माननीय @BPSCOffice से आग्रह है की विज्ञापन संख्या 42/2025 विशेष विद्यालय अध्यापक भर्ती परीक्षा हुए करीब 6 माह से अधिक समय हो चूका है अतः आपसे निवेदन है की जल्द से जल्द विज्ञापन संख्या -42/2025 का परिणाम जारी करें🙏 @BPSCOffice@BiharEducation_@97RakeshLimba
माननीय @BPSCOffice से आग्रह है की विज्ञापन संख्या 42/2025 विशेष विद्यालय अध्यापक भर्ती परीक्षा हुए करीब 6 माह से अधिक समय हो चूका है अतः आपसे निवेदन है की जल्द से जल्द विज्ञापन संख्या -42/2025 का परिणाम जारी करें🙏 @BPSCOffice@BiharEducation_@97RakeshLimba
मैं बहुत दूर चले जाना चाहता हूँ, इतना दूर कि मेरे नाम का उच्चारण भी थक जाए, मेरी पहचान रास्ते में कहीं उतर जाए और मैं खुद को ढोते-ढोते अचानक हल्का हो जाऊँ। ये कोई पलायन नहीं है, ये बचाव है उस शोर से जो अब आवाज़ नहीं, हिंसा बन चुका है।
ये समाज अब मनुष्यों का नहीं रहा। यहाँ पशु बनना एक रणनीति है। दाँत दिखाना, झपटना, अपने हिस्से से ज़्यादा नोचना और फिर खुद को सभ्य कहलाना। अजीब विडंबना है पशुओं में आज भी इंसान नज़र आता है, और इंसानों में केवल भूख, क्रूरता और चालाकी।
मैं थक गया हूँ हर चेहरे पर नकाब पढ़ते-पढ़ते, हर संवाद में छुपी नीयत समझते-समझते। यहाँ संवेदना कमजोरी समझी जाती है और मौन को अपराध। जो चीख नहीं सकता, उसे कुचल दिया जाता है, और जो सहता है, उसे मूर्ख कह दिया जाता है।
इसलिए मैं विलुप्त होना चाहता हूँ। किसी जंगल में नहीं, किसी पहाड़ पर नहीं, बल्कि उस जगह जहाँ मनुष्य होना अब शर्म की बात न हो। जहाँ आँखें डर नहीं, भरोसा देख सकें, जहाँ हाथ पकड़ने से पहले हिसाब-किताब न किया जाए।
अगर कभी कोई पूछे कि मैं कहाँ चला गया, तो बस इतना कहना, वो इंसान रहने चला गया उस समय में, जब इंसान होना अब यहाँ संभव नहीं रहा।💔
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
ये साल भी गुज़रने को है,अपने जीवन को देखता हूँ तो इस भीड़ में खुद का अस्तित्व धुंधला सा लगता है हर साल के आख़िरी दिनों में मैं ख़ुद को क्यों कोसता हूँ मेरे भीतर ऊर्जा,सामर्थ्य,क्षमता है फिर भी मैं ठहरा हुआ क्यों हूँ शायद ये ठहराव हार नहीं,बल्कि आने वाले बदलाव की ख़ामोश तैयारी है!
