A SON OF Ex. LANDLORD ( NATIONALIST)
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जब सार्वजनिक स्तर की घटनाओं के सत्त्व को चोरी करके व्यक्तिगत स्तर तक बांट दिया जाता है।तो बिना किसी सार्वजनिक उपलब्धि के भी एक सामान्य नागरिक स्वयं को संप्रभु बताने लगता है।ऐसा क्यों हो रहा है?इसे हर कोई नहीं जानता है।
अच्छा होगा राजनैतिक विचार अपनी नैतिक मर्यादाओं में गतिविधियों का संचालन करें। क्योंकि राजनैतिक अंबेडकर,और संवैधानिक अंबेडकर एक साथ नहीं चलाये जा सकते हैं। @Uppolice@jhansipolice
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने फरवरी 2026 में नई दिल्ली में आयोजित 'AI इम्पैक्ट समिट' में अपने संबोधन में विकासशील देशों के लिए 3 अरब डॉलर के 'वैश्विक AI कोष' का आह्वान किया।उन्होंने चेतावनी दी कि एआई का भविष्य मुट्ठी भर अरबपतियों पर नहीं छोड़ा जा सकता।
भारत की पूर्व से ही कुछ स्थायी विदेश नीतियां रहीं हैं। जिनका पालन भारत लगातार करता आ रहा है।
*भारत अपने पड़ोसियों से शान्ति पूर्ण एवं सम्मान जनक संबंध बनायें रखने के लिए प्रयासरत एवं हर संभव कोशिश करता रहेगा।
* भारत पहले से कोई आक्रमण नहीं करेगा। लेकिन अपनी आत्मरक्षा के लिए हर संभव कदम उठायेगा।
* भारत विश्व में अन्य देशों के साथ सह-अस्तित्व (मैत्रीपूर्ण संबंध एवं परस्पर आर्थिक हितों) के सिद्धांतों पर कार्य करेगा। और जैव विविधता के संतुलन एवं संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध बना रहेगा।
* भारत छोटे, अल्पविकसित, विकासशील, द्वीपीय देशों का हमेशा से सहयोग करने का पक्षधर रहा है।
* भारत प्राकृतिक आपदाओं और मानवीय संकट की हर स्थिति में यथाशीघ्र सहयोग के लिए तत्पर बना रहता है।
* विश्व में शांति स्थापना के लिए भारतीय शांति सेना अपना कार्य निष्ठा से करने के लिए प्रतिबद्ध है।
* भारत कभी किसी राजनीतिक या सैन्य गुटबाजी की गतिविधियों में शामिल नहीं होगा। और अपनी गुटनिरपेक्ष नीतियों पर चलता रहेगा।
* पर्यावरण संतुलन एवं प्राकृतिक संसाधनों के असीमित और अनैतिक दोहन के प्रति भारत संवेदनशील है। और इसके संरक्षण के लिए कुछ निश्चित नियम और उपाय के लिए भारत वैश्विक मंचों पर आवाज उठाता रहेगा।
ये भारत की कुछ स्थायी विदेश नीतियों के आधार रहे हैं।
विगत दिनों में भारतीय प्रधानमंत्री ने एक द्वीपीय देश Seychelles की यात्रा की थी। तभी वहां की कैबिनेट ने अपना एक राष्ट्रीय पुरस्कार संस्थापित किया था। यह सर्वविदित है कि कोई भी आधिकारिक दस्तावेज अनेक चरणों में पूरा होता है। लेकिन किसी भी कारण से इस पुरुस्कार का प्रारंभिक कच्चा मसौदा सार्वजनिक रूप से लीक हो गया था। इसका कारण कुछ भी रहा हो। हांलांकि छोटे देशों में प्रशासनिक दक्षता कम विकसित होना भी इसका कारण हो सकता है।
जो विवाद का कारण बन गया। वहां की सरकार ने इसके लिए खेद प्रकट किया है। जिसमें Republic of Seychelles के स्थान पर "Repubblic of Seycheeles" स्पैलिंग में कुछ त्रुटियां थी। हांलांकि यह नया पुरस्कार वहां की सरकार ने अभी हाल में आधिकारिक रूप से संस्थापित किया है।
28 जून 2026 को Seychelles के राष्ट्रपति Dr. Patrick Herminie ने अपनी आधिकारिक यात्रा के दौरान PM मोदी को यह सम्मान प्रदान किया। मोदी इसके पहले (और फिलहाल एकमात्र) प्राप्तकर्ता हैं।
भारतीय विपक्ष और सोशल मीडिया पर इसे "फर्जी अवॉर्ड" या PR स्टंट बताया गया।Seychelles की आधिकारिक प्रतिक्रिया:Seychelles के विदेश मंत्रालय (Ministry of Foreign Affairs and the Diaspora) ने 2-3 जुलाई 2026 के आसपास बयान जारी किया:सम्मान वास्तविक और genuine है।
यह 24 जून 2026 को कैबिनेट द्वारा विधिवत संस्थापित किया गया और राष्ट्रपति Herminie द्वारा प्रदान किया गया।
