अपनी भूमि, पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, मेघालय विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया है जिसमें राज्य में कहीं भी यूरेनियम खनन और यूरेनियम अयस्क प्रसंस्करण सुविधाओं की स्थापना का विरोध किया गया है।
@SangmaConrad@HemantSorenJMM
झारखंड का एक पुलिस ऑफिसर आदिवासी को गाली देते हुवे।
ढेर आदिवासी नेता बन गया है भोस#### माररेंगे तो गाड़े फाड़ देंगे ।
क्या करवाई हुवा इस ऑफिसर के ऊपर?
क्या नौकरी से निकाला?
क्या फांसी हुआ?
@JharkhandPolice
मैं स्वयं आदिवासी समाज से आता हूँ। हमारे लिए ‘आदिवासी’ केवल एक पहचान नहीं है यह हमारे पुरखों का इतिहास, हमारी संस्कृति, हमारा संघर्ष और हमारा स्वाभिमान है। जब कोई पुलिसकर्मी इसी पहचान को गाली की तरह इस्तेमाल करता है, किसी आदिवासी को सरेआम अपमानित करता है या डराता-धमकाता है, तो चोट केवल उस एक व्यक्ति को नहीं लगती; पूरा आदिवासी समाज आहत होता है।
हम पुलिस को अपना विरोधी नहीं मानते। अन्याय होने पर सबसे पहले वर्दी से ही सुरक्षा और न्याय की उम्मीद करते हैं। लेकिन जब वही वर्दी हमारी पहचान को अपमानित करे, तब हम अपनी पीड़ा लेकर कहां जाएं?
आधा दर्जन से अधिक ऐसे वीडियो वायरल हो चुके हैं। पुलिस एसोसिएशन बताए क्या उसने इनमें से किसी मामले में अपने स्तर से अपने किसी भी मेंबर पर कोई कार्रवाई की? किसी दोषी पुलिसकर्मी की सार्वजनिक भर्त्सना की? उसके विरुद्ध वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र लिखकर कठोर कानूनी कार्रवाई की मांग की? यदि हां, तो उससे जुड़े पत्र, प्रस्ताव या अन्य प्रमाण सार्वजनिक करे।
अपने सदस्यों के अधिकार और सम्मान के लिए खड़ा होना एसोसिएशन का दायित्व है, लेकिन संस्था की नैतिकता तभी प्रमाणित होती है, जब वह अपने बीच के गलत लोगों के विरुद्ध भी उतनी ही मजबूती से खड़ी हो। अन्यथा उसकी चुप्पी पीड़ित आदिवासियों को यही संदेश देती है कि उनकी गरिमा और पीड़ा का कोई मूल्य नहीं है।
यह सवाल पुलिस के विरोध का नहीं, पुलिस व्यवस्था पर हमारा विश्वास बचाने का है। हम केवल इतना चाहते हैं कि हमारी पहचान को गाली न बनाया जाए और वर्दी के पीछे छिपकर हमारा अपमान करने वालों को संरक्षण न मिले।
@JharkhandPolice
22 से ज्यादा बैगा #आदिवासी बच्चों की मृत्यु हो चुकी है कई अस्पताल में भर्ती है लेकिन देश में कही पर भी इसका जिक्र नहीं है
न कही किसी ने केंडल मार्च निकाला न कोई और चर्चा डिबेट हुई
कुछ लोग दुखी हैं कि ओबीसी क्रांति क्यों नहीं करते? 50 परसेंट से ज्यादा आबादी है, पर क्रांति नहीं करते! लेफ्ट का भी इन पर सबसे कम असर रहता है. नक्सलवाद में भी ये नहीं गए.
आखिर क्यों?
भाई, ओबीसी का इतिहास रुलिंग क्लास का है. मुसलमान आक्रमण से पहले तक, हर सौ में से 80 से 90 तक राजा उन जातियों के थे, जिनको आज ओबीसी कहा जाता है.
