“हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
जनता की रोके राह, समय में ताव कहाँ?”
जंतर-मंतर पर आंदोलन जारी है। प्रदर्शनकारियों की भीड़ को देखकर सरकार को अंदाजा लगा लेना चाहिए कि सवर्ण जाग गए हैं!
Use your phone less.
Use your phone less.
Use your phone less.
Use your phone less.
Because attention is not free.
A brain imaging study found that smartphone addiction was associated with structural and functional differences in brain regions involved in attention, emotion, and self-control.
Science in 2026: reels deactivate your brain's self control centre.
Krishna, 5000 years ago:
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥
Gita 2.62-63
Keep watching things you enjoy, you get hooked.
Being hooked becomes craving.
When craving is not satisfied, you get restless and angry.
Anger confuses the mind.
A confused mind forgets everything. When memory goes, your thinking power dies.
And when thinking power dies, the person is finished.
That is exactly what scrolling does. Watch, get hooked, crave more, lose focus, lose memory, lose self control.
Same truth. One needed an fMRI machine. One needed nothing.
And people still ask why we praise our shastra.
Good one! Very alarming but informative!
For all, including Gen Z and others! How foreign forces can manipulate the minds of our people using Social Media platforms and their engineered algorithms!
@GyanJaraHatke Nhi aayegi..likh k le lo... kyuki ye log behre aur satta k nashe me doob chuke hai
Inke spokesperson ho, IT cell waale ho ya minister sab be lagam ho chuke hai..bina logic ki baate krwa lo inse bas
1952 में 600-700 जातियाँ दलित थी, बाबा साहेब के संविधान ने 600 और जोड़ दिया, यानी 5000 वर्ष के मनुवादी, ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने 600 अछूत जातियाँ दी, 70 साल के बाबा साहेब संविधान ने 600 और जोड़ा। तार्किक रूप से सुधीजन ये बताएँ कि आरक्षण से जातियों का उत्थान हो रहा है या पतन?
SC के 135-145 IAS ऑफ़िसर्स हैं, 50-62000 क्लास 1 ऑफ़िसर्स, डेढ़ से पौने दो लाख क्लास 2 ऑफ़िसर्स हैं इस देश में। अंबेडकर को उनके शिक्षक ने और तत्कालीन महाराज सयाजीराव गायकवाड ने उन्हें विदेश भेजा, फिर छत्रपति शाहूजी महाराज ने उनकी लंदन की पढ़ाई पूर्ण करवाई।
अब प्रश्न यह है कि ऊपर के IAS, क्लास 1 और 2 के लगभग 2 लाख अफ़सरों में से कितनों ने अपनी ही जाति समूह के बच्चों को स्पॉन्सर किया है?
मीना समाज 1000% अधिक ओवर रिप्रिजेंटेड है, जाटव का भी प्रतिनिधित्व SC वर्ग में अधिक है, यादव, कुर्मी, जाट, गुर्जर को OBC में देख लीजिए! तो प्रश्न यह है कि असली आदिवासी, भील कहाँ हैं ST में?
मुसहर, माँझी, वाल्मीकि, सुदर्शन, बहेलिया, बंतार, डोम, हलालखोर, तुरी, पासी, भंगी और मदारगी के बच्चे स्कूल भी पहुँच पा रहे हैं? OBC की लगभग 1,000 जातियों की सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी शून्य या नगण्य है, जैसे कश्यप, केवट, मल्लाह, निषाद, बिंद, राजभर, पाल, बघेल, बढ़ई, कुम्हार, लोहार, तेली, चौरसिया, नाई (सैलानी) और नोनिया!
फिर कहा जाता है क��� आर्थिक आधार पर रिजर्वेशन नहीं होना चाहिए, क्योंकि जो दो-चार जातियाँ सारा आरक्षण खा रही हैं, उनकी आर्थिक स्थिति भी ठीक है, पर उन्होंने स्वयं को इन जाति समूहों में राजनैतिक रूप से ब्लैकमेलिंग करके घुसा रखा है, इसलिए वो कभी भी अपनी ही जाति समूहों में आरक्षण नीचे तक नहीं जाने देंगे।
इसीलिए, Reservation पर ReThink, Rationalise, Reform और अंततः Remove करने के लिए हमें चर्चा करनी चाहिए।
चूँकि मेरे दिए गए समाधान न तो जनवरी में माने गए, न फ़रवरी में (नीचे कमेंट में), और आज पुनः हम उसी मोड़ पर हैं जहाँ भाँग खाने वाले सलाहकारों और पे-रोल पर पलने वाले चापलूस 'कीप काम एंड ट्रस्ट मोदी' का जाप कर रहे हैं, मैं फिर भी पतितों की तरह कुछ समाधान बिंदु लिख रहा हूँ।
यह मैं इसलिए नहीं करता कि कोई इसे पढ़ कर अपनी अंतरात्मा जगा लेगा या सरकार मेरी बात मान लेगी, ये मैं केवल डॉक्यूमेंटेशन के लिए लिखता हूँ कि मैं केवल समस्या बताने वालों में से नहीं था, बल्कि मैं समाधान भी दे रहा था।
1. PM को सामने आ कर विद्यार्थियों, उनके परिजनों से सीधे बात करनी चाहिए। वहाँ स्वीकारिए कि यह समस्या है और सरकार उसे अभी तक केवल आंशिक रूप से सही कर पायी है, वृहद समाधान में समय लगेगा, और आप तत्परता से उस पर कार्य कर रहे हैं। क्या कर रहे हैं, उस���ी एक झलक भी द���खाएँ/बताएँ।