गलत इमेज वाला सर्टिफिकेट एक "pre-final working draft" (काम चलाऊ ड्राफ्ट) था, जो गलती से पब्लिक में आ गया।
इसे "compressed timeline" (बहुत कम समय) में बनाया गया था, इसलिए spelling errors हुए। मंत्रालय ने typos के लिए अफसोस जताया और कहा कि final authentic version जारी कर दी गई है।
वे leak की जांच कर रहे हैं।
सम्मान मोदी की यात्रा से सिर्फ 3-4 दिन पहले बनाया गया → कई लोगों ने इसे "खास मोदी के लिए बनाया गया" बताया।
भारत ने Seychelles को $175 मिलियन (लगभग ₹1,600 करोड़) की आर्थिक मदद दी थी (क्रेडिट लाइन + ग्रांट)। विपक्ष (कांग्रेस आदि) का "मदद के बदले अवॉर्ड" बताकर इसे "hurried award" कहना, भारत को अवार्ड देने वाले देश और भारतीय विदेश नीति दोनों को अपमानित करना है।
भारत में विपक्ष की इस प्रकार की गतिविधियां स्वीकार करने योग्य नहीं हैं। भारत की वपक्षी पार्टियां विदेश नीति में भी भारत को देखने के बजाय व्यक्तिवादी दृष्टिकोण से देखतीं हैं। यह बहुत ही अफसोस जनक और एक अयोग्य विपक्ष की कार्यशैली है।
जिस तरह अंबेडकर, संविधान नहीं है। उसी तरह सिर्फ मोदी भारत नहीं है।बल्कि विदेशों में भारतीय नीतियों का प्रतिनिधित्व करने वाले भारतीय प्रधानमंत्री हैं।
इन जैसी मानसिकता के IPS,जिनमें देश के प्रति नकारात्मक सोच होती है।ये देश का क्या भला करेंगे? शायद इन्हें इस बात का पता नहीं है।विश्व के सबसे विकसित देश USA में मेडिकल,सर्जरी और इंजीनियरिंग के क्षेत्रों में बहुतायत में उच्चस्तरीय योग्य भारतीय लोग हैं।भारतीय सिस्टम योग्यता का उचित मूल्यांकन नहीं करता है। सिस्टम में अयोग्य लोगों की घुसपैठ बनी हुई है।इसलिए अन्य देशों से पीछे है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इस देश में बहुत समय से ऐसे विचारों के लोगों को पाला जा रहा है। जो अपने व्यक्तिगत, जाति, समुदाय, ग्रुप , पार्टी की छवि से ऊपर नहीं उठ पाते हैं। और न हीं प्रतीकात्मक संस्कृति की सही और ईमानदार व्याख्या कर पाते हैं। ईश्वर या भगवान जैसी अवधारणाओं का उपयोग सिर्फ अपने व्यक्तिगत,जातिय और सामूहिक हित लाभों के लिए पाॅजेटिव और नेगेटिव दोनों रूपों में करते हैं। ईश्वर या भगवान की धारणा को लूटमार,छल,धोखाधड़ी, झूठ,गुंडागर्दी जैसे परिवेश में बदल दिया गया है।
क्योंकि इस पक्ष के हित में कोई सार्वभौमिक आवाज उठाने वाला प्रत्येक समय में नहीं होता है। इसलिए सांस्कृतिक प्रदूषण फैलाने वाले लोगों के विरुद्ध ईशनिंदा कानून होना चाहिए। जो मानवीय हितों की रक्षा के स्तर से ऊपर सार्वभौमिक स्तर पर लागू होना चाहिए।
जब ऐसे लोगों के आर्थिक हित लाभ प्रभावित होते हैं। तो ये आम लोगों को ईश्वरीय अवधारणाओं के नाम पर उकसाते हैं। और लड़ाते हैं।
कोई किस वैचारिक रूप में ईश्वरीय अवधारणा को स्वीकार करता है।यह उनका व्यक्तिगत विचार है। न कि सार्वभौमिक व्यवस्था के मानदंड हैं। सार्वभौमिक व्यवस्था पूरी तरह से वैज्ञानिक, तकनीकी और सैद्धांतिक प्रचलन की व्यवस्था है। इसमें संदेह के जैसी कोई प्रक्रिया नहीं है।
अक्सर जो लोग प्रकृति में ईश्वर या भगवान के अस्तित्व में विश्वास करते हैं। आधुनिक प्रचलन में उन्हें अशिक्षित, पिछड़े या पुराने विचारों के लोग कहा जाता है। हांलांकि उनके पास सार्वभौमिक स्तर के तर्क तकनीकी रूप से नहीं होते हैं। लेकिन निश्चित रूप से कहा जा सकता है। कि उनका विश्वास झूठा नहीं है। दुनिया भर की संस्कृति का पहला चैप्टर प्रकृति में ईश्वरीय या भगवान की अवधारणा और स्तुतियों से ही आरंभ होता है। अन्यथा मानवीय संस्कृति जैसा कुछ भी नहीं है। जिस प्रकार जैवविविधता में अन्य जीव हैं। उसी स्वभाव में मनुष्य परिवर्तित हो सकता है।
ऐसा नहीं है। कि आधुनिक समय का मनुष्य ही विज्ञान के सर्वोच्च विकसित शिखर पर पहुंचा है। इन स्थितियों की अनेकों बार पुनरावृत्ति हो चुकी हैं। और तभी से ईश्वरीय और भगवान जैसी अवधारणाओं का अस्तित्व तत्व, परमतत्व और आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी सटीक और मौजूद है।
