When BJP’s founder, Shyama Prasad Mukherjee, was himself a devout Buddhist, why the heck does the BJP IT Cell allegedly have a problem with Buddhism or conversion to Buddhism? Buddha Dhamma is a Sanatan Dharma.
बाबा साहब डॉ आंबेडकर की तस्वीर फाड़ दी गई, लड़कियों को बुरी तरह से घसीटा गया। थाने में आंबेडकवादियों के साथ बदसलूकी हुई।
IIT बॉम्बे में सांस्थानिक हत्या का शिकार हुए साहिल वकोड़े के लिए इंसाफ मांग रहे लोगों पर आंबेडकरवादियों पर @MumbaiPolice का कहर टूटा है। देखिए कैसे दलित-बहुजन समाज के लोगों को बुरी तरह घसीटा गया।
मुंबई से आई ये तस्वीरें दिखाती हैं कि कैसे @Dev_Fadnavis की पेशवाई में मुंबई पुलिस दलितों के साथ बेरहमी कर रही है।
साहिल वकोड़े के लिए संघर्ष कर रहे साथी @Sonpimplerahul, @deepali_writes, @ashu_vidrohi, @AIISCA1957 समेत सभी संघर्षशील साथियों को हमारा क्रांतिकारी जय भीम। आप सबके जज्बे को हम सलाम करते हैं। #DalitlivesMatters #JusticeForSahilWakode
So @Dev_Fadnavis is in charge of Home ministry and Crime Branch - 1 month since Sahil died -and yet no investigative arrest of Prof Dolla but his police is quick to arrest peaceful protesters @Sonpimplerahul and others at IIT Bombay gate demanding Prof Dolla be taken in custody (as per SC ST provision) and there is #JusticeforSahilWakode
जातिवादियों को अब उनकी जगह दिखाना ज़रूरी है। 🔥✊🏽
जातिवाद और सामाजिक अन्याय के सामने चुप रहना समाधान नहीं है। समानता, सम्मान और न्याय के लिए आवाज़ उठाना हर इंसान का अधिकार है।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने लिखा था:
“बुद्ध हिंसा के विरोधी थे, लेकिन वे न्याय के भी पक्षधर थे। जहाँ न्याय की रक्षा के लिए बल प्रयोग आवश्यक हो, वहाँ उन्होंने इसकी अनुमति दी। जो व्यक्ति न्याय और सुरक्षा के लिए संघर्ष करता है, उस पर हिंसा का आरोप नहीं लगाया जा सकता। यदि शांति बनाए रखने के सभी उपाय विफल हो जाएँ, तो हिंसा की ज़िम्मेदारी उस पर होती है जो युद्ध शुरू करता है। बुराई की शक्तियों के सामने कभी आत्मसमर्पण नहीं करना चाहिए। संघर्ष हो सकता है, लेकिन वह स्वार्थ के लिए नहीं होना चाहिए।”
— Buddha or Karl Marx, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर (1956)
जातिवाद के सामने झुको मत। अन्याय को स्वीकार मत करो। अपने अधिकारों, सम्मान और समानता के लिए आवाज़ बुलंद करो।
जय भीम 💙
नमो बुद्धाय 🙏🏽
@Sonpimplerahul
#जयभीम #नमोबुद्धाय #जातिवाद_बंद_करो #सामाजिक_न्याय #समानता
AIIMS ऋषिकेश में SC/ST कर्मचारियों की हड़ताल: पदोन्नति में आरक्षण नियमों की अनदेखी पर भीम आर्मी चीफ ने की ये मांग!
स्टोरी - @GitaSunilPillai@BhimArmyChief@AzadSamajParty
https://t.co/IV3emhPuEN
एक कोठे के बाहर बैठी इस मासूम सी दिखने वाली लड़की से जब एक ग्राहक इसके रेट पूछता है, तो फुल नाइट के 2000 रूपये और एक शॉट के 300 रूपये बोलती है...
ग्राहक ज्यादा पैसे बोलते हुए आगे बढ़ जाता है, लेकिन आप एक बार इस लड़की के चेहरे पर छाई उदासी को देखिए...
इसका चेहरा देखकर कोई भी इंसान बता सकता है, कि ये इस काम को अपनी मर्जी से नहीं कर रही है...
शायद इसके साथ कुछ गलत हुआ है, तभी इसे मजबूरन ये काम करना पड़ रहा है...
मुझे नहीं पता कि ये लड़की कौन है किस जगह के कोठे के बाहर बैठी है, अगर किसी को इसकी जानकारी है...
तो एक बार इस लड़की के दर्द को देखते हुए, इसे देह व्यापार के धंधे से बाहर निकालने की कोशिश जरूर करें...
अब ये नया ट्रेंड चल रहा है, जनआंदोलन में संघी गुंडों को भेजकर प्रदर्शनकारियों और स्वतंत्र पत्रकारों को टार्गेट किया जा रहा है। आज मेरे साथ भी संघी गुंडों ने यही करने की कोशिश की।
दिल्ली में अभिजीत दीपके और नेहा बोरा नोएडा के मीडिया और सोशल मीडिया दोनों 24×7 कवरेज देते हैं.
नेहा बोरा 5 मिनट भी सड़कों पर दौड़ लगा ले तो नोएडा का मीडिया 500 पत्रकारों को भेज देता है कवर करने के लिए
और 2000-3000 यूटूबर भी अपना मोबाइल ट्राइपॉड लेकर कूद पड़ते हैं.
