India doesn’t need U.S. permission to secure its energy needs. What you’re calling permission is simply a sanctions waiver under U.S. law for transactions that pass through the dollar based financial system. That’s how global finance works, whether one likes it or not.
India has continued buying discounted Russian oil for years despite Western pressure, precisely because New Delhi makes decisions based on national interest.
Turning every technical sanctions mechanism into a sovereignty crisis may sound dramatic on social media, but it doesn’t change the reality that India’s energy policy is decided in New Delhi, not Washington.
@Bunty_Gopalmath@Profdilipmandal जोगेंद्र नाथ मंडल को लग रहा था कि पाकिस्तान में जिन्ना उसे गृहमंत्री बनाएगा लेकिन जिन्ना उसके Gand पर लात मार कर भगा दिया और बोला यहां किसी दलित को मंत्री नहीं चाहिए।
हे देवी, "नालंदा को किसने जलाया" विवाद का आज मैं अंत कर देता हूं.
नालंदा को जलाने के लिए आप दो ब्राह्मणों को जिम्मेदार ठहराती हैं जबकि इसके प्रमाण के तौर पर उस दौर का आपके पास कुछ नहीं है. कई सौ साल बाद की एक गप्प है.
आप दो भारतीय पद्धतियों- बौद्धों और हिंदुओं को टकराव की स्थिति में देखने का मनोरथ रखती हैं, और वाम एजेंडे के तहत, इस्लाम को बदनामी से बचाने की कोशिश करती हैं. इसलिए अपनी कथा गढ़ लेती हैं, जिसमें खिलजी विलेन नहीं है.
आप यह भी नहीं देख पातीं कि इससे कुछ ही साल पहले ह्वेनसांग लिखते हैं कि कन्नौज में धर्म सभा में बराबर संख्या (लगभग 8,000) भंते और हिंदू पुजारी आपस में मिलकर धर्म चर्चा करते हैं. ये दोनों धर्म टकराव में थे ही नहीं.
खिलजी के दौर में लिखी किताब भी आपके लिए प्रमाण नहीं है, जिसमें लिखा है कि खिलजी ने बौद्ध विहार जलाए और भंते और पुजारियों का वध किया. आपको नालंदा से सटा हुआ बख्तियारपुर नहीं दिखता?
आप वामपंथी लोग धन्य हैं! जो दिख रहा है, जो प्रमाम है, जो खिलजी खुद बताना चाह रहा है, उसकी अनदेखी और जो नहीं है, उसकी स्थापना.
आप किनको खुश कर रही हैं?
हे देवी, इतिहास कई बार लोक आख्यानों, लोकगीतों और कथाओं में भी जिंदा रहता है. नालंदा को खिलजी द्वारा जलाया जाना इलाके के मुसलमानों के बीच गर्व और हिंदुओं के बीच शोकान्तिका के आख्यानों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है. ये लोकगीतों और कथाओं में है. टूरिस्ट गाइडों की कथाओं में है. हर साल लाखों लोग इस जीवंत इतिहास को लेकर नालंदा से जाते हैं.
कोई रोमिला थापर या डीएन झा या रुचिरा शर्मा से बड़ी है लोगों की यादें. तो अब ये कोशिश बंद करें. विवादों में बने रहने के लिए तमाम और विषय हैं. मैं मदद कर सकता हूं.