महिला क्रिकेट वर्ल्ड कप के मुकाबले में भारत की कप्तान हरमनप्रीत कौर और पाकिस्तान की खिलाड़ी फ़ातिमा सना के बीच मैदान पर तीखी बहस देखने को मिली। मैच के दौरान दोनों खिलाड़ियों के बीच हुई नोकझोंक ने दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया...
नैरेटिव का खेल देखिए प्रसिद्ध क्रांतिकारी “पंडित राम प्रसाद बिस्मिल” के इस पूरे नाम, जिसमें दो उपाधि हैं—पंडित और बिस्मिल।
इसे पढ़कर और सुनकर सभी को यह लगता था और अभी भी लगता है कि राम प्रसाद, पंडित यानी ब्राह्मण थे।
जी नहीं, इनका असली नाम है राम प्रसाद सिंह तोमर। और यह तोमर ठाकुर हैं, चंबल के मूल निवासी हैं। बाद में इनका परिवार शाहजहाँपुर में बस गया था, जहाँ इनका जन्म हुआ था।
पंडित एक उपाधि थी, जिसे आर्य समाज दिया करती थी। वहीं से यह प्रचलित हुई। जहाँ वेद और वेदांत के पाठी और भाषा के जानकार को पंडित कहते थे।
और बिस्मिल इनका पेन नाम, यानी क्रांति के दौरान लेख, कविता लिखने का उपनाम था।
यहीं से लोग इनको पंडित राम प्रसाद बिस्मिल कहने लगे, और यह किसी ने नहीं सोचा था कि आगे चलकर पंडित माने ब्राह्मण का कॉपीराइट हो जाएगा।
अब योगी बाबा को जातिवादी कहना कितना बड़ा नैरेटिव है क्योंकि वह भी राम प्रसाद सिंह तोमर को पंडित ही लिख रहे हैं।
क्योंकि ऐसा नहीं करेंगे तो सुदामा का उत्पात शुरु हो जाएगा। यह है नैरेटिव की ताकत। क्योंकि मीडिया सुदामा की है। और वह उमाशंकर की पट्टीदारी में है।
तभी तो परम नरभक्षी होकर भी दादा रावण विद्वान हैं।
#नैरेटिव_के_किस्से
मप्र में कुपोषित बच्चों की सेवा - 8 रु. से होती है, 1000 में 35 ऐसे हैं जो अपना पहला जन्मदिन भी नहीं मना पाते शिशु मृत्यु दर में राज्य दूसरी पायदान पर है.
अब ये देखिये एक ज्वाइंट डायरेक्टर 30 साल में 10 करोड़ बना लेता है. 11 प्लॉट, जिम,सुपरमार्केट भी!
नियमानुसार होगा तभी तो मिलना शुरू हुआ होगा, ऐसे ही वेतन मिलना शुरू हो जाता है क्या ? नियुक्ति के समय या भर्ती के विज्ञापन में स्पष्ट रूप से उल्लेख क्यों नहीं किया गया। प्रोबेशन में फिक्स वेतन वाला मामला कोर्ट में पहले ही ग़लत ठहराया जा चुका है।
विश्वास का विज्ञान है या मन की माया यह तो पता नहीं पर आज के आधुनिक युग में भी ज्योतिष (Astrology) और आध्यात्मिक उपायों का हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव बना हुआ है। कोई इसे ईश्वरीय कृपा मानता है तो कोई केवल एक मानसिक धारणा।
लेकिन जब हम इसे मनोविज्ञान (Psychology) और चिकित्सा विज्ञान के नजरिए से देखते हैं, तो एक बहुत ही दिलचस्प सच्चाई सामने आती है।
यह ग्रहों का खेल है, या हमारे अपने मस्तिष्क की अद्भुत शक्ति !
