जगन्नाथ मंदिर और मठों की संपत्ति पर किसका नियंत्रण?
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"अब जगन्नाथ मंदिर की ओर आपने कहा, वहाँ की समिति ने तो एक सत्संग भवन भी नहीं बना पाया...
गोवंश की रक्षा की बात छोड़ दीजिए।
श्री जगन्नाथ मंदिर, श्री मंदिर कहते हैं, वहाँ की तो समिति ने एक सत्संग भवन ही नहीं बना पाया। वहाँ मैं प्रवचन भी नहीं कर सकता (हँसते हुए)।
जबकि आदि शंकराचार्य जी ने श्री जगन्नाथ जी आदि को पुनः प्रतिष्ठित किया। 114 वर्षों से भगवान जगन्नाथ आदि का दर्शन ही संभव नहीं था, पाताल में थे। भगवान शंकराचार्य जी ने 2501 वर्ष पूर्व जगन्नाथ जी को वैशाख शुक्ल दशमी के दिन फिर से प्रतिष्ठित किया। सारी पुरानी प्रथा को शास्त्रसम्मत रीति से उन्होंने कार्यान्वित किया।
और पुरी के शंकराचार्य वहाँ के सर्वोच्च पदाधिकारी होते हैं। गोवर्धन मठ, पुरी के इष्टदेव हैं जगन्नाथ जी, इष्टदेवी हैं विमला जी। लेकिन वहाँ पुरी के शंकराचार्य भी प्रवचन नहीं कर सकते, सत्संग भवन भी नहीं है।
सीढ़ियां भी ठीक नहीं हैं, समझ गए न? सीढ़ियां भी ठीक नहीं हैं, स्वस्थ व्यक्ति तो चढ़ जाए किसी तरह, जिसके घुटने आदि में दर्द है, वह तो वहाँ जाकर गिर सकता है, कुछ भी हो सकता है।
तो उस मंदिर की... से वहाँ के संस्थान से हम सोचें कि किसी और जगह गौशाला बने! जब वहाँ एक सत्संग भवन नहीं बना सकता है संस्थान... सरकार का पूरा नियंत्रण है, और धन जाता कहाँ है... सरकार जाने!
और धीरे-धीरे तो जगन्नाथ जी के नाम पर सभी मठों की संपत्ति ले ली गई। हमारी 5 एकड़ जमीन, कुल में आश्रम... वह भी ले लिया गया।
और जगन्नाथ समिति का अर्थ होता है- मुख्यमंत्री सीधे! घुमा-फिराकर मुख्यमंत्री। महंतों को यह कह दिया गया कि आप ईंट भी नहीं लगा सकते, उत्तराधिकारी नियुक्त नहीं कर सकते... सरकारी चमचे अब महंत बनेंगे, शंकराचार्य बनेंगे!
माने राष्ट्र को नष्ट करने के लिए शासन तंत्र के माध्यम से इतना अत्याचार हो रहा है, जितना अत्याचार मुगलों और अंग्रेजों के शासनकाल में नहीं हुआ।
अब रह गई बात, जिनको हम समृद्ध संस्थान समझते हैं... ध्यान देना चाहिए, वह सब शासन तंत्र के अधीन हैं। शासन तंत्र कैसे चाहेगा कि गोवंश की रक्षा हो?
समझ गए न? साक्षी गोपाल में ही गोहत्या होती है खुलेआम! ओडिशा में साक्षी गोपाल में ही गोहत्या होती है, तो गोपालन का मार्ग तो शासन तंत्र अपनाएगा कैसे?"
विष्णु की संतानें: दक्षिण भारत में जन्म-पूर्व जीवन-चक्र के संस्कार
यह 'विष्णुबलि' है, एक ऐसी रस्म जिसे वैखानस ब्राह्मण पुजारी करते हैं। ये पुजारी दक्षिण भारत के तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में विष्णु मंदिरों में पीढ़ियों से सेवा करते आ रहे हैं। यह रस्म गर्भावस्था के आठवें महीने में होती है और सदियों से इस समुदाय का हिस्सा रही है। यह परंपरा के भीतर चल रही एक पुरानी बहस से जुड़ी है कि क्या कोई व्यक्ति सिर्फ़ जन्म से ही मंदिर की सेवा के लिए योग्य हो जाता है या किसी औपचारिक रस्म के ज़रिए। इस रस्म में आग जलाई जाती है और पुजारी पति का मार्गदर्शन करते हुए विष्णु के बारह रूपों को आहुति दिलवाते हैं; हर रूप को घी का भोग लगाया जाता है। फिर भगवान के प्रतीक—चक्र और शंख—को गर्म करके दूध की खीर में डुबोया जाता है, ठीक वैसे ही जैसे दूसरी जगहों पर दीक्षा लेने वालों की बांह पर निशान (ब्रांडिंग) बनाया जाता है। पति अपने हाथ से वह निशान वाली खीर अपनी पत्नी को खिलाता है, जबकि कमरे में मंत्रोच्चार और संगीत गूंजता रहता है। यह पल पूरी रस्म का मुख्य हिस्सा है, क्योंकि माना जाता है कि इसके ज़रिए विष्णु गर्भ में प्रवेश करते हैं और जन्म से पहले ही होने वाले बच्चे को अपना मान लेते हैं।
आज जिस तरह से यह रस्म निभाई जाती है, वह दो व्यावहारिक हैंडबुक—'सूत्रानुक्रमणिका' और 'पूर्वप्रयोग'—पर आधारित है, जिनका इस्तेमाल पुजारी विष्णुबलि को चरण-दर-चरण संपन्न करने के लिए करते हैं। इस रस्म का मूल ग्रंथ 'वैखानसस्मार्तसूत्र' है, जिसमें सबसे पहले बौधायन परंपरा (लगभग 600-300 ईसा पूर्व) में गर्भावस्था के आठवें महीने में होने वाली रस्म के तौर पर विष्णुबलि का वर्णन किया गया है। इसके अलावा, इसका गहरा अर्थ—खासकर यह विचार कि यह रस्म बच्चे को जन्म से पहले ही विष्णु भक्त के रूप में चिह्नित करती है—संस्कृत ग्रंथ 'दशविधहेतुनिरूपण' से आता है। इसे श्रीनिवास दीक्षित नामक विद्वान ने लिखा था और साथ ही इसकी व्याख्या 'तात्पर्यचिंतामणि' के रूप में की थी। यह रिकॉर्डिंग इस रस्म को असल में निभाते हुए दिखाती है, और यह एक दुर्लभ मौका है जब हम ऐसी चीज़ को असल ज़िंदगी में होते हुए देख सकते हैं जिसका वर्णन आमतौर पर केवल संस्कृत ग्रंथों में ही मिलता है।
गंगा में बाढ़ आने के 4 घंटे पहले ही इस बाबा ने बता दिया था!
