नेहरू की आरंभिक जीवनियों में एक प्रमुख जीवनी है माइकेल ब्रीचर की लिखी हुई- Nehru: A Political Biography. नेहरू के जीते जी ही इसका हिंदी अनुवाद हरिवंश राय बच्चन ने किया था। हालांकि मूल पुस्तक करीब साढ़े छह सौ पन्नों की है। लेकिन बच्चन जी ने पुस्तक के संक्षिप्त संस्करण का अनुवाद किया था, जो तक़रीब 240 पृष्ठों का था। बच्चन जी ने लिखा है कि बहुत कम समय उन्होंने इसका अनुवाद कर दिया था। वे खड़े होकर डायस पर रखकर अनुवाद करते थे, और जब दायाँ हाथ थक जाता था तो बायें हाथ से अनुवाद करने लगते थे। मोतीलाल बनारसीदास से प्रकाशित यह किताब आज भी उपलब्ध है।
भारत फर्जी बुद्धिजीवियों से भरा हुआ देश है, जहाँ समस्याओं को गिनवाने वाले ज्ञानी एक से बढ़कर एक हैं लेकिन समाधान के नाम पर जीरो।
मौजूदा बीजेपी और RSS की सत्ता के संरक्षण में महामूर्खों और वाचालों को उच्च पदों पर बैठा दिया गया है।
एक समाज हो या परिवार, उसकी परिणीति और विकास की गति काबिल, कर्मठ और साहसी लोगों के हाथों ही संभव है।
भारतीय समाज का असल दुर्भाग्य ही यही है कि यहाँ डिग्री ही सब कुछ है।
हम शने-शने बौद्धिक पिछड़ेपन के शिकार हुए और अब आधुनिक वैज्ञानिक परिवेश में पिछलग्गू हो चले हैं।
हमारे यहाँ पद की लालसा ही जीवन का ध्येय है और यही अंतिम लक्ष्य भी है।
क्या इन मापदंडों और मानसिकता से हम एक उत्कृष्ट समाज की परिकल्पना भी कर सकते हैं? कदापि नहीं।
आज हम मानसिक गुलाम हैं, दोबारा जल्द ही शारीरिक गुलाम भी होंगे।
Technology may transform our lives, but consideration remains irreplaceable. A timely reflection on the quiet power of kindness. #Consideration#Kindness#Empathy https://t.co/KHXtt8I2yN
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Asha Bhosle was never just a singer. She was a woman of immense courage—one who lived life on her own terms, made difficult choices, endured pain, found love again, and above all, remained unapologetically herself. A tribute by @DivyaLNDixit https://t.co/NYKHXF1rVb
Jawaharlal Nehru at the age of four (c. 1893)
One of the earliest known photographs of India's first Prime Minister, taken during his childhood in Allahabad.