2. अब धर्मेंद्र प्रधान को हटाना उचित नहीं लगता क्योंकि यदि अभी ऐसा होता है तो 'जो सबसे लंबा अनशन करेगा, उसके हिसाब से मंत्री हटाए जाएँगे' की एक परिपाटी बनेगी। वो हटे, पर अभी तो बिल्कुल नहीं। बात यह नहीं है कि कॉकरोच की डिमांड क्या है, बात यह है कि 28 करोड़ लोगों के द्वारा चुनी सरकार को अराजकतावादियों के हिसाब से मंत्री नहीं बदलना चाहिए। समर्थकों के कहने पर नहीं हटाया तो इन पर तो बिल्कुल नहीं।
3. चाहे NEET हो, SSC हो या अन्य परीक्षा, इसे ऑब्जेक्टिव तक ही सीमित ना रख कर इसका एक-दो चरण ऐसा हो कि केवल MCQ ही उनका भविष्य तय ना करे। बोर्ड तक उसकी सतत समझ की क्षमता के साथ साक्षात्कार आदि को भी डाला जाए या IIT की तरह उसे भी बड़ा बनाया जाए। यदि यह संभव ना हो तो ��प IIT या UPSC से सीखें कि उनकी परीक्षा के प्रश्न लीक क्यों नहीं होते।
4. हर कोचिंग संस्थान, विद्यालयों और महाविद्यालयों में विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखने के लिए मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता की नियुक्ति अनिवार्य की जाए ताकि हर 40 मिनट में एक विद्यार्थी आत्महत्या ना करते रहें।
5. हर विभाग का परीक्षा कैलेंडर (हर चरण का दिन पूर्व निर्धारित) हर वर्ष निकले और परीक्षा केंद्र छात्रों क�� सहजता के हिसाब से हो ना कि रैंडम। अभी ऐसी स्थिति है कि सेंटर अनावश्यक रूप से 4-500 किलोमीटर दूर तक दे दिए जाते हैं। इसका कोई तर्क नहीं होता।
6. पेपर लीक से जुड़ी फर्म ही नहीं, उनसे जुड़े व्यक्ति और उनके परिजन तक ब्लैकलिस्टेड होने चाहिए कि ये लोग इसी व्यवसाय में पुनः कहीं से भी नहीं आ सकते। यदि कोई सरकारी व्यक्ति पैसा खा कर ऐसा कुछ भी करता है, उन्हें कोई टेंडर आदि दे देता है तो उस पर देशद्रोह का केस चले और न्यूनतम 20 वर्ष का दंड हो।
7. ऐसे अपराध से जो जुड़े हों, उन्हें शिक्षा मंत्रालय का अपना ट्रिब्यूनल हैंडल करे और ऐसी सुनवाई 'इन कैमरा' होने के स्थान पर 'ऑन कैमरा' सार्वजनिक रूप से हो। इसे एक तय समयसीमा में निपटाने की बाध्यता हो। यदि यह सार्वजनिक नहीं होता तो फिर से हर चीज मैनेज हो जाएगी और इसका कोई महत्व नहीं रहेगा।
8. इस नौटंकी आ��दोलन में जो भी हैं, एक-एक को चिह्नित कर, उनका उदाहरण बनाया जाए। हाँ, कुछ वास्तविक विद्यार्थी भी होंगे, तो उन्हें काउंसलिंग के साथ छोड़ दिया जाए, परंतु अराजक तत्वों को, यदि वो किसी पार्टी से हैं, 18 वर्ष से ऊपर के हैं, तो उन्हें जेल में डाला जाए, उन्हें जीवन में कोई नौकरी ना मिले यह सुनिश्चित किया जाए और यह हर हिंसक आंदोलनकारी को बताया जाए कि प्रदर्शन का अधिकार है, आगजनी और हिंसा का नहीं।
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और भी कुछ सुझाव होंगे, परंतु अभी इतना ही। सरकार ऐसा कुछ नहीं करेगी पर 'दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है' के लिए मैं यह लिख रहा हूँ।
A Mumbai govt hospital advised a pregnant woman's family to consider transferring her elsewhere, as pre-delivery fetal assessment indicates her newborn will likely require NICU care, and all of their NICU beds are currently occupied.
The woman's husband called Shiv Sena (Shinde) corporator Ramesh Mhatre, who arrived with his goons and assaulted doctors and nurses.
If you understand how hospitals work, you'll know a bed not being available is not the doctor's fault. You can't ask another critical newborn to vacate a bed, nor can you provide NICU care on the floor, nor can you "arrange bed from some other dept" because a NICU bed isn't just a bed, it comes with ventilators, monitors, oxygen, infusion pumps, and other life-support equipment.
So the blame, if any, goes on the govt. But doctors are the easiest targets, and assaulting them earns politicians easy political mileage.
I know some will say, "Doctors are evil and deserve it," and that's fine. I'm not seeking sympathy. This post is for parents and medical aspirants. Unless your parents own a hospital, you choose govt jobs with better working conditions like the Army, paramilitary, or Railways, plan to pursue USMLE (or an equivalent pathway), or intend to move to private practice where you can arrange your own security, think carefully before choosing this profession.
Most govt hospitals are hellholes. You can serve patients well for decades and still end up being abused or assaulted by a tenth-pass corporator, a publicity-hungry politician chasing cameras, or patient relatives who think every death could have been prevented if only the doctor had "tried harder."