मुंबई में बहुजन समाज के सामाजिक कार्यकर्ता राहुल सोमपीम्पले और दीपाली सालवी कई दिनों से साहिल वकोड़े के माता पिता को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
आज दोनों को डिटेन भी किया गया. इनके संघर्ष को मराठी मीडिया और मैनस्ट्रीम मीडिया कवर नही कर रहा है. सोशल मीडिया पर ही थोड़ी बहुत खबर प्रसारित हो रही है.
बहुजन समाज के सभी अकाउंट होल्डर से बिनती हैं कम से कम 2-4 पोस्ट जरूर साहिल वकोड़े के मामले चल रहे शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर लिखे.
30 साल में हम लोगों ने अपनी पूरी ऊर्जा केवल राजनीति जीतने में लगा दी. हमारे पास केवल नेता हैं जो CM PM MP बनना चाहते हैं. लेकिन मीडिया और न्यायपालिका में हमारा ना के बराबर प्रतिनिधित्व है.
Rahul Sonpimple A Unsong Hero of JNU.
राहुल सोनपिंपले का बचपन महाराष्ट्र के नागपुर में एक बौद्ध बस्ती में बिता है.
• उनके पिता रिक्शा चलाते थे.
• उनकी माँ निर्माण स्थल पर दिहाड़ी मजदूरी करती थीं.
• वे ऐसे माहौल में बड़े हुए जहां उन्हें गरीबी के अलावा जातिवाद भी झेलना पड़ा.
राहुल के पिता ऑटो रिक्शा चालक जरूर थे लेकिन वही उनके पिता तार्किक सोच वाले व्यक्ति थे और उनके पहले हीरो थे. पिता उन्हें बुद्ध, कबीर और रैदास की कहानियां सुनाते थे.
राहुल सोनपिंपले ने बस्ती से निकल कर TISS में पढ़ाई कर के मास्टर की डिग्री हासिल की. अपने टैलेंट के दम पर JNU में दाखिला लिया.
JNU एक तरफ डफलीबाज कन्हैया कुमार था जहां Lal Salaam नारा लगाया जाता था. तो दूसरी तरफ राहुल सोनपिंपले थे जो JNU में वामपंथी लिबरल जमातों को मनुवादी बताते हुए उनके खिलाफ Jai Bheem नारे के साथ मोर्चा खोल दिया.
कन्हैया कुमार ने जब "Azadi" वाला भाषण दिया तब मीडिया और सवर्ण इको सिस्टम ने कन्हैया कुमार को नायक बना दिया. JNU का अध्यक्ष भी बनाया.
राहुल सोनपिंपले ने जब अपने लोकप्रिय भाषण "Satrangi" में दलित आदिवासी पिछड़ा और मुस्लिम समाज के अधिकार और एकता की बात की तो उन्हें सवर्ण इको सिस्टम ने खलनायक बनाया.
2016 राहुल सोनपिंपले JNU के अध्यक्ष पद के BAPSA से चुनाव में खड़े हुए. AISA और SFI राहुल को हराने के गठजोड़ कर लिया. AISA-SFI के मोहित कुमार पांडेय ने राहुल सोनपिंपले को हरा दिया.
कन्हैया कुमार जय भीम जय भीम नारा लगाकर अपनी जाति के कारण कहाँ से कहाँ पहुंच गया. उसी दौर के राहुल सोनपिंपले को जातिवादी सिस्टम ने किनारे कर दिया.
साहिल वकोडे के न्याय के लिए आज कन्हैया कुमार नही संघर्ष कर रहा. साहिल वकोडे को न्याय दिलाने के राहुल सोनपिंपले लगातार प्रदर्शन, ज्ञापन और शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन चला रहे हैं.
एक बार भी मनुवादी राहुल सोनपिंपले की बढ़ती लोकप्रियता से परेशान हो उठे हैं. राहुल चाहते तो इतनी पढ़ाई करने के बाद किसी मल्टीनेशनल कंपनी में काम कर के आराम की जिंदगी जी सकते थे लेकिन उन्होंने भीम रास्ता का चूना, अपनों के लिए संघर्ष का रास्ता चुना.
अभिजीत दीपके को किस जुल्म में हिरासत में लिया जा रहा है? तिरंगा झंडा फहराने के जुर्म में!
ऐसे ही 3 मराठी युवकों को जेल भेजा गया था जब उन्होंने ने 2001 में 52 साल तक तिरंगा नहीं फहराने वाले RSS के हेडक्वार्टर पर तिरंगा फहराने का जज्बा दिखाया था!
मीडिया व मनुवादी इसे ऐसे प्रचारित कर रहे है जैसे;
"यह सभी पर लागू होता है"
यह इन लोगो पर लागू नही होता है।
"अनुसुचित जाति का जो व्यक्ति बौद्ध, सिख धर्म ग्रहण करता है, उसपर यह लागू नही होता है। उन्हें अनुसुचित जाति के आरक्षण का लाभ मिलेगा।
लेकिन कोई एससी अगर "ईसाई या मुस्लिम" बनता है तो उसका जाति प्रमाणपत्र उसी दिन से रद्द माना जाएगा"
इस मामले में एक ओबीसी व्यक्ति मुस्लिम बन गया और बाद में मुस्लिम ओबीसी की एक जाति से आरक्षण मांग रहा था। जिसे न्यायालय ने मना कर दिया।
विकास कुमार जाटव
ये दौर अंबेडकर और अम्बेडकरवादियों का है और अम्बेडकरवादी जहाँ भी है ग़दर मचाये हुए है 🔥
भाई का Salon आज़मगढ़ में है इसलिए आज़मगढ़ के साथी एक बार भाई के Salon में जरूर जाए और इंस्टाग्राम पर फॉलो भी कर ले ।