उनको ये कैसे पता चला ये पूछने पे इन्होने जो कारण बताया वो आप के होश उड़ा देगा!!👇
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ऐसे लोग भी है आज के समय में! और ऐसे ही होते है असली संत! अब आप ही सोचिये कल्कि भगवान आयेंगे तो ऐसे भक्तो को अपने साथ रखेंगे या तेरा-मेरा और पोलिटिक्स करने वाले पाखंडी लोगो को?
भविष्य मालिका में भगवान कल्कि के जिन करीबी भक्तो के बारे में बताया गया है वो सब गृहस्थ भी बहुत बड़े नामजपी और विशुद्ध भक्ति वाले बताये गए है! तो कोई भी कलियुगी मानसिकता में पड़ा हुआ व्यक्ति भगवान का करीबी नहीं हो सकता! पाखंडी लोगो से दूर रहिये; विशुद्ध भक्ति वाले निश्छल लोगो का ही संग कीजिये, ऐसे लोगो का संग ही आप का उद्धार करेगा
इस विडिओ में बाबाजी ने ये भी बताया है की रावण भी त्रिसंध्या करता था, 4 वेद, 6 शास्त्र और 18 पुराणों का ज्ञाता था! जब हनुमानजी लंका में गए तो वेद की ध्वनी सुनके आश्चर्य में पड़ गए थे! इतना ज्ञान और प्रखर बुद्धि होने के बावाजूद भी रावण नहीं बच पाया | क्यूँ ? क्यूँ की मन निर्मल नहीं था!
सार समजिये और कर्म काण्ड की जगह पावन हृदय और शुद्ध मन से सच्ची भक्ति कीजिये | लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति होना चाहिए, संसार में नाम कमाना या दिखावा नहीं!
ऐसे विशुद्ध ज्ञान देने वाले और शुद्ध हृदयी संतो को मेरा सादर दंडवत प्रणाम! 🙏
#HanumanAnsh
आपको मालूम है जिन वैदिक स्थलों या चार धामों का आप दर्शन कर रहे हैं, उनको आपके लिये सुलभ किसने किया ? ईस्वी सन से 507बर्ष पूर्ब स्वयं शंकर भगवान ने शंकराचार्य के रूप में जन्म लेकर जनमानस के कल्याणार्थ सुलभ करवाया। मूर्तिभंजकों ने कोई भी ऐसा दिव्य स्थल सुरक्षित नहीं छोड़ा था।
यह वो आस्था है, जहाँ बड़े से बड़े वैज्ञानिक और उनका विज्ञान भी फेल हो जाते हैं।
हनुमत डटे रहो आसन पर
जब तक दंडवत ना हो सरकार।
जय हो शिव अवतारी, सियाराम दुलारे, उज्जैन के खड़े हनुमान जी महाराज की 🙏🏻🚩
स्वधर्मानुष्ठान का परमफल निरावरण स्वप्रकाश ब्रह्म साक्षात्कार नि:श्रेयस मोक्ष ही है।
—अनन्तश्रीविभूषित यतिचक्रचूड़ामणि अभिनवशंकर सर्वभूतहृदय वेदभाष्यकार धर्मसम्राट स्वामी श्रीकरपात्रीजी महाभाग
(संपूर्ण चलचित्र को देखें,सनातनधर्म का पूरा सार केवल इस ६ मिनट क्लिप में सन्निहित है)
वोट बैंक की राजनीति और वर्तमान आरक्षण व्यवस्था ने देशको अव्यवस्थित करने में कोई कसर बांकी नहीं छोड़ी है। भारत में जन्मजात आरक्षण था और है, लेकिन आज अपनी विरासत को सम्हालने वाला कोई भी नहीं है। कोई सम्हालता भी तो मुफ्त का राशन देकर उसे शहनशाह बना दिया गया है, मेहनत क्यों करे !