता महंगो पर्न सक्छ, किनकी प्र.म.को लागि धेरै समय र प्रक्रिया बाँकी छ।
नेपाललाई अत्यधिक वैदेशिक हस्तक्षेपबाट रोक्ने माध्यम संघीय संरचना र उन्नत संसदीय व्यवस्था नै हुने देखिन्छ। केन्द्रीयता वा प्रत्यक्ष कार्यकारीले नेपाललाई दिर्घकालिन रुपमा भड्खालमा पुर्याउने एवं जेलेनस्की जन्माउने निस्चित प्राय छ।
Populist ,Nationalist , Fascist हरुको सत्तामुखि संगमले Oppressed ,Suppressed ,Excluded हरु राज्य र राजनीतिबाट गुनात्मक रूपमा किनाराकृत हुने निस्चितप्राय छ।
मौलान शमाइल नदवी ने कैसे बेवकूफ बनाया!
धर्मगुरु या मौलाना किस चालाकी से लोगों को बेवकूफ़ बनाते हैं,मौलान शमाइल नदवी इसका बेहतरीन उदाहरण हैं।
जावेद साहब ने चर्चा के शुरुआती 5–7 मिनट में ही ये साफ़ कर दिया था कि मैं साइंस को उतना नहीं समझता, फिर भी मौलाना पूरी चर्चा के दौरान जानबूझकर साइंटिफ़िक टर्म यूज़ करते रहे। इतना ही नहीं, उसे न समझ पाने के लिए जावेद साहब की खिल्ली भी उड़ाते रहे, तंज़िया अंदाज़ में हंसते भी रहे।
ऐसा नहीं है कि आप किसी वैज्ञानिक फलसफे की बात कर रहे हैं तो आप उसे आसान शब्दों में समझा नहीं सकते। आइंस्टीन ने कहा था कि अगर किसी बात को आसानी से समझा नहीं सकते तो इसका मतलब आप खुद उस बात को ठीक से समझते नहीं।
मनोविज्ञान में Impression Management कहते हैं।
ऐसे लोग चर्चा में जार्गन या बड़े-बड़े तकनीकी शब्दों का इस्तेमाल करते हैं ताकि आप उनका तर्क सुनने के बजाय उनके बड़े-बड़े शब्दों के प्रभाव में आ जाएं, बात की बजाय उसके शब्दों पर फ़ोकस करने लगें। और वो शब्द न समझ आने पर खुद को कमतर मानने लगें और उन बड़े शब्दों को सुनकर जनता भी आपका बौद्धिक रुतबा स्वीकार कर ले।
पूरी चर्चा में मौलाना ने जावेद साहब और वहां मौजूद जनता के साथ यही खेल खेला है।
इस शब्द-जाल का एक टूल की तरह इस्तेमाल किया। कभी भी Contingency के झूले से झूलते रहे। कभी वो infinite regress of causes की डाल पर जा बैठे, कभी वो necessary being की चूसनी चूसने लगे। और जैसे हर अच्छा कॉमेडियन अपनी ऑडियंस को साथ लेकर चलता है, उसी तरह मौलाना भी तालीबाज़ों की एक पूरी मंडली ट्रॉली भरकर साथ लाए थे।
ये मौलाना का ही कमाल था कि उन्होंने इतने बेहतरीन विषय पर, जावेद साहब जैसे Panelist के होते हुए, एक बौद्धिक चर्चा को 24 कैरेट शुद्ध कूड़े में तब्दील कर दिया।
क से कुतर्क
साहब एक तरफ कहते हैं कि अल्लाह अंतिम सत्य है, दूसरी तरफ कहते हैं कि सवाल करने से कौन रोकता है!
कोई पूछे कि ऐसा है तो क्या उनका मज़हब अल्लाह के होने पर भी सवाल की इजाज़त देता है?