न अपनी राह बदलता तो और क्या करता
तुम्हारे साथ ही चलता तो और क्या करता
ये एक बात अंधेरों को कौन समझाये
मैं था चराग़ न जलता तो और क्या करता
मैं आसमान का हो कर ज़मीं पे रहता हूँ
छुपा के ख़ुद को न चलता तो और क्या करता
ये मेरा अपना सफ़र था और अपनी मंज़िल थी
मैं गिर के ख़ुद न सम्हलता तो और क्या करता
वो मेरे ख़्वाबों से निकला है हाथों से तो नहीं
मैं अपनी आँखें न मलता तो और क्या करता
~ आदर्श दुबे🌷
और फिर एक और दिन ढल गया चुपचाप, बिना किसी शोर के, जैसे किसी ने धीरे से आकर कंधे पर हाथ रखा हो और कह दिया हो "चलो, इतना हिस्सा भी तुम्हारी उम्र का कतर लिया गया है।" अजीब-सा लगता है हर शाम, जैसे किसी अनदेखे हिसाब-किताब में एक और पन्ना फटकर गिर गया हो, और हमें पता भी न चला कि उसमें कितने अधूरे सवाल, कितनी अधूरी इच्छाएँ और कितनी ही अनबोली बातें दर्ज थीं।
कभी-कभी मन सोचता है कि दिन आखिर जाता कहाँ है? सुबह तो बिल्कुल साफ होती है उम्मीदों की तरह, एकदम नयी। लेकिन जैसे-जैसे समय बहता जाता है, वैसी ही थोड़ी धुंध, थोड़ी थकान, थोड़ी बेचैनी हमारे भीतर भी जमा होने लगती है। और शाम आते-आते कहीं भीतर कोई धीमी-सी आवाज़ कहती है कि आज फिर कुछ ऐसा था जो पूरा नहीं हो सका, कुछ जो कहना था पर कह नहीं पाया और कुछ जो मन के भीतर ही दबा रह गया।
आज भी ऐसा ही था। दिन खत्म तो हो गया, पर अंदर एक खाली कोना छोड़ गया। जैसे कोई बच्चा अपनी पसंदीदा चीज़ खो दे और उसे समझ ही न आए कि उसकी जगह अचानक इतना सन्नाटा क्यों है। ज़िंदगी का हर दिन थोड़ा-थोड़ा हमसे छीन लेता है उम्र, ऊर्जा, सपने, रिश्तों की चमक, दिल का जोश और हम फिर भी किसी मजबूरी या आदत की तरह अगले दिन की ओर चला देते हैं खुद को, ये सोचकर कि शायद कल कुछ बेहतर होगा।
लेकिन सच ये है कि हर दिन हमें थोड़ा बदल देता है, थोड़ा थका देता है और थोड़ा समझा भी देता है। समझ ये कि किसी भी पल को हल्के में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि वही पल किसी शाम को पछतावा बनकर लौट आता है। आज भी कई चीजें थीं जिन्हें महसूस तो किया, पर जी नहीं पाया। कई लोग थे जिन्हें मन ने पुकारा, पर आवाज़ बाहर तक नहीं पहुंची। कई ख्वाहिशें थीं जिन्हें जुटाकर पकड़ना था, पर वो लापरवाह तितलियों की तरह हाथ से फिसल गईं।
शाम ढलने के बाद हमेशा ऐसा लगता है कि वक्त हमारी मुट्ठी में रेत की तरह था धीरे-धीरे, चुपचाप, बिना पूछे, फिसलता रहा और हम बस उसे रोकने की कोशिश में खुद ही थकते चले गए। कुछ पल ऐसे थे जिन्हें संभाल लेता, कुछ बातें ऐसी थीं जिन्हें मन में रहने न देता पर दिन जैसे हर बार की तरह आगे बढ़ गया और मैं पीछे ही कहीं रह गया अपनी ही सोचों में उलझा हुआ।
कभी-कभी मन चाहता है कि ज़िंदगी को थोड़ी देर रोककर पूछूँ क्या वाकई ये सब ऐसे ही जाता रहेगा? क्या हर दिन यूँ ही ढलता रहेगा और मैं यूँ ही अंदर से थोड़ा-थोड़ा कम होता रहूँगा? जवाब कौन देगा? कोई नहीं। क्योंकि समय तो बस चलता है, उससे बहस नहीं की जा सकती।