विज्ञान की दृष्टि: प्लेसबो और नोसेबो प्रभाव
चिकित्सा विज्ञान में दो शब्द बहुत प्रसिद्ध हैं— प्लेसबो (Placebo) और नोसेबो (Nocebo)।
प्लेसबो प्रभाव: जब किसी व्यक्ति को यह विश्वास दिलाया जाता है कि वह जो उपाय कर रहा है वह उसे लाभ देगा, तो उसका मस्तिष्क वास्तव में शरीर में ‘हीलिंग’ रसायन (जैसे एंडोर्फिन) छोड़ने लगता है। व्यक्ति बिना किसी वास्तविक दवा के यानी मीठी गोली खाकर केवल ‘विश्वास’ से बेहतर महसूस करने लगता है।
नोसेबो प्रभाव: यह इसका ठीक उल्टा है। यदि हमें यकीन हो जाए कि कोई ग्रह या भविष्यवाणी हमें नुकसान पहुँचाएगी, तो हमारा शरीर वास्तव में तनाव और बेचैनी पैदा करने लगता है। यहाँ ‘डर’ ही शारीरिक और मानसिक कष्ट का कारण बन जाता है।
फलित ज्योतिष: विश्वास का एक माध्यम
फलित ज्योतिषीय गणनाएँ और उपाय अक्सर इन्हीं दोनों प्रभावों के लिए एक “ट्रिगर” का काम करते हैं।
जब हमारा विश्वसनीय भविष्यवक्ता हमें सकारात्मक उपाय बताता है, तो वह हमारे भीतर प्लेसबो प्रभाव पैदा करता है, जिससे हमारा आत्मविश्वास बढ़ जाता है।
वहीं, “अशुभ समय” का डर हमारे मन में नोसेबो प्रभाव पैदा करता है, जिससे हम घबराहट में अनजाने में गलतियाँ करने लगते हैं।
भारतीय अध्यात्म के दर्पण में ‘मन की शक्ति’
भारतीय दर्शन ने हजारों साल पहले ही मन की इस शक्ति को समझ लिया था। हमारे अध्यात्म के विभिन्न मार्ग इन वैज्ञानिक प्रभावों को बहुत गहराई से स्पष्ट करते हैं:
भक्ति योग (श्रद्धा का प्लेसबो): भक्ति मार्ग में जब हम अपना भार ईश्वर को सौंप देते हैं, तो हमारा मस्तिष्क चिंता मुक्त हो जाता है। यह समर्पण सबसे शक्तिशाली प्लेसबो है। जिसे विज्ञान ‘रसायन’ कहता है, भक्त उसे ‘ईश्वरीय कृपा’ के रूप में अनुभव करता है।
ज्ञान योग (नोसेबो का अंत): ज्ञान मार्ग हमें विवेक सिखाता है। यह हमें बताता है कि डर का कारण केवल अज्ञानता है। जब हमें सत्य का बोध होता है, तो किसी भी नकारात्मक भविष्यवाणी का डर (Nocebo) हमें प्रभावित नहीं कर पाता।
कर्म योग (सक्रिय हीलिंग): कर्म योग सिखाता है कि हम अपने भाग्य के निर्माता स्वयं हैं। जब हम उपाय के तौर पर ‘सेवा’ या ‘दान’ करते हैं, तो हमारे भीतर का नकारात्मक अपराधबोध खत्म होता है। यह सकारात्मक कर्म एक मनोवैज्ञानिक औषधि की तरह काम करता है।
अद्वैत वेदांत (साक्षी भाव): अद्वैत की दृष्टि सबसे ऊँची है। यह हमें सिखाता है कि हम अपने मन और शरीर के केवल ‘साक्षी’ (Observer) हैं। अद्वैत के अनुसार, सुख (प्लेसबो) और दुख (नोसेबो) मन की क्षणभंगुर लहरें हैं, जबकि हमारी मूल चेतना इन सबसे परे है। जब व्यक्ति इस साक्षी भाव में टिक जाता है, तो वह समझ जाता है कि कोई भी बाहरी परिस्थिति उसकी आंतरिक शांति को भंग नहीं कर सकती।
कन्फर्मेशन बायस: मन की वह खिड़की जो केवल वही देखती है जो वह चाहती है
यह एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जहाँ हमारा दिमाग केवल उन्हीं घटनाओं पर ध्यान देता है जो हमारे पहले से बने विश्वासों से मेल खाती हैं।
उदाहरण के लिए: यदि किसी ज्योतिषी ने कहा कि “आज आपका दिन शुभ है” और पूरे दिन में 10 बुरी चीजें हुईं लेकिन 1 अच्छी बात हुई, तो आपका दिमाग केवल उस 1 अच्छी बात को याद रखेगा और कहेगा— “देखा! भविष्यवाणी सच हुई।”
