@WasimAkramTyagi@AshwiniVaishnaw सातवीं शताब्दी के आस पास मेरे देश को एक फुन्सी हुई थी जिसका इलाज नहीं किया गया था 47 तक आते आते उसने कैंसर का विकराल रूप ले लिया जिसके फलस्वरूप मेरे देश के २ टुकड़े हो गए उस कैंसर का कुछ टुकड़ा देश में बच गया था जो फिर विकराल रूप ले रहा है। इस कैंसर का इलाज आवश्यक है।
@sherajai@ShivAroor Please don’t push your agenda. Corruption was there before 2014, exists today, and—unless there are fundamental systemic reforms—will continue to remain a challenge in India. Political rhetoric should not replace facts. Governments may change, but the need for transparency?
IPS trainee Rahul Bansal, who gave emotional gyaan about corruption in his civil services mock interview, now charged with accepting ₹1 crore bribe in cyberfraud case. https://t.co/CLcOcgUIiT
@DainikBhaskar समाचार पत्रों के माध्यम से प्राप्त जानकारी के अनुसार, श्री नितिन गडकरी ने अपनी आने वाली पीढ़ियों को आर्थिक रूप से अत्यंत संपन्न बनाने की व्यवस्था कर ली है। यदि यह जानकारी तथ्यात्मक है, तो जनता के समक्ष पूर्ण पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
@Lawyer_Kalpana जब तक हम स्वयं अपने चरित्र का निर्माण नहीं करेंगे, तब तक अच्छे समाज की अपेक्षा करना व्यर्थ है। समाज में सड़क बनाने वाले और उस पर चलने वाला भी हम ही हैं, वहाँ दोष व्यवस्था का नहीं, हमारे चरित्र का भी है। समाज परिवर्तन कानून से नहीं, बल्कि व्यक्ति के चरित्र से प्रारम्भ होता है।
@SamarRaj_ मनुष्य अक्सर अपनी ओर से ऐसी प्रथाएँ बना लेता है, जिन्हें वह ईश्वर को प्रसन्न करने का माध्यम मानता है। परंतु हर प्रथा ईश्वर की आज्ञा नहीं होती; कई केवल मनुष्य की बनाई हुई परंपराएँ होती हैं।
@_sayema साईंमा जी अगर आप में थोड़ा भी सच बोलने का साहस है तो मेरी इस बात को उत्तर दे ?
नूपुर शर्मा जी किस सड़े हुए समाज के भेदभाव और दोहरे मानदंडों की शिकार हैं?
क्या आप उस सड़े हुए समाज के ख़िलाफ़ आप कुछ बोल पाएंगे?
@PragyaLive जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग देश के प्रधानमंत्री के लिए किया गया, क्या वही भाषा यदि कोई आपके लिए प्रयोग करे तो क्या आपको वह स्वीकार्य और उचित लगेगी? यदि नहीं, तो किसी भी व्यक्ति के लिए ऐसी भाषा का प्रयोग उचित नहीं ठहराया जा सकता।
@Lawyer_Kalpana@rsprasad रविशंकर जी हमारे एक मामले में अधिवक्ता रह चुके हैं। मैं उनकी भाषा-शैली और व्यक्तित्व से भली-भांति परिचित हूँ। वे अत्यंत सभ्य, संयमित और मर्यादित व्यक्ति हैं। इसलिए मुझे विश्वास नहीं होता कि उन्होंने इस प्रकार की भाषा या टिप्पणी की होगी।
@ShahSheikh19 ये मज़ारें नहीं है सरकारी ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने की एक साधन है। मुस्लिम देशों में मज़ारें क्यों नहीं मिलती?
क्या भारत में सारे महान मुसलमान पैदा हुए हैं?
@Sachingupta धर्म का उद्देश्य लोगों को जोड़ना है, कष्ट देना नहीं। यदि किसी धार्मिक आयोजन से आम जनजीवन, शिक्षा और रोजगार प्रभावित होने लगें, तो लोगों का विश्वास भी कम होने लगता है। 12 तारीख तक ढाबों और स्कूलों का बंद रहना इस चिंता का एक उदाहरण है। आस्था और व्यवस्था दोनों में संतुलन आवश्यक है।