और मैं…मैं इस ढलते दिन के अंधेरे में बैठकर बस यही सोचता रह गया कि आज भी कुछ पल थे जो मैंने जिए नहीं, बस गुजर जाने दिए। और हर गुजरता पल मेरे हिस्से की ज़िंदगी से थोड़ा-सा काटकर आगे बढ़ गया जैसे मैं खुद ही अपनी उम्र को तमाशा बनकर देख रहा हूँ।
शायद हर दिन का खत्म होना एक याद दिलाने जैसा है कि ज़िंदगी लंबी नहीं होती, बस हम इसे लंबा मानकर गलती करते रहते हैं। आज का दिन चुपचाप ढल गया और मैं फिर वही पुरानी खामोशियों के साथ एक नए खालीपन में बैठा हूँ खुद को समझाते हुए, जैसे हर बार समझाता हूँ कि "चलो, कल शायद थोड़ा बेहतर होगा।"
लेकिन अंदर का सच जानता है। हर दिन कुछ न कुछ ले जाता है और हम बस उसकी कमी के साथ जीना सीखते जाते हैं। 🖤
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
@Raghvendra_101
लोगों के जीवन में जितने दुःख दिखाई देते हैं, उनमें से आधे असल में अस्तित्व ही नहीं रखते। वे न तो किसी घटना का परिणाम हैं, न किसी त्रासदी का, बल्कि केवल मन के भीतर पनपी एक जटिल कल्पना हैं। एक ऐसी रचना जिसे इंसान खुद गढ़ता है और फिर उसी में फँस जाता है। ये वही कृत्रिम दुःख हैं जो वास्तविकता से ज़्यादा हमारी संवेदनशीलता और तुलना करने की आदत से जन्म लेते हैं।
मानव मन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह हमेशा किसी और के जीवन में अपना प्रतिबिंब खोजने लगता है। जैसे ही कोई दूसरों के सुख-दुःख को अपनी कसौटी से तौलने लगता है, वह अपनी मानसिक स्वतंत्रता खो देता है। वह यह भूल जाता है कि हर व्यक्ति की यात्रा अलग है, उसकी मंज़िलें अलग हैं, और उसके संघर्ष भी।
कभी-कभी कोई व्यक्ति अपने दोस्त को देखता है, जो करियर में आगे बढ़ रहा है, हर जगह सराहा जा रहा है, हर दिन उसके नाम की चर्चा है। वह व्यक्ति जो स्वयं अपने जीवन से अभी तक संतुष्ट था, अचानक भीतर से खालीपन महसूस करने लगता है। वो सोचता है, “मेरे हिस्से में ऐसा क्यों नहीं आया?” धीरे-धीरे वह यह मान बैठता है कि वह असफल है। जबकि सच तो यह है कि उसकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया, बदला है तो सिर्फ़ उसका देखने का नज़रिया। अब वह अपने जीवन को किसी और के फ़्रेम से देखने लगा है, और यही बदलाव एक कृत्रिम दुःख को जन्म देता है।
रिश्तों में भी यही खेल चलता है। जब कोई यह सुनता है कि किसी का साथी हर दिन ‘आई लव यू’ कहता है, तो वो अपने रिश्ते को उसी पैमाने पर परखने लगता है। उसे लगता है कि शायद उसका साथी उतना प्यार नहीं करता। उसे यह महसूस नहीं होता कि हर व्यक्ति का अभिव्यक्ति का ढंग अलग होता है। लेकिन मन नहीं मानता, वह एक तुलना में जकड़ जाता है और वहीं से शुरू होता है वह पीड़ा, जो असली नहीं बल्कि कल्पना की उपज होती है।