यही कारण है कि प्लेसबो और नोसेबो प्रभाव हमारे मन में इतने गहरे उतर जाते हैं। हम अनजाने में अपनी धारणाओं को पुष्ट करने वाले सबूत ढूँढते रहते हैं।
निष्कर्ष: “यद् भावं तद् भवति”
हमारे उपनिषदों का महान सूत्र है— “यद् भावं तद् भवति”, अर्थात जैसा आपका भाव (विश्वास) होगा, वैसा ही आपके साथ घटित होगा।
आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि हमारे विचार हमारी शारीरिक स्थिति (Biology) को प्रभावित करते हैं। ज्योतिष और आध्यात्मिक उपाय वास्तव में हमारे मन को एक सकारात्मक दिशा देने के उपकरण हैं।
भविष्यफल: भविष्य की बात नहीं, भाषा की बाज़ीगरी है; इसे ठीक से समझिए
अभी मैं ऐप खोलकर ख़बरें देखने लगा तो हर जगह सबसे पहले राशि फल कूदकर आता है। लोग इसे देखते हैं, पढ़ते हैं और विश्वास करते हैं।
राशिफल लिखने वाला व्यक्ति भविष्य में जाकर कोई समाचार एकत्र करके नहीं लौटता। उसके पास न समय की कोई खिड़की होती है, न ग्रहों से आने वाली कोई गोपनीय सूचना और न मनुष्य के आगामी जीवन का कोई नक्शा। उसके पास केवल भाषा होती है। अस्पष्ट, लचीली और इतनी सामान्य कि वह लगभग प्रत्येक व्यक्ति के जीवन पर किसी न किसी तरह चिपक जाए।
जैसे आज का ही एक उदाहरण लें। वह ऐपे मेष राशि को सबसे पहले दिखा रही थी। इसे ही उदाहरण के रूप में लीजिए। प्रायः उसमें लिखा मिलेगा, “आज आत्मविश्वास बनाए रखें। कार्यक्षेत्र में नई जिम्मेदारी मिल सकती है। आर्थिक मामलों में सावधानी बरतें। परिवार के किसी सदस्य से मतभेद हो सकता है; लेकिन धैर्य से काम लेने पर स्थिति संभल जाएगी। स्वास्थ्य का ध्यान रखें।”
पहली नज़र में लगता है कि किसी ने हमारे दिन का पूरा नक्शा पढ़ लिया है। लेकिन इसे थोड़ा वैज्ञानिक विवेक से देखिए।
“आत्मविश्वास बनाए रखें” भविष्यवाणी नहीं, सामान्य सलाह है। आत्मविश्वास बनाए रखने की आवश्यकता किसे नहीं होती? मेष राशि वाले को भी, मकर वाले को भी और उस व्यक्ति को भी, जिसे अपनी जन्म-राशि तक मालूम नहीं है।
“नई जिम्मेदारी मिल सकती है” में असली चालाकी “मिल सकती है” शब्द में छिपी है। जिम्मेदारी मिली तो भविष्यवाणी सही; नहीं मिली तो कहा जाएगा कि योग बना था; लेकिन परिस्थितियां अनुकूल नहीं हुईं। ऐसी बात को ग़लत सिद्ध ही नहीं किया जा सकता। विज्ञान में किसी दावे की सार्थकता तभी है, जब उसके ग़लत सिद्ध होने की भी स्पष्ट संभावना हो।
“आर्थिक मामलों में सावधानी रखें” तो यह सलाह हर मनुष्य को प्रतिदिन दी जानी चाहिए। क्या किसी दिन अर्थव्यवस्था में असावधानी बरतना उचित हो जाता है? यह ठीक वैसी ही बात है जैसे कोई कहे, सड़क पार करते समय इधर-उधर देखकर चलें। इसे भविष्यवाणी कहना सड़क सुरक्षा के निर्देश को दैवी संदेश घोषित करने जैसा है। सावधानी तो मनुष्य ही नहीं, कुत्ते भी रखने लगे हैं। आप भीड़्भाड़ वाली सड़क पार करते किसी कुत्ते को देखिए, वह तीन टांगाें पर लंगड़ाता हुआ चलेगा और प्रतीत होगा, जैसे बेचारा कितना पीड़ित है और सड़क पार करते ही वह चारों पैरों पर दौड़ने लगता है। कुत्तों में यह सावधानी हम क्रूर मनुष्यों ने हाल ही के वर्षों में विकसित कर दी है।
