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सरकारें आएंगी, जाएंगी, पार्टियां बनेंगी, बिगड़ेंगी मगर ये देश रहना चाहिए।
चूंकि देश सर्वोपरि है और एक राजनेता को अव्व्ल अपने देश के लिए पूरी निष्ठा से काम करना चाहिए। 🥀
#अटल_बिहारी_वाजपेयी
सोनम वांगचुक जी के नहीं, सरकार के vitals डाउन हुए हैं। तभी संवाद की जगह पुलिस और पर्दों का सहारा लेना पड़ा। यह किसी व्यक्ति की नहीं, एक घबराई हुई सत्ता की कहानी है।
#StandWithSonamWangchuk#JantarMantar@Cockroachisback
@TheKPMalik लड़ाई अभी अधूरी है सर, सत्ता संवेदनहीन होती है।
सोनम वांगचुक की अधूरी लड़ाई अब कायदे से विपक्ष को लड़ना चाहिए और धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा न होने तक संघर्ष जारी रखना चाहिए, तभी सरकार परीक्षा प्रणाली में कुछ ठोस सुधार के लिए कदम उठाएगी।
@TEJASHCHAU27052@dibang मेरी सरकार और अन्ना हजारे जी से सविनय निवेदन है कि वह सोनम वांगचुक जी का अनशन जल्द से जल्द समाप्त कराएं और उनके अमूल्य जीवन की रक्षा करें।
सुप्रीम कोर्ट में उठी आवाज़...
सिर्फ़ अवमानना या न्याय व्यवस्था के आत्ममंथन का संकेत?
सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश के प्रति अभद्र टिप्पणी निंदनीय है, क्योंकि न्यायपालिका की गरिमा लोकतंत्र की आधारशिला है। लेकिन क्या इस घटना को केवल अवमानना मानकर छोड़ देना पर्याप्त है, या यह न्याय व्यवस्था में घटते जनविश्वास और बढ़ते असंतोष का भी संकेत है?
दरअसल, न्याय में देरी, लंबित मुकदमे, पारदर्शिता पर सवाल और संवेदनशील मामलों की सुनवाई को लेकर उठती बहसें अब व्यापक सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा हैं। लोकतंत्र में संस्थाओं का सम्मान आवश्यक है, लेकिन समय-समय पर उनका आत्ममंथन भी उतना ही जरूरी है।
- के. पी. मलिक
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