सोशल मीडिया ने तो इन कृत्रिम दुःखों को एक नया रूप दे दिया है। अब कोई अपने दिनभर की थकान से गुज़रता है और शाम को स्क्रीन पर किसी और की मुस्कुराती तस्वीर देखता है, किसी की यात्रा, किसी का जश्न, किसी का तथाकथित “परफ़ेक्ट” जीवन। वह भूल जाता है कि तस्वीरें सच्चाई नहीं होतीं, वे सिर्फ़ चुने हुए क्षण होते हैं। लेकिन उसका मन उस क्षण को एक स्थायी वास्तविकता मान लेता है और वह अपने ही जीवन से असंतुष्ट हो जाता है। इस असंतोष की कोई सीमा नहीं, क्योंकि यह कभी बाहर से भर नहीं सकता। यह मन का वह कुआँ है जिसमें जितना पानी डालो, उतना सूखता है।
लोगों के जीवन का बड़ा हिस्सा इस भ्रम में बीत जाता है कि कोई और बेहतर है, कोई और खुश है, कोई और आगे है। वे यह नहीं समझते कि तुलना आत्मा की सबसे सूक्ष्म हत्या है। जो व्यक्ति दूसरों की तुलना में खुद को आंकना शुरू कर देता है, वह धीरे-धीरे अपने मूल्य को खोने लगता है। उसका आत्म-संतुलन टूटता है और एक झूठी पीड़ा जन्म लेती है। एक ऐसी पीड़ा जो दिखने में सच्ची लगती है लेकिन भीतर से बिल्कुल खोखली होती है।
सच्चे दुःख और कृत्रिम दुःख में यही फर्क है, सच्चा दुःख हमें भीतर से बदल देता है, जबकि कृत्रिम दुःख हमें भीतर से खोखला कर देता है।सच्चा दुःख मनुष्य को मजबूत बनाता है, पर कृत्रिम दुःख उसे संदेह और असुरक्षा से भर देता है। वह व्यक्ति हर चीज़ में कमी ढूँढने लगता है, खुद में भी और दुनिया में भी।
जब कोई व्यक्ति इस बात को समझ लेता है कि हर जीवन की गहराई अलग है, कि किसी के पास जो है वो उसके अनुभवों से अर्जित है, और जो हमारे पास है वह हमारी यात्रा का परिणाम है तब वह इन झूठे दुखों से मुक्त होने लगता है। वह यह जान लेता है कि वास्तविकता उतनी कठोर नहीं जितनी हम सोच लेते हैं, बस मन की परछाइयाँ उसे भारी बना देती हैं।
अगर इंसान सीख जाए कि हर चीज़ को “रिलेट” करने की आदत छोड़ दे, कि हर अनुभव को “अपनाने” की बजाय “देखने” का अभ्यास करे, तो उसकी आधी मानसिक पीड़ा खत्म हो जाएगी। जीवन में कई बार ज़रूरत किसी समाधान की नहीं, बल्कि एक साक्षीभाव की होती है, चीज़ों को जैसे हैं वैसे ही देख लेने की क्षमता।
क्योंकि जब हम चीज़ों को जैसे हैं वैसे स्वीकारना सीख जाते हैं, तो जो बचता है वह सिर्फ़ शांति होती है। और वही शांति सबसे बड़ी सच्चाई है, न कल्पना की, न तुलना की, न किसी और से उधार ली हुई बल्कि अपनी, पूरी तरह से अपनी।
जीवन की असली सुंदरता तभी सामने आती है जब हम कृत्रिम दुखों की परतों को उतार फेंकते हैं और अपने भीतर के मौन को सुनते हैं। वह मौन जो कहता है “सब कुछ वैसा ही है जैसा होना चाहिए था।” 🌹
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
@Raghvendra_101
आज कुछ खास सा महसूस हो रहा। ऐसा लग रहा है जैसे मैं किसी ऐसी राह पर चल पड़ा हूं, जहां लौटने का सवाल ही नहीं उठता। रास्ता अनंत है, लेकिन उसमें थकान नहीं, बल्कि एक अजीब सा सुकून बसा है। तुम्हारा हाथ थामे हुए लगता है जैसे पूरी दुनिया थम गई हो, और अब सिर्फ़ हम हैं। मैं और तुम, और हमारे बीच की अनंत ख़ामोशी।
ये ख़ामोशी बोझिल नहीं बल्कि मीठी है, जिसमें शब्दों की ज़रूरत ही नहीं। हर कदम पर तुम्हारी उंगलियों की गर्माहट मुझे याद दिला रही है कि मंज़िल मायने नहीं रखती, मायने रखता है ये सफ़र और उसमें तुम्हारा साथ।