“परिवार में मतभेद हो सकता है” भी मनुष्य के सामाजिक जीवन की सामान्य संभावना है। करोड़ों परिवारों में प्रतिदिन किसी न किसी विषय पर असहमति होती है। यदि मतभेद हो गया तो व्यक्ति राशिफल को याद करेगा; यदि नहीं हुआ तो वह उस वाक्य को भूल जाएगा। इसे मनोविज्ञान में पुष्टिकरण पूर्वग्रह यानी Confirmation Bias कहा जाता है। हम उन घटनाओं को याद रखते हैं जो हमारे विश्वास की पुष्टि करती हैं और जो उसे ग़लत साबित करती हैं, उन्हें चुपचाप भुला देते हैं।
राशिफल की सबसे बड़ी शक्ति ग्रहों में नहीं, मनुष्य के मन की इसी कमज़ोरी में है।
उसकी भाषा इस तरह तैयार की जाती है कि हर व्यक्ति उसमें अपने जीवन का प्रतिबिंब देख सके; “आप संवेदनशील हैं; लेकिन कभी-कभी कठोर निर्णय लेते हैं”; “आप लोगों पर विश्वास करते हैं; किंतु चोट लगने पर स्वयं को अलग कर लेते हैं”; “आपके भीतर बड़ी क्षमता है, पर अवसरों की कमी रही है।” ऐसी बातें लगभग हर मनुष्य को अपने बारे में सही लगती हैं। मनोविज्ञान इसे बार्नम या फोरर प्रभाव कहता है; सामान्य और अस्पष्ट व्यक्तित्व-वर्णन को व्यक्ति अपने लिए विशेष और सटीक मान लेता है।
ज़रा यह भी सोचिए कि संसार के लगभग बारहवें हिस्से को मेष राशि वाला मान लिया जाए तो क्या उन करोड़ों लोगों का दिन एक जैसा होगा? क्या किसी मेष राशि वाले को नौकरी मिलेगी तो सभी को मिलेगी? क्या किसी का विवाह होगा तो सभी के जीवन में प्रेम का वही संयोग उपस्थित हो जाएगा? उसी समय कोई मेष राशि वाला अस्पताल में होगा, कोई अदालत में, कोई परीक्षा दे रहा होगा, कोई युद्ध से भाग रहा होगा और कोई अपना जन्मदिन मना रहा होगा। फिर एक ही भविष्यफल इन सभी पर कैसे लागू हो सकता है?
मनुष्य अपने भविष्य का कुछ अनुमान अवश्य लगा सकता है; लेकिन ग्रहों के आधार पर नहीं, अपने अतीत, वर्तमान परिस्थितियों, आदतों, स्वास्थ्य, शिक्षा, आर्थिक स्थिति, संबंधों और निर्णयों के आधार पर। जो व्यक्ति कई महीनों से परीक्षा की तैयारी कर रहा है, वह अपने परिणाम की संभावना का कुछ तार्किक अनुमान लगा सकता है। जो लगातार ऋण ले रहा है, वह आने वाले आर्थिक संकट का अंदेशा कर सकता है। जो धूम्रपान करता है, वह स्वास्थ्य-जोखिम समझ सकता है। यह कारण और परिणाम पर आधारित आकलन है; ज्योतिषीय भविष्यवाणी नहीं।
सच्चाई यह है कि राशिफल भविष्य नहीं बताता, वह वर्तमान जीवन की सामान्य परिस्थितियों को रहस्यमय भाषा में दोबारा पैक करता है। एक प्रिय मित्र यही बातें कहे तो हम उन्हें सलाह कहेंगे; अख़बार में राशि के नाम से छप जाएं तो भविष्यवाणी मान लेंगे।
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ग्रह अपने मार्ग पर घूम रहे हैं। वे न हमारी पदोन्नति रोकते हैं, न प्रेम-विवाह कराते हैं, न परीक्षा में अंक बढ़ाते हैं। मनुष्य का भविष्य उसकी परिस्थितियों, सामाजिक संरचना, संयोगों और सबसे बढ़कर उसके निर्णयों से बनता है। इसलिए मेष राशि से अपना दिन पूछने के बजाय मनुष्य को स्वयं से पूछना चाहिए; मैंने कल क्या किया था, आज क्या कर रहा हूं और मेरे निर्णय मुझे कल कहां ले जाएंगे?
