*ऐसा इमाम तलाश कीजिए जो मुर्दा दिलों में इंक़लाब पैदा कर दे*
"मुर्दों को बख्शवाने वाले इमाम तो हर दौर में बहुत मिल जाएंगे लेकिन मुर्दा दिलों में ईमान, इश्क़े रसूल और ख़ौफ़े ख़ुदा की रूह फूंककर उन्हें ज़िन्दा कर देने वाला इमाम कहां है?"
"अगर दीन की सच्ची जागृति चाहते हो, तो अपनी मस्जिदों के लिए, ऐसे इमाम की तलाश करो जो क़ब्र वालों से पहले ज़िन्दा लोगों के दिलों को आबाद करे, जो सोई हुई उम्मत को जगाए, गाफ़िलों को राह दिखाए और दिलों में अल्लाह व रसूल की मोहब्बत पैदा कर दे।"
मुर्दों को बख्शवाना आसान है मगर मुर्दा दिलों को ज़िन्दा करना सच्चे इमामों / रहबरों का काम है। ऐसे इमाम की तलाश कीजिए जो मस्जिद के मिम्बर से सिर्फ़ बातें न करे, बल्कि दिलों में इंक़लाब पैदा कर दे।
*सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी*
चेयरमैन एवं चीफ़ क़ाज़ी: ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन
*क्या यह इमाम हुसैन की याद है या बेअदबी?*
इस्लाम के इतिहास में यदि किसी नाम पर पूरी उम्मत का सिर अदब से झुकता है, तो वह नाम है सय्यदुश्शुहदा हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु का।
आप नबी-ए-करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के नवासे, जन्नत के नौजवानों के सरदार और अहले बैत के चमकते हुए सितारे हैं। कर्बला की तपती रेत पर आपने अपने ख़ून से इस्लाम की ऐसी तफ़्सीर लिखी कि क़यामत तक कोई उसे मिटा नहीं सकता।
*सर दे दिया मगर कभी सज्दा न ज़ुल्म को किया!*
*कर्बला की रेत पर हुसैन ने इस्लाम लिख दिया!!*
लेकिन अफ़सोस! आज कुछ स्थानों पर हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की याद के नाम पर ऐसे कार्य किए जाते हैं जो हर संवेदनशील मुसलमान को सोचने पर मजबूर कर देते हैं। कहीं किसी व्यक्ति को इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु का रूप देकर प्रस्तुत किया जाता है, कहीं प्रतीकात्मक पुतले बनाए जाते हैं और कहीं उन्हीं प्रतीकों पर तीर चलाने तथा उन्हें घायल दिखाने जैसे दृश्य प्रस्तुत किए जाते हैं। सवाल यह है कि क्या अहले बैत की महान हस्तियों की याद मनाने का यही तरीक़ा है?
