भीड़ का हिस्सा होना
हर बार बुरा नहीं होता
जरूरी नहीं की भीड़ का साथ देना
आपकी अज्ञानता का सूचक या फिर
डर की निशानी ही समझा जाए
अकेला चलना
लीक से हटकर खुद की नई पहचान बनाना
अच्छा है मगर!
उस वक्त अपने चेहरे की परवाह किए बिना
ओढ लेना भीड़ का चेहरा
जब उसके माथे पर लिखा देखो
भूख, गरीबी, बेरोजगारी, अन्याय, तिरस्कार, बेबसी
जब भीड़ का दुख तुम्हें अपना ही दुख लगे
अपने जैसे हजारों, लाखों का दुख लगे
तब बिना एक पल गंवाए
हो जाना उन हजारों, लाखों में तुम भी शामिल
जब किसी एक कमजोर कंधे पर अचानक
आ पड़ा हो दुख का विशाल पहाड़
उसे सहारा देने को
बेझिझक आगे बढ़ा देना अपना कंधा
सुनो!
जब किसी की पीड़ा अपने सुख से बड़ी जानो
उतार फेंकना अपनी सीमाओं का कवच
याद रखना
जब लक्ष्य समुंदर से भी विशाल हों
उन्हें समूह बनकर ही पार किया जा सकता है
अगर भीड़ के पास भीड़ बन जानें के अलावा
कोई दूसरा मार्ग शेष ही ना बचा हो
या फिर तुम्हें भीड़ ना होने पर भी
समझा जाता रहा हो मात्र भीड़
जब सुनने वाला हो गया हो बहरा
या एक अकेले की आवाज बेअसर हो अपनी बात कहने में
तब भीड़ का स्वर बन कर आकाश गूंजा देना
जब किसी शिकारी के मजबूत जबड़े से छीन कर
लाने पड़ जाएँ अपने अधिकार
भीड़ को जरूरत होगी तुम्हारे हाथों की
उस समय तुम सहयोग के लिए निःसंकोच अपनी बाहें फैला देना
जब भेड़ समझ कर उसके रेशों की तरह हर कोई
नोचने में लगा हो तुम्हारी देह से चमड़ा
उस वक्त भीड़ बन कर ही बचाया जा सकता है अस्तित्व
शक्ति और सत्ता के मद में चूर हाथी
जब दुर्बल चींटी जान कर पैरो तले रोंदने लगे तुम्हें
उस पल कतारबद्ध हो चढ़ जाना उसके मस्तक तक
याद रखना भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता
मगर आवाज और ताकत जरूर होती है।
~ चित्रा पंवार
हाथों में जो किताब होनी थी,
वहाँ आज निशान गहरे हैं,
शिक्षा की गुहार लगाने वालों पर,
व्यवस्था के कड़े पहरे हैं।
कलम मांगी थी सुनहरे कल के लिए,
बदले में लाठियां बरसाईं,पूछ रहा है आज देश का युवा, क्या यही है लोकतंत्र की दुहाई?
ज्ञान के मंदिर की चौखट पर, क्यों लहू बहाया जाता है,
हक मांगने वाले छात्र को, क्यों अपराधी बनाया जाता है?
निराशा में आँख का पानी
जब समुंदर बन जाता है
‘इंक़लाब’ तब आता है!!!
कोई अपनी ताक़त पर
जब सर उठा इठलाता है
‘इंक़लाब’ तब आता है!
हुक़ूमतों का घमंड-गुरूर
जब पर्वत सा बन जाता है
‘इंक़लाब’ तब आता है!!!
दौर जब नाइंसाफ़ी का
हद ही पार कर जाता है
‘इंक़लाब’ तब आता है!
जब-जब देश का भविष्य
पूरा दांव पर लग जाता है
‘इंक़लाब’ तब आता है!!!
लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है
जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है
सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है
~ राहत इंदौरी
(ज़द: चपेट, साहिबे मनसद: सिंहासन पर बैठने वाला)
तोड़ दो ज़ंजीर-ए-बातिल तोड़ दो,
रूख़ हवाओं का उधर को मोड़ दो।
तुम ज़माने की नई तक़दीर हो,
तुम ही उठती मौज हो, शमशीर हो।
ज़ुल्म के आगे कभी झुकना नहीं,
राह में आँधी हो पर रुकना नहीं।
तुम सफ़ीर-ए-अमन हो,
तुम हो इंक़लाब,तुम से ही चमकेगा कल का आफ़ताब
~ अली सरदार जाफ़री
इतना अँधेरा तो पहले कभी नहीं था
कि मुँह खोलकर अँधेरे को कोई अँधेरा न कह सके
कि हाथ को हाथ भी न सूझे
कि आँख के सामने घटे अपराध की
कोई गवाही न दे सके
इतना अँधेरा तो पहले कभी नहीं था !
- राजेश जोशी । जन्मदिवस विशेष
#sonamwangchuk#सोनम_वांगचुक
"यदि राम केवल नारों में रहेंगे और मर्यादा व्यवहार से गायब रहेगी, तो मंदिरों में ताले बढ़ते चले जाएंगे" 💯🔥
राम मंदिर में चोरी के मुद्दे पर शेखर सुमन के ये 3 मिनट एकदम लाजवाब है। 🫡🫡
और अंत में जय श्री राम तो बहुत ही गजब। 🚩💯🔥🔥
देशगान / सर्वेश्वरदयाल सक्सेना (पूरी कविता...)
क्या ग़ज़ब का देश है यह, क्या ग़ज़ब का देश है!
बिन अदालत औ' मुवक्किल के मुक़दमा पेश है।
आँख में दरिया है सबके
दिल में है सबके पहाड़
आदमी भूगोल है, जी चाहा नक़्शा पेश है।
क्या ग़ज़ब का देश है यह, क्या ग़ज़ब का देश है!
हैं सभी माहिर उगाने
में हथेली पर फ़सल
औ हथेली डोलती दर-दर बनी दरवेश है।
क्या ग़ज़ब का देश है यह, क्या ग़ज़ब का देश है!
पेड़ हो या आदमी
कोई फ़र्क़ पड़ता नहीं
लाख काटे जाइए, जंगल हमेशा शेष है।
क्या ग़ज़ब का देश है यह, क्या ग़ज़ब का देश है!
प्रश्न जितने बढ़ रहे
घट रहे उतने जवाब
होश में भी एक पूरा देश यह बेहोश है।
क्या ग़ज़ब का देश है यह, क्या ग़ज़ब का देश है!
खूँटियों पर ही टँगा
रह जाएगा क्या आदमी?
सोचता, उसका नहीं यह खूँटियों का दोष है।
क्या ग़ज़ब का देश है यह, क्या ग़ज़ब का देश है!
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