सारी लड़ाई इस सवाल करने की इजाज़त की ही तो है। अगर सवाल करने की इजाज़त होगी, तो ईरान में जो महिलाएं हिजाब पर सवाल कर रही हैं, क्यों उनको चुन-चुनकर फांसी पर लटका दिया गया? ईरान में हिजाब-विरोधी प्रदर्शनों में 3 हज़ार लोगों को सज़ा-ए-मौत दे दी गई।
अगर सवाल की इजाज़त है, तो क्या मौलवी किसी चर्चा में नास्तिक से ही सवाल पूछ सकता है या मुसलमान खुद इस्लाम से भी सवाल पूछ सकता है?
और ऐसा है, तो जवाब न मिलने पर क्या उसे इस्लाम छोड़ने की भी इजाज़त है?
एक जगह वो कहते हैं कि देखिए, अगर कोई इंसान इस धरती पर गुनाह करके चैन की ज़िंदगी जी रहा है, तो आपके पास इसका क्या जवाब है कि वो ऐसा क्यों कर पा रहा है। लेकिन हम जानते हैं कि उसके साथ एक दिन इंसाफ़ होगा।
चाचा, कोई पूछे कि “एक दिन उसके साथ इंसाफ़ होगा”—ये भी आपका विश्वास ही है न? उसके साथ इंसाफ़ होगा ही, इसका कोई सबूत तो नहीं है।
आप तो मानते हैं न कि इज़राइल ग़ज़ा में ज़ुल्म कर रहा है, तो ये बताओ कि फिर ऊपरवाला इज़राइल को उसके गुनाहों की सज़ा कब देगा?
1947 तक जिस इज़राइल के पास फ़िलिस्तीन में ग़ज़ा जितनी ज़मीन थी, आज उसने फ़िलिस्तीनियों से ग़ज़ा की ज़मीन भी छीन ली है। लगभग पूरे फिलिस्तीन से ही फिलिस्तीनियों को भगा दिया गया है!
अगर आप मानते हो कि एक दिन पक्का इज़राइल को उसके गुनाहों की सज़ा मिलेगी, तो ये बताओ ऊपरवाले को क्यों लग रहा है कि अभी इज़राइल के पापों का घड़ा भरा नहीं है।
अगर कोई आदमी एक क़त्ल करके सड़कों पर घूम रहा है, तो शिकायत मिलने पर पुलिस फ़ौरन उसे पकड़ लेती है न। अदालत भी फ़ौरन उसको सज़ा देती है।
तो ऊपरवाले की ये कौन-सी अदालत है जो इंसाफ़ तो करती है, लेकिन उसे लगता है कि नहीं, अभी तो इज़राइल ने ग़ज़ा में 50 हज़ार बच्चे ही मारे हैं। 50 हज़ार तो कम है, इसे और क़त्लो-ग़ारत करने दो, फिर देखेंगे।
अब आप कहते हैं कि हममें इतनी अक्ल नहीं कि ऊपरवाले के प्लान को समझ पाएँ तो ये आपने कैसे पता लगाया कि ज़ुल्म इज़राइल ही कर रहा है…अपनी अक्ल से न?
और अगर हम इंसानों की अक्ल ऊपरवाले से कम है तो क्या पता इज़राइल ज़ुल्म नहीं, इंसाफ ही कर रहा हो?
क्या पता फिलिस्तिनियों को ही उनके किसी पाप की सज़ा मिल रही हो, वो पाप जो आप और हम अपनी अक्ल से नहीं समझ पा रहे?
ये कैसा ऊपरवाला है जिसने अमेरिका जैसे देश को इज़राइल का सबसे बड़ा दोस्त बना दिया ?
क्या वजह है कि ऊपरवाला 56 मुस्लिम देशों को मिलकर इतनी हिम्मत नहीं दे रहा कि वो यहूदी शैतान को सबक सिखा सकें?