प्रश्न :-> मान लिया जाये कि ईश्वर या भगवान जैसी कोई धारणा नहीं है। तब इस ब्रह्माण्ड और उसकी प्रकृति का निर्माण किसने किया है।
यह विज्ञान का ही सिद्धांत है। कि बिना कर्ता,कारण और क्रिया के कुछ भी घटित नहीं हो सकता है।
आज हमारे एक निर्माणाधीन मकान के दूसरी मंजिल के गेट पर आकाशीय बिजली गिरी, जिससे गेट का कुछ हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया है। अब हम यदि दैवीय शक्ति,ईश्वर, भगवान जैसी धारणा पर विश्वास नहीं करते हैं। तो क्या इसे मानवकृत यांत्रिकीकरण का हिस्सा मानते हुए हम सभी प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं और घटनाओं ( बाढ़ , अधिवर्षा,सूखा, आकाशीय बिजली गिरने,भूकंप, समुद्री तूफान, भूस्खलन, ग्रहण, क्षुद्र ग्रहों का टकराव, आदि) के लिए वामपंथी, अंबेडकिरीट और बुद्ध दादा को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं। यदि इन्हें भी नहीं तो इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? या इन्द्र के प्रकोप को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
डाॅ. अंबेडकर ने तभी शायद आप लोगों के लिए वैचारिक,शैक्षणिक, सामाजिक पिछड़े पन के कारण संविधान सभा में आरक्षण का प्रस्ताव किया था। क्योंकि वे जानते थे। कि चने की दाल कोई भी खाये उसमें सभी के लिए पोषक तत्व समान होते हैं। लेकिन सिर्फ चने की दाल गधों को खिलाकर उन्हें कभी घोड़ा नहीं बनाया जा सकता है।
हनुमान मानसिक उड़ान के प्रतीक हैं। मानसिक उड़ान किन्हीं सीमाओं में कैद नहीं होती है। हनुमान की किदवंती कथा तो सिर्फ सूर्य मापन की प्रतीकात्मक कथा है। जबकि सूर्य से आगे ब्रह्मांड और भी है।
जुग सहस्त्र योजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।
* जुग (युग): यहाँ 12,000 वर्षों की संख्या ब्राह्मांड के युग की यूनिट को दर्शाता है।
ब्रह्मांड के औसत समय मापन की इकाई कल्प होती है। कल्प की गतिशीलता भूत, वर्तमान, भविष्य की तरह कल्प के आदि में, कल्प में स्थित, कल्प के अंत में होती हैं।
मानव वर्षों से ब्रह्मांड की संपूर्ण आयु तक की क्रमबद्ध सारिणीनीचे दी गई तालिका पूरी समय-व्यवस्था को क्रम से दर्शाती है
क्रम: इकाई अवधि (मानव वर्ष में) सरल भाषा
(1) 1कलियुग। 4,32,000। 4.32 लाख वर्ष
(2) 1 द्वापरयुग। 8,64,000। 8.64 लाख वर्ष
(3) 1 त्रेतायुग। 12,96,000। 12.96 लाख वर्ष
(4) 1 सत्ययुग। 17,28,000 17.28 लाख वर्ष
(5) 1 महायुग (4युग) 43,20,000 ,43.2 लाख वर्ष
(6) 1 मन्वंतर ,30,67,20,000। , 306.72 करोड़ वर्ष
(7) 1 कल्प(ब्रह्मांड का1 दिन) 4,35,88,80,000
43.59 अरब वर्ष
(8) ब्रह्मांड का 1 वर्ष , 360 कल्प
≈ 15,696 अरब वर्ष
(9) ब्रह्मांड की पूरी आयु 100 वर्ष
15,69,600 अरब वर्ष (15.696 खरब वर्ष)
मानवीय वर्ष होते हैं।
संपूर्ण ब्रह्मांड कल्प की गति में स्थित है।
लेकिन किसी भी प्रकार के विभाजन की व्यवस्था एक भ्रम होती है। उसमें सिर्फ एक अदृश्य अंतर होता है। जितना वृहद और विस्तृत ब्रह्मांड है। उतनी ही विराट उसकी गणना है। जिसमें पृथ्वी पर मानवीय सभ्यता लाखों वर्षों पुरानी हो सकती है। इसका कोई ठोस प्रमाणित स्पष्ट दावा नहीं है।
सहस्र: 1,000 की संख्या
योजन: प्राचीन भारत में दूरी की एक मानक इकाई।
गणना (लोकप्रिय व्याख्या):
12,000 × 1,000 × 8 मील = 9,60,00,000 मील
(1 मील ≈ 1.6 किमी) → लगभग 15.36 करोड़ किलोमीटर।आधुनिक विज्ञान के अनुसार पृथ्वी-सूर्य की औसत दूरी (1 AU) लगभग 14.96 करोड़ किलोमीटर है। दोनों में काफी निकटता है। आज़ के नासा अंतरिक्ष केंद्र की व्याख्या प्राचीन भारतीय साहित्य में बहुत पहले से अनुमानित रुप से लिखी हुई है। और यह दुर्भाग्य है। कि भारतीय लोग अपनी ही संस्कृति को हीन दृष्टि और संदेह की नजरों से देखकर उसमें मामूली बंदर खोज रहे हैं।
