जिस तरह की जानकारी सामने आ रही है, उससे साफ़ दिख रहा है कि यह स्थिति अचानक नहीं बनी - इसे इंडिगो ने ब्लैकमेलिंग के लिए जानबूझकर पैदा किया है।
DGCA ने एयरलाइंस को नए नियम लागू करने के लिए 6 से 18 महीने की ट्रांजिशन विंडो दी थी। Air India ने तैयारी की, Akasa और Vistara ने भी अपने ऑपरेशंस पर असर नहीं पड़ने दिया।
लेकिन इंडिगो -जिसके पास 60% से अधिक मार्केट शेयर है -न तो पायलट हायर किए, न शेड्यूल एडजस्ट किया। बल्कि उल्टा, रूट्स बढ़ाती रही।
और जब नियम लागू हुए, तो कंपनी यात्रियों की असुविधा को ढाल बनाकर सरकार को ब्लैकमेल कर रही है।
और यह ब्लैकमेलिंग किसलिए? ताकि पायलट बिना पर्याप्त आराम के उड़ान भरते रहें और कंपनी की जेब भरी जाती रहे। यह सुरक्षा के साथ सीधा समझौता है।
और एक बड़ा सवाल -इतना संवेदनशील सेक्टर होने के बावजूद नागरिक उड्डयन मंत्रालय क्या ऐसी स्थिति आने का इंतज़ार करता रहा?
इसी मुद्दे की जानकारी और विश्लेषण के साथ- यह वीडियो सेशन 👇🏽👇🏽
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ध्यान दीजिएगा-एक पैटर्न बन रहा है। और खासकर विपक्षी पार्टियों के समर्थकों को इसे समझने की जरूरत है।
लोकसभा चुनाव में हार की खीज में मतदाताओं को अपमानजनक लहज़े में कहा गया कि 5 किलो अनाज के बदले वोट बेच दिया।
अब बिहार चुनाव के बाद वही मानसिकता दोहराई जा रही है-कि बिहारी मतदाताओं ने 10,000 रुपये में वोट बेचा है, ये अपनी दुर्गति के लायक हैं।
सोशल मीडिया खोलिए-ऐसे हजारों कमेंट और कंटेंट मिल जाएंगे जिनमें बिहार के मतदाताओं को दोषी, लालची, अनपढ़ और डिज़र्विंग ऑफ मिसरी बताया जा रहा है।
चुनाव खत्म होते ही मतदाताओं को गाली देने और उन्हें नीचा दिखाने का यह रवैया सिर्फ एक बात बताता है-कि जिन लोगों को जनता तक पहुँचना चाहिए था, वो जनता को ही समस्या समझने लगे हैं। और यह व्यवहार मतदाताओं को दूर कर रहा है, जोड़ नहीं रहा।
मतदाता को गाली देकर, मजाक बनाकर या नीचा दिखाकर आप उनसे दूरी ही बढ़ा रहे हैं।
असल समस्या यह है कि welfare के नाम पर freebie और direct cash transfer को राजनीतिक टूल की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। यह जनता की बदहाली और आर्थिक कमजोरी का फ़ायदा उठाने जैसा है-और यह स्थिति अपने आप में बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
देश में freebie culture और cash-for-votes पर गंभीर सार्वजनिक बहस होनी चाहिए। पैसा या सामान बाँटकर वोट ख़रीदने की प्रवृत्ति पर रोक लगे, चुनाव प्रक्रिया में सुधार हो-यह राजनीतिक दलों, केंद्र और राज्य सरकारों, चुनाव आयोग और अदालतों की जिम्मेवारी है।
सत्ता में बैठी पार्टियों ने anti-incumbency का काट freebie और कैश ट्रांसफर में खोज लिया है। उनके पास ज़्यादा संसाधन हैं और अपनी बात जनता तक पहुँचाने के ज्यादा विकल्प भी हैं।
जो पार्टियाँ अभी विपक्ष में हैं, उनके सामने चुनौती छोटी नहीं है। लेवल प्लेइंग फ़ील्ड लगातार घट रहा है, लेकिन इसका समाधान सिर्फ परिश्रम और जनता के बीच निरंतर उपस्थिति में है। चुनाव ख़त्म हो जाने के बाद भी उन्हें लोगों के साथ रहकर-उनके मुद्दे समझने होंगे, उनके सुख-दुख में शामिल होना होगा, मतदाता की भावनाओं को समझना होगा, उसकी आवाज सुननी होगी और उसकी जरूरतों को पहचानना होगा।
इसके साथ ही संगठन को मजबूत करना, कार्यकर्ताओं को तैयार करना और टिकट वितरण व नेतृत्व में सही सामाजिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना होगा
और आखिरी बात - अपने बनाए सोशल मीडिया बबल या इकोचेंबर से बाहर निकलकर, बाहर की असली आवाजों को सुनना पड़ेगा।
कैंसर एक ऐसी बीमारी ने जिसने करोड़ो घर तबाह किए हैं ।
सिर्फ मरीज ही नहीं बल्कि मरीज के परिवारों को ।
दवाइयों का खर्च वहन करते करते लोग टूट जाते हैं ।
और कैसे नहीं टूटेंगे अगर 600 रुपये की दवाई पर सरकार ने छूट दे रखी है 12000 रुपये MRP रखने की ।
जी हाँ ।
दवाई है Paclitaxel ।
रिटेलर खरीदते हैं 600 में और MRP है 12000.