भविष्य का सबसे विश्वसनीय संकेत आकाश में नहीं, हमारे वर्तमान आचरण में छिपा होता है।
एक सरकारी सर्कुलर से हड़कंप...
राजस्थान सरकार के वित्त विभाग ने 2 जून को एक आदेश जारी किया गया है जिसमें कि तृतीय श्रेणी अध्यापकों को राज्य सरकार का कर्मचारी ना मानकर नहीं माना गया है और ऐसे जितने भी कर्मचारी अन्य उच्च पदों पर सीधी भर्ती से नियुक्त हुए हैं और पे प्रोटेक्शन का लाभ लिया है उनके वेतन नियतन पुनः कर अधिक भुगतान वसूली के आदेश जारी करने की तैयारी की जा रही है।
इस परिपत्र के अनुसार राज्य के सार्वजनिक उपक्रमों/ स्वायत्तशासी संस्थाओं/ स्थानीय निकायों एवं पंचायतीराज संस्थाओं के कार्मिक राज्य सरकार के कर्मचारी नहीं हैं, अतः ऐसे कार्मिक यदि सीधी भर्ती के माध्यम से राजकीय सेवा में नियुक्त होते हैं तो उन्हें राजस्थान सेवा नियम, 1951 के नियम 24 एवं 26 के अंतर्गत पूर्व पद का वेतन संरक्षण(Pay-protection) देय नहीं होगा।
जिसके आधार पर मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारियों द्वारा कार्यालय स्तर पर कमेटियों का गठन करके सेवा-पुस्तिकाओं का भौतिक सत्यापन किया जा रहा है। जिनमें ऐसे कार्मिक जो पूर्व में अध्यापक तृतीय श्रेणी में थे अथवा अन्य विभाग से अध्यापक तृतीय श्रेणी पर नियुक्त हुए, की सेवा-पुस्तिकाओं में वेतन-संरक्षण(Pay-protection) को त्रुटिपूर्ण और नियम विरुद्ध बताया जा रहा है।
ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग के दिनांक 14/3/11 के परिपत्र के प्रारंभिक शिक्षा, स्कूल शिक्षा विभाग के अधीन है एवं तृतीय श्रेणी अध्यापकों की भर्ती प्रक्रिया के अतिरिक्त समस्त सेवा प्रकरण पैतृक विभाग अर्थात स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा संपादित किए जाने हैं। अतः जिन अध्यापकों की नियुक्ति जिला परिषद/ पंचायत समिति के माध्यम से तृतीय श्रेणी अध्यापक के रूप में हुई थी तथा वर्तमान में उनका पैतृक विभाग शिक्षा विभाग ही है।
उल्लेखनीय है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी एक प्रकरण में निर्णय दिया है जिसमें पंचायती राज संस्थानों के सभी कार्मिकों को राज्य सरकार के कार्मिक माना गया है, ऐसी स्थिति में यदि किसी प्रकार की वसूली के आदेश होते हैं तो सारे शिक्षक कोर्ट की तरफ जाएंगे जो खुद सरकार के लिए झंझट ही होगा ।
(जैसा शिक्षकों ने बताया है)
@Profdilipmandal इस इंश्योरेंस का प्रीमियम कौन भरता है ?
वर्ल्ड बैंक !
नोट छाप छाप कर अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ाने से क्या होगा ?