आधुनिक विज्ञान की यह अवधारणा सैद्धांतिक एवं प्रमाणित नहीं है। कि सार्वभौमिक प्राकृतिक समय का संचालन सीधी या सरल रेखा में हो रहा है। यही पर विज्ञान त्रुटिपूर्ण और भ्रम का शिकार है।
जबकि वैदिक दार्शनिक थ्योरी विज्ञान के सिद्धांतों पर ही आधारित है। और आधुनिक विज्ञान से कहीं अधिक प्रमाणों के साथ समय को चक्रीय गति में पूरा करने के ठोस प्रमाण दे सकती है।
इसके अनेक प्रमाण हैं। ब्रह्मांड में प्रत्येक खगोलीय रचना गोलाकार एवं चक्रीय है। इसलिए समय की गति का चक्रीय होना सैद्धांतिक रूप से स्वाभाविक है।
ग्रह और तारों की चक्रीय गति के कारण रात और दिन चक्रीय समय की घटनाएं हैं
एक निश्चित समय पर ग्रह और नक्षत्रों की स्थितियां समान होकर ग्रहण जैसी घटनाएं चक्रीय समय की घटनाएं हैं। अन्य खगोलीय घटनाओं की पुनरावृत्ति होना भी चक्रीय समय की घटनाएं हैं। और भी अन्य कारण हैं। जिनके द्वारा प्रमाणित किया जा सकता है।कि समय चक्रीय गति में प्राकृतिक रूप से संचालित होता है। और प्रकृति का इतिहास स्वयं अपने आप को दोहराता है।
इनसे मिलिए! ऐसी मानसिकता के लोगों के कारण ही भारत में सांस्कृतिक प्रदूषण का चर्मोत्कर्ष दौर चल रहा है। इस देश की संस्कृति को ऐसे लोगों से सबसे अधिक खतरा है। जो जिस वृक्ष पर बैठकर खाते हैं। उसी की जड़ों को खोदते हैं।
यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता है।पता नहीं इस प्रकार के प्रश्न ऐसी मानसिकता के लोग क्या इसलिए करते हैं?कि इन्हें इससे संबंधित कोई ज्ञानवर्धक उत्तर देकर इनका ज्ञान वर्धन करें।या ये अपने आधे,अधूरे ज्ञान के कारण तथ्यों के सटीक निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाते हैं।इसलिए ऊटपटांग प्रश्न करते रहते हैं।
जब इनके लिए प्रतीकों का कोई महत्व नहीं है।तो कल ये राष्ट्रीय प्रतीक के लिए भी प्रश्न खड़ा कर सकते हैं।कि हमने कभी चार मुंह का शेर नहीं देखा है।यदि कोई हमें चार मुंह का शेर दिखायेगा।तभी ये लोग प्रतीकों पर विश्वास करेंगे।
प्राचीन साहित्य में कथाओं के रूप में कुछ प्रतीकात्मक साहित्य भी मिश्रित है।जो पौराणिक कहानियों के रूप में प्रचलित है।
हाथी और बच्चे की दंतकथा सर्जरी जैसे कार्य की प्रतीकात्मकता से जुड़ी हुई है।इसे भगवान शिव की अवधारणा के साथ जोड़कर भी कथा के रूप में भी सुनाया जाता है।क्योंकि भारत ने प्राकृतिक कारणों को सार्वभौमिक मानते हुए अपने आविष्कारों का पश्चिमी देशों की तरह कभी भी कापीराइट नहीं कराया है।बल्कि उनकी स्मृतियों को हमेशा और दीर्घकालिक समय तक संजोए रखने के लिए प्रतीकात्मक धारणाओं को विकसित किया था। उदाहरण के रूप में USA में स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी ( स्वतंत्रता की देवी) की स्थापना की गई थी।क्या वह पाखंड है?अमेरिकी नागरिकों ने स्वतंत्रता की धारणाओं को अपनी स्मृतियों में बनायें रखने के लिए इसे मूर्तिरूप दिया था।अन्यथा स्वतंत्रता का संघर्ष अकेले किसी देवी ने नहीं किया था।बल्कि US के सभी नागरिकों ने किया था।
यह अतिश्योक्ति नहीं है।कि विश्व चिकित्सा क्षेत्र में सर्जरी सर्वप्रथम भारत की देन है।जब आपको अपने राष्ट्रीय गौरव के विषयों का कोई ज्ञान ही नहीं है।तो अपनी ही राष्ट्रीय संस्कृति आपको संदिग्ध लग सकती है। इसमें आपका दोष नहीं है।बल्कि आप जिनके विचारों से प्रेरित हैं।असली दोष उन्हीं का है।जिन्हें संपूर्ण वैश्विक रचना ही यूरोपियन लोगों का आविष्कार लगती थी। जबकि किसी भी क्षेत्र की कोई भी विधा किसी की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं होती है।यह क्रमिक विकास का परिणाम होती हैं।राॅ मैटेरियल प्राकृतिक रूप से प्राप्त होता है।जब इसका मूल्यांकन किया जाता है।तो यह बाजार और अर्थव्यवस्था का रूप धारण कर लेता है।