*जिनके सज्दों से ज़माने को इबादत मिल गई!*
*क्या उन्हें तस्वीर और पुतलों में समेटा जाएगा?!!*
हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु कोई नाटक का पात्र नहीं थे कि कोई अभिनेता उनका किरदार निभाए। वे वह महान हस्ती हैं जिनके बारे में सरकारे दो आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया: "हुसैन मुझसे हैं और मैं हुसैन से हूँ।"
जिस व्यक्तित्व से रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की इतनी गहरी निस्बत हो، उसकी याद भी उसी अदब के साथ होनी चाहिए जिसकी वह हक़दार है।
*नवासा-ए-मुस्तफ़ा का है इतना बुलंद मक़ाम!*
*फ़रिश्ते भी लें अदब से जिनका हर एक नाम!!*
कर्बला का संदेश यह है कि सत्य के लिए खड़े हो जाओ, चाहे पूरा संसार विरोध में क्यों न हो। कर्बला का संदेश यह है कि अल्लाह की रज़ा के सामने अपनी हर इच्छा कुर्बान कर दो।
*कर्बला सिर्फ़ एक कहानी नहीं है दोस्तों!*
*यह हक़ और बातिल की पहचान का नाम है!!*
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम यह पूछें: क्या हमारी नमाज़ हुसैनी है? क्या हमारा चरित्र हुसैनी है? क्या हमारी ईमानदारी हुसैनी है? क्या हमारा अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना हुसैनी है? यदि नहीं, तो हमें केवल कर्बला को याद नहीं करना चाहिए बल्कि कर्बला को समझना भी चाहिए।
*हुसैनियत का दावा आसान बहुत है लेकिन!*
*हुसैनियत निभाने में ज़िन्दगी गुज़र जाती है!!*
याद रखिए! हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को पुतलों, प्रतीकों और नाटकीय दृश्यों की आवश्यकता नहीं। उनका संदेश आज भी उतना ही जीवित है जितना चौदह सौ वर्ष पहले था। ज़रूरत इस बात की है कि हम उनके विचारों को अपने जीवन में उतारें।
*न तीर चाहिए, न कोई नया मातम चाहिए!*
*हुसैन की राह पर चलने का दम चाहिए!!*
आज पूरी उम्मत को अहले बैत के अदब की ओर लौटने की आवश्यकता है। हमें कर्बला की याद को भावनाओं तक सीमित नहीं रखना, बल्कि उसे अपने चरित्र का हिस्सा बनाना है।
*हुसैन ज़िन्दा हैं अपने किरदार की बदौलत!*
*यज़ीद मर गया अपने अत्याचार की बदौलत!!*
आओ कर्बला से यह सबक लें कि: सिर कट सकता है, लेकिन सत्य नहीं। जिस्म मिट सकता है, लेकिन सिद्धांत नहीं। तलवार जीत सकती है, लेकिन अत्याचार कभी अमर नहीं हो सकता।
*क़त्ले हुसैन अस्ल में मरगे यज़ीद है!*
*इस्लाम ज़िन्दा होता है हर कर्बला के बाद!!*
*सलाम उस हुसैन पर जिसने सर कटा दिया!*
*मगर यज़ीदियत के आगे सर झुकाया नहीं!!*
अगर हुसैन को याद करना है, तो उनके मिशन को ज़िन्दा कीजिए क्योंकि हुसैनियत पुतलों से नहीं, किरदार से ज़िन्दा रहती है।
*सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी*
चेयरमैन: ग़ौसे आज़म फाउंडेशन
*ढोल बाजे, रिवाज़ नहीं बल्कि अल्लाह व रसूल की इताअत।
ढोल बजाने के लिए वक़्त है, ताक़त है, जोश है लेकिन नमाज़ के लिए न वक़्त है, न फुर्सत है, न शौक़ है। ढोल: न फ़र्ज़ है, न वाजिब है, न सुन्नत है, फिर भी कुछ तथाकथित "कन्वर्ट मुस्लिम" पूरी शिद्दत से बजाते हैं। नमाज़: जो फ़र्ज़ भी है, वाजिब भी है, सुन्नत भी है, जिसके बारे में क़यामत के दिन सबसे पहले सवाल होगा, उसी नमाज़ को पढ़ने में सुस्ती, लापरवाही और बहाने नज़र आते हैं।
याद रखिए! जिस उम्मत की मस्जिदें सूनी और ढोल नगाड़े आबाद हो जाएं, उसे अपने हालात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। ढोल की आवाज़ से पहचान नहीं बनती, मुसलमान की पहचान अज़ान, नमाज़, तिलावत और सुन्नत से बनती है।
आइए, अपनी प्राथमिकताएं तय करें।
ढोल बाजे नहीं बल्कि नमाज़, रिवाज़ नहीं बल्कि शरीअत और अल्लाह व रसूल की इताअत।
मस्जिद से जो रिश्ता है, वही ईमान की जान है!
सज्दों से जो दूरी है, वही रूह का नुक़सान है!!