मैंने महसूस किया कि समय भी शायद इस सफ़र के सामने हार मान लेता है। वह ठहर जाता है, जैसे हमें देख कर कहता हो चलो, तुम दोनों चलते रहो, मैं तुम्हारे लिए रुक गया। सच कहूं तो ये एहसास किसी जादू से कम नहीं, मानों पूरी कायनात ने हमें अपनी बाँहों में ले लिया हो।
बस यूं समझ लो अगर सफ़र में तुम्हारा हाथ थामे चलने को मिले तो लौटने की ख्वाहिश क्यों होगी? तब तो बस यही दुआ होगी कि यह रास्ता कभी ख़त्म न हो और हम हमेशा इस खामोश, गुमसुम, लेकिन बेहद खूबसूरत सफ़र में खोए रहें। ❤️
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
रातें खास तौर पर तुम्हें लिखने के लिए बनाई गई हैं। जब शहर की रौशनी थककर सो जाती है, तभी मेरे शब्द उठते हैं बेबाक, निर्विवाद, और बहुत मानवीय। मैं लिखता हूं कि तुम्हें लिखकर मैं अपनी गुमशुदगी को पहचान सकूं, तुम्हें लिखकर मैं खुद से मिलने की कोशिश करूं। और शायद, तुम्हें लिखकर मैं तुम्हें कुछ बताना चाहता हूं कि तुम्हारे बिना भी तुम्हारी मौजूदगी मुझे पूरा कर देती है। 🤷
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
आज की रात कुछ और भारी है, और इस भारीपन के बीच तुम्हारी बातें किसी दिये की लौ की तरह टिमटिमा रही हैं। मुझे लगता है, अगर ये बातें मेरे पास न होतीं तो शायद ये खामोशी मुझे पूरा निगल जाती। तुम्हारी हर बात, चाहे वह मामूली हो या अधूरी, मेरे भीतर उस जगह को भर देती है जहाँ खालीपन सबसे ज़्यादा दर्द करता है।
कभी सोचता हूँ, यह कैसी ताक़त है शब्दों की? जो बोलकर खत्म हो जाते हैं, पर उनकी गूँज, उनकी परछाई, उनका असर सब मेरे भीतर किसी नमी की तरह बस जाता है। मैं उन बातों को फिर पढ़ता हूँ, याद करता हूँ, और हर बार लगता है कि जैसे तुम यहीं हो, बहुत पास। ये कोई धोखा नहीं, ये सच्चाई है क्योंकि मेरे अकेलेपन ने तुम्हारी बातों को अपना घर बना लिया है।
आज जब दिनभर की उलझनों से थककर लौटा तो एकदम पहली चाह यही हुई कि तुम्हारी कही हुई कोई पंक्ति याद करूँ। और जैसे ही वह याद आई, मुझे महसूस हुआ कि थकान आधी रह गई है। यह किसी दवा का असर नहीं, ये किसी रिश्ते की गहराई का असर है, जो शब्दों के ज़रिए मेरी साँसों में उतर आता है।
तुम्हारी बातें मुझे बचाती भी हैं और मुझे तोड़ती भी हैं। बचाती इसलिए कि वो याद दिलाती हैं मैं अकेला नहीं हूँ, तोड़ती इसलिए कि हर बात के पीछे तुम्हारी मौजूदगी का एहसास है, और तुम्हारी गैर-मौजूदगी उस एहसास को चोट देती है। पर शायद यही टूटना मुझे ज़िंदा रखे हुए है। इंसान बिना दर्द के अधूरा है, और मैं तुम्हारी बातों के इस दर्द में कहीं पूरी तरह अपने आप को पा लेता हूँ।
मैं सोचता हूँ तुम्हें शायद यह एहसास भी नहीं होगा कि तुम्हारी कही हुई एक हल्की-सी बात कितनी दूर तक मेरे साथ चलती है। एक साधारण सा वाक्य मेरे दिन का आधार बन जाता है। कभी-कभी तो लगता है कि मैंने तुम्हें तुम्हारी बातों को भी ज़्यादा संजीदा बना लिया है, जैसे किसी तस्वीर को उसके असली रंगों से भी गहरा कर दिया हो।