*टोपरा का वह अशोक स्तंभ जिसकी भाषा को 400 वर्षों तक कोई पढ़ नहीं सका,*
*अंग्रेज जेम्स प्रिंसेप ने जब पढ़ा तो 2200 वर्ष पुराने भारत के इतिहास का पता चला*
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एड आर एस वर्मा
13वीं शताब्दी में दिल्ली में *फिरोज शाह तुगलक* शासन कर रहा था, उसे शिकार खेलने का बहुत ही शौक था, एक बार वह *टोपरा*, मेरठ (उ प्र) के जंगलों में शिकार खेलने गया तो उसे जंगल के बीच में सोने की तरह चमकता हुआ एक स्तंभ मिला, वह स्तंभ इतना खूबसूरत था कि जब उसमें जब सूर्य की रोशनी पड़ती थी तो ऐसा लगता था की सोने की बूंदे झर रही हो,
स्तंभ की खूबसूरती को देखकर वह स्तंभ को उखड़वा कर लाया और अपने किले के ऊपर लगवा लिया, स्तंभ में कुछ इबारत लिखी हुई थी जो किसी के पढ़ने में नहीं आ रही थी तो उसने बनारस के विद्वान *ब्राह्मणों* को इबारत पढ़ने के लिए बुलाया, उसमें से एक ब्राह्मण ने बताया कि यह स्तंभ *महाभारत काल* के भीम की गदा है, इसमें लिखी हुई भाषा *संस्कृत* है, इसमें महाभारत के युद्ध की कहानी लिखी हुई है,
फिरोज शाह तुगलक विदेशी था, उसकी भाषा *अरबी* थी, वह भारत की भाषाओं से अपरिचित था, इसलिए उसने ब्राह्मण की बात को मान लिया और यह बात लगातार 500 वर्षों तक भारत में प्रसारित होती रही,
भारत में जब अंग्रेज आए तो उन्हे भी महाभारत की कहानी बताई गई स्तंभ में लिखी लिपि को संस्कृत भाषा बताया गया
1837 में अंग्रेज *जेम्स प्रिंसेप* को भी यही कहानी बताई गई लेकिन जब प्रिंसेप ने संस्कृत की लिपि और उसमें लिखी इबारत से मिलान किया तो दोनों लिपियों में अंतर नजर आया, तब उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यह संस्कृत भाषा की लिपि नहीं हो सकती, कोई और भाषा है, जिसकी जानकारी भारत के बड़े-बड़े ब्राह्मण विद्वानों को भी नहीं है
उसने ब्राह्मणों की बातों पर विश्वास नहीं किया और स्तंभ में लिखी हुई लिपि को पढ़ने की कोशिश किया, इत्तेफाक से उसे श्रीलंका से एक पुस्तक मिली जिसमें स्तंभ में लिखी हुई लिपि जैसी लिखावट थी, श्रीलंका की उस लिपि के जानकार को उसने दिल्ली बुलवाया और स्तंभ में लिखी हुई इबारत को जब पढ़वाया तो मानो, भारत के एक नए इतिहास का पता चला,
जिसकी जानकारी ब्राह्मणों को भी नहीं थी पिछले 500 वर्षों से जिस लिपि को वे भारतियों को संस्कृत भाषा बताकर मूर्ख बनाये हुए थे, उनकी सारी पोल खुल गई रहे थे,
वास्तव में वह संस्कृत भाषा नहीं थी *अशोक* की *धम्म लिपि* थी, इस रहस्योद्घाटन से मानो ब्राह्मणों के पांव के नीचे जमीन खिसक गई हो, जिस झूठी कहानी को वह पिछले 500 वर्षों से प्रचारित करके भारत के लोगों को मूर्ख बनाये हुए थे, उनकी सारी पोल खुल गई,
यहां से एक नए इतिहास का पता चला कि इस देश के अंदर 2000 साल पहले कोई *सम्राट अशोक* था जिसकी जानकारी ब्राह्मणों को भी नहीं थी
अंग्रेजों के प्रयास से भारत के एक नए इतिहास का पता चला जो जमीन के नीचे दफन था,
अंग्रेजों ने सम्राट अशोक और चंद्रगुप्त मौर्य के उस दफन इतिहास को जमीन खोद खोदकर बाहर निकलना शुरू किया,
तो ब्राह्मणों ने अशोक के दादा *चंद्रगुप्त मौर्य* के सिर पर एक काल्पनिक *चाणक्य* को बैठा दिया।
#AshokaTheGreat
They wanted the funeral to look like an ending.
Tehran turned it into a fist in the sky with a beautiful drone show.
Messages do not always need speeches.
Sometimes one symbol is enough
to say:
We did not and will not break.