अब आप कहेंगे कि सर्जरी का प्रतीक ऐसा अविश्वसनीय क्यों बनाया गया है?क्योंकि सीधी और सही बातें अधिक दिनों तक याद नहीं रखीं जातीं हैं।
उदाहरण के लिए शैक्षणिक समय में जो विद्यार्थी किताबी ज्ञान से ओत प्रोत होते हैं।शिक्षा छोड़ने के बाद उनका अधिकांश किताबी ज्ञान रफूचक्कर हो जाता है।और उनके पास सिर्फ विविध क्षेत्रों का व्यावहारिक ज्ञान शेष रह जाता है।और यह सिर्फ नैतिक मूल्यों पर आधारित होता है।
लेकिन अविश्वसनीय सी लगने वाली बातें आपके जैसी मानसिकता के लोगों के लिए कौतूहल का विषय बनी रहतीं हैं।
(जैसे (1) शेर ने हिरन का शिकार किया यह काॅमन बात है।इस पर कोई भी अधिक ध्यान से चर्चा करना नहीं चाहेगा,लेकिन हिरन ने शेर का शिकार कर लिया यह कौतूहल है।(2) कुत्ते ने आदमी को काट लिया यह सामान्य है।लेकिन आदमी ने कुत्ते को काट लिया यह कौतूहल है।ये मनोवैज्ञानिक कारण होते हैं)
इसलिए ऐसी बातें हमेशा प्रचलित रहतीं हैं।क्योंकि प्रत्येक काल में सभी प्रकार की बौद्धिक क्षमताओं ( IQ LEVEL) के लोग इस दुनिया में रहते आए हैं।सभी की बुद्धि समान नहीं होती है।
आपने कभी गहराइयों से सोचा है।कि किसी अज्ञात स्थिति ने आप लोगों से आपका निजी धन व्यय कराकर फ्री में ब्राह्मण शब्द का प्रचार सोशल मीडिया पर कराकर उसे विश्व प्रसिद्ध करा लिया है। जबकि आप जैसी मानसिकता के लोग प्रतिस्पर्धात्मक रुप से अपनी स्थिति के लिए किसी सही शब्द को सोशल मीडिया पर प्रसिद्ध तक नहीं कर पाये हैं।अपना निजी धन व्यय करने पर भी आप असफल हैं।और अज्ञात स्थिति फ्री में विश्व प्रसिद्ध होकर विजेता बन जाती है।बात तीखी अवश्य है।लेकिन उतनी ही सही भी है।
प्रसिद्धि के मामले में तुम लोगों से आगे तो काकरोच वाले भी निकल गये।क्योंकि आप लोग सिर्फ हाथी से आगे बंदर,भालू,आदि अन्य जीवों को देखना समझना ही नहीं चाहते हैं।बल्कि तरह,तरह के मीम बनाकर घृणा प्रदर्शित करते हैं।
अक्सर इस दुनिया में जो लोग अपने आप को अधिक बुद्धिमान समझने का अहंकार रखते हैं।उनके साथ इस दुनिया में यूज ऐंड थ्रो जैसा व्यवहार होता है। यह बात आप लोगों की समझ नहीं आयेगी है।भले ही आपको कोई कितना भी समझाने की कोशिश कर ले।क्योंकि आप लोगों ने एक कल्पित और झूठे,नैरेटिव में उलझकर वास्तविक और प्राकृतिक परिवेश से अपने आपको पृथक कर रखा है।और आपसे अधिक बुद्धिमान अगली पंक्ति के विचारक नहीं चाहते हैं।कि आप उस पृथक परिधि से बाहर कुछ वास्तविक जानने की कोशिश भी करें।
मन और बुद्धि को कभी कंपेयर नहीं किया जा सकता है। मन,मस्तिष्क की आटो क्रियेटिव क्रिया है। जो जैविक शरीर के निर्माण की क्रियाओं के साथ ही अस्तित्व में आती है।
मन,मस्तिष्क की एक सतत,और चंचल क्रिया है।
यह सिर्फ बाह्य शारीरिक गतिविधियों का संचालन ही नहीं करती है। बल्कि आंतरिक शारीरिक क्रियाओं को भी संचालित करती है।जैसे सोच के अनुसार शारीरिक क्रियाएं,भोजन के पाचन से लेकर,उसके खून,पेशीय,ऊतक,अंग,अस्थि,मज्जा, और स्पर्म में बदलना और उनका विकास करना, श्वसन क्रिया आदि सभी मन के द्वारा संचालित होती हैं। मनु (मन +ॐ) शब्द इसी निकला है। जो प्रकृति में एक विशिष्ट जैविक प्राणी की शारीरिक आकृति को मनुष्य के रूप में संबोधित करता है।
जबकि बुद्धि एक उपार्जित जैविक लक्षण है।
जो पूरी तरह काल्पनिक परिवेश में अपना अस्तित्व ढूंढ़ती है। इसका कोई स्थायी अस्तित्व नहीं होता है। यह निर्णय लेने,तर्क करने और सही-गलत का भेद समझने की क्षमता ढूंढ़ती है। बुद्धि का काम मन की इच्छाओं का विश्लेषण करके सही दिशा तय करना है। इसे सिर्फ गतिविधियों के आधार पर किसी भी व्यक्ति की IQ से मापा जा सकता है। क्योंकि सभी की बुद्धि कभी समान नहीं हो सकती है।