एक मरीज को कई बार 20-30 vial की ज़रूरत पड़ती है ।
और ये कोई एक दवाई की बात नहीं ।
कीमोथेरेपी की ज़्यादातर दवाइयों का यही हाल है ।
200% मार्जिन भी समझ में आता है लेकिन 1900% margin??
वो कैंसर जैसी बीमारी में , जिसका इलाज वैसे भी काफ़ी लंबा चलता है??
ग़रीब तो मर ही जाएगा ना?
ये तो ठीक नहीं हैं ना साहब ?
@PMOIndia
छोटे छोटे बच्चों में कैंसर और डायबिटीज जैसी बीमारियां हो।रही हैं ,
और हम बड़े चाव से बच्चों को ये सब खिला रहे हैं , इन सबको कंट्रोल करने वाली संस्था FSSAI में फर्जी तरीके से डायरेक्टर चुने जा रहे और पॉलिसीज केवल कॉपी पेस्ट हो रहीं।
एक ही कंपनी इंडिया में बीमारी बेच रही और अमेरिका में हेल्थ कांशियस प्रोडक्ट्स,
क्योंकि यहां पर रखवाली करने सो रहे और वहां पर नए हेल्थ पैरामीटर्स पर काम हो रहा ।
🚨 डिजिटल क्रांति का असली चेहरा 🚨
रिलायंस जियो ने शुरुआत में “फ्री इंटरनेट” और “फ्री कॉल” का सपना दिखाया — देश ने इसे डिजिटल आज़ादी समझा।
लेकिन असल में ये डिजिटल गुलामी की चाल थी।
पहले ₹149 का प्लान, फिर ₹249, फिर ₹349 — अब ₹899 तक जा पहुँचा। नेटवर्क वहीं, स्पीड वहीं — बस लूट की दर बढ़ गई।
TRAI और सरकार दोनों मौन हैं — क्योंकि इस खेल के दोनों हिस्सेदार हैं। “डिजिटल इंडिया” के नाम पर जनता को डेटा की लत लगा दी गई — अब बिना नेट कुछ नहीं चलता।
वॉयस-ओनली रिचार्ज गायब, हर काम के लिए डेटा ज़रूरी — यानी मजबूरी का नेटवर्क युग।
गरीब से लेकर मध्यम वर्ग तक रोज़ाना कट रहा है,
और कॉर्पोरेट साम्राज्य अरबों कमा रहा है।
ये “Digital India” नहीं — 👉 Corporate India है,
जहाँ जनता यूज़र नहीं, शिकार बन चुकी है। 🕳️📶
चाहो तो इसका टैगलाइन रखो —
#JioSeJudaDesh, JaalMeinPhansaDesh 🤡
Jio के खराब नेटवर्क के बारे मे जब से ट्विट किया है
कम्पनी वाले कॉल पर कॉल कर रहे है, और अंत मे आज पल्ला झाड लिया की नेटवर्क उपलब्ध नहीं करा सकते।
रिट्वीट करो और कमेंट्स मे अनुभव शेयर करो
#देश_का_लुटेरा_अम्बानी@reliancejio@JioCare
बहुत दिनों से लोकपाल की कोई खोज-ख़बर नहीं आई थी, अभी एक ख़बर आई है -एकदम सही वजह से।
लोकपाल की तरफ़ से सात लग्जरी BMW कार खरीदने के लिए टेंडर जारी किया गया है। प्रत्येक कार की कीमत लगभग 70 लाख बताई जा रही है -यानी कुल मिलाकर लगभग 5 करोड़ का ख़र्चा बैठ रहा है।
बताया जा रहा है कि ये गाड़ियाँ लोकपाल और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के आधिकारिक उपयोग के लिए होंगी।
सही बात है -समर्थन होना चाहिए। देश की भ्रष्टाचार-निरोधी सर्वोच्च संस्था के अधिकारी कैसे सामान्य कार में चल सकते हैं? आखिर इससे देश में क्या संदेश जाएगा!
