मज़हब के नाम पर इस गुंडागर्दी के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए, ऐसे गुंडे इस्लाम धर्म को बदनाम करने के सिवा कुछ नहीं कर सकते।
मध्य प्रदेश के उज्जैन में मुहर्रम जुलूस के दौरान क्रेन से कार को लटकाया गया और उसमें ब्लास्ट करके नोट उड़ाए गए बाद में गाड़ी की छत पर खड़े होकर मुहर्रम जुलूस से संबंधित झंडे लहराये गए ।
पुलिस ने जुलूस के आयोजक और क्रेन के मालिक पर FIR दर्ज कर 7 के करीब लोगों को गिरफ्तार किया है और उनके विरुद्ध संगीन धाराएं भी दर्ज की गई हैं।
इन गुंडों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि ये कृत्य इस्लाम का हिस्सा नहीं बल्कि इस्लाम मज़हब को बदनाम करने वाला कृत्य है।
फिरोज़ाबाद के ASP इंच टेप से ताजिया का साइज नाप रहे हैं। सरकार ने ताजिया का साइज निर्धारित किया हुआ है, तो फिरोज़ाबाद के ASP इंच टेप लेकर ताजिया का साइज नापने पहुंच गए। सही भी है! ज्यादा ऊंचा ताजिया दुर्घटना का सबब भी बन जाता है। अब सवाल यह है कि क्या कांवड़ का भी साइज निर्धारित होगा? क्या ऐसे ही इंच टेप लेकर उसकी भी ऊंचाई नापी जाएगी?
अगर यह देश संविधान और क़ानून से ही चल रहा है तो जन संहार का आह्वान करने वाले इस शख्स को तुरंत जेल में डाला जाए। संविधान और कानून के मुताबिक सज़ा देने का अधिकार सिर्फ अदालत के पास है। चाहे कोई कितना ही खूंखार अपराधी हो उसे भी आम नागरिक सज़ा नहीं दे सकते। लेकिन यह शख्स कह रहा है कि जिहाद करने वाले को मारना पाप नहीं। अव्वल तो इस नफ़रती बाबा को जिहाद का अर्थ ही मालूम नहीं, दूसरा यह कि अगर कोई अपराध हुआ भी है, तब भी सज़ा देने का अधिकार अदालत के ही पास है।
मांसाहार मानव सभ्यता और विज्ञान
अजीत शाही
भारत में मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा इसलिए भी भड़काई जा रही है क्योंकि वो मांस खाते हैं. अपर कास्ट हिंदुओं का एक वर्ग कहता है कि मांस खाना ग़लत है और मांस खाने वाले नीच हैं.
मगर असलियत ये है कि पूरी दुनिया में एक भी इंसान ऐसा नहीं है जिसके पूर्वज मांस नहीं खाते थे. बल्कि Homo sapiens बनने में मांस खाने की बहुत बड़ी भूमिका रही है. अगर लाखों साल पहले हमारे पूर्वज मांस न खाते, तो आज का इंसान वैसा न होता जैसा आज है. मांस खाना मानव विकास की कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.
यानी हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, ब्राह्मण, दलित, गोरे, काले, चीनी, जापानी, अफ़्रीकी, शाकाहारी, मांसाहारी, आदमी, औरत — सबके पूर्वज मांस खाते थे.
साइंटिफ़िक रिसर्च बताती है कि लगभग 20 लाख से 25 लाख साल पहले हमारे पूर्वज नियमित रूप से मांस खाने लगे थे. उस समय वे आज के इंसान यानी Homo sapiens नहीं थे. लाखों साल तक मांस खाना, शिकार करना और बाद में आग पर खाना पकाना मानव विकास का हिस्सा बने रहे.
क़रीब 8 लाख से 10 लाख साल पहले हमारे पूर्वजों ने आग का इस्तेमाल करना और भोजन पकाना शुरू किया. इससे मांस और दूसरे खाद्य पदार्थ ज़्यादा आसानी से पचने लगे और शरीर को उनसे ज़्यादा ऊर्जा मिलने लगी.