रात के इस सन्नाटे में मैं अपनी साँसों के बीच तुम्हारी आवाज़ ढूँढता हूँ। खामोशी जब चुभने लगती है, तो तुम्हारे शब्द उसे नर्म बना देते हैं। ये खामोशी अब खालीपन नहीं बल्कि तुम्हारे शब्दों का आश्रय-स्थल बन गई है। तुम्हारी बातें मेरे भीतर किसी मंदिर की घंटी की तरह धीरे-धीरे पर लगातार गूँजती रहती हैं ।
आज मैंने अपनी डायरी के इस पन्ने पर यह दर्ज कर दिया है कि तुम्हारी बातें मेरे लिए अब सिर्फ यादें नहीं रहीं, वो मेरी आदत बन चुकी हैं। मैं उन्हें जीता हूँ, उन्हें थामे रखता हूँ, और जब कभी टूटने लगता हूँ, वो मुझे दोबारा जोड़ देती हैं। यह जोड़ना इतना गहरा है कि अब मुझे डर भी नहीं लगता कि मैं अकेला हूँ।
यूं समझ लो मेरे पास भले ही और कुछ न हो, पर तुम्हारी बातें हैं। और जब तक वो हैं, ये खामोशी मुझे कभी भी पूरी तरह अकेला नहीं कर पाएगी।🖤
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
@airtelindia का फ्रॉड चल रहा है जिसमे कोई भी गाइडलाइन नहीं दे रखी है कि इसका एक बार ही उपयोग किया जा सकता है अगर आप 199 वाला रिचार्ज करते हैं तो इसकी वैधता यहीं खत्म हो जाएगी बचे 331 आपके व्यर्थ हो जाएंगे @narendramodi @Airtel_Presence @JioCare
@airtelindia का फ्रॉड चल रहा है जिसमे कोई भी गाइडलाइन नहीं दे रखी है कि इसका एक बार ही उपयोग किया जा सकता है अगर आप 199 वाला रिचार्ज करते हैं तो इसकी वैधता यहीं खत्म हो जाएगी बचे 331 आपके व्यर्थ हो जाएंगे @narendramodi @Airtel_Presence @JioCare
तुम्हें पढ़ते हुए जो एहसास होता है, वो किसी कल्पना की उड़ान नहीं बल्कि हकीकत है। जैसे कोई बहुत जाना-पहचाना चेहरा, जिसे बरसों से देखा नहीं, अचानक सामने आ खड़ा हो चुप, लेकिन सब कुछ कहता हुआ।
तुम्हारे शब्दों में कुछ ऐसा होता है जो दिखावे से बहुत दूर है। कोई साजिश नहीं, कोई बनावट नहीं सिर्फ़ सच्चाई। वो सच्चाई जो भीतर तक उतर जाती है, जो चेहरे पर एक हल्की मुस्कान ला देती है, और उसी मुस्कान के पीछे कहीं आंखें भी थोड़ी भीग जाती हैं।
तुम्हें पढ़ते हुए ऐसा नहीं लगता कि कोई कहानी पढ़ रहा हूं, बल्कि ऐसा लगता है जैसे किसी ने मेरी ही ज़िंदगी को चुपचाप देखा हो और फिर उसे शब्दों में दर्ज कर दिया हो बिना पूछे, बिना कहे लेकिन पूरे हक़ से।
तुम्हारे हर वाक्य में एक अपनापन है, जैसे तुम नहीं लिख रहीं, कोई बहुत अपना लिख रहा हो, जो जानता है कि कब मैं टूटा था, कब चुप रहा, और कब ज़रूरत थी बस किसी के यह कह देने की "मैं समझता हूँ।"
ये जो निखार है चेहरे पर, ये कोई चमत्कार नहीं, ये वो असर है, जब कोई तुम्हें बिना मांगे, बिना शर्त समझ लेता है। और वो समझ, अगर शब्दों में मिले तो पढ़ते-पढ़ते तुम बस थम जाते हो, चुप हो जाते हो, और दिल से बस एक ही बात निकलती है…"तुमने कैसे जाना?"
और फिर उसी पल समझ आता है ये शब्द मेरे लिए ही लिखे गए थे।🌷
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️