इससे सस्ती कार में बैठकर भ्रष्टाचार को खत्म भी नहीं किया जा सकता है।
Transparency ख़त्म
गलतिया छुपाओ
जिसको मर्जी घुसाओ
#SSC phase X के exam में
93 questions same repeat हुए थे ।
तमाम सवाल ग़लत थे । अब ऐसी और गलतिया पकड़ में ना आए - उसके लिए सब छुपा लो #ssccgl2025@SSC_GoI ?
IRCTC के दलालों के अलावा आखिर कोई तत्काल टिकट क्यों नहीं बुक कर पाता? 🎟️
क्या रेलवे और दलालों की कोई अंदरूनी सांठगांठ है?
हर रोज़ 10:00 बजे साइट खुलती है और 10:00:30 पर सोल्ड आउट!
सवाल है — ये टिकट जनता से पहले किसके सिस्टम में पहुँच जाती हैं?
क्या रेलवे के सर्वर हैक हुए हैं या अंदर ही कोई खेल चल रहा है?
क्यों आम आदमी हर बार वेटिंग लिस्ट में फँसता है और दलाल मिनटों में कन्फर्म टिकट निकाल लेते हैं ??
क्या रेलवे के अधिकारी भी इस डिजिटल लूट का हिस्सा हैं ??
“हम जीत गए! कोई भी अपने लेबल पर 'ORS' नहीं लिख सकता”
◆ किसी भी फूड-ड्रिंकिंग प्रोडक्ट पर अब ORS का लेबल लगाने के लिए WHO से मंजूरी जरूरी होगी, FSSAI ने जारी किए आदेश
◆ हैदराबाद की बच्चों की डॉ. शिवरंजनी संतोष ने इसके लिए 8 साल लड़ाई लड़ी, और जीतने के बाद इमोशनल हो गईं
◆ डॉ. का मकसद गलत मार्केटिंग रोककर असली ORS को पहचाना जाए, ताकि बच्चों को मीठे पेयों से नुकसान न पहुंचे
#ORS | Hyderabad Doctor | ORS | #FSSAI
SSC परीक्षा में अनियमितताओं को लेकर प्रदर्शन कर रहे छात्रों और शिक्षकों पर पुलिस द्वारा लाठीचार्ज और हिरासत में लेने की खबरें हैं। पुलिस-प्रशासन का छात्रों के प्रति यह रवैया बेहद शर्मनाक है।
छात्रों को बार-बार इस स्थिति का सामना करना पड़ रहा है कि उन्हें सिर्फ सुचारू और पारदर्शी परीक्षा की मांग के लिए सड़क पर उतरना पड़ता है। अपनी जायज मांगों को लेकर आवाज उठाना उनका अधिकार है, लेकिन प्रशासन उनकी आवाज सुनने के बजाय उन्हें दबाने की कोशिश कर रहा है।
किसी महान आदमी ने कहा था कि अगर देश ख़तम करना है तो शिक्षा व्यवस्था ख़तम कर दो अपने आप देश ख़तम हो जायेगा !
ऐसा ही आज हमारे देश में हो रहा है छात्र और शिक्षक विरोध भी नहीं करने दे रहे पुलिस पकड़ रही है
#CHANGE_SSC_VENDOR#NO_Wrong_SSC_Question
रेलवे का नया नियम - शिकायत मत करो, यात्री हो तुम अधिकारी नहीं। शिकायत की तो समझो सफर AC से नहीं, ICU से तय होगा।
भारतीय रेल में ग्राहक भगवान नहीं, केवल अगला नंबर है पिटने वाला इंसान।
चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में ग्राहक सेवा एक ऑप्शन है, लेकिन सुताई - वो पैकेज में फिक्स है।