वैज्ञानिक भाषा में आज के इंसान को Anatomically Modern Human या AMH कहा जाता है. ऐसे इंसान पहली बार लगभग 3 लाख साल पहले दिखाई देते हैं. यानी हमारे पूर्वज लगभग 20 लाख साल तक मांस खा रहे थे, उसके बाद जाकर आधुनिक इंसान अस्तित्व में आया.
शुरुआती AMH अफ़्रीका में रहते थे और संभवतः गहरे रंग के थे. क़रीब सत्तर हज़ार साल पहले इंसान अफ़्रीका से निकलकर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बसने लगे तब धीरे-धीरे शरीर का रंग, कद-काठी और कुछ दूसरे गुण बदलने लगे.
किसी जगह लोगों में दूध पचाने की काबिलियत डेवेलप हुई, कहीं नहीं हुई. ठंडे मौसम के चलते कहीं शरीर का रंग हल्का हुआ. जहाँ गर्मी थी वहां रंग दबा रहा. इन सब बदलावों के बावजूद इंसान की बुनियादी बनावट वही तीन लाख साल पहले के AMH वाली रही. दुनिया के अलग-अलग रंगों और नस्लों के लोग पहले से ही आधुनिक इंसान थे. यानी पहले इंसान बना, बाद में उसका रंग बदला. तो मांस खाने ने हमारे विकास में क्या भूमिका निभाई?
मांस ने हमारे पूर्वजों को सिर्फ़ पेट भरने के लिए खाना नहीं दिया. मांस से उन्हें ज़्यादा कैलोरी, प्रोटीन, fat, आयरन, विटामिन B12 और दूसरे ज़रूरी पोषक तत्व मिले. जब अधिक ऊर्जा मिली तो इंसानी दिमाग़ जटिल होता चला गया. मांस के भोजन ने इंसानी दिमाग़ के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
जब आग पर खाना पकाना शुरू हुआ, तो शरीर उसी भोजन से और ज़्यादा ऊर्जा हासिल करने लगा. इससे इंसान का दिमाग़ और भी सुप्रीम होता गया और उसकी सोचने-समझने की काबिलियत ताबड़तोड़ बढ़ती गई.
इसी बेहतर और जटिल दिमाग़ ने इंसान को आधुनिक औज़ार बनाने, भाषा विकसित करने, संगीत रचने, कला पैदा करने, गणित और विज्ञान समझने, आधुनिक टेक्नालिजी बनाने और संस्कृति विकसित करने की क्षमता दी.
इस तरह सभ्यताएँ बनीं. शहर बने. और अंततः आज की दुनिया बनी जिसमें हम रहते हैं. मांस खाने और बाद में उसे आग पर पकाकर खाने का असर सिर्फ़ इंसान के दिमाग़ पर नहीं पड़ा.
हमारे जबड़े और दाँत छोटे होते गए, चेहरा पहले की तुलना में ज़्यादा सपाट होता गया और पेट-आँतों को खाना पचाने में कम मेहनत करनी पड़ने लगी. मांस खाने से पहले हमने शिकार करना सीखा. क्योंकि अधिकतर जानवर इंसान से ज़्यादा तेज़ भागते हैं इंसान को शिकार के लिए आपसे में समझौता और कोआर्डिनेशन सीखना पड़ा. इस तरह समाजिक रिश्ता बना. ऐसे टीमवर्क की सफलता के लिए कम्युनिकेशन डेवेलप हुआ. आगे चलकर जो भाषा और संवाद बना.
शिकार, औज़ारों के इस्तेमाल और लंबी दूरी तय करने के साथ-साथ इंसान के हाथ-पैर, चाल-ढाल और पूरे शरीर की बनावट भी पहले के पूर्वजों से अलग होती गई.