नंद, पाल, मौर्य, कुशवाहा/कोइरी, अहीर/यादव, निषाद, गुर्जर, महिष्य, हैहय, कुनबी, जाट, लोधी, तेली, सैनी, मराठा, ग्वाला, वोक्कालिगा, कुरमी, कापू, माली, कलवार, तैलिक, कुम्हार, धानुक...
इनमें सबके कुल में राजा थे.
मंदिर इनके, जलवा इनका. किसकी औकात थी या है कि इनका मंदिर प्रवेश रोक दे? मंदिर आंदोलन का नेतृत्व किया है ओबीसी ने.
कौन सी ओबीसी जाति ऐसी है, जो खुद को क्षत्रिय या ब्राह्मण नहीं मानती? कुर्मवंशी और यदुवंशी क्षत्रिय हैं तो कुम्हार प्रजापति ब्राह्मण हैं. सबका ऐसा ही है.
कुर्मी या अहीर को शूद्र या नीचा कह कर तो देखिए. डंडा लेकर दौड़ा लेगा दूर तक.
किस सत्ता के खिलाफ क्रांति करें ये? अपने खिलाफ?
ओबीसी राजा थे. इनका पतन हुआ इस्लाम के हमले के बाद. वो तो मुसलमानों के शासन में पिछड़ गए थे, इसलिए भरपाई हो रही है आरक्षण से.
बड़ौदा सिटी में 84करोड़ की कीमत का सरकारी प्लॉट यूसुफ पठान ने दबाके रखा है पिछले 12साल से अब कॉरपोरेश उसका रेंट 17करोड़ और प्लॉट का कीमत 84 करोड़ रखा है मतलब प्लॉट का मामला 100करोड़ का है जिसके चलते @MamataOfficial का साथ छोड़ दिया!
@KirtiAzaad
झूठ और फरेब की दुनिया के सौदागर, @BJP4Jharkhand और आदरणीय @yourBabulal जी, पेपर लीक रोकने वाले कानून पर छाती क्यूं पीटी थी? घड़ियाली आंसू क्यों बहाए थे?
माफियाओं के साथ मिलकर फ़र्ज़ी PIL क्यूं दायर करवाई थी? चंदा चोरों के साथ मिलकर युवाओं को ठगने का काम क्यूं किया था?
Before 1857, there was Hul. On 30 June 1855, thousands of Santhals rose against the British East India Company, exploitative Landlords, Moneylenders & a system that had taken away their land and dignity.
History is incomplete without #AdivasiHistory#HulDiwas#SanthalHul
Despite the persistent and uninformed narrative pushed by certain vested interests individuals and organisations who brand the Kuki-Zo people as "refugees" or "outsiders" history tells a very different story.
The attached archival document, dated 17 September 1947, is the distribution list of the first Manipur Constitution Making Committee. Of its members, six were Kuki-Zo, forming a significant bloc among those who helped lay the constitutional foundation of Manipur itself:
1. Pu Tiankham Paite — B.A., C.O., Member
2. Pu K. Teba Kilong — Member
3. Pu Thangkhopao Kipgen — B.A., C.O., Member
4. Pu Dr. Kampu Gangte — Advisor
5. Pu Thangkhai— Advisor
6. Pu S.L. Lunneh — President, Kuki National Assembly (K.N.A.) Advisor
These were not refugees. These were sons of the soil educated leaders who sat at the very table where Manipur's constitutional future was written decades before today's manufactured controversies.
प्रतापगढ़ प्रशासन बताए कि आखिर वह जनता के साथ है या खनन माफियाओं के साथ? जब-जब ग्रामीणों ने अपनी समस्या रखी, तब-तब उन्हें ही परेशान किया गया। लोकतंत्र में जनता की आवाज दबाना नहीं, सुनना प्रशासन का कर्तव्य है।
#दांता_माइंस_निरस्त_करो