विश्व में सिर उठाकर चलने के लिए दो चीजें हैं।
पहली पासपोर्ट की वैल्यू,
और दूसरी कैरेंसी की वैल्यू ।
आप बहुत विद्वान आदमी हैं, लालच में आकर कुछ भी अंटशंट मत लिखिए।
ऐसी जातियां जो पारम्परिक रूप से युद्ध /संगठन आदि में थी, जिनमें राजपूत,सिख,जाट, यादव,अहीर, गोरखा मराठा, गढ़वाली, मीणा, नायक और एससी वर्ग में आने वाली कुछ अन्य जातियां आदि शामिल हैं।
इन सब जातियों में स्वयं सेवक संघ जैसे संगठनों की कितनी रूचि है ?
या फिर इन सबकी संघ में कितनी रूचि है ?
फलित ज्योतिष कुंडली फुंडली वाला खेल चाहे AI से खेलो या फिर भविष्यवाणी वाले महापुरुष से दोनों ही महत्वहीन है।
असली ज्योतिष शास्त्र यानी खगोल विज्ञान/ Astronomy का विकास एक अलग उद्देश्य के साथ हुआ था।
लेकिन फलित ज्योतिष यानि Astrology सिर्फ कमाई का साधन है। फेक विज्ञान है।
स्त्री अगर पूरे वस्त्र भी पहन लेगी तो भी एक्स रे वाली आंखें उन्हीं जगहों पर घूमेंगी जहां अब घूम रही हैं। प्रोब्लम वस्त्र नहीं है, प्रोब्लम कहीं और है।
आखिर ऐसी रीले वायरल क्यों हो जाती हैं। कौन लाइक करता है इन्हें, आपने स्वयं इसे पोस्ट किया है। आप अपनी बात बिना इस वीडियो के या अन्य सांकेतिक वीडियो के सहारे कह सकते थे।
आदरणीय बंधुओ ये कैसा समाज का निर्माण हो रहा
महिलाओं के बदन पर चंद लाइक व्यू के लिए कपड़े दिन प्रतिदिन छोटे होंगे, इनके घर में कोई पुरुष नहीं है, पुरुष होता तो ऐसा न करती।
यह जिनकी हथेलियों की फोटो पोस्ट करेंगे वे सब कामकाजी व्यक्ति होंगे,और जो इनको कमेंट में हथेलियों की फोटो पोस्ट करेंगे उनमें 99.99 प्रतिशत निठल्ले ही होंगे। 🤣
आशा ही जीवन
यह युवा दो दिन पहले शिक्षक भर्ती में राजस्थान के टॉप-5 में चयनित हुआ है। इसके मां-पिता का बचपन में ही निधन हो चुका था। इसका चयन बीते दिनों चतुर्थ श्रेणी भर्ती में भी नहीं हो था, लेकिन अब टॉपर है। शीघ्र ही इसका चयन RAS में भी होगा। क्या आपके हाथ में भी है ऐसा योग?
🤣 लगता है भाई ने पहले ही Insurance + Health Insurance + Accident Cover सब ले रखा था...
तभी तो Confidence Level देखो "मारो, जो होगा क्लेम में आ जाएगा!" 💀😂
दैव का अर्थ भाग्य अथवा नियती होता है। जबकि अध्यात्म पुरूषार्थ है।
आपके कहने के अनुसार अगर दांपत्य जीवन की सफलता चाहिए तो या तो दंपत्तियों का भाग्य प्रबल हो अथवा अध्यात्मिक स्तर उच्च होना चाहिए।
दाम्पत्य में पति-पत्नी के अतिरिक्त एक और पक्ष होता है, दैवी अथवा आध्यात्मिक तत्त्व। पति-पत्नी के मध्य स्थायी संबंध का अस्तित्व इस तृतीय तत्त्व पर ही निर्भर करता है, इसलिए दम्पति को एक दूसरे के प्रति उत्तरदायी होते हुए इस दैवी तत्त्व के प्रति और महत्तर निष्ठा रखनी पड़ती है।
@jeevanyatraa कोई नहीं जानता, सिर्फ कयास है।
भारतीय दर्शन ने जो लाखों करोड़ों वर्षों के युग और कल्पों का उल्लेख किया है वह कोई गणना नहीं है, वह यह दर्शाने के लिए है कि इस सृष्टि का आदि अंत समझना नामुमकिन है। साथ ही चक्रीय व्यवस्था भी बताई जिससे यह अनादि और अंतहीन हो जाती है।