(*) बुद्धि को परिवेश,आनुवांशिकी,भाषा शैली, विचार,आहार,आदि,अनेक कारण प्रभावित करते हैं।
संसार में इन तथ्यों के अनेक प्रमाण और उदाहरण है। विश्व में अनेक वैज्ञानिक,दार्शनिक,चिंतक हुए हैं। जिनके पास उच्च संस्थागत शैक्षणिक डिग्रियां नहीं थी। लेकिन उनके विचारों और सैद्धांतिक खोजों ने विश्व को नई दिशा दी।
जबकि बहुत सारी किताबें पढ़कर एक शिक्षित और डिग्री धारक व्यक्ति भी शाश्वत ज्ञान,विज्ञान और सफलता के उस स्तर को प्राप्त नहीं कर पाता है। जो एक कम किताबें पढ़ने वाला,प्रखर तत्वदर्शी दार्शनिक और चिंतक सफलता के उच्च निष्कर्ष को प्राप्त कर लेता है।
निश्चित रूप से इसके वास्तविक उपरोक्त (*चिन्हित) कारण हैं।भले ही आर्टिफिशियल कारणों का प्रभाव बताकर इन तथ्यों को नकार दिया जाये।
नास्तिक परिवेश संपूर्ण शाश्वत ज्ञान,विज्ञान की खोज करने के लिए अनुकूल नहीं है।क्योंकि उसके पास संपूर्ण कारण नहीं होते हैं। और वह जो फिजिकल रूप से जहां तक देख और समझ सकता है। उसके लिए उतना ही सत्य और वास्तविक है।
किसी बृहद समान स्थिति को अनेक भाषाओं में अनेक स्तरों पर रखने पर उसमें अज्ञानता वश विरोधाभास उत्पन्न होता है।
उदाहरण के लिए धर्म,संस्कृति से पृथक विज्ञान का क्षेत्र निर्मित करने वाले वैज्ञानिक प्रकृति में पहले से अपने गुण,धर्म में उपस्थित तत्वों की खोज का श्रेय स्वयं को देते हैं। जबकि प्रकृति में उन सभी तत्वों को उनके गुणों में निर्मित करने वाले, कर्ता, क्रिया और कारणों के लिए उनके पास कोई विश्वसनीय उत्तर नहीं है। बल्कि कुछ अनुमानित अपूर्ण तर्क हैं। तब विज्ञान का संम्पूर्णता और नास्तिकता का दाबा कितना अर्थपूर्ण हो सकता है।
लेकिन जो तत्वदर्शी संपूर्ण ब्रह्मांड को एकाकार मानते हुए किसी न किसी रूप में परमशक्ति (परमाणु सत्ता) के अस्तित्व को स्वीकार करता है।वह निरंतर उस सत्य की खोज करने के लिए प्रयत्नशील रहता है। क्योंकि प्रकृति के वास्तविक और अंतिम सत्य को जानने के लिए उसके पास संपूर्ण कारण होते हैं।
कुछ शताब्दियों पहले विज्ञान की धारणा धर्म, संस्कृति के साथ ही सम्मिलित थी।आम लोगों की ये धारणाएं गलत हैं।कि प्राचीन समय में विज्ञान नहीं था। भारत का मूल प्राचीन संपूर्ण दर्शन ही तत्त्वज्ञान पर आधारित रहा है। भारतीय दर्शन में ध्वनि,अक्षर,शब्द तक भी धातुओं और तत्वों की श्रेणियों में सम्मिलित हैं।
जब यूरोपीय लोगों का भारतीय उपमहाद्वीप में आगमन हुआ और उन्होंने प्राचीन भारतीय साहित्य का अध्ययन किया तो विज्ञान के अनेक शब्दों से उनका साक्षात्कार हुआ। यही वह समय था। जब वैश्विक स्तर पर विज्ञान की धारणा को धर्म और संस्कृति के क्षेत्र से पृथक किया गया था। विज्ञान के क्षेत्र का वर्गीकरण करते हुए इसको अनेक शाखाओं में स्थापित किया गया। आज भी आवश्यकता के अनुसार विज्ञान की अनेक नई उप-शाखाओं का निरंतर विकास हो रहा है।
यदि आज भी सभी वैज्ञानिक विधाओं का सारतत्व एक या दो या अधिक, ग्रंथों में संकलित कर दिया जाये। तो निश्चित रूप से इससे संपूर्ण विश्व मानवीय समुदाय को बहुत बड़ा लाभ मिलेगा। तब ईश्वर, धर्म, संस्कृति और विज्ञान में कोई फासला नहीं रह जायेगा।और निरर्थक परंपराओं और अंधविश्वासों से निकलकर एक वास्तविक विश्व की संरचना में संपूर्ण मानवीय समुदाय सहभागी बनेगा। और अपने समवर्ती लोगों को भी वैचारिक रूप से समृद्ध करने में सहयोग करेगा।
जो पार्टी स्वयं कांग्रेस से बगावत करके अस्तित्व में आई थी। तब बगावत का चारित्रिक गुण उसकी आंतरिक संरचना में उपस्थित है।तब उस पार्टी में बगावत होकर विभाजन होना स्वाभाविक है।जब कोई व्यक्ति जिस व्यवहार को दूसरों के साथ करता है। तब कोई मैटर नहीं होता है।लेकिन वही व्यवहार जब उसके साथ होता है।तब क्या मैटर बन जाता है?और तब उसे इसके लिए दूसरों को दोष क्यों देना चाहिए?
बोया पेड़ बबूल का,तो आम कहां से खाय!