मैं जानता हूं कि तुम कहोगे कि इसके पीछे ऊपरवाले की वो प्लानिंग है जिसे हम समझ नहीं सकते। अगर ज़ुल्म करने वाले की भी कोई फ़्री विल नहीं है और ये ऊपरवाले की larger scheme of things का हिस्सा है वो एक दिन उसे ज़रूर सज़ा देगा।
अगर ऐसा है फिर तो इज़राइल के फ़िलिस्तीन पर क़ब्ज़े पर भी सवाल मत उठाओ। इस्लामोफ़ोबिया पर भी सवाल मत उठाओ। झारखंड में एक ग़रीब मुसलमान को जब लोग उसके मुसलमान होने की वजह से पीट-पीटकर मार देते हैं, तो क्या इस देश को उस पर भी सवाल नहीं उठाना चाहिए।
हो सकता है ये सब भी ऊपरवाले की किसी larger scheme of things का हिस्सा होगा! ऐसे में मुसलमानों के ख़िलाफ़ होने वाले किसी भी ज़ुल्म पर सवाल उठाना अपने ही ईमान पर सवाल करना है, क्योंकि वो ऊपरवाले की मर्ज़ी से हो रहे हैं। तो उस पर हो हल्ला करके ऊपरवाले की समझ पर सवाल क्यों खड़ा कर रहे हो। और अगर ये सब फ्री विल से हो रहा है तो क्या फ्री विल एक्सपायरी डेट के साथ आती है!
लेेकिन ये सब बातें इतनी खोखली हैं कि सिवाए कयामत के भरोसे या ‘ऊपरवाला ज़्यादा दानिशमंद’ है कि दलीलों के अलावा आप खुद को कोई तसल्ली नहीं दे सकते। असल बात है ताकत की।
जानते हो कि शैतान होने के बावजूद इज़राइल और अमेरिका इतने ताक़तवर क्यों है। कम्युनिज़्म तो इस्लामिक देशों में बैन है, फिर भी जानते हो कि कम्युनिस्ट चाइना आज अमेरिका से भी आगे क्यों है?
क्योंकि इन मुल्कों ने विज्ञान को अपनाया है। विज्ञान से ऊपरवाले की बनाई उसी कायनात के राज़ फ़ाश होते हैं।
हम तकनीक से जुड़ते हैं। तकनीक हमें ताक़तवर बनाती है। और यही ताक़त बाद में उस धर्म को मानने वालों के उस मुल्क की भी ताक़त बनती है। फिर चाहे उसका धर्म या मज़हब कुछ भी क्यों न हो।
तुम्हारे दिलों में कितना भी जज़्बा क्यों न हो, लेकिन हाथ में लाठी लेकर तुम उस आदमी से नहीं लड़ सकते जिसके हाथ में एक 47 है।
अब सवाल ये है कि ये बात कट्टरपंथी को क्यों समझ नहीं आती। तो इसमें बड़ा दिलचस्प विरोधाभास है।
कट्टरपंथी को ये लगता है कि इस दुनिया पर और ऊपरवाले की रहमत पर सिर्फ़ उसका हक़ है जो उसके दीन में ईमान रखते हैं। लेकिन विज्ञान धर्मनिरपेक्ष है। विज्ञान में पानी का फ़ॉर्मूला एक काफ़िर के लिए भी वही है और एक ईमान वाले के लिए भी। और ये बात कट्टरपंथी को बर्दाश्त नहीं।
और पाकिस्तान में यही हुआ है। मौलाना अबुल आला मौदूदी, जो कि Jamaat-e-Islami के संस्थापक थे, उन्होंने ये बोलकर साइंस का विरोध किया था कि जो साइंस पाकिस्तान में पढ़ाई जा रही है, वो इंसान को अल्लाह से दूर लेकर जाती है।
उन्होंने डार्विन की Evolution Theory को कुफ़्र तक बता दिया था। उन्होंने कहा कि साइंस इस तरह पढ़ाई जाए कि हर cause and effect में अल्लाह ही सबसे ऊपर रहे।