जैसे-जैसे दिमाग़ बड़ा और जटिल होता गया, इंसान के बच्चों का बचपन भी लंबा होता गया, क्योंकि इतने बड़े दिमाग़ को पूरी तरह विकसित होने और सीखने में ज़्यादा समय लगता है. इसीलिए इंसान अपने बच्चों को बहुत लंबे समय तक पालता और सिखाता है. दूसरे ज़्यादातर जानवरों की तुलना में इंसान का बचपन कहीं लंबा होता है.
मेरी इस पोस्ट का ये मतलब नहीं है कि हर किसी को मांस खाना चाहिए. मैं ख़ुद पिछले पच्चीस साल से शाकाहारी हूँ. आपको नहीं खाना हो तो मत खाइए. किसी को रोक कैसे सकते हैं?
मांस खाने को अपवित्र, नीच या नफ़रत के लायक बताना न सिर्फ़ मक्कारी है, बल्कि इतिहास और विज्ञान — दोनों के ख़िलाफ़ है.
वरिष्ठ पत्रकार @ajitsahi के कलम से✍️
The Embassy of the Islamic Republic of Iran in India categorically rejects the reports and claims circulated by certain media outlets regarding the economic situation in Iran and alleged difficulties in the supply of essential goods and public necessities.
It is emphasized that, despite the imposition of three wars and extensive pressures against the Iranian nation, no shortage of essential commodities or basic necessities has occurred to date. Owing to the effective measures and responsible management of the Government of the Islamic Republic of Iran under the leadership of President Dr. Masoud Pezeshkian, the procurement, supply, and distribution of the goods required by the country continue in a normal, stable, and uninterrupted manner.
The Embassy of the Islamic Republic of Iran also urges respected Indian media organizations to obtain and disseminate news and reports concerning Iran from credible, official, and verifiable sources. In this regard, it should be recalled that Iran International is a media outlet affiliated with opponents and adversaries of the Iranian people and has a long record of disseminating biased narratives aligned with anti-Iranian political agendas. Consequently, it cannot be regarded as a credible source for accurately reflecting the realities of Iran.
@aajtak
यह जितने भी पुलिस वाले हैं इन्हें सभी को सस्पेंड कर देना चाहिए।
क्योंकि इन्हें जनता की सेवा करने के लिए नौकरी पर रखा गया है धीरेंद्र शास्त्री से भीख मांगने के लिए नहीं।
यह जितने भी पुलिस वाले हैं इन्हें सभी को सस्पेंड कर देना चाहिए।
क्योंकि इन्हें जनता की सेवा करने के लिए नौकरी पर रखा गया है धीरेंद्र शास्त्री से भीख मांगने के लिए नहीं।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के बारे में फेक न्यूज फैलाया गया कि 1965 में उस वक्त के पीएम लाल बहादुर शास्त्री ने AMU पर बैन लगाया था।
@DFRAC_org की टीम ने इसका फैक्ट चेक किया है। DFRAC की टीम को फॉलो करें।
बदायूं में मुस्लिम मुस्लिम बुज़ुर्ग और उनके साथियों के साथ बेरहमी से मारपीट करने वाला बजरंग दल का नेता अक्षय ठाकुर हैं, ठाकुर स्कूटी से जा रहा था, रास्ते में बुजुर्ग अब्दुल सलाम भी अपने साथियों के साथ पैदल चल रहे थे, ठाकुर ने स्कूटी का हॉर्न बजाने पर भी साइड न देने का आरोप लगाया और मुस्लिम बुज़ुर्ग से टोपी उतरवाई, तथा बुजुर्ग अब्दुल सलाम और उनके साथियों को बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया।
@budaunpolice@Uppolice@dgpup@HMOIndia आतंकवादी बॉर्डर पार से नहीं बल्कि देश में पैदा हो रहे रहें हैं, बजरंग दल के गुंडे अक्षय ठाकुर की गुंडागर्दी साफ़ दिख रही हैं कि वो मुस्लिम होने की वजह से बुज़ुर्ग और उनके साथियों पर आरोप और फ़िर उनके साथ मारपीट कर रहा है, इस गुंडे ठाकुर पर तुंरत NSA के तहत कार्रवाई की जाए।