हिंदू परिवार की बिटिया की शादी में गीत गाते इमरान भाई ❤️
प्रिय भाई आयुष (@TheAyushVoice) ने जब ये वीडियो पोस्ट किया था तभी से ये दिलो - दिमाग़ में रच बस गया है, बीच - बीच में सुन लेता हूँ, डाउनलोड करके रखा है।
यही है हिंदुस्तान
यही है हिंदुस्तानी तहज़ीब
यह मेरा बनारस है। यहां जामुन भी घर की बेटी है लंगड़ा आम भी घर का बेटा। न जाने किसकी इस शहर को नजर लग गई। कवि कह रहा है
कल्लो रानी आए गयीं
नाचत कूदल आए गयीं
खेलत कूदत आए गयीं
ससुरे से आए गयीं
नहिरे में छा गयीं
हमहुं काली हैं
तुमहुं से काली है
कौवे से काली हैं
नाचत कूदल आए गयीं
खेलत कूदत आए गयीं
कल्लो रानी आए गयीं
कल्लो रानी आए गयीं
कलाकार गुमनाम सी कविता को वायरल कर सकता है। कलाकार चाहे तो गिरते समय को रोकने में सब कुछ झोंक सकता है।
कलाकार चाहे तो ‘बच्चन’ की अभिलाषा छोड़कर लोक और कला के कर्तव्य की ओर देख सकता है।
भारत के कलाकारों, लेखकों और साहित्यकारों के ‘गिरने के गौरव गान’ के बीच राजेंद्र जी का कविता पाठ रीढ़ सीधी रखने की याद दिलाने वाला है ।
कविता : गिरो
कवि : हूबनाथ पांडे
कविता पाठ : राजेंद्र गुप्ता
हूबनाथ पांडेय की कविता- “गिरो” - राजेंद्र गुप्ता जी की ज़ुबानी
गिरो
गिरो कि अभी और गिरने की संभावनाएं भरपूर हैं
इतना गिरो कि गुरुत्वाकर्षण बल भी शर्म के मारे गिर पड़े
अभी तो गिरने की शुरुआत है
गिरने के अपने सामर्थ्य पर भरोसा गिरने मत दो
सारा विश्व तुम्हारा गिरना देख रहा है
और ख़ुद न गिर पाने पर अफ़सोस कर रहा है
गिरो !
पर अकेले मत गिरो
रुपए के साथ गिरो
चरित्र के साथ गिरो
गर्व के साथ गिरो
कि एक तुम्हीं हो
जिसमें गिरने का इतना साहस है
उस साहस के साथ गिरो
बेशर्मी के साथ गिरो
बेदर्दी के साथ गिरो
कि दुनिया तुमसे गिरना सीख रही है
किसी एक ही मामले में सही तुम्हें विश्वगुरु होने से कोई रोक नहीं सकता
आनेवाली पीढ़ियां तुम्हारे गिरने में
अपने गिरने की संभावनाएं तलाशेंगी
वे तुमसे भी ज़्यादा गिरने का पराक्रम करेंगी
उनके पराक्रम पर यकीन करते हुए
ज़रा और ज़ोर से गिरो
थोड़े शोर से गिरो
चारों ओर से गिरो
निपट भोर से गिरो
और गिरते रहो, गिरते रहो
यह सच है
कि इससे पहले
तुम्हारी तरह कोई नहीं गिरा
इसका कोई नहीं गिला
बल्कि तुम्हें तो ख़ुश होना चाहिए
कि सदियों से खड़े समाज को
तुम गिरना सिखा रहे हो
एक ही जगह खड़े खड़े
लोग जड़ हो गए थे
उन्हें जड़ से तुम्हीं हटा रहे हो
यह कोई आसान काम नहीं
जो तुम ज़माने को बता रहे हो
कि जो गिरने में असमर्थ हैं
वे तुम्हारी आलोचना करेंगे
तुम्हारी निंदा करेंगे
इन सबसे घबराना नहीं
गिरने से डगमगाना नहीं
आज तक जो कुछ न गिरने के लिए प्रतिबद्ध था
वह सब लेकर गिरो
धर्म लेकर गिरो
कर्म लेकर गिरो
देश लेकर गिरो
भेस लेकर गिरो
पेड़ लेकर गिरो
रेंड़ लेकर गिरो
पानी लेकर गिरो
पहाड़ लेकर गिरो
सावन लेकर गिरो
अषाढ़ लेकर गिरो
प्रकृति लेकर गिरो
संस्कृति लेकर गिरो
विकृति लेकर गिरो
ओ वर्तमान सदी के महानतम महापुरुष
पूरी कायनात को दिखा दो कि तुम और कितना गिर सकते हो
कल हो सकता है
कि तुम्हारा गिरना देखकर ही
लोगों में उठने की कामना जाग उठे
आनेवाली पीढ़ियों को उठने का अर्थ बताने
के लिए
कम और ज़्यादा गिरने का फ़र्क बताने के लिए गिरो!
बिना किसी की फ़िक्र
सिर्फ़
और सिर्फ़
गिरो!
गिरते रहो!
जब तक
गिरने की प्रक्रिया
निष्क्रिय न हो जाय !!!
गिरो! गिरो! गिरो!
हूबनाथ पांडे जी की कविता : राजेंद्र गुप्ता जी ने कविता के साथ पूरा न्याय किया है.
“गिरो, गिरो, गिरो और गिरने की संभावनाएं भरपूर हैं. इतना गिरो कि गुरुत्वाकर्षण बल भी शर्म के मारे गिर पड़े, गिरो……
…..गिरो वर्तमान सदी के महानतम महापुरुष ! पूरी कायनात को दिखा दो कि तुम और कितना गिर सकते हो….
कल हो सकता है कि तुम्हारा गिरना देखकर ही लोगों में उठने की कामना जाग उठे…..और आने वाली पीढ़ियों को ‘उठने का अर्थ’ बताने के लिए, कम और ज्यादा गिरने का फर्क बताने के लिए गिरो!”
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