इसके बाद पाकिस्तानी हुकूमत ने Institute of Policy Studies, Islamabad की स्थापना की, ताकि मौदूदी के बताए तरीके से साइंस पढ़ाई जा सके। इसके बाद तीसरी कक्षा की साइंस की किताब बनाते वक्त ये हिदायत दी गई कि कोई भी scientific phenomenon अल्लाह से ऊपर न बताया जाए।
मसलन, अगर बच्चे को ये पढ़ाना है कि अगर कोई जानवर दो दिन तक खाना नहीं खाएगा तो वो मर जाएगा, तो इसे ऐसा लिखें कि अगर अल्लाह किसी जानवर को दो दिन तक खाना मुहैया नहीं कराता, तो वो जानवर मर जाएगा।
जैसा कि मौदूदी ने कहा था कि हर साइंस पढ़ाने में अगर हम cause and effect में अल्लाह को शामिल नहीं करेंगे, तो इससे लोग नास्तिकता की तरफ़ जा सकते हैं। उनकी चिंता ये थी कि अगर हम ये लिखते हैं कि energy चीज़ों को मूव करती है, तो इसका मतलब energy ऊपरवाले से ज़्यादा बड़ी हो गई।
इस तरह की कई और हिदायतें दी गईं, जिनके बेस पर वहां विज्ञान की किताबें लिखी गईं। मुझे नहीं पता कि इन सालों में कुछ बदलाव आया है या नहीं। लेकिन हक़ीक़त ये है कि विज्ञान को लेकर मोटे तौर पर इस्लामिक जगत की यही अप्रोच है।
तभी तो नोबेल पुरस्कारों के इतिहास में पांच सौ के क़रीब जिन वैज्ञानिकों को ये पुरस्कार मिला है, उनमें सिर्फ़ तीन मुसलमान हैं। मतलब पूरी दुनिया में 23 फ़ीसदी आबादी होने और 175 करोड़ से ऊपर आबादी होने के बावजूद इतिहास में आज तक सिर्फ़ तीन मुसलमानों को विज्ञान में नोबेल पुरस्कार मिला, और ये तीनों भी वो थे जिन्होंने अपने देश से बाहर जाकर रिसर्च की।
वैज्ञानिक सोच के साथ दिक्कत यही है कि जैसे-जैसे आप cause and effect को समझने लगेंगे, उसी पल आप वैसे कट्टर नहीं रह जाएंगे। और जिस पल आप कट्टर नहीं रह जाएंगे, उसी वक़्त मुल्ला-मौलवियों की पकड़ आपसे कमज़ोर होती जाएगी।
अब मौलाना नोमानी जैसों के साथ दिक्कत ये है कि मज़हब और विज्ञान के इस पहलू पर बात नहीं करेंगे। आप वैज्ञानिक टर्मिनोलॉजी का इस्तेमाल भी अपनी सहूलियत के हिसाब से अपने पक्ष को साबित करने के लिए एक डिबेट में तो करेंगे, लेकिन वही विज्ञान जो आपसे बाकी सवाल पूछता है, आप उससे कन्नी काट जाएंगे।
शब्द-जाल बुनकर लोगों को भरमाएंगे। गोलमोल बात करेंगे। भाड़े की भीड़ से ताली बजवाकर माहौल बनाएंगे। फिर वैसी ही भीड़ सोशल मीडिया पर अपनी सुविधा के हिस्से काटकर Contingency वाली डाल पर आप ही के साथ झूलने लगेगी।
अब डाल टूट जाए और सब एक साथ नीचे गिर पड़ें, तो बुरा मत मानिएगा—हो सकता है ये Larger scheme of things का हिस्सा हो…या किसी टीवी बहस में उल्टे-सीधे तर्क रखने की फौरी सज़ा!
-Neeraj Badhwar
#javedakhtar #islamic #islam #maulana
लौ न समापातीक मै जादा यती खुशी? मधेश-पहाड एउटै हो भन्ने अनी सामानुपातिकमा मधेशी कोटामा जाने?
प्रियतावादीहरुको खासीयत नै यही हो। खैर नवनेताले राजनीति के हो, छिट्टै बुझ्नेछ।