*✍️ सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी*
चेयरमैन, ग़ौसे आज़म फाउंडेशन
*हुसैन के नाम पर आंसू बहुत हैं, हुसैन के रास्ते पर चलने वाले कम हैं : सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी*
मुहर्रम का महीना आते ही "या हुसैन" की सदाएं बुलंद होने लगती हैं। जगह-जगह मजलिसें होती हैं, सबीलें लगती हैं, नज़र-नियाज़ का एहतिमाम होता है और अहले बैत की मुहब्बत का इज़हार किया जाता है। यह सब अपनी जगह क़ाबिले-एहतराम है लेकिन एक सवाल आज भी हमारे सामने खड़ा है। क्या इमाम हुसैन सिर्फ़ अकीदत का नाम हैं या अमल का भी? क्या कर्बला सिर्फ़ एक तारीखी वाक़िआ है या हर दौर के इंसान के लिए एक ज़िंदा पैग़ाम भी?
*हुसैन से मुहब्बत है तो किरदार भी पैदा कर!*
*फ़क़त नारा-ए-हुसैन से तक़दीरें नहीं बदलतीं!!*
इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु नबी-ए-करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के नवासे, जिगर गोशा-ए-बतूल और जन्नत के नौजवानों के सरदार हैं। उनकी मुहब्बत हर सुन्नी मुसलमान के ईमान का हिस्सा है। लेकिन मुहब्बत का तक़ाज़ा सिर्फ़ आंसू बहाना नहीं बल्कि उनके पैग़ाम को अपनी ज़िंदगी में उतारना भी है। आज का सबसे बड़ा सवाल। अगर हम अपने समाज पर नज़र डालें तो हर तरफ़ अन्याय, भ्रष्टाचार, स्वार्थ, झूठ और अवसरवादिता का बोलबाला दिखाई देता है। ताक़तवर कमज़ोर को दबा रहा है, सच को समझौतों की भेंट चढ़ाया जा रहा है और इंसाफ़ को निजी हितों के तराज़ू में तोला जा रहा है। ऐसे माहौल में हमें अपने आप से पूछना चाहिए। क्या हम सचमुच इमाम हुसैन के चाहने वाले हैं? क्योंकि इमाम हुसैन का नाम लेना आसान है लेकिन उनके रास्ते पर चलना आसान नहीं।
*जो ज़ुल्म देखकर ख़ामोश रह गया यारो!*
*वह अपने दौर का मुजरिम भी है, गवाह भी है!!*
सिर्फ़ मोहब्बत नहीं, उसूल भी चाहिए। आज हर व्यक्ति अपने आपको आशिक़े हुसैन कहता है लेकिन जब सच बोलने की कीमत चुकानी पड़े, जब अन्याय के खिलाफ़ खड़े होने का समय आए, जब अपने लाभ और सिद्धांत में से किसी एक को चुनना पड़े, तब बहुत से लोग पीछे हट जाते हैं। हमने इमाम हुसैन को एक भावनात्मक शीर्षक तो बना लिया लेकिन उनके मिशन को भुला दिया। हम उनकी कुर्बानी पर आंसू तो बहाते हैं, मगर उनके संदेश को अपने चरित्र का हिस्सा नहीं बनाते।
*सर दे दिया मगर कभी बातिल से न झुके!*
*दुनिया को यह सबक़ शहे कर्ब व बला ने दिया!!*
अगर कर्बला में भी समझौता हो जाता... ज़रा सोचिए! अगर मैदाने कर्बला में इमाम हुसैन भी समझौते का रास्ता चुन लेते... अगर वह भी खामोशी को तरजीह देते... अगर वह भी अपनी जान और अपने परिवार की सुरक्षा को हक़ से ऊपर रख देते... तो क्या आज हक़ और बातिल के बीच की रेखा इतनी स्पष्ट होती? हरगिज़ नहीं। कर्बला हमें सिखाती है कि हक़ के लिए डटे रहना ही असली कामयाबी है, चाहे दुनिया उसे हार ही क्यों न समझे।