शिष्टता के अनुसार आपको किसी सार्वजनिक वस्तु, स्थान का उपयोग करने के लिए निश्चित समयावधि दी गई है। तो आपको उसे निश्चित समय में लौटा देना चाहिए।
किसी भी कारण से यदि आप निश्चित समयावधि में ऐसा करने में असमर्थ हैं। तब आप संबंधित कार्यालय में अतरिक्त उचित समय मांगने के लिए तकनीकी कारण को संदर्भित करते हुए अपील कर सकते हैं।
सार्वजनिक संपत्ति पर आपका जन्मसिद्ध अधिकार नहीं है।और यदि आप ऐसा समझते हैं।तो आप अपने को स्वयं ही परिभाषित कर सकते हैं।कि आप किस मानसिकता की श्रेणी में आते हैं।
पूर्व पदाधिकारियों को सामान्यतः सीमित समय/शर्तों के आधार पर अलॉटमेंट मिलता है,न कि हमेशा के लिए।और सार्वजनिक
नियम-कानून किसी की व्यक्तिगत वर्णित अपनी सुविधा और विचारों का अनुसरण नहीं करते हैं। सबसे अच्छा विकल्प है कि कानून का पालन करते हुए अपना मान,सम्मान और अपनी गरिमा बनाए रखें।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सोशल मीडिया पर आखिर यह चल क्या रहा है?अपने स्तर पर की जाने वाली स्वस्थ आलोचना लोकतंत्र में रचनात्मक कही जा सकतीं हैं।
लेकिन इस तरह की गतिविधियों को चलाने के पीछे कौन?और किस प्रकार की वैचारिक मानसिकता के लोग जिम्मेदार है।जिनके पास न कोई शालीन भाषा है,न पूरी समझ है,न कोई तर्क है, न मजबूत और तर्कसंगत साक्ष्य हैं, लेकिन हर तरह की झूठी बातें फैलाकर सोशल मीडिया पर स्वयं को बहुत बड़े अधिवक्ता सिद्ध करने में लगे हुए हैं।
भारतीय न्यायिक प्राधिकरण एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है।और कोलेजियम उस संस्था की अपनी व्यवस्था है।जिसे कभी भी असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता है।यह अलग विषय है। कि समय समय पर व्यवस्थाएं स्वयं को अपडेट करती हैं।और नये सामयिक प्रचलन को अपनातीं हैं।कोलेजियम व्यवस्था में जजों के चुनाव में वरिष्ठता,कार्य अनुभव,योग्यता सभी प्रकार के पहलुओं का पूरा ध्यान रखा जाता है। और उन्हीं नामों को स्वीकृति के लिए आगे बढ़ाया जाता है।
लेकिन ये कथित भीम,मीम विचारक उनकी तुलना फोर्थ ग्रुप के कर्मचारियों के स्तर से कर रहें हैं। इससे इसका स्तर तो प्रदर्शित हो ही रहा है। लेकिन यह पूरी न्यायिक व्यवस्था पर जिस भाषा शैली में कीचड़ उछाल रहे हैं।इसे किसी भी आदर्श समाज और व्यवस्था में उचित नहीं कहा जा सकता है। शायद ये ऐसे अज्ञात पात्र बनाकर अपनी वैचारिक योग्यता को बताना चाहते हैं। बिना कुछ किए कुतर्कों के पुल बनाकर कोई नेता या हीरो नहीं बन सकता है। अब वे जमाने गये। लोग जागरूक हैं।
महत्वपूर्ण ध्यान रखने योग्य
जब किसी स्वायत्त संवैधानिक संस्था की अपनी कोई व्यवस्था नहीं होगी और यदि चयन प्रक्रिया की पूरी विधि सरकारी मशीनरी की तरह लागू की जायेगी तो अन्य सरकारी विभागों के समान स्वायत्त संवैधानिक संस्थाओं का उद्देश्य ही समाप्त हो जायेगा। इससे निष्पक्ष न्याय प्रभावित होगा। क्योंकि वे सरकारी सिस्टम की नीतियों के प्रभाव और दबाव में कार्य करेंगी।
स्वायत्त संवैधानिक संस्थाओं की चयन प्रक्रिया में आंशिक स्वायत्तता के कारण न्यायिक संस्थाएं सरकारी नीति और दबावों को अस्वीकार करते हुए सरकार के गलत फैसलों के विरुद्ध भी निर्णय ले सकतीं हैं। यही संवैधानिक स्वायत्तता का वास्तविक उद्देश्य है।
कार्यपालिका के फैसलों के विरुद्ध न्यायालय के निर्णयों से क्षुब्द होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वरिष्ठता के नियमों को तोड़कर जूनियर जज को CJI बना दिया था। और न्यायपालिका में कार्यपालिका का दखल बढ़ने से अनेक निष्पक्ष फैसले प्रभावित हुए। और इन्हीं गतिविधियों का सहारा लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर दिया। संविधान में अनेक तथ्यों को अपनी वैचारिक सुविधाओं के अनुसार जोड़ा गया। सेकुलर शब्द भी भारतीय संविधान में जोड़ा गया।
तब X नहीं था। और X पर जो कथित नेता बने घूम रहे हैं। ये तब उत्पन्न भी नहीं हुये होंगे। और आज ये न्यायपालिका को चपरासी स्तर के पेपर का ज्ञान दे रहे हैं। ये लोग भारतीय प्राचीन साहित्य और प्रतीकों का विरोध करते हैं।और उनके लिए अपशब्द बोलते हैं। सामाजिक व्यवस्थाओं के लिए अपशब्द बोलते हैं। और गालियां बकते हैं।स्वायत्त संवैधानिक संस्थाओं के लिए बेहद गिरी हुई भाषा का उपयोग करते हैं। ऐसे लोगों को इस देश में अपने नागरिक अधिकार चाहिए। जिन्हें अपने नागरिक कर्तव्यों का बोध तक नहीं है।