टी. एन. शेषन देश के मुख्य चुनाव आयुक्त थे। एक बार वे अपनी पत्नी और सुरक्षा दल के साथ उत्तर प्रदेश के दौरे पर जा रहे थे। रास्ते में उनकी पत्नी की नज़र एक पेड़ पर लटक रहे सुंदर बया के घोंसले पर पड़ी।
घोंसला इतना आकर्षक था कि उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,
“यह घोंसला मुझे ला दीजिए, घर सजाने के काम आएगा।”
शेषन साहब ने तुरंत अपने एक सुरक्षाकर्मी को घोंसला उतार लाने का निर्देश दिया।
सुरक्षाकर्मी ने पास ही भेड़-बकरियाँ चरा रहे एक किशोर को बुलाया और कहा,
“बेटा, यह घोंसला उतार दो। दस-बीस रुपये मिल जाएंगे।”
लेकिन लड़के ने बिना एक पल सोचे साफ़ इनकार कर दिया।
सुरक्षाकर्मी ने पैसे बढ़ाने की बात भी कही, पर वह टस से मस नहीं हुआ। आखिरकार उसने लौटकर सारी बात शेषन साहब को बता दी।
यह सुनकर शेषन साहब स्वयं कार से उतरे और उस किशोर के पास पहुँचे। उन्होंने मुस्कुराकर कहा,
“अगर तुम यह घोंसला उतार लाओगे तो मैं तुम्हें दस नहीं, पूरे पचास रुपये दूँगा।”
लड़के ने फिर भी विनम्रता से मना कर दिया।
शेषन साहब ने हैरानी से पूछा,
“इतने पैसे भी नहीं चाहिए? आखिर क्यों?”
किशोर ने मासूमियत से घोंसले की ओर देखा और बोला,
“साहब, इस घोंसले में छोटे-छोटे बच्चे हैं। शाम को उनकी माँ उनके लिए दाना लेकर आएगी। अगर घोंसला ही नहीं मिलेगा, तो उसे कितना दुख होगा। चाहे आप जितने भी पैसे दे दें, मैं यह घोंसला नहीं उतारूँगा।”
उस अनपढ़ चरवाहे के इन सरल शब्दों ने देश के सबसे शक्तिशाली अधिकारियों में से एक टी. एन. शेषन को भीतर तक झकझोर दिया।
बाद में इस घटना का उल्लेख करते हुए शेषन साहब ने लिखा
“आज भी मुझे इस बात का अफसोस होता है कि एक उच्च शिक्षित आईएएस अधिकारी होने के बावजूद मेरे मन में वह संवेदना क्यों नहीं थी, जो उस अनपढ़ किशोर के मन में थी। उस दिन मेरी डिग्रियाँ, मेरा पद, मेरी प्रतिष्ठा और मेरा अहंकार—सब उस बच्चे की करुणा के सामने छोटे पड़ गए। उसने मुझे सिखाया कि बुद्धि, पद और धन तभी सार्थक हैं, जब उनके साथ संवेदनशीलता भी हो।
- सोशल मीडिया से साभार
एक होटल में एक आदमी दाल रोटी खा रहा था, अच्छे परिवार का बुज़ुर्ग था, खाने के बाद जब बिल देने की बारी आई तो वो बोला की उसका बटुआ घर रह गया है, और वो थोड़ी देर में आकर बिल चूका जाएगा,
काउंटर पर बैठे होटल के मालिक जो सरदार जी थे ने कहा "कोई बात नहीं, जब पैसे आ जाएं तो दे जाना" और वो वहां से चला गया,बेयरा ने जब ये देखा तो उसने काउंटर पे बैठे सरदार जी को बताया कि ये आदमी पहले भी दो तीन होटलों में ऐसा कर चुका है, और ये पैसे कभी नहीं भरेगा,
इसपर होटल के मालिक ने कहा " वो सिर्फ दाल रोटी खाकर गया है, कोई बटर चिकन या कोफ्ते पनीर खाकर नहीं गया, उसने अय्याशी करने के लिए नहीं, सिर्फ अपनी भूख मिटाने के लिए खाना खाया है, वो इसे एक होटल नहीं गुरुद्वारा समझकर आया था,और हम सिख लोग लंगर के पैसे नहीं लेते....Read News