*हुसैन ने जो दिया था सबक़-ए-वफ़ा हमें!*
*अब इम्तिहान यह है कि उस पर अमल भी हो!!*
समाज को सिर्फ़ मातम नहीं, किरदार चाहिए। आज हमारी सबसे बड़ी ज़रूरत यह नहीं कि हम सिर्फ़ कर्बला को याद करें बल्कि यह है कि हम कर्बला के पैग़ाम को ज़िंदा करें। अपने भीतर सच पैदा करें। इंसाफ़ को मज़बूत करें। मज़लूम का साथ दें। ज़ालिम का विरोध करें और हर हाल में हक़ का दामन थामे रखें। याद रखिए। हुसैनी होना सिर्फ़ मुहब्बत का दावा नहीं, बल्कि सत्य, न्याय, साहस और कुर्बानी का नाम है।
*मातम से नहीं बदलेगी तक़दीर-ए-ज़माना!*
*किरदार में पैदा करो अंदाज़-ए-हुसैन!!*
अपने दिल में झांकिए। अगर हमारे अंदर सच के लिए बेचैनी नहीं... अगर मज़लूम के लिए दर्द नहीं... अगर अन्याय के खिलाफ़ ग़ुस्सा नहीं... अगर समाज और राष्ट्र के लिए कुर्बानी का जज़्बा नहीं... तो हमें अपने दावों पर दोबारा विचार करना चाहिए।
*दिलों में अगर चराग़-ए-हुसैन रौशन हो जाए!*
*अंधेरों का हर एक लश्कर फ़ना हो जाए!!*
सिर्फ़ नारे नहीं, अमल चाहिए। आइए! हम केवल नारों तक सीमित न रहें। हम केवल भावनाओं तक सीमित न रहें। हम केवल रस्मों तक सीमित न रहें बल्कि इमाम हुसैन के पैग़ाम को अपने घरों, संस्थाओं, राजनीति, समाज और व्यक्तिगत जीवन में उतारें क्योंकि इतिहास गवाह है, इमाम हुसैन को मानने वाले बहुत थे, लेकिन इमाम हुसैन के साथ खड़े होने वाले बहुत कम थे।
*उठो कि वक़्त पुकारे, हुसैनी बन जाओ!*
*सितम के सामने दीवार-ए-आहनी बन जाओ!!*
अंत में सिर्फ़ एक सवाल। क्या इमाम हुसैन सिर्फ़ हमारी ज़ुबान पर हैं या हमारे चरित्र में भी? क्योंकि इमाम हुसैन से मुहब्बत का असली सबूत आंसू नहीं, बल्कि चरित्र है। नारा नहीं, बल्कि कर्म है। दावा नहीं, बल्कि त्याग है।
*कल हश्र में पूछा जाएगा इतना ही फ़क़त!*
*हुसैन का नाम लिया था या रास्ता भी चुना था?!!*
✍️ सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी
चेयरमैन: ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन
🔥 असम स्कूल बीफ विवाद: सच क्या है? 🔥
क्या 5 छात्रों के आरोप के आधार पर पूरे समुदाय को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है?
क्या इस्लाम किसी पर ज़बरदस्ती भोजन थोपने की अनुमति देता है?
क्या भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब को बदनाम करने की कोशिश हो रही है?
क्या मीडिया ट्रायल से पहले निष्पक्ष जाँच नहीं होनी चाहिए?
📺 India News की राष्ट्रीय बहस में मैंने कुरआन, संविधान, भारतीय संस्कृति और इंसाफ़ के सिद्धांतों के आधार पर अपना पक्ष रखा।
⚖️ दोषी को सज़ा मिले, लेकिन निर्दोष को बदनाम न किया जाए।
🇮🇳 नफ़रत नहीं, न्याय चाहिए। 🤝 टकराव नहीं, संवाद चाहिए। 📖 अफवाह नहीं, सच्चाई चाहिए।
पूरा वीडियो बहुत ही जल्द अपलोड होगा।
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी, चेयरमैन: ग़ौसे आज़म फाउंडेशन
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