स्वायत्त संवैधानिक निकायों की व्यवस्थाओं में आंशिक स्वतंत्र गतिविधियां होना संवैधानिक रूप से आवश्यक है। अन्यथा वह पूरी तरह सरकारी मशीनरी में ही विलय हो जायेंगी।और निष्पक्षता कहीं खोजने पर भी नहीं मिलेगी।
न्यायपालिका में कुछ लोगों के भ्रष्ट होने या किसी जज के द्वारा अप्रिय निर्णय दिये जाने के आधार पर पूरी न्याय पालिका के लिए अपशब्द बोलना और मूल्यांकन करना असभ्य और तर्कहीन है। क्योंकि न्यायपालिका कोई विचार नहीं है। बल्कि स्थापित संस्था है। न्याय पालिका की व्यवस्था को जातिवाद या आरक्षण की श्रेणियों से देखना भी पूरी तरह से अवैध है।
लोकतंत्र में संयमित और मर्यादित आलोचनात्मक टिप्पणी करना और सच्चाई प्रमाणित करने के लिए साक्ष्य होना किसी भी तर्क को और अधिक मजबूत करते हैं। आलोचना करना बहुत आसान है।लेकिन उसके लिए लोकप्रिय विकल्प और तर्कसंगत एवं तकनीकी व्यवस्था देना उतना ही कठिन कार्य है। उदाहरण के लिए कबीरदास एक स्वस्थ और अच्छे आलोचक कहे जा सकतें हैं। लेकिन वे व्यवस्थापन क्षेत्र में असफल थे। क्योंकि आलोचनात्मक व्याख्याओं के साथ साथ नैतिक एवं व्यावहारिक क्रिया कलापों को नजरांदाज नहीं किया जा सकता है। यही काॅम्बीनेशन व्यवस्थागत ढांचा तैयार करता है।
विज्ञान की भाषा में मनुष्य भी जीव जन्तुओं की प्राकृतिक संरचनाओं में आता है।मनुष्य और सूअर की
सृष्टि- जैविक
संघ- काॅर्डेटा
क्लास- मैमेलीया
वैज्ञानिक रूप से समान है। लेकिन कुल,जाति, उपजाति में अंतर होता है। जंतुओं के एक प्रजाति के होने के आधार पर भी मनुष्य,सूअर और अन्य जीवों की आनुवंशिक संरचनाओं में भी अनेक भिन्नता पाई जातीं हैं। ये वैज्ञानिक तथ्य हैं। और सच हैं।भले ही इन्हें भी कोई असंवैधानिक बता सकता है। सवर्ण प्राचीन भारतीय साहित्य का शब्द है। जिसका अर्थ वर्ण में सम्मिलित है।अवर्ण नहीं है।
मनुष्य (Human) का वैज्ञानिक वर्गीकरण:वैज्ञानिक नाम (Scientific Name): Homo sapiens
पूर्ण वर्गीकरण (Taxonomy):
स्तर (Rank)। नाम (Name)।
जाति (Species)। sapiens
वंश (Genus)। Homo
कुल (Family)। Hominidae
उपकुल (Subfamily)। Homininae
Order। Primates (प्राइमेट्स)
Class. Mammalia (स्तनधारी)
Phylum. Chordata
Kingdom. Animalia
सूअर (Pig) का वैज्ञानिक वर्गीकरण:वैज्ञानिक नाम (Scientific Name): Sus scrofa domesticus (घरेलू सूअर)
(जंगली सूअर का नाम Sus scrofa है)
वर्गीकरण (Taxonomy):
स्तर (Rank). नाम (Name)
जाति (Species). Sus scrofa
वंश (Genus). Sus
कुल (Family). Suidae
गोत्र/उपकुल. Suinae
Order. Artiodactyla
Class. Mammalia
Phylum. Chordata
Kingdom. Animalia
सभी श्रेणियां निर्धारण करने वाला सिस्टम,उन्हें लागू करने वाला सिस्टम,किसी को CM,DM,SDM बनने का अवसर देने वाला भी सिस्टम है।अब इसमें सिस्टम का क्या दोष है?यह मानसिकता का दोष है।वैचारिक पिछड़ेपन की भरपाई आर्थिक उन्नति या उच्चपदासीन होकर नहीं होती है।न्यायिक निष्ठा से होती है।पिछड़े और भी हैं।आरक्षण पर किसी जाति,वर्ग या समुदाय का एकाधिकार नहीं है।
For the world's largest democratic country, a journalist should say that why should we trust India? This is a violation of his jurisdiction by a journalist. India has kept its democracy safe. The basic spirit of India does not oppose any religious idea of the world. The policies of the citizens of India are based on the legislation here. Events that happen at the local level happen everywhere in the world. At some places it is more and at other places it is less. But these incidents cannot be linked to national prevalence. Eradication of crime occurs through judicial processes. Directly targeting any nation by a journalist is beyond his jurisdiction. Because a journalist is not a supermassive universal person. Freedom of speech has certain defined parameters. Instead, the words your government, your cabinet, your system can be used.
@HelleLyngSvends@PMOIndia